शनिवार, 17 अप्रैल 2021

"एक और ज़िन्दगी"

 


कहते हैं "शरीर मरता है मगर आत्मा अमर होती है"

और वो बार-बार नई-नई पोषक पहनकर पृथ्वी पर आना-जाना करती ही रहती है। इसे ही जन्म-मरण कहते हैं। अगर इस आने-जाने की प्रक्रिया से मुक्ति पाना चाहते हैं तो आपको मोक्ष की प्राप्ति करनी होगी और मोक्ष प्राप्ति के लिए ईश्वर से लौ लगानी होगी। बहुत से लोग इस जन्म-मरण से छूटने के लिए ईश्वर की पूजा,तपस्या,साधना और भी पता नहीं क्या-क्या करते हैं। मगर मैं..."मोक्ष" नहीं चाहती...... 


 मैं जीना चाहती हूँ 

 एक और ज़िन्दगी 


पाना चाहती हूँ 

मां का ढ़ेर सारा प्यार, 

पापा का दुलार,

खोना चाहती हूँ 

बचपन की गलियों में

 फिर से, एक बार

जहाँ ना गम, ना खुशी

मस्ती और सिर्फ मस्ती

फिर से.... 

एक घरौंदा बनाकर,

 सखियों संग गुड़ियों का,

 ब्याह रचाकर,

 नाचना-गाना चाहती हूँ। 

यौवन के प्रवेश द्वार पर,

फिर से..... 

किसी से नजरें मिला कर, 

पलकें झुकाना चाहती हूँ। 

किसी के दिल को चुरा कर, 

उसे अपने दिल में छुपा कर,

फिर से... 

एक बार इश्क में फ़ना 

हो जाना चाहती हूँ। 

छुप-छुप कर रोना,

बिना बात मुस्कुराना,

आँखें बिछाए पथ पर,

फिर से....

 उसकी राह तकना चाहती हूँ। 

दुआओं में उसे मांगकर, 

 उसको अपना बनाकर,

उसकी सांसों में समाकर,

उसकी ही आगोश में

  मरना चाहती हूँ। 

उसकी झील सी गहरी आँखों में,

जहाँ बसते हैं प्राण मेरे,

 डुब जाना चाहती हूँ।

उसकी बाहों का 

सराहना बनाकर

चैनो-सुकून से 

सोना चाहती हूँ। 

आँखें जब खोलूं 

 मनमोहन की छवि निहारु 

माथे को चूम कर

उसे जगाना चाहती हूँ। 

 होली में उसके हाथों के  

लाल-गुलाबी-पीले रंगों से 

 तन-मन अपना 

 रंगना चाहती हूँ। 

 दिवाली के दीप जलाकर,

 उसके घर को रोशन कर,

 उसके प्रेम अगन में,

 जल जाना चाहती हूँ। 

संग-संग उसके 

  हवाओं में 

उड़ना चाहती हूँ। 

बारिशों में 

भीगना चाहती हूँ। 

कोरा जो पन्ना रह गया

उस पर

ख़्वाब अधूरे

लिखना चाहती हूँ।

एक और ज़िन्दगी 

 मैं जीना चाहती हूँ......

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

"पार्क"


"पार्क" अर्थात खुला मैदान 

लेकिन बिडंबना ये है कि-इतने खुले में भी आकर सब अपने आप में ही बंद रहते हैं। पुरे मैदान में हर तरह के हर उम्र के लोग दिखते है पूरा मैदान भरा होता है मगर कोई किसी का नहीं होता। आप दुसरे को देखते है दूसरा आपको। एक दूसरे के चेहरे को देखकर बस मन ही मन ये अनुमान लगाते रहते हैं कि -क्या वो खुश है या दुखी ?क्या वो अपने जीवन से संतुष्ट है या मेरी तरह वो भी असंतुष्ट। किसी को उदास देखकर भी कोई उसके पास जाकर संतावना के दो बोल भी नहीं बोलता। हाँ,कभी-कभी उसकी उदासी आपको और भी गहरी उदासी दे जाती है तो कभी किसी की मुस्कुराहट देख आप भी मन ही मन मुस्कुरा लेते है, पास में हँसते-खेलते,खिलखिलाते बच्चों को देखकर आप भी थोड़ी देर के लिए अपने बचपन में लौट जाते हैं बस। बिना किसी के दर्द बाँटे भी शायद थोड़ी तसल्ली तो यह जरूर मिलती होगी। शायद यही वजह है कि जब अकेले कमरे में तकलीफ बढ़ने लगती है तो अक्सर लोग बाहर निकल जाते हैं सड़कों पर,पब्लिक पार्क में या किसी पब में ही। यहाँ कोई आपको तसल्ली ना भी दे तो भी आपका दुःख या आपका मूड दूसरी तरफ करवट ले लेता है,इससे दुखों का बोझ कम तो नहीं होता बस  एक कंधे से दूसरे कंधे पर चला जाता है और थोड़ा रिलैक्स हो जाते है। 

 "पार्क" हमें ही सुकून नहीं देता होगा यकीनन हमारी मौजूदगी से उसे भी सुकून मिलता ही होगा,बच्चों की किलकारियों से वो भी गुलजार रहता था बड़ों के सुख-दुःख का साक्षी होना उसे भी भाता होगा।  मगर इन दिनों तो सबका ये सहारा भी छूट गया है।आप कामकाजी है तो एक दहशत के साथ दफ्तर जा रहे हैं और  डरते-डरते घर वापस आ रहे हैं। अगर घरेलु है तो बस एक बंद कमरा और साथ में आपकी नींद उड़ाने वाली खबरें। हमारे जीवन के साथ-साथ पार्क  में भी वीरानियाँ पसरी हुई है और बच्चें चारदीवारियों में कैद है....साँझ की बेला कटे नहीं कटती।  

जीवन का ये रूप पहले कभी नहीं देखा गया था और परमात्मा ना करें आगे किसी पीढ़ी को देखना पड़ें। 

गुरुवार, 1 अप्रैल 2021

"तू मेरी लाडली"

मेरी बेटी दामिनी को जन्मदिन के उपहार स्वरूप समर्पित 


जूही की कली,मिश्री की डली। 

नाजों में पली,तू मेरी लाड़ली।। 


चन्दा से मुखडें पे,सूरज सा तेज़ है। 

कोमल तन और निर्मल सा मन है।।  

आँखों में तेरे है,सपने सुहाने। 

सितारों पे घर बनाने की रण है।। 

पंख है छोटे,ऊंची उड़ान है। 

हौसले बुलंद और दिल में उमंग है।। 


तेरे ही सपने है, आँखों में मेरे। 

लो,मैं भी चली हूँ संग-संग  तेरे।। 

तू आगे चल,मैं तेरे पीछे खड़ी हूँ। 

जग से नहीं,मैं तो रब से लड़ी हूँ।।  


मुश्किल सफर है, गिरने का डर है। 

गम नहीं, हाथ थामे तेरे जनक है।। 

 सफल होगी तपस्या हमारी। 

मिलेगी मंजिल मनचाही तुम्हारी।। 


कीचड़ में भी कमल बन खिलना। 

आत्मनिर्भर मगर,सुसंस्कृत नारी तू बनना।। 

तू मेरा मान,तू स्वाभिमान,

तू ही तो है मेरी जान लाडली।। 


ये मेरी दुआ है...  

आयेगा एक दिन, जब.... 

हर माँ के दिल का अरमान,

बहनों का अभिमान,

तू बनेगी देश की पहचान लाड़ली।। 


जूही की कली,मिश्री की ढ़ली। 

नाजों में पली,तू मेरी लाड़ली।। 

तू मेरी लाडली..... 





गुरुवार, 25 मार्च 2021

"होली के फूल"



 ये रंगीन फूल मुबारक तुम्हे हो

ये ख्वाबों की होली मुबारक तुम्हे हो। 


ख़ुशी के रंगों से रंगी है- ये दुनिया

तेरे सपनो के रंगो से सजी है-ये दुनिया। 

इस प्रिय पहर में दो खग यूँ मिले है, 

जैसे एक ही डाली पर दो सुमन खिले है। 

मेरे दिल की लाली मुबारक तुम्हे हो।। 

मेरे ख्वाबों की होली..... 


प्रेम पिचकारी में दिल के रंगों को घोल 

दिल ये कहता है,तुमसे भी होली खेलूं । 

तेरी सारी पोशाकों को रंगों से रंग दूँ, 

तेरे गालों-ललाटों पे गुलालों को मल दूँ। 

मेरे प्यार की रोली मुबारक तुम्हे हो।।  

मेरे ख्वाबों की होली-----


काश !तुमसे मैं होली में मिल पाती 

मगर, ये होली अधूरी ना होगी 

मेरे शब्दों के छीटों से खुद को रंग लेना 

हो सकें तो, इन रंगों को मुझको भी देना। 

संग-प्रीत की ठिठोली मुबारक तुम्हे हो।। 

मेरे ख्वाबों की होली मुबारक तुम्हे हो -----



आप सभी को होली  की हार्दिक शुभकामनायें 

शनिवार, 20 मार्च 2021

"पद और प्रतिष्ठा"

बात उन  दिनों की जब हम सब छोटे-छोटे थे। मेरे पापा  इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में कार्यरत थे,हमें सरकारी  क्वार्टर  मिले थे। हमारी  कॉलोनी में साफ-सफाई के लिए,बागवानी के लिए और घरों के टॉयलेट-बाथरूम तक के सफाई के लिए अलग-अलग कर्मचारी थे। उन्ही कर्मचारियों में एक थे "रामचंद्र अंकल" जी हाँ,हम उन्हें अंकल कहकर ही बुलाते थे, वो हमारे टॉयलेट-बाथरूम और नालियों की सफाई करने हर रोज आते थे। अब उन दिनों की  मानसिकता के हिसाब से आप समझ ही सकते हैं कि-घर के बुजुर्ग उनके साथ कैसा व्यवहार कर सकते हैं। उन दिनों तो छुआ-छुत जैसी बीमारी अपने प्रवल रूप में थी। लेकिन.....हमारे घरों में ये कम होता था, थोड़ा बहुत दादी करती थी बाकी कोई नहीं। लेकिन रामचंद्र अंकल के लिए पापा की सख्त हिदायत थी कि उनके साथ कभी कोई गलत व्यवहार नहीं करेगा। उन्हें दफ्तर से लेकर सबके घरों में भी उतना ही सम्मान मिलता था जितना बाकी बड़े कर्मचारियों को मिलता था। दरअसल अंकल का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि कॉलोनी के साहब भी उन्हें "रामचंद्र जी" कहकर सम्बोधित करते थे बाकी उम्र के हिसाब से भईया,चाचा अंकल बुलाते थे। साहब को पीठ पीछे गालियाँ भले दे दी जाए ,मगर रामचंद्र अंकल के लिए... पीठ पीछे भी उनकी तारीफ ही होती थी। 

पापा.. दादी कहती है कि- "रामचंद्र अंकल तो मेहतर है छोटी और नीच जाति  के है और तो और वो बहुत छोटे कर्मचारी भी है "फिर भी सभी लोग उन्हें इतना मान-आदर क्यूँ देते हैं ? मेरे भोले मन को ये बाते उलझा रही थी सो एक दिन मैंने पापा से पूछ ही लिया। पापा ने उस दिन एक बात बड़े प्यार और गंभीरता से समझाई  जो आज तक मैं कभी नहीं भूली। पापा ने कहा -"बेटा "प्रतिष्ठा"  पद और जाति से नहीं मिलती, प्रतिष्ठा अपने व्यक्तित्व और व्यवहार से कमानी पड़ती है " और रामचंद्र ने ये कमाया है। फिर पापा ने उनकी कहानी बताई-रामचंद्र अंकल के पापा इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में कार्यरत थे जब वो 14 साल के थे तभी उनके पापा गुजर गए। उनके पापा का स्वभाव भी बड़ा मृदुल था और हर एक हाकिम उन्हें मानता भी था और इज्जत भी देता था। उन  साहब लोगो ने जब रामचंद्र अंकल की आर्थिक मदद करनी चाही तो उन्होंने मना कर दिया। तब वो लोग उन्हें चाय-पानी पिलाने के लिए रख लिया और इस बहाने उनकी मदद करने लगे। जब वो 18 साल के हुए तो उनके  पापा के जगह पर ही उन्हें नौकरी पर रख लिया। 

रामचंद्र अंकल कठोर परिश्रमी,मृदुभाषी और बड़े  स्वभिमानी भी थे कभी किसी से उनका झगड़ा तो दूर कहा-सुनी भी नहीं होती, बच्चें  हो या बड़े साहब सबके साथ उनका व्यवहार नपातुला होता ,चेहरे पर शालीनता भरी एक मुस्कुराहट सदैव बनी रहती। इसी  कारण कभी कोई साहब तक भी उनके साथ दुव्यवहार कर ही नहीं पाया और उन्हें "रामचंद्र जी' ही कहकर सम्बोधित किया और अपने बच्चों से भी उनका आदर करने को कहा। 

मुझे आज भी याद है उनकी जेब टॉफियों से भरी रहती थी जो भी कोई बच्चा उनके करीब आता  तो उन्हें "नमस्ते अंकल" जरूर कहता था और वो बड़े प्यार से उसकी हथेली पर दो टॉफियाँ रख देते थे और बच्चें "थैंक्यू अंकल" कहते हुए खुश हो जाते थे। आज खबर आई कि रामचंद्र अंकल नहीं रहे.... , जिनके  व्यवहार ने बालपन में ही मुझे ये सीखा दिया था कि -"प्रतिष्टा कमानी पड़ती है"

उनकी याद आई तो ये संस्मरण आप से साझा कर लिया। 


रविवार, 14 मार्च 2021

"सीख"

अरे....बिट्टू बेटा, बाहर इतना शोर क्यों हो रहा है और बाबुजी किस पर गुस्सा हो रहे है।  

अरे चाची... क्या बताऊँ, दादा जी छोटी सी बात पर किसी औरत पर बहुत गुस्सा हो रहे है....

उसे ही अभद्र बोल रहे है....

जब कि गलती उस औरत की है भी नहीं....यदि वो दुकान से कोई सामान ले रही है 

और उसमे कुछ कमी है तो... शिकायत करना उसका वाज़िब है न 

मगर..... दादा जी को कौन समझाए..... 

यदि हम छोटी से बात भी चीखकर या गुस्से में बोले तो अभद्र हो जाते हैं... 

और जब बड़े ऐसा करे तो, उन्हें कौन रोके......

ऐसा नहीं बोलते बिट्टू, दादा जी बड़े है न.....

हाँ, चाची वही तो वो बड़े है जो करे वो सही.....

क्या बड़े कभी गलत नहीं होते ? 

मुँह बनाकर बोलते हुए बिट्टू तो निकल गया और मैं.... 

सोचती रही बात तो सही कह रहा है लेकिन मैं उसे प्रोत्साहन तो दे नहीं सकती.......

 क्योंकि वो गलत होगा और चुप रहना वो भी सही नहीं..... 

फिर मैं तो घर की नई सदस्य हूँ ......घर के रीत-रश्मों से भी बेखबर.....बोलूँ भी तो क्या ?

दिमाग ख्यालों में उलझा था.....तभी मन ने कहा -वो घर के मुखिया है और.....

 उससे भी ज्यादा वो बुजुर्ग है.....

 उनका तो सिर्फ सम्मान किया जा सकता है सवाल-जबाब नहीं....

घर-परिवार की मर्यादा तभी बनी रहती है। 

हाँ,उनसे सीख जरूर ले सकते हैं कि-

जो गलती वो कर रहे हैं वो हम ना करे.....

छोटों की नज़र में खुद का मान-मर्यादा बनाये रखना भी बड़ों का अहम फर्ज है। 

गुरुवार, 11 मार्च 2021

फिर क्यूँ??



क्यूँ ये मन उदास है ?

किसकी इसे तलाश है ?

सीने में हूक सी उठती है। 

क्यूँ दर्द से दिल ये बेजार है ?

ना कुछ खोया,ना पाया है। 

 फिर किस बात का मलाल है ?

ना रूठी हूँ,ना मनाया है किसी ने। 

 क्यूँ कहते हैं,तुमसे बहुत प्यार है ?

ना कुछ भूली,ना ही याद है। 

फिर क्यूँ उलझे से ये मन के तार है?

ना आया है,ना आएगा कोई। 

फिर मुझे किसका इंतज़ार है ?

ना प्यार है,ना शिकवा-गिला। 

फिर क्यूँ ये तकरार है ?

ना मरती हूँ,ना जिन्दा हूँ। 

क्यूँ त्रिशंकु सा बना हाल है ?

और कितने इम्तहान लेगी ऐ ज़िंदगी !

आखिर तुझे मुझे से, 

क्या दरकार  है ?

ऐ मन ! तू ही बता 

ना चाहती थी,ना चाहिए कुछ तो  

फिर क्यूँ, इतने सवाल है ?


गुरुवार, 4 मार्च 2021

"खिलतें हैं फुल बनके चुभते हैं हार बनके"


   

"रिश्ते जो जिंदगी में मिलते हैं प्यार बनके  

    खिलतें हैं फुल बनके चुभते हैं हार बनके" 

वैसे तो, सामान्य जीवन में रिश्तों का बहुत महत्व है, अनमोल होते हैं ये रिश्ते। सच्चे और दिल से जुड़े रिश्ते कभी चुभते नहीं...वो हार बनकर भी गले की शोभा ही बढ़ाते हैं। ये गीत तो आज कल के युग की एक खास रिश्ते को बाखुबी परिभाषित कर रहा है वो रिश्ते हैं "आभासी दुनिया के रिश्ते" जो आजकल समाज में यथार्थ रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण जगह बना चुका है। सोशल मीडिया के नाम से प्रचलित अनेकों ठिकाने हैं  जहाँ ये रिश्ते बड़ी आसानी से जुड़ रहें हैं और हवाई पींगे भर रहें हैं "फल-फूल भी रहें हैं" ये कहना अटपटा लग रहा है क्योंकि वैसे तो हालात कही भी नजर नहीं आ रहें हैं। 

रिश्ते बनाना अच्छी बात है..किसी से बातें करना... किसी के अनुभव से जुड़कर कुछ सीखना...किसी का दर्द बाँटना.... किसी का हमदर्द बनने में कोई बुराई नहीं है। कितना सुखद होता है ये सब... किसी अजनबी से जुड़ आप खुद को उससे साझा करते हो....वो अपना ना होते हुए भी आपका हमराज बनता है....सही है। 

तो गलत क्या है ? आजकल के ऐसे रिश्तों को देख मेरा मन अक्सर ये सवाल खुद से ही कर बैठता है तो सोचा  क्यूँ न इस पर थोड़ा मंथन किया जाए,कुछ विचार-विमर्श हो। आभासी रिश्तों में फँस कर दर्द पालते हुए लोगों को देखकर मुझे बड़ी उलझन सी होती और ऐसी परिस्थिति में मन खुद ही मंथन करने लगता है।

  तो  चलते हैं, आज से बीस साल पीछे - जब हमारे पास रिश्तों के नाम पर कुछ खून से जुड़े रिश्तें और चंद गिने-चुने दोस्त ही हुआ करते थे। अब आपका उनके साथ जैसा भी संबंध हो बस, आपको निभाना होता था। क्योंकि उससे आगे का आप सोच भी नहीं सकते थे और यक़ीनन हम खुश रहते थे....भटकाव के रास्ते जो नहीं थे। आज बे-अंत द्वार खुले हैं....अनगिनत रास्ते है....आप जहाँ चाहे विचरण कर सकते हैं....जिससे चाहे संबंध बना सकते हैं.....मेरा मतलब दोस्त बना सकते हैं....कोई रोक-टोक नहीं है....कोई पहरेदारी नहीं है...आप स्वछंद है और सबसे बल्ले-बल्ले ये है कि -उन रिश्तों को निभाने की आप पर कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं है... यूँ कह सकते हैं कि -आप बिंदास होकर इन रिश्तों का लुफ़्त उठा सकते हैं। 

अब सवाल ये है कि-क्या ये रिश्ते दिल से जुड़े होते हैं और टिकाऊ होते हैं या ये सिर्फ मनोरंजक होते हैं ? मेरे समझ से तो ये बात अपने-अपने व्यक्तित्व पर निर्भर करता है,कुछ तो सचमुच दिल से जुड़ जाते हैं मगर अधिकांश के लिए ये सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन होता है (मनोरजन करने  वालों की तादाद ही ज्यादा है ) मनोरंजन करने वाले तो मनोरंजन करके निकल लिए....कोई और खिलौना  ढूंढने मगर....जो दिल से जुड़ जाते हैं वो तो यही कहते हैं -"खिलते हैं फुल बनके चुभते हैं हार बनके" इन रिश्तों में स्पष्ट दिखता है कि -इसकी ख़ासियत कम और ख़ामियाँ ज्यादा है फिर भी इसके मोहपाश में लोग बँधते  ही जा रहें हैं।

ऐसे रिश्ते बनाने की पीछे आखिर क्या मानसिकता है ? 

 आजकल की युवा पीढ़ी ऐसे रिश्तों का खेल खेल रहें है तो उनकी मानसिकता तो फिर भी समझ आती है। क्योंकि उन्होंने तो आँखें ही इस युग में खोली है जहाँ हर चीज़ उनके लिए बस "यूज एंड थ्रो" हो गयी है। उन्हें किसी चीज़ का मोह ही नहीं है हमारी तरह। लेकिन गौर करने वाली बात ये भी है कि-पिछले दस-पंद्रह सालों में इन फरेबी रिश्तों के चक्कर में पड़कर कितने युवक-युवतियों ने ( नाबालिगों ने तो और भी ज्यादा ) अपने हँसते-खेलते जीवन को तबाह कर लिया  है। जो समझदार है वो इन आभासी रिश्तों को आभासी ही समझ मनोरंजन कर निकल आते हैं और उस हार को गले में  डालते ही नहीं जो चुभें। 

  हैंरत तो तब होती है जब प्रौढ़ लोग और उससे भी ऊपर 50-60 साल के बेटे-बहु ,नाती-पोतो से भरे परिवार वाले समझदार लोग इन आभासी रिश्तों में उलझ जाते हैं। मैं ऐसे लोगो को बदचलन या रसिक मिज़ाज की संज्ञा बिलकुल नहीं दे रही। ऐसा नहीं है कि- ये सब इन्ही तरह के लोग है,सीधे-साधे भोले प्रकृति के लोग भी इस आभासी रिश्तों के बीमारी के शिकार हुए जा रहें हैं। हाँ,मैं तो इसे "बीमारी" ही कहूँगी क्योंकि स्वस्थ मानसिकता के लोग ऐसे रिश्ते बनाते जरूर है मगर इन रिश्तों के धागों में उलझतें नहीं है,इन रिश्तों को एक मर्यादित सीमा में ही रखते हैं जो उन्हें सिर्फ खुशियाँ ही देता है। 

आखिर क्या वजह है ऐसे रिश्तों को दिल से लगाने की और उसमे दर्द पालने की ? 

आखिर क्यूँ आज सब हक़ीक़त की धरातल छोड़ आभासी आसमान में उड़ना चाहते हैं ?आखिर  क्या पाने की चाहत होती है ? कोई प्रलोभन  या दिखावे के ही सही स्नेह और अपनत्व के चंद बोल की लालसा या उलझ जाते हैं दूर से चाँद का  लुभावना  रूप-रंग देखकर या खुद के मन को खोलकर साझा करना चाहते है वो दर्द जो यथार्थ के रिश्तों में उन्हें मिले होते हैं या भरना चाहते हैं अपने मन और जीवन के ख़ालीपन को ? 

 जब एक स्त्री दूसरी स्त्री से आभासी दोस्ती की डोर में बँधती है (जो कि अमूमन कम ही होता है ) तो अवश्य ये उनके लिए सुखद है क्योंकि वो इस आभासी रिश्ते में अपनी वो बातें, अपना वो दर्द, जो वो किसी से साझा नहीं कर पाती वो सुनने और समझने वाला उसे कोई दोस्त मिल जाता है,जो उसकी बात किसी और तक नहीं पहुँचाएगी। लेकिन जब एक स्त्री और पुरुष की आभासी दोस्ती होती है तो यहाँ भी ये  फार्मूला लागू  होता है कि -"एक लड़का-लड़की कभी दोस्त नहीं होते" (अपवाद से इंकार नहीं किया जा सकता )  तो ये रिश्ते बहुत कॉम्प्लिकेटेड हो जाते हैं और अक्सर दर्द और बदनामी ही दे जाते हैं। 

फिर हमारी पीढ़ी की कुछ  खास बुराई भी है वो सपने में ज्यादा जीती है शायद हक़ीक़त  की धरातल पर उसे वो सुख नहीं मिल पता जो उसे चाहिए और दूसरा सपनों को भी सच मान यदि वो किसी रिश्ते से जुड़ गई तो उसका दर्द भी दिल में पाल लेती है। हाँ,कुछ लोग तो इस गम से निकल आते हैं कुछ का इससे उबर पाना मुश्किल होता है। यहाँ स्त्री या पुरुष कहना उचित नहीं है क्योंकि पुरुष तो पहले से समझदार थे अब तो स्त्रियाँ भी समझदार हो गयी है। 

ये कहावत बिलकुल सही है और यहाँ शत-प्रतिशत लागू होता है कि-"दूर के ढ़ोल सुहाने लगते हैं" पास आते ही वो मात्र शोर होता है। आभासी रिश्ते भी कुछ ऐसे ही होते हैं।  वैसे तो रिश्तों में थोड़ा बहुत स्वार्थ तो होता ही है मगर ये रिश्ता तो शायद, पूर्णतः स्वार्थ और आकर्षण में ही लिप्त होता है इसीलिए और जल्दी दर्द दे जाता है।( इसमें भी अपवाद से इंकार नहीं किया जा सकता)  मेरी समझ तो यही कहती है कि -आभासी  या मिथ्य रिश्तों को छोड़ यथार्थ के रिश्तों के साथ में जीना ही समझदारी है। दूर के दोस्त से भला पास का दुश्मन होता है। एक ऐसे व्यक्ति के साथ रिश्तों में उलझना जिसके व्यक्तित्व से आप पूरी तरह अनभिज्ञ हो  जो सिर्फ एक भ्रम है ये खुद को छलना ही होता है। 

वैसे एक  नज़रिये से देखा  जाए तो आभासी रिश्ते बेहद पवित्र होने चाहिए क्योंकि इसमें देह से जुडा कोई स्वार्थ नही होता। भक्त और भगवान का रिश्ता भी तो आभासी ही होता है।   कही-कही तो देखने में आता है कि -अकेलेपन के शिकार बुजुर्गों के लिए तो ये वरदान भी साबित होता हैं। कभी-कभी तो ये रिश्ते  बड़ी ही सुखद अनुभूति कराते हैं.....आप जिसे जानते नहीं....जिससे कभी देखा नहीं....उससे मन से जुड़ जाते हैं...वो अपना सा लगने लगता है....कभी-कभी तो वो पिछले जन्म का  बिछुड़ा  मीत सा लगता है। इस नज़रिये से देखा जाए तो आभासी रिश्ते बेहद खूबसूरत और सुकून देने वाले होने चाहिए।मगर ऐसा होता नहीं है..... अक्सर लोग इस रिश्ते को अपवित्र बना लेते है ( खासतौर पर स्त्री और पुरुष का रिश्ता)  क्योंकि आज की हक़ीक़त  ही यही है कि-रिश्तों से पवित्रता ही खत्म हो गई है वो चाहे आभासी हो या यथार्थ। आभासी रिश्ते भी अमूमन किसी न किसी स्वार्थ वश ही बन रहे है। 

  एक दर्द को मिटाने के लिए दूसरा गम पाल लेना ये कहा की समझदारी है। मेरी समझ तो यही कहती हैं कि -इन आभासी रिश्तों में उलझ कर एक और दर्द पालने से अच्छा है जो रिश्ते हमारे पास है उसे ही खूबसूरत और खूबसूरत बनाने में अपना मनोयोग लगाना ही उचित है। 

जिनके पास खूबसूरत आभासी रिश्ते है जो उन्हें सिर्फ खुशियां और सुकून देते है तो वो बड़े भाग्यशाली है। मैं भी भाग्यशाली हूँ,मेरे पास भी मेरी कुछ प्यारी सखियाँ है। मगर ऐसे रिश्ते जो दर्द दे उनसे खुद को बचाने में ही समझदारी है। मेरी  मनसा किसी की भावनाओं को आहत करना बिलकुल नहीं है ये बस  मेरी व्यक्तिगत सोच है आपकी राय मेरे से इतर हो सकती है और उसका मैं सम्मान भी करती हूँ। 



 

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

"ह्यूमन साइकोलॉजी"

 


 

 "आजकल पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे 

          बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए " 

इस गीत की मधुर सुरलहरी वातावरण को एक सुखद एहसास से भर रहा  है सोनाली खुद को आईने में निरखते हुए अपनी बालों को सवाँर रही है और गीत के स्वर के साथ स्वर मिलाते हुए  गुनगुना भी रही। और मैं ...खुद को निरखती हुई सोनाली को निरखे जा रही हूँ। अचानक सोनाली की नजर मुझ पर  पड़ी, मेरी भावभंगिमा को देख वो थोड़ी झेप सी गई। थोड़ा शर्म थोड़ा नखरा दिखाते हुए बोली-"क्या देख रही हो माँ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा-"बस, अपनी बेटी को खुश होते हुए देख रही हूँ....उसके चेहरे के निखरते हुए रंग-रूप को देख रही हूँ....उसके बदले हुए हाव-भाव को देख रही हूँ।वो मेरे पास आकर मुझसे लिपटते हुए बोली-" हाँ माँ,जब से राज मेरे जीवन में आया है न सबकुछ अच्छा-अच्छा सा लग रहा है" फिर मेरे चेहरे को गौर से देखते हुए पूछ बैठी -"तुम भी खुश हो न माँ"  मैं झट से खुद को उससे  अलग कर ये कहते हुए उठ गई कि -अब हटो मुझे जाने दो, बहुत काम पड़ा है। पता नहीं ऐसा क्यूँ लगा जैसे सोनाली ने मेरी दुखती रंग पर हाथ रख दिया हो या मेरी कोई चोरी पकड़ ली हो। 

(राज और सोनाली की कहानी जानने के लिए पढ़े-"पीला गुलाब " और "बदनाम गालियाँ या फूलों से भरा आँगन ")

   राज और सोनाली ने जब से मेरे सामने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया था और मैंने उनकी ख़ुशी पर अपनी रज़ामंदी की मुहर लगा दी थी तब से वो दोनों बड़े खुश रहने लगे थे और मेरे आगे भी थोड़े खुल से गए थे। अब उन्हें अपनी भावनाओं को छुपाने की जरूरत जो नहीं थी। चुकि शुरू से भी मैं उनके साथ दोस्त बनकर ही रही थी तो अब वो मुझे और भी अच्छा दोस्त समझने लगे थे और उन्हें मुझसे कोई खास झिझक नहीं थी। मगर वो अपनी मर्यादाओं का उलंघन कभी नहीं करते। राज हमारे ही बिल्डिंग के एक फ्लैट में ही रहता था तो काम से आने के बाद अक्सर वो हमारे साथ ही रहता था या यूँ कहे सिर्फ सोने अपने घर जाता था। वैसे तो ज्यादा वक़्त वो दोनों मेरे साथ ही गुजारते थे,कही भी आना जाना हो मुझे साथ ही लेकर जाते थे। मैं कहती भी कि -बेटा, आप दोनों जाओं मुझे रहने दो। पर दोनों नहीं मानते कहते, आपके बिना मज़ा नहीं आएगा....फिर आप घर में अकेली कैसे रहोगी....क्या करोगी, वगैरह-वगैरह। वो दोनों एक दूसरे के साथ खूब मौज-मस्ती करते,एक दूसरे को छेड़ते या लड़ते,लड़ने के बाद सॉरी बोल एक दूसरे को मनाते,एक दूसरे की पसंद के खाने बनाते या ऑडर कर मंगवाते, एक दूसरे के पसंद-नापसंद का भी पूरा ख्याल रखते।जब से राज मिला था सोनाली रोज सुबह उठकर मेरे लिए चाय बनाकर मुझे जगाने आती। मुझे प्यार करके जगाने के बाद कहती- माँ राज को बुला लाऊँ। मैं भी हामी भर देती वो ख़ुशी-ख़ुशी भागकर जाती और राज को बुला लाती फिर हम तीनो एक साथ ही चाय पीते। जबकि, पहले मुझे चाय लेकर सोनाली को जगाना पड़ता था। उसे ऐसा करते देख मुझे बेहद ख़ुशी होती और तसल्ली भी कि-मेरी सोनाली बड़ी हो गयी अब कल को घर-गृहस्ती का बोझ जब उसके कंधे पर पड़ेगा तो वो सरलता और ईमानदारी से संभाल लेगी। 

    उनका ये प्यार और साथ देखकर मैं खुश होती ..बहुत-बहुत खुश होती मगर, कभी-कभी मन यूँ ही उदास हो जाता। जब भी उन दोनों को एक दूसरे में मगन देखती, हँसी-ठिठोली करते देखती.....होठों पर तो मुस्कान आ जाती मगर, पता नहीं क्यूँ आँखों में आँसू भी आ जाते। उन दोनों की ख़ुशी मेरे लिए बहुत मायने रखती थी यूँ कहे अनमोल थी मगर, उनकी ख़ुशी को देखकर अंदर एक टीस सी उभर जाती। शायद, थोड़ी जलन सी भी होने लगती....एक खालीपन सा महसूस होने लगता......अपने जीवन को टटोलने लगती.....ये तलाश मुझे अतीत में धकेल देती.....अतीत में घूमते हुए खुद से सवाल कर बैठती -"क्या मैंने जीवन जिया हैं या बस वक़्त गुजरा है ?"  वक़्त भी कैसा कि- जिसे खगालने पर ख़ुशी के एक मोती तक को पाने का सुख भी ना मिलाता  हो..... एक दुःख अंदर कचोटने लगता काश,  हम भी आज की पीढ़ी में जन्म लिये होते.....हमारे माँ-बाप भी हमारी भावनाओं को समझ पाते....अतीत की गलियों में भटकते-भटकते आँखों में ऐसी चुभन होने लगती कि -आँसू स्वतः ही निकल पड़ते.....आँसुओं के खारेपन का स्वाद आते ही झट, वर्तमान में लौट आती......आँसू पोछती.....खुद को मजबूत करती और खुद से ही एक प्रण लेती....."जो मुझे नहीं मिला वो मैं  अपनी संतान को दूँगी....वो हर ख़ुशी  पाने में उनका साथ दूँगी जो उनके वर्तमान और भविष्य दोनों को महका दे।" और वो पल मुझे खुद पर ही गर्व करने के लिए काफी होता। ऐसे  लम्हे  एक बार नहीं कई बार मेरे आगे से गुजरता.....मैं उदास होती....भीतर एक टीस उभरती....जिस पर खुद ही मरहम लगाती.....खुद की हौसला अफजाई करती......खुद की ही पीठ थपथपाती मगर, खुद पर गुजरते इन पलों का एक भी असर अपनी सोनाली पर ना होने देती। 

    साइकोलॉजी पढ़ा तो बहुत था मैंने मगर,  इन दिनों मैं ह्यूमन  साइकोलॉजी के कुछ खास थ्योरी को अच्छे से महसूस कर पा रही हूँ। आप कितने भी निस्वार्थी हो जाओं, कही ना कही एक छोटा सा स्वार्थ छुपा ही रहता है......आप कितने भी त्यागी बन जाओं मगर, कही ना कही उस त्याग की कसक दिल में बनी ही रहती है..... दूसरे की ख़ुशी में कितने भी खुश हो जाओं मगर, हल्की सी जलन आपको जलाती ही है।  (वो दूसरा आपका सबसे प्रिय ही क्यों ना हो ) इतना ही नहीं खुद को किसी के ख़ुशी का निमित समझना या खुद को ये  श्रेय देना कि-मेरी वजह से ये अच्छा हुआ है, ना चाहते हुए भी आपके भीतर अहम भाव ला ही देता है। एक और सच से रूबरू हुई "बहुत ज्यादा ख़ुशी भी कभी-कभी तन्हाई और खालीपन का एहसास करवाती है।" सच,यही है "ह्यूमन  साइकोलॉजी"

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

"बैठ झरोखे सोच रही हूँ----"

मेरी पहली कविता, एक तुच्छ प्रयास 

(जानती हूँ गलतियाँ बहुत हुई होगी,यकीन करती हूँ कि-आप सब के सानिध्य में सीख भी जाऊँगी )

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बैठ झरोखे सोच रही हूँ 

क्यूँ,पतझड़ के दिन आते हैं

         हर वर्ष बसंत आकर             

क्या, जीवन-पाठ  पढ़ाते हैं  

परिवर्तन है सत्य सृष्टि का 

याद दिलाकर जाते हैं 

रंग बदलते शाखों के पत्ते 

धीरे-धीरे मुरझाते हैं 

तोड़कर बंधन 

अपनी शाखों से 

फिर धरा पर गिर जाते हैं 

 सूनी डाली हो जाती है 

दर्द लिए  बिछड़न का 

बैठी-बैठी मैं देखूं 

ढंग भी ये कुदरत का  

अगली सुबह 

अब उसी शाख पर 

नई सृजन देख रही हूँ 

छोटी-छोटी कोमल पत्तियां  

नन्हे शिशु के कोमल तन सा 

जन्म देकर नई रचना को 

 प्रकृति हमें समझाती है 

जन्म-मरण तो लगा रहेगा 

जीवन आनी-जानी है 

चंचल शैशव धीर-धीरे 

यौवन को छूता जाएगा  

यौवन खुद के रूप पर 

इठलाता नजर आएगा

लेकिन एक समय के बाद  

बुढ़ापा भी आएगा  

सत्य-सनातन है मृत्यु तो  

हे मानव ! इससे तू 

कब तक भाग पायेगा 

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चित्र-स्वयं के कैमरे से 

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

"बदनाम गलियाँ या फूलों से भरा आँगन"



 राज और सोनाली के द्वारा दिए गए पीले गुलाब की महक उस वक़्त तो पुरे वातावरण को सुखद अनुभूति से भर रहा था मगर कही एक डर भी कोने में दबा हुआ था। तो अगले दिन मैंने उन दोनों को बिठाकर पूछ ही लिया -

(राज और सोनाली की कहानी जानने के लिए पढ़ें-मेरी लघुकथा "पीला गुलाब )

" ये चाहत और पसंदगी वक्ती तो नहीं जो आज कल का रिवाज बन गया है या मैं यकीन कर लूँ कि -ये सचमुच प्यार ही है "

 मेरी गोद में सर रखते हुए सोनाली बोली -" प्यार क्या होता है माँ " ?  किसी का साथ आपको अच्छा लगने लगे,उसकी हर छोटी से छोटी बात आपके दिल को छूने लगे,उसके साथ हँसना- रोना  अच्छा लगने लगे यदि ये प्यार है तो शायद हमें प्यार हो गया है-उसने भी बड़ी सादगी से जबाब दे दिया। 

बेटा,प्यार सिर्फ साथ रहना,हँसना और रोना नहीं है,प्यार एक गहरा एहसास है,एक अत्यंत पवित्र भावना है जो हृदय के अतल गहराइयों में जन्म लेता है जो निश्छल, निर्मल और वासना रहित होता है। बाकी, आजकल तो इसकी परिभाषा बदल दी गई है। लेकिन प्यार का स्वरूप तो यही है और यही रहेगा।  

बेटा, ढाई अक्षर के इस प्यार को छूना आसान होता है पाना भी आसान होता है मगर संभालना बहुत मुश्किल।दो लोग मिलकर भी इस ढाई अक्षर को नहीं संभाल पाते।  बस  यही समझ नई पीढ़ी के पास नहीं होने के कारण प्यार का रूप बिगड़ता चला जा रहा है। आज तो प्यार दैहिक हो चुका है,दैहिक सुख को ही प्यार का नाम दे दिया गया है। माना, दैहिक मिलन प्रेम की प्रकाष्ठा होती है परन्तु, प्रेम आत्मा का मिलन है देह इसका माध्यम,देह का आकर्षण चंद दिनों का होता है और जब वो सरलता से मिलने लगता है तो बहुत जल्द ये आकर्षण फीका पड़ने लगता है फिर जिसे "प्रेम" नाम दिया जाता है वो बदलकर कोई और देह तलाशने लगता है। 

मुझे नहीं पता आप दोनों  के प्रेम का क्या रूप है मगर,यदि सच्चा प्रेम चाहते हो तो देह को परे रखना और खुद को तीन कसौटी पर तौलना धीरज-धैर्य,विश्वास और आपसी समझ-बुझ। इन तीन कसौटी पर जब खुद को खरा उतार लेना तब इस प्रेम को एक "संबध" का नाम देकर अपनी गृहस्थी की शुरुआत करना क्योंकि प्रेम के पावन रूप के सफर की असली मंजिल तो यही है। 

अब यहाँ "संबंध" का अर्थ समझना  भी बहुत जरुरी है। संबंध का मतलब एक "लेबल" नहीं है जो रिश्तों पर लगाया जाता है माँ-बाप,भाई-बहन,पति-पत्नी वगैरह-वगैरह। "संबंध" से मेरा मतलब सम+बंध भी नहीं है। क्योंकि संबंधों में समानता कभी-कभी अहम भाव को भी जन्म देती है। "संबंध" का मतलब फर्क होते हुए ऐसे जुड़े जैसे सागर से नदी। ऑक्सीजन -ऑक्सीजन मिलकर पानी नहीं बनाते ,पानी बनाने के लिए ऑक्सीजन में हाइड्रोजन की निश्चित अणु को मिलाने की आवश्यकता होती है। अतः कह सकते है कि -"संबंध से एक तीसरी वस्तु का जन्म होता है जो संबंध को  पूर्णता प्रदान करता है।" शायद,इसीलिए "दाम्पत्य-संबंध" के साथ संबंध शब्द जुड़ा है। इसीलिए दाम्पत्य-संबंध को निभाने के लिए भी धीरज-धैर्य,विश्वास और आपसी समझ-बुझ की निश्चित मात्र के मिलान की नितांत आवश्यकता होती है तभी प्रकृति में नई सृजन होती है। 

 और सबसे जरुरी बात हृदय में जैसे ही सच्चे प्रेम का भाव उत्पन्न होता है तो साथ ही साथ "समर्पण" का भाव भी स्वतः उत्पन्न हो जाती है। "समर्पण " ही सच्चे प्रेम की सही पहचान होती है। 

 मैं जानती हूँ आप दोनों में बहुत फर्क है पर यकीन भी करती हूँ कि-यही फर्क आप दोनो को आपसी ताल-मेल भी बिठाने में सहयोग करेगा। यदि फर्क इतना भी हो कि -"एक को चावल पसंद है और दूसरे को रोटी" तो प्रेम इतना हो कि -रोटी से चावल खाने में भी दोनों को सुखद अनुभूति  हो। फर्क मिटाकर चंदन और पानी की तरह घुल-मिल जाना ही "प्रेम' होता है। आगे आप दोनों खुद समझदार हो ,अपने प्रेम को आप किस ओर ले जाना चाहते हो वो आप पर निर्भर है-"बदनाम गलियों में या फूलों से भरे आँगन में"। 

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

"पीला गुलाब "



   मैं बड़ी तन्मयता से लैपटॉप पर अपने काम में बीजी थी तभी, राज और सोनाली मेरे पास आकर खड़े हो गए। मैंने सर उठाये बिना ही सवाल किया-क्या बात है ? मम्मी बिज़ी हो क्या....कुछ खास नहीं, बोलो -मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा। दोनों के चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ  शर्म और  घबड़ाहट भी साफ़-साफ़ नजर आ रही थी । मम्मी..पहले आप आँखें बंद करों, राज आपको कुछ देना चाहता है - सोनाली ने धीरे से कहा। मैंने जैसे ही राज की तरफ देखा वो भागकर कमरे के बाहर चला गया। मैं सब समझ रही थी फिर भी आँखे बंद करते हुए बोली-लो कर लिया,अब बोलो। दोनों ने मेरी गोद में एक-एक "पीला गुलाब" रखा और भाग खड़े हुए।गुलाब को देखकर मैं मुस्कुरा दी,दिल चाहा कहूँ -" I knew it" . मगर, अनजान बनी बोली -अरे,फूल दे रहे हो या मार रहें हो इधर आओ दोनों। सोनाली पास आई, राज अब भी कमरे के बाहर से झाँक रहा था। मैंने कहा -आप  क्यूँ छुपे हो आप भी आओं। राज बेहद घबड़ाया हुआ था, दोनों पास आकर बैठ गए। मैंने दोनों के माथे पर प्यार किया और दोनों को गले लगाते हुए बोली-"बेवकूफों मैं तो बहुत पहले से जानती थी तुम दोनों को ही समझने में छह साल लग गए।" 

    राज मेरा हाथ पकड़ते हुए बोला -आज "प्रॉमिस-डे " पर मैं आपसे प्रॉमिस करता हूँ कि -मैं कभी भी आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगा.....कभी आपके विश्वास और भरोसे को नहीं तोडूँगा....ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा जिससे दोनों परिवारों के मान-मर्यादा को ठेस पहुंचे, मेरे दूसरे हाथ को पकड़ते हुए सोनाली ने भी उसके हाँ में हाँ मिलते हुए सर हिला दिया। दोनों की आँखे भरी हुई थी,दोनों ने मेरी गोद अपना सर छुपा लिया। मेरी भी आँख भर आई, दोनों का माथा सहलाते मैंने हुए कहा- "मैं जानती हूँ बेटा ,मुझे आप दोनों पर पूरा भरोसा है।" थोड़ी देर तक ख़ामोशी छाई रही फिर मैंने कहा -चलो,इसी बात पर पिज्जा पार्टी करते है,राज...फटाफट ऑडर करों,तीनों ने मुस्कुराते हुए एक दूसरे को सहमति दे दी। 

राज और सोनाली की दोस्ती छह साल पहले एक इंस्टिटूइट से शुरू हुई थी। पहली मुलाकात से ही दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई थी। सोनाली जब भी उससे मिलकर आती तो  घंटों उसी की तारीफ किया करती। उस वक़्त सोनाली सत्तरह साल की थी और राज उससे छह महीने बड़ा था। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैं पहली बार राज से मिली थी। सोनाली से दोस्ती किये उसे एक महीना भी नहीं हुआ था कि अचानक एक दिन वो सोनाली के साथ  घर धमक आया था उसके साथ सोनाली का एक और दोस्त भी था। सोनाली बोली-माँ ये दोनों जबर्दस्ती घर आ गए है मैं तो लाना ही नहीं चाहती थी। फर्मलिटी करते हुए मैंने कहा-कोई बात नहीं  बेटा -ये भी तो आपका ही घर है...अब, घर आये को मैं क्या कहती। मेरी बात सुनते ही वो सोनाली को छेड़ता हुआ बोला -" सुना न, ये भी मेरा ही घर है।" मैंने उन्हें चाय-नास्ता कराया। रात के आठ बजे का वक़्त था मेरे पतिदेव ने फोर्मलिटी में कह दिया -रात का खाना-वाना खिलाकर भेजों बच्चों को,फिर क्या था दोनों डट गए बोले-हाँ अंकल, अब डिनर करके ही जाऊँगा। पहले तो मुझे बहुत गुस्सा आया -"अरे ये क्या मान-ना-मान मैं तेरा मेहमान "  पर पता नहीं क्यूँ राज को देखते ही मुझे  भी ऐसा ही लगा जैसे मैं उसे वर्षो से जानती हूँ और राज,वो तो दो घंटे के अंदर ही घर से लेकर किचन और यहाँ तक कि -डाइनिंग टेबल तक पर कब्ज़ा कर चूका था,वो मुझे खाना सर्व कर रहा था ,बिलकुल "कल हो ना हो "के शाहरुख़ खान की तरह। इससे पहले सोनाली का कोई लड़का दोस्त घर में इतनी देर कभी  नहीं रुका था ,ऐसा पहली बार हो रहा था। हम कुछ असहज थे पर राज ने कब हमें सहज कर दिया और कब वो हमारे दिल पर कब्जाकर लिया हमें पता ही नहीं चला। 

धीरे-धीरे इनकी दोस्ती बढ़ती चली गई और राज ने हमारे पुरे खानदान के दिलों में अपना स्थान बना लिया। मुझे दिख रहा था कि-इनकी दोस्ती सिर्फ दोस्ती नहीं है लेकिन "मेरी सोनाली" प्यार-मुहब्बत तो समझती ही नहीं थी। मेरी सोनाली को दोस्ती शब्द से ही इतना प्यार था कि वो हर एक को दोस्त बनाकर ही ज्यादा खुश रहती थी। कभी-कभी राज की बातों से ये स्पष्ट हो जाता कि-वो दोस्ती से आगे बढ़ रहा है। एक बार मैंने राज को टटोला भी था। उसने बड़े प्यार से जबाब दिया था -"मेरे चाहने से कुछ नहीं होता आंटी...अगर, मेरी फीलिंग वो जान जाएगी तो आप तो जानती ही है वो.....फिर मेरी दोस्त भी नहीं रहेंगी और मैं इतनी प्यारी दोस्त को खोना नहीं चाहता.....उसके साथ-साथ मैं आपको भी खोना नहीं चाहता।" राज सोनाली से भी ज्यादा मुझसे जुड़ गया था और मुझे भी वो अपने सगे बेटे सा प्यारा था। 

मगर,शायद उनकी दोस्ती को किसी की नज़र लग गई। उन दोनों में किसी बात को लेकर जबर्दस्त झगड़ा हो गया। मेरी सोनाली स्पष्टवादी है उससे कोई भी गलत बात बर्दास्त नहीं होती,अपने सिद्धांतों की इतनी पक्की है कि -उसके आगे वो प्यारा-से प्यारा दोस्त भी त्याग सकती है। जो की मुझे  भी पसंद है। मैंने सोनाली से कहा भी था "राज मुझे  बहुत प्रिय है" -उसने बड़े ही रूखे स्वर में कहा-"वो आपका बेटा रह सकता है मेरा दोस्त नहीं।" मैं समझती थी ये वक़्ती गुस्सा है। परिस्थिति ही कुछ ऐसी हो गई थी कि -उन दोनों को ही नहीं समझा सकती थी और दोस्ती टूट गई। सोनाली ने अपना दोस्त त्याग दिया मगर मुझसे अपना बेटा नहीं त्यागा गया। मैं जानती थी कि - दोनों ने ही गलतियाँ की है मगर वो गलती प्रतिकूल परिस्थितियों की वजह से हुई है। एक ना एक दिन ये ठीक हो जायेगा। राज दूसरे शहर चला गया मगर मैंने उससे कभी सम्पर्क नहीं तोड़ा। फोन से बराबर उसका हाल-चाल लेती रही। दोनों के दिलों में प्यार होते हुए भी कड़वाहट ज्यादा हावी था। मैंने भी वक़्त पर सब छोड़ दिया। 

शायद,नियति का खेल था ,चार साल बाद हम फिर मिलें।इस बीच मेरी सोनाली भी पहले से ज्यादा समझदार हो गई थी। रिश्तों में कहाँ और कैसे एडजेस्टमेंट करना है वो बाखूबी सीख चुकी थी और राज को भी अपनी गलतियों का अहसास हो गया था वो भी जिंदगी को समझने लगा था। परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि मज़बूरीवश ही उन्हें साथ समय गुजरने का मौका मिला। दोनों ने एक दूसरे की भावनाओं को समझा और उसको मान भी दिया और आज.... 

एक बार बातों-बातों में सोनाली ने मुझ से पूछा था -माँ अगर, मुझे कोई पसंद आ गया तो मैं आपको कैसे बताऊँगी....सीधे-सीधे बोलना तो मुश्किल होगा....तब,मैंने कहा था -" जिस दिन तुम्हे सच्चे दिल से किसी से प्यार हो जाये,तुम्हे लगने लगे कि -यही मेरा सच्चा साथी है उस दिन मुझे एक "पीला गुलाब" दे देना मैं समझ जाऊँगी। और ....मेरी सोनाली को सच्चा साथी मिल गया था और मुझे मेरा बेटा। आज मेरे बच्चों ने मुझे मान दिया, मेरी परवरिश को मान दिया। मुझे गर्व है अपनी परवरिश पर और उस माँ की परवरिश पर भी जिसका बेटा राज है।

" माँ कहाँ खोई हो,पिज्जा आ गया "सोनाली ने आवाज़ दी तो मैं बीते दिनों से बाहर आ गयी। मैंने हँसते हुए  डायलॉग चिपका दिया -" हमारी उम्र में पहली नज़र में ही पता चल जाता है कि लड़का-लड़की के बीच क्या चल रहा है "मगर,तुम आजकल के वेवकूफ बच्चे जिन्हे पेरेंट्स ने साथी चुनने की आज़ादी दे रखी है उन्हें बड़ी देर से समझ आ रहा है कि-"हमें क्या चाहिए"। माँअअ..कहते हुए सोनाली मुझसे लिपट गई,मैं भी-मैं भी.... कहता हुआ राज भी गले लग गया। 

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

"अश्रु गंगाजल "


 

आज ना जाने फिर क्यूँ आवाक हूँ.....अतीत और भविष्य के मध्य....वर्तमान में सतत दोलित....एक अबोध पेंडुलम की तरह.......संबंधों की डोर से बँधी.....मैं झूलती जा रही हूँ......तभी, आँखें कुछ आश्वस्त होती है.......शायद, आसमान की बुलंदियों को....छूने की मधुर कामना से......मगर, भावनाओं के अप्रत्यशित प्रहार से.....मैं चूर-चूर हो जाती हूँ....संबंधों की डोर टूट जाती है,

और तब मैं.....

    एक अनाम अतुल गहराईयों में......लुढ़कने लगती हूँ......आधारहीन  पत्थर की तरह.....तभी, भावनाओं से आहत मेरा शरीर........छपाक से किसी की आग़ोश में गिर पड़ता है.......जो शायद,मेरा ही इंतजार कर रहा था..... ना जाने कब से .......मैं कुछ कह नहीं सकती......वो इंतजार था या.....मुझ पर अनायास उमड़ा उसका दयाभाव......जिसने मुझे अपने दामन में संभाल लिया......मेरे गिरने से....... प्रतिक्रिया में उठी तरंगों की उफाने.......गर्जनघोष से नभ को ललकार उठी.......या शायद, उस प्रिय के प्रहार से व्यथित होकर.......मैं खुद हर्ष से पुलकित हो.....खिलखिला उठी थी.....एक मधुर हल्केपन का अहसास.....मेरा रोम-रोम रोमांचित हो रहा है.....

मगर ये क्या---- 

उस जल का विश्लेषण कर.......उस खारे नमकीन जल को चखकर......मैं पुनः आवाक हो जाती हूँ.....  मुझे विश्वास नहीं कि- वो जल है......अरे,यह तो मेरे प्रियतम का दिया हुआ.....पूर्व जन्म का प्रसाद है.......जो अश्रु बनकर उसकी आँखों  के कोर से......ना जाने कब से बह रहा है......और उस अश्रु गंगाजल के खारे झील में.....मैं डूबती चली गई .... .मेरे सारे जख्म भर चुके हैं..... उस अमृत का पान कर मैं निर्मल हो चुकी हूँ.......

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

"तुम्हारी आँखें हमारी आँखों से अलग थोड़े ही है "


 

 "नानी माँ, अगर मैं अपनी पसंद से शादी कर लुंगी तो क्या आप उसे अपना लेंगी " मनु ने नानी माँ को       गले लगाते हुए बड़े प्यार से पूछा। हाँ ,अपना ही लेंगे और कर भी क्या सकते हैं .....आखिर रहना तो    तुम्ही को है उसके साथ....इसीलिए अपनी पसंद से लाओ तो ही बेहतर है - नानी माँ ने भी उसी प्यार से जबाब दे दिया। 

     मैंने तुरंत एतराज किया -"ये क्या माँ,हमें तो लड़को से बात  करने की भी आजादी नहीं थी,बात क्या हमें तो किसी लड़के की तरफ देखना तक मना था और इसे अपनी पसंद से शादी करने की इजाजत मिल रही है "

     जमाना बदल गया है बेटा .....जमाना नहीं आप भी बदल गयी हो -मैंने तुनुकते हुए कहा। जमाने के साथ बदलना ही पड़ता है बेटा-माँ ठंठी साँस लेते हुए हँस पड़ी। 

मनु ने मुझे टोकते हुए कहा -" मम्मी पहले मुझे बात करने दो ....नानी माँ, मैं चाहती हूँ कि मैं जिससे भी शादी करूँ आप सब उसे मुझसे भी ज्यादा प्यार करें ....आप सब की ख़ुशी और रजामंदी  मेरे लिए बहुत मायने रखता है, इसलिए आप खुलकर बोले.... "

अरे,बेटा जी... मुझे तुम पर पूरा भरोसा है "तुम्हारी आँखें हमारी आँखों से अलग थोड़े ही है "

नानी माँ के बातों की गहराई को मनु ने समझा या नहीं  ये तो नहीं पता बस,  इतना सुनते ही वो ख़ुशी से नानी माँ से लिपट गई और मुझे बड़ी जोर की हँसी आ गई। क्यों हँस रही हो माँ -मनु ने हैरानी से पूछा।   मैंने कहा- कुछ नहीं बेटा। 

सच, हमारे बुजुर्ग कितने सयाने होते है बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाते हैं  बिना डोर के भी आपको कितने ही बंधनों में बाँध देते हैं । 

 "तुम्हारी आँखें हमारी आँखों से अलग थोड़े ही है " 

 ये कहकर माँ ने मनु को इजाजत भी दे दिया और हिदायत भी कि -  पसंद वही करना जो हमारे संस्कारों में  बँधा हो, हमारी संस्कारों से बाहर जाने की इजाजत नहीं है तुम्हें। इसीलिए तो, बुजुर्ग हमारे "मार्गदर्शक भी होते है और मार्गरक्षक भी।"

  

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

दोष किसका ???

    


नमस्ते आंटी जी, कैसी है आप - शर्मा आंटी  को देखते ही मैंने हाथ जोड़ते हुए पूछा। 

    खुश रहो बेटा....तुम कैसी हो...कब आई दिल्ली....बिटिया कैसी है....कितने दिनों के लिए आई हो....शर्मा आंटी अपनी चिरपचित अंदाज़ में सवालों की झड़ी लगा दी। अरे, ये मुआ कोरोना जो ना कराये.....जरूर बिटिया का काम  छूट गया होगा तभी आयी हो न.... इस कोरोना के कारण तो घर से निकलना ही नहीं हो रहा....आज कितने दिनों बाद निकली हूँ घर से ......ना निकलती तो पता ही नहीं चलता की तुम आ गई हो - वो बोले जा रही थी। 

     अरे आंटी, सांस तो ले लो-  मैंने हँसते हुए कहा। मेरे इतना कहते ही वो भी हँसने लगी। मैंने कहा -आंटी मेरी छोडो अपनी सुनाओं कैसे हैं सब....आपकी बहु कैसी है....अब तो बहु के हाथ का खा रही है इसीलिए वजन बहुत बढ़ गया है आपका....शादी हुए तो एक साल से ज्यादा हो गया जरूर घर में नन्हा-मुन्ना भी आ ही गया होगा...कब खिला रही है मिठाई - मैंने भी उन्ही के जैसे एक पर एक सवाल रख दिए।  जैसे-जैसे मैं आंटी से सवाल किए जा रही थी वैसे-वैसे आंटी के मुँह का ज्योग्राफिया बदलता जा रहा था। मैं मन ही मन सोच रही थी -इन्हे क्या हुआ इनका मुँह तो कड़वे करेले जैसा बनता जा रहा। 

   मेरे सवालों से आंटी के सब्र का बांध जैसे टूट गया अचानक से झिड़कती हुई बोली -अरे मेरे आगे उस कलमुही का नाम ना ले खून जलने लगता है मेरा...मर गई वो। हे भगवान, कब मर गई...कैसे मर गई - मुझे तो शॉक सा लग गया,मैं एक साल बाद दिल्ली आई थी मुझे तो ये पता ही नहीं था। वो उतने ही गुस्से में बोली- अरे, मेरे वास्ते मर गई....वो तो शादी के एक महीने बाद ही मेरे बेटे को छोड़ कर चली गई....किसी दूसरे के साथ चककर था उसका......नाहक शादी में इतने पैसे खर्च कर दिए...हाथ ढेला ना आया। 

    आंटी तो गुस्से में बड़बड़ाती हुई निकल गई, उनकी दुखती रग पर हाथ जो रख दिया था मैंने, मगर मैं उनकी बातें सुनकर सन्न रह गई। आंटी हमारे ही मुहल्ले में रहती है एक बेटा एक बेटी है अच्छा-खासा धूम-धाम से बेटे का व्याह की थी और बहु एक महीने में ही घर छोड़कर चली गई और तलाक का नोटिस भेज दी। आंटी की बेटी तो पहले से ही तलाकशुदा थी वो भी आंटी के घर में ही बैठी थी। आंटी तो चली गई मगर मेरे जेहन में कई सवाल छोड़ गई.... 

कमी किस में थी ?

दोष किसका था ?

क्यूँ घर बस काम रहे है, उजड़ ज्यादा रहे है ?

क्यूँ आखिर क्यूँ ?

"एक और ज़िन्दगी"

  कहते हैं "शरीर मरता है मगर आत्मा अमर होती है" और वो बार-बार नई-नई पोषक पहनकर पृथ्वी पर आना-जाना करती ही रहती है। इसे ही जन्म-मरण...