शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

रक्षाबंधन -" कमजोर धागे का मजबूत बंधन "

    

    
     सावन का रिमझिम महीना हिन्दुओं के लिए पावन महीना होता है। आखिर हो भी क्यों नही ये देवो के देव "महादेव" का महीना जो होता है और इसी महीने के आखिरी दिन यानि पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है। रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम को अभिव्यक्त करने का एक जश्न है। जिसे आम बोल-चाल में राखी कहते हैं । 
    सुबह-सुबह नहा-धो कर पजामा-कुर्ता पहने भागते-दौडते अति उत्साहित लड़के और प्यारा सा फ्रॉक या लहँगा-चुन्नी पहने, हाथ में पूजा की थाली लिए हुए इतराती फिरती लड़कियाँ। कही कोई भाई अपनी छोटी बहन को मना  रहा है उससे छोटे-छोटे, प्यारे-प्यारे वादे कर रहा है कि - "आज से मैं तुम्हें  बिल्कुल नहीं मारुंगा, तुम्हें कभी नहीं सताऊँगा, तुम्हें  ढेर सारी चॉकलेट भी दूँगा प्लीज, मुझे राखी बाँध दो" और कही कोई बहन, भईया को मना रही है कि -"मैं मम्मी से तुम्हारी कभी कोई शिकायत नहीं करुँगी, अपने खिलौने भी दे दूँगी, तुम्हारी हर बात मानूँगी प्लीज, मुझसे  राखी बँधवा लो।" सच ,बड़ा प्यारा नज़ारा होता है।
    राखी के दिन मैं भी अपने बचपन में खो जाती हूँ। हम चार भाई-बहन है,दो बहन और दो भाई। इसके अलावा चाचा ,बुआ के बच्चे, कुल मिलाकर 12-13 भाई-बहन। हम सब में सगे भाई-बहनों जैसा ही प्यार था,कोई पराया था ही नहीं। राखी के दिन हम सारे इकठ्ठे होते थे और राखी बँधवाने का कार्यक्रम एक साथ ही होता था, सारे भाई एक लाइन में बैठ जाते थे और हम सारी बहनें आरती का थाल हाथ में लिए खड़ी रहती थी। मैं सबसे बड़ी थी, सारे भाई पहले मुझसे ही राखी बँधवाना चाहते थे क्योँकि मैं सबको एक समान प्यार करती थी और सभी मुझे भी उतना ही प्यार देते थे। मैं एक लाइन से बड़े भाई से शुरू कर छोटे तक पहुँचती थी। सब एक दूसरे को अपने हाथो से मिठाई खिलाते थे और प्यार से गिफ्ट देते थे। वो गिफ्ट चाहे पांच रूपये का ही क्यों न हो, भाई वो अपनी बचत के पैसे से लाते थे और वो  हमारे लिए लाखों रूपये से भी कीमती होते थे। बड़ा ही पवित्र होता है ये बचपन का प्यार.... 
    राखी पर्व का नाम लेते ही शायद ही ऐसा कोई हो जिसे अपने बचपन की याद ना आती हो। वैसे तो हर त्यौहार का असली मजा तो बचपन में ही आता है लेकिन राखी की तो बात ही अलग होती है। भाई-बहन का असली प्यार झलकता है, कोई दिखावा नहीं, कोई लालच नहीं, कोई मन पे बोझ नहीं। जितना ज्यादा बचपन में इस त्यौहार का आनंद होता है उतना ही बड़े होने के बाद इस त्यौहार का रंग-रूप बिगड़ जाता है। मैं ये नहीं कहूँगी कि भाई-बहन के बीच का प्यार कम हो जाता है बस उस प्यार पर औपचारिकता भारी पड़ जाती है और प्यार धूमिल हो जाता है। मुझे इस राखी में बनाये गए एक रिवाज़ से सबसे ज्यादा शिकायत है -"वो है, तोहफों का आदान-प्रदान " और मेरे बिचार से इसी रिवाज़ ने ही बड़े होने पर इस त्यौहार को बोझ बना दिया। 
     अगर ये उपहारों का लेन-देन परम्परा ना हो कर "खुशी" होती तो राखी हमेशा अपने बचपन वाले स्वरूप में, भाई बहन का प्यार दिन-ब-दिन बढ़ता कभी कम नहीं होने देता। क्योंकि बचपन में जो उपहार प्यार से दिया जाता था बड़े होने पर औपचारिकता के साथ-साथ बोझ भी बन गया। वास्तव में राखी हम हिन्दुस्तानियों के लिए इतना पवित्र धागा है कि-अपने खून के रिश्ते की तो बात ही छोड़ें, किसी अनजाने और अपने जाति-धर्म से अलग व्यक्ति को भी अगर कोई लड़की एक बार ये धागा बाँध  देती है तो आजीवन निभाती है। 
     वैसे तो इस पवित्र बंधन की बहुत सी कहानियाँ मशहूर हैं मगर आज मैं आप को इससे जुडी अपने बचपन की एक दस्तान सुनती हूँ। बात उन दिनों की है जब मैं 15 -16 साल की थी। हमारे पापा बिजली बिभाग में इलेक्ट्रिशियन थे और हम सरकारी क्वार्टर में रहते थे। उन्हीं दिनों एक इंजीनियर का परिवार ट्रांस्फर होकर आया था। हमारी उनसे अभी अच्छे से जान-पहचान भी नहीं हुई थी। उनके 10 और 12 साल के दो बेटे थे, कोई बेटी नहीं थी। उनके आने के महीने बाद ही राखी पर्व आ गया था। हम सारे भाई-बहन हर साल की तरह इकठ्ठे  थे और राखी बाँधने का कार्यक्रम चल रहा था उसी बीच  उनका बड़ा लड़का आ गया। वो थोड़ी देर खड़ा होकर सब देखता रहा फिर दौडता हुआ चला गया। थोड़ी देर बाद उसकी माँ उसे लेकर आई। बच्चें का रो-रो कर बूरा हाल था आँखें सूजी थी,सिसकी अभी भी बंद नहीं हुई थी। हम सब डर गए कि क्या हो गया इसे? उसकी माँ मेरे पास आई और बोली -"बेटी क्या तुम मेरे बेटे को राखी बाँध सकती हो ये रोये जा रहा है कि-मुझे रानी दीदी से ही राखी बँधवानी है (घर में सब मुझे रानी बुलाते हैं  )मैंने उसे पहले प्यार करके चुप कराया फिर, मैंने कहा कि -"चाची राखी एक दिन का बंधन नहीं है, ये सिर्फ एक धागा नहीं है जिसे मैं आज बाँध दूँ और फिर भूल जाऊँ, अगर आज मैं इसे राखी बाँधूगी तो ये हमेशा के लिए मेरा भाई हो जायेगा, आप को मंजूर हो तो बोलिये।" उस लड़के की माँ कुछ बोलती इससे पहले वो लड़का मेरा हाथ पकड़कर बोल पड़ा -"हाँ-हाँ ,मैं आजीवन आप का साथ निभाऊंगा, आप मेरे हाथ पर राखी बाँध दे मैं आप का हाथ कभी नही छोड़ूंगा।"
     सब हँस पड़े, मैंने उसे राखी बाँध दी। उसने बड़े प्यार और आदर से मेरे पैर छूए और अपनी जेब से निकाल कर एक टॉफी पकड़ा दी।उस वक़्त उसकी कही हुई बात को ना उसकी माँ ने गंभीरता से लिया और ना ही मेरे परिवार वालों ने, सबको लगा बच्चा है और उसकी बहन भी नहीं है इसीलिए बोल दिया, 3 साल बाद उनका  ट्रांस्फर हो जायेगा और वो चला जायेगा फिर कहानी खत्म। लेकिन मैं उस बच्चें के मन की पवित्रता समझ रही थी उसके  मुख से निकला एक-एक शब्द मेरी आत्मा को छू गया था। उसके हाथ पकड़ने का एहसास आज तक मुझे महसूस होता है। उस बच्चें ने सच कहा था आज वो 44 साल का हो गया है और एक सफल डॉक्टर है और मुझसे बहुत दूर भी रहता है। 5 -6 साल पर हम कभी-कभी मिलते हैं  लेकिन आज भी वो मेरा हाथ उसी प्यार और ख़ुलूस के साथ पकड़ रखा है। आज भी उसका प्यार एक मासूम बच्चें की तरह निश्छल और निस्वार्थ है। खून के रिश्ते के भाई-बहन स्वार्थवश बिखर गए लेकिन आज भी मैं उसकी  "प्यारी रानी दीदी " और वो भी मेरा " प्यारा मासूम पिंकू" ही है। ये होता है राखी के एक कमजोर धागे का मज़बूत बंधन। यूँ ही नहीं इस त्यौहार को पवित्र मानते हैं। 


     मेरी भगवान से यही प्रार्थना हैं कि-"कभी किसी बहन से उसका भाई ना बिछड़े ना ही कभी किसी बहन से उसका भाई रूठे " और हर भाई -बहन से ये आग्रह हैं कि-"कभी भी अपने बीच कोई दीवार ना आने दें चाहे वो दीवार स्वार्थ की हो चाहे, किसी व्यक्ति बिशेष की। 


छोटी बहना चूम के माथा

भईया तुझे दुआ दे
सात जनम की उम्र मेरी
तुझको भगवान लगा दे
अमर प्यार है भाई-बहन का
जैसे सुभद्रा और किशन का

मोल नहीं कोई इस बंधन का
ये राखी बंधन है ऐसा.... 
ये राखी बंधन है ऐसा....
******
आप सभी को राखी की ढेरों शुभकामनाएं 

शनिवार, 18 जुलाई 2020

अंतर्मन की सच्ची पुकार है प्रार्थना....


    "प्रार्थना" निश्छल हृदय से निकली अंतर्मन की सच्ची पुकार है। जब भी कोई मनुष्य किसी संकट में होता है,परेशानी में होता है,जब बाहरी दुनिया के लोग उसकी सहायता नहीं कर पाते तब, असहाय होकर उस परमसत्ता से वो मदद की गुहार लगाता है।उसका दर्द, उसकी पीड़ा प्रार्थना के रूप में उस परमपिता तक पहुँचती है और एक अदृश्य हाथ उसकी  मदद के लिए आ खड़ा होता है। निश्चित रूप से प्रार्थना में बहुत शक्ति होती है,जो किसी भी असंभव दिखने वाली परिस्थिति से हमें बाहर निकालती है। ऐसे  उदाहरणों से हमारा इतिहास भरा पड़ा है और हमारा व्यक्तिगत अनुभव भी है।  
    "प्रार्थना"एक ऐसी वार्ता है,जो एकतरफा होती है,लेकिन इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलती है। "प्रार्थना" भगवान से सिर्फ अपनी इच्छाओं की पूर्ति का माध्यम नहीं है,बल्कि यह तो भगवान के साथ अपनी करुण वेदना की सहभागिता है। इसीलिए जब भी मदद के सारे  द्वार बंद जाते है, कोई भी मार्ग नहीं सूझता, तब भी प्रार्थना का द्वार  खुला रहता है।जहां हर एक बे-रोक- टोक जाकर गुहार लगा सकता है और कभी वहाँ से निराश भी नहीं लौटना पड़ता है। जब भी कोई ऐसा नहीं होता, जिससे आप अपना दुःख बाँट सकें उस वक़्त भी प्रार्थना के माध्यम से आप अपना दुःख बे-झिझक उससे  कह सकते हैं।   
    वैसे तो अक्सर हम कष्ट में अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए ही प्रार्थना करते हैं परन्तु आत्मकल्याण के लिए लोककल्याण के लिए भी  प्रार्थनाएँ की जा सकती है। लोककल्याण के लिए.परहित के लिए,निस्वार्थ भाव से की गई सामूहिक प्रार्थना तो परमेश्वर तक और भी जल्दी पहुँचती है और इसके कई चमत्कारिक परिणाम देखने को भी मिले है। निष्कपट,निस्वार्थ भाव से,सच्ची हृदय से अगर हम भगवान को पुकारते है तो वो हमारी आवाज़ कभी अनसुना नहीं करता। हाँ,कभी-कभी ये देखने में आता है कि -हमारी आवाज़ उस तक पहुँचने  में देर हो जाती है मगर व्यर्थ  नहीं जाती।तभी तो कहते हैं कि- "भगवान के घर देर है,अंधेर नहीं "
   हम प्रार्थना के माध्यम से जीवन की नकारात्मक परिस्थितियों में भी सकारात्मकता से जुड़ सकते हैं,ये हमें अंधकार में घिरने पर भी प्रकाश की और निहारने की हिम्मत देती है,एक उम्मीद का दीया जलता रहता है जो हमें ढाढ़स बँधाता है।  
    शायद इसीलिए,विश्व के सभी धर्मो में एकमात्र जो समानता है,वह है-"प्रार्थना"। हर धर्म किसी-न-किसी रूप में उस परम सत्ता से जुड़ने के लिए प्रार्थना करने को कहता है। प्रार्थना के  माध्यम से हम अपनी भावनाओं को भगवान के पास भेजते हैं।यह एकमात्र वो  माध्यम है जिससे हम भगवान से अपनी इच्छाओं, भावनाओं एवं विचारों की अभिव्यक्ति  करते हैं। अभिव्यक्ति का यह माध्यम हमारी मनोचिकित्सा का भी कार्य करता है,हमारे मन को जीवन में पड़ने वाले अनगिनत भँवरों से बाहर निकालता है। सच्चे मन से की गई पुकार न केवल मनुष्य को घोर  संकटों-आपदाओं से निकालती है,वरन उसे उस दिव्य सत्ता के साथ भी जोड़ती है और हमें उसके कृपा का पात्र बनती है।प्रार्थना में जुड़े हाथ ये भी सिद्ध करते है कि-हम लाख विज्ञान को शिरोधार्य कर ले,अपनी काबिलियत, शक्ति और समझदारी पर इतरा ले मगर आखिरकार हमें मानना ही पड़ता है कि-"कोई तो अदृश्यशक्ति है जिसके आगे हम बेबस है।"   

"धरती माँ"



  पृथ्वी,धरती,धरणी या धरा चाहे जो नाम दे परन्तु उसका रूप और कर्तव्य तो एक "माँ" का ही है। जैसे, एक नारी का तन ही एक शिशु को जन्म दे सकता है और उसका पालन-पोषण भी कर सकता है। तभी तो, एक शिशु के माँ के गर्भ में आने के पहले से ही  माँ का तन-मन दोनों उसके पालन-पोषण  के लिए  तैयार होता है। वो अपने अंग के एक अंश से एक जीव को जन्म देती है और अपने लहू को दूध में परिवर्तित  कर उसका पोषण करती है, उसी प्रकार हमारी "धरती" ही वो गर्भगृह है जहाँ जीवन संभव है।इसीलिए तो हम पृथ्वी को भी "धरती माँ " ही कह कर बुलाते हैं। पृथ्वी और प्रकृति एक ही सिक्के के दो पहलू ही तो है,अगर प्रकृति जीवित है तो पृथ्वी पर जीवन संभव है। 


     मगर हमने इस प्रकृति का दोहन करते-करते "धरती माँ" के आत्मा तक को रौंद डाला है  और अब ये धरती माँ कुपित हो चूकी है। जैसे माँ पहले तो अपने बच्चों की गलतियों को नजरअंदाज करती है फिर उसे समझाने की कोशिश करती है,फिर भी ना समझे तो उसे धमकाती है और फिर भी बच्चें ना सुधरे तो मजबूरन उसे अपने जिगर के टुकड़े को सजा देनी ही पड़ती है। आज हमारी "धरती माँ" भी हमसे बहुत ज्यादा कूपित हो चूकी है और हमें धमकाना प्रारम्भ कर चूकी है। हाँ,आज ये जो भी प्राकृतिक आपदाएँ अपने भीषण रूप में प्रहार कर रही है वो तो बस अभी "माँ"की धमकी भर है। यदि अब भी ना चेते तो, हमें सजा मिलनी निश्चित है। ऐसी सजा जिसकी कल्पना भी हम नहीं कर सकते। जब माँ की धमकी इतनी  भयावह है तो इसकी सजा कैसी होगी ? ये भी हो सकता है कि माँ चंडी का रूप धारण कर नरसंहार ही करती चली जाए. (जिसकी एक झलक तो वो हमें दिखला भी रही है )
   यदि हम माँ की सबसे प्रिय संतान मनुष्य होने के नाते प्रकृति की संरक्षण की जिम्मेदारी स्वयं नहीं उठाते हैं तो मजबूरन प्रकृति को अपने उस रूप को धारण करना होगा, जिसमे ध्वंस किये बिना नूतन सृजन संभव नहीं है। स्वभाविक है कि इस प्रक्रिया में हमें बहुत से कष्ट-कठिनाइयों से गुजरना भी होगा, पर यदि हम समय रहते सचेत हो जाएंगे तो अपनी जीवन की दिशा को बदल पाने में सक्षम हो जाएंगे और साथ ही साथ  हम सम्पूर्ण मानव जाति का सुंदर और बेहतर भविष्य निर्मित कर पाने में भी सक्षम होंगे। ऐसा करने के लिए आवश्यकता मात्र इतनी है कि हम इस प्रकृति से चाहे जितना ले,पर बदले में उसी विनम्रता और ईमानदारी के साथ उसे उतना ही लौटाएँ भी। यदि हम प्रकृति के साथ साझेदारी निभाएंगे तो प्रकृति के इस संभावित कहर से बच पाना संभव है। यदि हम प्रकृति के  सुरक्षा एवं संरक्षण का ध्यान रखेंगे तो प्रकृति भी हमें सुरक्षा और संरक्षण देगी। इसीलिए अब यह जरुरी है कि-हम प्रकृति एवं  धरती माँ के सुरक्षा,संरक्षण एवं समृद्धि के लिए अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार सतत प्रयत्नशील हो जाए। 
   हमने अपनी जन्म देने वाली माँ की बेकद्री की तो भी, उस माँ ने हमें क्षमा कर दिया मगर अब ये "धरती माँ" हमें क्षमा नहीं कर पाएगी। 







शनिवार, 11 जुलाई 2020

"प्रश्नचिन्ह" ?

     

    आज समाज में यत्र -तत्र -सर्वत्र ऐसे लोग मिल ही जाते हैं जिन्हें या तो शिकायत करना आता है या सिर्फ "प्रश्न" करना।प्रश्न माँ -बाप पर प्रश्न, रिश्ते -नातेदारों पर प्रश्न, समाज और उनके बनाएं कायदे-कानून पर प्रश्न, सरकार पर-इतना ही नहीं-प्रश्न इस सृष्टि और सृष्टिकर्ता पर,धर्म-संस्कार पर,आस्था-विश्वास पर,नारी के स्वाभिमान और मान-मर्यादा पर,यहां तक कि मनुष्य जाति के अस्तित्व पर कि-वो बन्दर की संतान हैं या देवता और ऋषि-मुनि की संतान।मुझे यकीन हैं ऐसे लोग खुद के होने पर भी "प्रश्नचिन्ह"जरूर लगाते होंगे। "सवाल उठाना"वो अपनी बुद्धिमता समझते हैं या अधिकार---- ये बात तो वही जाने---!

     उन महाज्ञानियों को कोई भी अपने उत्तर से संतुष्ट भी नहीं कर सकता  क्योँकि उनकी तार्किक प्रवृति उन्हें संतुष्ट होने ही नहीं देती।जैसे,समस्या है तो उसका समाधान भी है वैसे, ही यदि प्रश्न है तो उसका उत्तर भी है मगर इन बुद्धिजीवियों  को स्वयं उत्तर तलाशाने नहीं हैं, वो तो सिर्फ "प्रश्नकर्ता" हैं उन्हें उत्तर से दरकार नहीं, वो उत्तर तलाशने में अपना वक़्त जाया क्यूँ करें। वो तो सिर्फ इस मद में चूर हैं कि--" मेरी सोच समाज से "इतर" है, मेरी बुद्धि मेरे ख्यालात मॉडन हैं, मैं अंधविश्वासी नहीं हूँ, मैं तार्किक हूँ।" 

     भगवान पर,वेद-पुराणों पर,रामायण,गीता और भहाभारत जैसे ग्रंथों पर,आस्था-विश्वास पर "प्रश्नचिन्ह" लगाना तो बहुत आसान है, अपने तर्कों से अपनी बातों को सिद्ध करना वो भी आसान है जो सभी करते आए  हैं, कर रहे हैं और आगे भी करते ही रहेंगे। मुश्किल तो हैं "खुद को समझना और समझाना" खुद पर प्रश्नचिन्ह लगाना।क्या आप कभी खुद का विश्लेषण कर खुद को ही समझा पाएं हैं? उत्तर बताना नहीं हैं खुद को ही देना हैं। 
एक बार खुद को तलाश तो लें,खुद से कुछ प्रश्न तो कर लें - "मैं कौन हूँ "?

      खैर, "मैं कौन हूँ" ये तो बड़ा मुश्किल सवाल हैं और इसका उत्तर ढूंढ पाना इन तार्किक प्रवृति वालों के बस की बात नहीं हैं वो तो बस इतना जबाब ढूंढ ले वही बहुत हैं कि- 
क्या मेरे आस-पास रहने वाले या मेरे दोस्त-रिश्तेदार,संगी-साथी सभी मेरा आदर-सम्मान करते हैं?
क्या कोई एक भी मुझे निश्छल स्नेह देता हैं?
क्या मैं अपनी बातों से, अपने तर्क से किसी को क्षण भर की भी ख़ुशी या संतुष्टि दे पाती /पाता हूँ ?
मेरी तार्किक बुद्धि के कारण मेरे व्यवहार से किसी का मन आहत तो नहीं होता ?
क्या मैं परिवार,समाज और देश के प्रति अपने दायित्वों को ईमानदारी से  निभा पाती /पाता हूँ ?
जिन विषयों पर मैंने "प्रश्नचिन्ह"लगाया है,क्या तथस्ट भाव से उसके उत्तर को तलाशने की मैंने स्वयं कोशिश की है?  
क्या सभी मुझे "ज्ञानी" समझते हैं?
(क्योँकि खुद को ज्ञानी समझना और ज्ञानी होने में बहुत फर्क हैं)

     यकीनन, अपने "प्रश्नों" से किसी के आस्था-विश्वास को,सम्मान और मर्यादा को छलनी करना ज्ञानियों का काम तो नहीं होता ये तो बस तार्किक प्रवृति के दंभी लोग ही कर सकते हैं जिन्हें सिर्फ प्रश्न करना आता है और उत्तर की जिम्मेदारी वो दूसरों पर डाल देते हैं। ऐसे लोग समाज के लिए खुद भी एक "प्रश्नचिन्ह" ही होते हैं। किसी ने बिलकुल सही कहा हैं -

"खुद से बहस करोगे तो सारे सवालों के जवाब मिल जाएंगे ।
अगर दूसरों से करोगे तो नए सवाल खड़े हो जाएंगे।। 

("तर्क में जीत जाना ज्ञानी होने का प्रमाण नहीं हैं" इस पर आगे चर्चा करेंगे ) 

गुरुवार, 9 जुलाई 2020

"रचना और रचनाकार"


बचपन में मेरी दादी एक कहानी सुनाया करती थी.....
     एक आदमी जो खुद को बड़ा ज्ञानी समझता था,वो सृष्टिकर्ता पर , सृष्टि की हर एक रचना पर ,समाज और उसके नियमों पर, हर एक सम्बन्ध पर प्रश्नचिन्ह लगा देता। उसे खुद के आगे हर कोई मूर्ख और कमअक्ल ही लगता था। एक बार उस के गॉव में एक महात्मा जी आये। गॉव के लोग बड़ी ही श्रद्धा से उनका प्रवचन सुनने जाते।महात्मा जी भगवान की और उनकी हर एक रचना की गुणगान करते। उस आदमी को ये सब बर्दाश्त नहीं होता। एक दिन वो प्रवचन के बाद उस महात्मा के पास पहुंच गया.उसने उन्हें खूब भला-बूरा कहा। उसने कहा -आप पाखंड करते हैं  भगवान के नाम पर आप सबको बेवकूफ बनाते है ,"भगवान" नाम का कोई अस्तित्व नहीं है. महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए पूछा -"कोई तो रचनाकार होगा न,जिसने इस सृष्टि की रचना की है" तो उस व्यक्ति ने कहा -"ये सब विज्ञान हैं भगवान नहीं,यदि भगवान है तो वो दिखता क्यूँ नहीं ,क्या आप मुझे भगवान से मिलवा सकते हैं ? महात्मा जी ने बड़े शांत स्वर में कहा-" बिलकुल मिलवा सकता हूँ मगर पहले तुम मेरे चंद प्रश्नो का उत्तर दे दो।" उस आदमी ने बड़ी ढिठाई से कहा -पूछिए।

    महात्मा जी ने पूछा -कोई एक व्यक्ति का नाम बताओ जिससे तुम अत्यधिक स्नेह करते हो? उस व्यक्ति ने अकड़ते हुए कहा -"मैं खुद से ज्यादा किसी से प्यार नहीं करता".... क्या अपने माता-पिता से भी नहीं ,उन्होंने तो तुम्हे जन्म दिया है,उनका तो आदर करते होगें न - महात्मा जी ने उसी शांत स्वर में पूछा। नहीं,मुझे जन्म देना एक जैविक प्रक्रिया थी और पालन-पोषण करना उनका कर्तव्य जो हर माता-पिता करते हैं ,उन्होंने कुछ विशेष नहीं किया........तुम्हारी पत्नी और बच्चें तो होंगे न -महात्मा जी ने पूछा। उनका क्या,वो तो मेरी अनुकम्पा पर जीते हैं उन्हें मेरा ऋणी होना चाहिए मुझे स्नेह करना चाहिए,मैं उनकी परवाह क्यूँ करूँ- उस आदमी ने गर्दन अकड़ा कर कहा..... कोई दोस्त,रिश्तेदार या पड़ोसी तो होगा - महात्मा जी ने फिर पूछा। नहीं-नहीं मैं किसी से संबंध नहीं रखता,सब मतलब के होते है,थोड़ा भाव दो सर पर चढ़ जाते है, इनकी सिरदर्दी मैं नहीं पालता,वैसे भी सब जाहिल है, देखा नहीं आपने मूर्खो की तरह आपकी बातों में उलझ जाते हैं -उसने झल्लाते हुए कहा।

    महात्मा जी मुस्कुराते हुए बोले -हाँ हाँ ,सही कहते हो तुम,कोई बात नहीं किसी जानवर,पशु-पक्षी, पेड़ -पौधे या पुष्प से तो तुम्हें जरूर लगाव होगा...... नहीं,जानवर बहुत गंदे होते है उन्हें कौन प्यार करेंगा और पक्षी तो हर जगह बीट करते रहते है,मैं उनसे दूर ही भला.... अच्छा ये बताओं सूरज चाँद ,सितारे ,धरती और आकाश के बारे में तुम्हारी क्या राय है  इनके अस्तित्व को मान कर इनकी उपासना तो तुम जरूर करते होंगे.....ये सभी एक खगोलिय पिंड है,विज्ञान के अनुसार इनकी उत्पति एक खगोलिय घटना के कारण हुआ, इनकी उपासना या पूजा क्यों करें हम, मेरे पूजा करने से ये औरों से ज्यादा मुझे रौशनी और ऊर्जा देंगे क्या ? अच्छा ये बताओं - तुमने वेद-पुराण का अध्ययन किया है? अरे नहीं,स्वामी जी वेद पुराण को भी तो आप जैसे महत्माओं ने ही लिखा है हमें नियम कानून में बांधने के लिए,ये सही है या गलत हमें क्या पता, हम तो अपनी बुद्धि-विवेक से समझेगें कि क्या सही हैं क्या गलत। ये तो बहुत अच्छी बात कही तुमने....बेटा,तब तो तुमने रामयण और महाभारत भी नहीं पढ़ी होगी,उनके बारे में भी नहीं जानते होंगे- स्वामी जी ने बड़े धीरज से पूछा। अरे नहीं स्वामी जी ,जानता तो सब हूँ,मगर मैं इन मूर्खों की तरह नहीं हूँ जो उनमे लिखी बातों को सत्य मान लूँ, ये तो एक काल्पनिक कथाएं है। स्वामी जी बड़े प्यार से बोले- बेटा,तुम तो बड़े ज्ञानी हो,भगवान को ना देखो ना समझों तो ही अच्छा हैं, मैं तुम्हे भगवान के दर्शन नहीं करा सकता। वो व्यक्ति खुद की जीत पर इतराता हुआ चला गया। 
    अगले दिन स्वामी जी ने अपना प्रवचन प्रांरभ करते हुए पूछा- क्या आप सब भगवान से मिलना चाहते है, उनका दर्शन करना चाहते हो? सबने एक स्वर में "हाँ" कहा। स्वामी जी ने कहा-  माता-पिता के स्नेह में भगवान है,पति-पत्नी के समर्पण में भगवान है,बच्चों की किलकारियों में भगवान है,पक्षियों के कलरव में भगवान है,फूलों की सुगंध में भगवान है अगर तुम इनके करीब हो तो भगवान के करीब हो,यदि और नजदीक से भगवान का दर्शन करना चाहते हो तो उगते सूरज में उन्हें देखों, ढलती शाम में उन्हें महसूस करो, किसी भूखे को तृप्त करके देखो, किसी रोते के मुख पर हँसी लाकर देखो, माता पिता की सेवा करोगे, सृष्टि के प्राणियों से स्नेह करोगे तो भगवान के दर्शन अवश्य होंगे, क्योँकि "कण-कण में भगवान है,तुम्हारे बाहर भगवान है,तुम्हारे भीतर भगवान है, प्रेम,दया, करुणा, परोपकार, आदर-सम्मान यही तो भगवान के रूप है मगर ये दर्शन महाज्ञानी नहीं कर सकते क्योँकि वो मद में अंधे होते है,ये दर्शन निश्छ्ल,पवित्र और करुणामयी आँखे ही कर सकती हैं. बच्चों, एक बात याद रखना -"जो रचना को नहीं समझ पाया वो रचनाकार को कभी नहीं समझ पायेंगा"
    सभा से दूर खड़ा वो व्यक्ति सब सुन रहा था मगर खुद को महाज्ञानी समझने वाले ने अपनी मन की आँखें बंद कर रखी थी वो ना सृष्टि को समझ सकता था ना सृष्टिकर्ता को। 

    कहानी सुनाने के बाद दादी कहती थी -बच्चों "अज्ञानी को ज्ञान दिया जा सकता है मगर जो खुद को महाज्ञानी समझ बैठा हो,उसे तो परमात्मा भी आकर नहीं समझा सकता।"




 

"अब "

 "अब" अर्थात  वर्तमान यानि जो पल जी रहें है...ये पल अनमोल है...इसमे संभावनाओं का अनूठापन है...अनंत उपलब्धियों की धरोहर छिपी है इस ...