मंगलवार, 18 मई 2021

"हम सुधरेंगे युग सुधरेगा"



2012-13 में एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमे दिखाया  गया था कि-परिवार का हर एक सदस्य अपनी  पीठ पर एक ऑक्सीजन सिलेंडर बांधे हुए है। डाईनिंग टेबल पर खाना खाते हुए  पत्नी पति से कहती है -"आज शाम तक टोनी (उसका बेटा ) का ऑक्सीजन खत्म हो जायेगा ऑर्डर कर देना "पति हाँ में सिर हिलता है और सब अपने-अपने काम पर निकल जाते हैं। शाम को घर आते ही बच्चा माँ से सिलेंडर मांगता है। माँ पापा से कहती है -तुमने सिलेंडर आर्डर नहीं किया था क्या,अभी तक नहीं आया ?पति कहता है -ऑफिस के कामों में मैं भूल गया तुम भी तो कर सकती थी। माँ कहती है मेरे पास पैसा नहीं था। फिर दोनों में बेलम-गेम शुरू हो जाता है ,बच्चा कहता है अब तो आर्डर कर दो मेरा ऑक्सीजन बस एक घंटे का है। फिर माँ आर्डर करती है ,मगर एक घंटे में सिलेंडर नहीं आ पता। ऑक्सीजन खत्म होने के बाद बच्चें की हालत खराब होती जाती है। वो एक-एक साँस मुश्किल से ले पा रहा,जैसे-जैसे वक़्त गुजरता है बच्चें की हालत नाजुक होती जा रही है ,माँ-बाप बच्चें को गोद में लिए खुद भी तड़प रहे,अपनी बेबसी और भूल पर रो रहे है ,छोटी बहन बार-बार दौड़ कर  दरवाजे पर जाती है ,पिता डिलीवरी वाले को बार-बार फोन कर रहा है। तभी दरवाजे पर घंटी बजती है माँ दौड़ती हुई जाकर दरवाजा खोलती है सिलेंडर वाले से लगभग झपटते हुए सिलेंडर लेती है और उसे बच्चें को लगाती है। लगभग दो मिनट बाद बच्चा थोड़ा नॉर्मल होता है सबकी जान में जान आती है।उस वीडियो के मुताबिक 2025-30 तक पुरे विश्व की हालत यही होगी यदि हम सचेत नहीं हुए तो। 

इस वीडियो को देखने के बाद मैं बहुत सहम गई, कई दिनों तक नींद गायब हो गई। हर वक़्त मन में एक ही सवाल -क्या हम अपनी भावी पीढ़ी के लिए ये दिन छोड़कर जायेगे ? वैज्ञानिक अपनी तरफ से जरूर हर संभव प्रयासरत होंगे लेकिन क्या हमारी खुद की कोई जिम्मेदारी नही है ? आखिर सब कुछ बिगाड़ने में हमारा भी तो हाथ है। मैंने अपनी तरफ से जो बन पाया करना शुर कर दिया जैसे, टैरिस गार्डन लगाना,कूड़ा खुद भी नहीं जलाती और पड़ोसियों को भी रोकती,सेहत ठीक करने के बहाने पतिदेव को गाड़ी कम इस्तेमाल करने को कहती,  आदि। कभी-कभी मन में ख्याल भी आता कि -एक मेरे करने से क्या होगा,मगर दूसरे ही पल खुद को समझाती "अपने हिस्से की जिम्मेदारी तो निभाओ " खैर 2014-15 से धीरे-धीरे दिल्ली में प्रदूषण का स्तर किस कदर बढ़ा ये तो जग जाहिर है। गाड़ियों के धुएं,घुल की आंधी,कारखानों की जहरीली गैस ने तो नाक में दम कर ही रखा था ऊपर से खेतो में पराली का जलना तो  एक-एक सांस लेना दुर्लभ कर दिया। 

इतने प्रदूषण के वावजूद जब त्यौहार आते तो दशहरा में रावण जलाने से लेकर दिवाली के पटाखों के बाद घर-घर में दमा के मरीज भर जाते। बुजुर्गों की हालत इतनी दयनीय होती कि -आज के कोरोना-काल की तरह उन्हें घर में कैद हो जाना पड़ता, तब भी मौत की संख्या बढ़ ही जाती। उन्ही बदनसीबों में से एक मेरा भी परिवार था। 2016 के 23 नवम्बर को  प्रदूषण के कारण ही मेरे पापा को साँस लेने में थोड़ी दिक्क्त शुरू हुई। इलाज शुरू हुआ, डॉक्टरों के सारे ड्रामे चलते रहे , 31 जनवरी को कहा गया कि -फेफड़े में एक छोटा धब्बा नज़र आ रहा है शायद कैंसर हो , 28 फरवरी को कैंसर चौथे स्टेज पर पहुंच गया और पापा लाईलाज हो गए और 4 मार्च को हमें छोड़ इस प्रदूषण के दुनिया से बहुत दूर चले गए । 

इस घटना के बाद मेरा परिवार टूट सा गया क्योंकि नवम्बर तक मेरे पापा हट्टे-कट्टे थे,74 साल के उम्र में भी हर रोग से दूर,उनका अचानक जाना हमारा परिवार सह नहीं पा रहा था और बच्चों के लिए तो यकीन करना मुश्किल ही था। उस वक़्त मेरा 5 साल का भतीजा मुझसे सवाल किया "बुआ आप दादा जी को क्यों नहीं बचा पाई आप तो डॉक्टर है न "(मैं होमियोपैथ की डॉक्टर हूँ,बच्चें को मुझ पर बहुत यकीन था ) मैंने कहा-नहीं बचा पाई क्योंकि दादाजी को किसी बीमारी ने नहीं मारा बल्कि प्रदूषण ने मारा है। बच्चें ने प्रदूषण पर ढेरों सवाल खड़े कर दिए,मैंने यथासम्भव और उसके समझ के हिसाब से समझाने की कोशिश की। उस उम्र के बच्चें का सबसे गंभीर प्रश्न- क्या हम प्रदूषण को रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकते ? मैंने समझाया क्यों नहीं कर सकते, जरूर कर सकते हैं  सबसे पहले तो दिल्ली के प्रदूषण को रोकने के लिए हम पटाखें जलाना छोड़ सकते हैं, कूड़ा और गंदगी को जलाना छोड़कर हवा प्रदूषित होने से रोक सकते हैं और अपने छत पर छोटा सा गार्डन लगा सकते हैं। 

उस छोटे से बच्चें ने उसी वक़्त संकल्प लिया हम भाई-बहन (कुल मिलाकर सात बच्चें है घर में )आज से पटाखें नहीं जलायेगे और अपने दोस्तों को भी समझायेंगे कि -पटाखें नहीं जलाओ साथ ही साथ हम जितना होगा पौधे लगयाएगे। हमारे घर के बच्चों ने झूठी कसम नहीं खाई थी वो दिन है और आज का दिन हमारे घर में पटाखें नहीं जलाये गए। 

ये सारा वृतांत सुनाकर मैं सिर्फ ये कहना चाहती हूँ कि -बड़ी-बड़ी योजनाएं तो अपनी जगह है हम सभी अपने हिस्से की छोटी-छोटी जिम्मेदारी भी निभा ले तो ये बड़ी समस्या भी छोटी हो सकती है। आज अनेको उदाहरण भरे पड़े है जहाँ अपने बलबूते पर ही प्रकृति और पर्यावरण के लिए कई लोग बहुत कुछ कर रहें है। लेकिन हम उनसे प्रेरित ना होकर उन्हें देखते है जो लोग इसके विपरीत काम करते हैं अर्थात पर्यावरण को दूषित करने का एक भी मौका नहीं छोड़ते। उन्हें देख हम कहते हैं कि -सब तो कर रहे है एक मेरे ना करने से क्या होगा ?

2020 में जब लॉक डाउन हुआ था तो हम सबने प्रत्यक्ष देखा था कि -प्रकृति ने अपना शुद्धिकरण कैसे किया था। उस परिणाम स्वरूप चंद साँसे हमारी बढ़ गई थी लेकिन हमने इतने बड़े घटनाक्रम से भी कुछ नहीं सीखा और जैसे ही दुःख के दिन बीते हम फिर वही लापरवाही करने लगे। प्रकृति फिर कुपित हुई और इस बार उसने पर्यावरण में नहीं हमारे फेफड़ों में ही साँसे कम कर दी। ये कथन कि -"एक के किये से कुछ नहीं होता " इसे भी गलत साबित कर प्रकृति हमें समझा रही है कि -तुम्हारे घर का एक बंदा ही मौत को लेकर घर में प्रवेश कर रहा है और पूरा का पूरा परिवार काल के गाल में चला जा रहा है। 

रामायण में वर्णित एक गिलहरी की कहानी सब जानते हैं कि -रामसेतु पुल बनाने में कैसे उसने अपना छोटा सा ही सही योगदान दिया था। यदि हम वो गिलहरी भी बन जाए और अपने हिस्से का फर्ज निभा ले तो स्थिति बहुत हदतक सुधर सकती है।जैसे कि -घर में पांच व्यक्तियों के लिए पांच गाड़ी रखने को हम अपना स्टेटस सिंबल ना समझ, ये समझे कि -हम जिम्मेदार है हवाओं में जहर घोलने के लिए।गाड़ियों को प्रदूषण रहित रखने की जिम्मेदारी ना निभाना और घुस देकर प्रदूषण फ्री का सर्टिफिकेट ले लेने को अपनी समझदारी ना समझे। हम ये मान ले कि -अपना घर साफकर कूड़ा सड़क के किनारे फेकना सफाई नहीं है। उस कूड़े को सही तरिके से विघटित ना कर कही भी इक्ठाकर जला देना हमारी बेवकूफी है। जहर घुल चुकी हवाओं में त्यौहार के नाम पर या शादी-उत्सव के नाम पर पटाखें जलाकर और जहरीला बनाने को ही खुशियां मनाने की संज्ञा ना दे,बल्कि ये  समझे हम ख़ुशी नहीं अपनी मुसीबत आप बुला रहे है। 

ये बाते बहुत छोटी है परन्तु बहुत महत्व रखती है। पहले खुद सुधर जायेगे तभी तो सिस्टम और सरकार पर उँगली उठाने के काबिल रह पाएंगे।दूसरों पर ऊगली उड़ाने से पहले एक ऊगली अपनी तरफ भी होनी चाहिए। सिर्फ धरना-प्रदर्शन कर, बड़ी-बड़ी बहस में शामिल होकर हम किसी भी समस्या का समाधान नहीं कर सकते। एक आपबीती और याद आ रही है -एक शिक्षिका थी जो समाज सेविका भी थी वो  खुद की बहु को दहेज के लिए प्रताड़ित कर स्कुल के मंच पर ही नहीं बड़ी-बड़ी सभाओं में भी जाकर दहेज प्रथा के खिलाफ भाषणबाजी और नारेबाजी करती थी। हमें ये दोहरा व्यक्तित्व छोड़ना पड़ेगा। वरना कोरोना तो कुछ भी नहीं आगे इससे भी बड़ी विपदा हमारे आगे खड़ी है। ऑक्सीजन लेबल घटाया हमने है बढ़ाना भी हमारा काम है। 

हर समस्या के समाधान का बहुत ही साधारण मंत्र है -"हम सुधरेंगे युग सुधरेगा

                                                                                        हम बदलेंगे युग बदलेगा " 

 



गुरुवार, 13 मई 2021

"शुक्रिया"


एक दिन,निकले थे 

अनजान सफर पे..

रास्ते पता ना थे 

मंजिल की परवाह ना थी 

बस अपनी धुन में.. 

कदम-दर-कदम बढाती गई 

उदेश्य,सिर्फ दिल की ख़ुशी 

कुछ टेढ़े,कुछ मेढ़े 

टूटे-फूटे शब्दों को जोड़ते 

मन की बात 

कलम कहती गई 

साथी मिलते गए 

हौसला अफजाई होती गई

दोस्तों का संग मिला 

महफ़िल सजती गई

गुणीजनों का सहयोग मिला 

ज्ञान-गंगा बढ़ती गई  

अब रुकना कहाँ है ?

परवाह नहीं... 

ख़ुश हूँ,मुतमइन हूँ  

और आज,

सौवे पायदान पर 

कदम रख चुकी हूँ... 

आपका संग,आपका आशीर्वाद 

 रास आ गया मुझे 

शुक्रिया....शुक्रिया 

तहे दिल से शुक्रिया दोस्तों !


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आज की इस बिषम परिस्थिति में खुद को व्यस्त , संयमित

और सकारात्मक रखने का एक मात्र सहारा  "लेखन कार्य " 

किसी से कुछ सीखते हैं किसी को कुछ सिखाते हैं,

बिना किसी से शिकवा-शिकायत किये 

वक़्त के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का प्रयास करते हैं। 

खुश रहते है और दूसरों को खुश रखते है.....

एक बार फिर से आप सभी को 

हृदयतल से शुक्रिया....


 


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