गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

"नई सोच के साथ, नया साल मुबारक हो"


" 2021 "आख़िरकार नया साल आ ही गया। कितने उत्साह, कितने उमंग के साथ आज रात को पुराने साल की विदाई और नए साल के स्वागत का जश्न चलेगा। पुराने साल को ढेरों बद्दुआएं देकर कोसा जायेगा और नए साल से कई नयी उम्मीदें लगायी जायेगी। उम्मीदें लगाना, अच्छा सोचना और आशावान होना सकारात्मक सोच है जो होना ही चाहिए। 

मगर सवाल ये है कि - किस आधार पर हम नए साल में नए बदलाव की कामना कर सकते हैं ? 

 अक्सर मन में विचार आता है "नया साल" आखिर  होता क्या है ?  देखे तो वही दिन वही रात होती है वही सुबह वही शाम होती है ,बस कैलेंडर पर तारीखे बदलती रहती है। हाँ,कोई एक किस्सा, कोई एक हादसा, कोई एक घटना उस तारीख के नाम हो जाती है बस। जैसा कि 2020 एक  भयानक जानलेवा बीमारी और त्रासदी के नाम से याद किया जाएगा। इस साल में जितनी अनहोनियां हुई है उतनी शायद ही किसी साल में हुई हो।अभी ये दिन गुजरा ही नहीं है कि आने वाला साल अपने साथ एक नया दहशत  लेकर आ रहा है। फिर नया क्या है ?किस बात का जश्न मना रहे है हम ? 

    ये नहीं है कि पुराना  साल हमें सिर्फ दुःख-दर्द ,डर और दहशत ही दे गया है,उसने हमें एक सबक एक चेतावनी भी दी है। मगर हम में से ज्यादातर लोग उस बुरे घटनाक्रम को ही याद रखेगें,मात्र दस प्रतिशत लोग ही उस सबक और चेतावनी को यादकर खुद को बदलने की कोशिश करेगें। 

  "नया" शब्द का मतलब क्या है ? नया यानि बदलाव,अब वो बदलाव अच्छा भी हो सकता है बुरा भी। अगर बदलाव अच्छाई,शांति और ख़ुशी लेकर आए तो खुशियाँ मानना जायज है अगर बदलाव दिनों-दिन हमें बुराई, अशांति दुःख-दर्द की ओर ले जा रही है तो फिर किस नयी बात का जश्न  मनाया जाये ?

   पिछले दशक यानि 2010 से 2020 तक समाज में जितना बदलाव हुआ है वो शायद ही किसी और दशक में हुआ हो। नयी टेक्नॉलजी आई,समाज में इतना बड़ा परिवर्तन हुआ जिसकी 2000 तक कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। सोशल मिडिया ने हमारा पूरा सामाजिक ढांचा ही बदल दिया। आया था अच्छे के लिए मगर हमने उससे अपना बुरा ही किया। चिकित्सा जगत में नए-नए खोजकर पुरानी बिमारियों का इलाज ढूढ़ा गया।  क्या हम रोगमुक्त हुए या हमें कई प्रकार की नई बिमारियों ने आ जकड़ा ? आज एक बीमारी ने पुरे विश्व को त्राहि-माम करने पर मजबूर कर दिया। अनगिनत जानें तो गई ही समूचा विश्व आर्धिक तंगी के चपेट में भी आगया।सारे महान ज्ञानियों के खोज-बिन के बाद सभी को इस बीमारी से बचने का बस एक उपाय  सुझा कि -"अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाये और इस बोमरी से बचें,दूसरा कोई इलाज नहीं है।"

   इस त्रासदी के शुरूआती दिनों में तो हम डरे,बच-बचाव के सारे उपाय किये, अपनी सेहत पर ध्यान देना शुरू किया,योग-प्राणायाम ,खान-पान सब पर पूरी सतर्कता से अम्ल किया और अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का पूरा प्रयास किया । मगर धीरे-धीरे हम उस रोग में ही रचते-बसते चलें गए है और नतीजा वही "ढाक के तीन पात". 

   क्यों हम एक ही गलती बार-बार दोहराते जाते हैं और दुःख-दर्द,परेशानी का रोना रोते रहते हैं  और फिर ये कामना भी करते हैं कि -"आनेवाले दिनों में सब ठीक हो जायेगा" ?

कैसे ठीक हो जायेगा ? हम अपनी परिस्थिति को ठीक करने के लिए क्या योग्यदान कर रहे है?

  ज्ञानीजनों ने,भविष्य वक्ताओं ने  कहा था 21 वी सदी बदलाव का युग होगा। बदलाव तो दिख रहा है, मगर ये कैसा बदलाव है जिसमे हर तरफ दर्द और सिसकियाँ ही सुनाई पड़ रही है। 

    बदलाव हो जायेगा यदि हम 2020 की दी हुई एक-एक सीख को स्मरण कर अपनी गलतियों को सुधारने लगेंगे। आधुनिकता की अंधी दौड़ से खुद को निकलकर अपनी परम्परागत जीवन शैली को अपनाते हुए खुद के सेहत का धयान रखना शुरू करेगें,घर को सुख-ऐश्वर्य के सामान से ही नहीं परिवार से सजाना शुरू करेगें,समाज को कुंठित-कलुषित करना छोड़ उसमे प्यार और भाईचारा का रंग भरना शुरू करेगें,प्रकृति को दूषित करना छोड़, उसे प्रदूषणरहित करने की ओर अग्रसर होंगे, अपनी सोच को बदलगे तो  बदलाव जरूर आएगा। ये निश्चित है। 

फिर उस दिन शान से कहेगें - "नई सोच के साथ, नया साल मुबारक हो"


गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

"एकांतवास"




       टॉलस्टॉय की लिखी एक कहानी है - दो दोस्तों में शर्त लगी कि- कौन एक वर्ष तक एकांतवास कर सकता है जो करेगा दूसरा उसे 10 लाख नगद देगा। एक दोस्त राजी हो गया।उसने एक साल की अपनी जरुरत की सारी चीज़े रख ली,खुद के मनोरंजन के जितने भी साधन उसे चाहिए थे सब इकठ्ठें  कर रख लिये और एक साल के लिए कमरे में बंद हो गया।  कुछ दिन तो बड़ा खुश-खुश रहा,मगर धीरे-धीरे वो उन सब चीजों से ऊबने लगा। महीने दिन में ही वो अकेलापन से घबराने लगा।कुछ और दिन बीतते ही वो चीखने- चिल्लाने लगा,अपने बाल नोचने लगा,अकेलेपन की पीड़ा उसे असहनीय लगने लगी मगर, जैसे ही उसे शर्त की बात याद आती वो शांत हो जाता क्योँकि उसे पैसे की बहुत आवश्यकता थी। उसके पास कुछ अच्छी किताबें थी जिसमे परमात्मा से जुडी ज्ञान की बातें थी, मन बहलाने की लिए वो उसे पढ़ने लगा।उसका मन थोड़ा लगने लगा,वो धीरे-धीरे शांत भी होने लगा।धीरे-धीरे वो खुद को परमात्मा के करीब महसूस करने लगा,जब किताबें छोड़ता तो परमात्मा से बातें करने लगता।परमात्मा से बातें करना उसे अच्छा लगने लगा, अब उसे अकेलापन भी अच्छा लगने लगा,उसे खुद के भीतर अजीब सी शांति महसूस होने लगी,वो खुद को परमात्मा के साथ महसूस करने लगा, परमात्मा के साथ उसे अच्छा लगने लगा और वो खुश रहने लगा। उसे पता ही नहीं चला कब एक वर्ष गुजर गया। शर्त पूरा होने में बस एक महीना बचा था।  उधर दूसरे दोस्त को घबराहट होने लगी उसे लगा कि यदि मेरा दोस्त शर्त जीत गया तो उसे शर्त की  रकम देनी होगी।वो परेशान हो गया, क्योँकि इधर एक साल में उसे बिजनेस में काफी नुकसान हो गया था वो चिंतित रहने लगा कि शर्त की रकम कहाँ से लाऊँगा। उसने सोचा कि मैं दोस्त को मार दूँ तो सब यही समझेगें कि अकेलेपन से ऊब के और शर्त हारने के डर से उसने आत्महत्या कर ली,मुझ पर कोई शक भी नहीं करेगा और मैं पैसे देने से भी बच जाऊँगा।  फिर क्या था,शर्त पूरा होने के एक दिन पहले वो दोस्त को मारने के ख्याल से उस कमरे में गया जहाँ उसका दोस्त बंद था। मगर वहां जाकर देखा तो दंग रह गया। उसका दोस्त जा चूका था, उसने एक पत्र छोड़ रखा था जिसमे लिखा था -"प्यारे दोस्त इस एक साल में मैंने वो चीज पा ली हैं जो अनमोल हैं उसका मूल्य कोई भी नहीं चूका सकता ,मैं जान चूका हूँ कि हमारी जरूरते जितनी कम होती जाती है आनंद और शांति की अनुभूति बढ़ती जाती है,इन दिनों में मैंने परमात्मा के असीम शक्ति और प्रेम को जान  लिया हैं, ये शर्त मैं खुद ही तोड़कर जा रहा हूँ मुझे तुम्हारी रकम नहीं चाहिए,तुम इस रकम को मेरी तरफ से खुद के लिए उपहार समझो, इस रकम से अपना व्यवसाय बढ़ाओं,मुझे अब किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं है,मैं अब हमेशा के लिए इन सभी चीज़ों से दूर जा रहा हूँ।"
    पहले ये कहानी मुझे बिलकुल समझ नहीं आती थी लेकिन, लॉकडाउन के दौरान मुझे ये बात समझ में आई कि-सचमुच," हमारी जरूरते जितनी कम होती जाती है आनंद और शांति की अनुभूति बढ़ती जाती है"शायद,इस बात का अनुभव लॉकडाउन के दौरान बहुतों ने किया होगा।   

     पहले मेरे लिए अकेलापन ही सबसे बड़ी सजा होती थी। मैं अक्सर कहती थी कि-"मुझे अगर मारना है तो दो दिन के लिए एक कमरे में बंद कर दो मैं अकेलेपन से ही मर जाऊँगी" मगर,पिछले कुछ दिन में मुझे भी ऐसी ही अनुभूति हुई कि -"कभी-कभी अकेलापन आपके लिए सजा नहीं बल्कि वरदान साबित होता है" बशर्ते आप उस अकेलेपन का सही मायने में सदुपयोग करें,जैसा कि टॉलस्टॉय की कहानी के किरदार ने किया। अकेलेपन में आप सर्वप्रथम तो खुद करीब होते हैं,खुद को जानने समझने और खुद से प्यार करने का अवसर मिलता है और खुद के करीब होते ही आप परमात्मा के करीब होने लगते है।आप अपने आस-पास सभी को जानते,पहचानते और समझते हैं बस खुद को ही नहीं जानते हैं और ना ही कभी जानने की कोशिश करते हैं,अकेलापन यही अवसर आपको प्रदान करता है
    ये सत्य है कि-"मनुष्य एक समाजिक प्राणी है" समाज में रहना नाते-रिश्तेदारों के साथ अपना कर्तव्य निभाना ये जरुरी है लेकिन, उतना ही जरुरी है खुद के साथ भी रहना।खुद के साथ रहने के लिए किसी एकांतवास या अलग कमरे में रहने  की जरुरत नहीं होती, अपनी आशाओं,अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को कम  कर आप भीड़ में रहकर भी खुद के साथ रह सकते हैं और परमात्मा के असीम शक्ति और स्नेह की अनुभूति कर सकतें हैं। 

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

"उलझन-सुलझन"

  


     जिंदगी कभी-कभी उलझें हुए धागों सी हो जाती है,जितना सुलझाना चाहों उतना ही उलझती जाती है। जिम्मेदारी या कर्तव्यबोध,समस्याएं या मजबूरियों के धागों में उलझा हुआ बेबस मन। ऐसे में दो ही विकल्प होता है या तो सब्र खोकर तमाम धागों को खींच-खाचकर तोड़ दे....उलझन खुद-ब-खुद सुलझ जाएगी.....ना रहेगा कर्तव्यबोध तो जिम्मेदारियों का एहसास ख़त्म हो जायेगा और.....जब ये एहसास ख़त्म तो मजबूरियाँ और समस्याएं तो अपने आप ही ख़त्म हो जाएगी......तब ना कोई उलझन होगी ना सुलझन.....सारे बंधन खुल जायेगे और हम आजाद....बिना डोर के पतंग  सी.....डोलते रहे जहाँ चाहे वहाँ। मगर इस विकल्प को तो पलायन करना कहेगे और परस्थितियों से पलयन करना उचित है क्या ? वैसे भी बिना डोर के पतंग  को तो कटी पतंग कहते हैं  जिसका कोई अस्तित्व नहीं होता। 

   और दूसरा विकल्प है सब्र से,धैर्य से और प्यार से एक-एक धागों की गाँठ को खोलते जाये,जिम्मेदारियों का निबाह करते हुए उलझनों को सुलझाते जाएं । मगर...अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तन्मयता के साथ निभाते हुए भी हर एक उलझन को सुलझाना आसान तो नहीं होता ....ववरा मन इतना धर्य धारण कैसे करें......सब्र टूटने लगता है.....प्यार नीरस होने लगता है। अक्सर मन,सब्र और प्यार  से उन धागों के उलझनों को तो सुलझा भी  लेता है मगर खुद को कही खोता चला जाता है। दूसरों के वजूद को सँवारते-सँवारते खुद का वजूद कही गुम सा हो जाता है।सारे गाँठ  तो खुल जाते हैं  मगर मन खुद अनदेखे बंधनो में बांध जाता है। ये बंधन  कभी तो सुख देता है और कभी अथाह दुःख।  

    माना, कटी पतंग का सुख क्षणिक होता है या यूँ कहें भ्रम होता है....असली सुख तो बंधन में ही होता।  सब्र,धैर्य और प्यार से कर्तव्यबोध के बंधन में बांधकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करना हमारा प्रथम धर्म है। मगर, इन्हे निभाते- निभाते हम अपने प्रति अपना कर्तव्य भूल जाते हैं। खुद के वजूद का एहसास होना भी जरूरी होता है मगर, इस बात को हम नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे में कभी-कभी हमारा कोई  "प्रिय" आकर अधिकार और स्नेह से भरे उलाहनों के साथ, चंद प्यार भरे शब्द  बोलकर हमारे अंतर्मन को जगा जाता है, हमें खुद के होने का एहसास करा जाता।"वो अपना" हमें बड़े प्यार से समझता है कि- "उठो ,दूसरों के प्रति जिम्मेदारियों को बहुत निभा लिया खुद के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभाओ,वो काम भी करों जो तुम्हारे अंतर्मन को शुकुन देता है,जिम्मेदारियाँ निभाओं मगर खुद को उसमे गुम ना करों" 

     उसके शब्दों का जादू जैसा असर होता है और हम जैसे गहरी नींद से जाग जाते हैं,और खुद के तलाश में लग जाते हैं वो अपना कोई दोस्त ही होता है "उस दोस्त का दिल से शुक्रिया"

" यदि जीवन में  आपको कोई सच्चा दोस्त मिल जाएं तो जीवन की आधी समस्याएं तो यूँ ही समाप्त हो जाती है,कई उलझन खुद-ब-खुद सुलझ जाती है।"


दोष किसका ???

     नमस्ते आंटी जी, कैसी है आप - शर्मा आंटी  को देखते ही मैंने हाथ जोड़ते हुए पूछा।      खुश रहो बेटा....तुम कैसी हो...कब आई दिल्ली....बिटिय...