रविवार, 23 दिसंबर 2018

"ज़िंदगी का सबक सिखाता " - दिसम्बर और जनवरी का महीना



        एक और साल अपने नियत अवधि को समाप्त कर जाने को है और एक नया साल दस्तक  दे  रहा है। बस, एक रात और कैलेंडर पर तारीखें  बदल जायेगी। दिसम्बर और जनवरी महीने की कुछ अलग ही खासियत होती है। कहने को तो ये भी दो महीने ही तो है पर साल के सारे महीनो को बंधे रखते है। दोस्तों , क्या आप को भी लगता है कि - इन दोनों के बीच एक खास रिश्ता है ? 

मुझे लगता है इन दोनों के बीच एक खास रिश्ता है बिलकुल रात और दिन के जैसे। दोनों एक ही धागे के दो सिरे ही तो है ,कहने को दोनों दूर है फिर भी एक दूसरे के साथ बंधे रहते है ,दोनों के  बीच कभी  ना ख़त्म होने वाला एक रिश्ता होता है। जब ये दो महीने दूर जाते है तो साल बदल जाते है और जब पास आते है तो आस बदल जाते है।  एक का अंत हो रहा होता है  दूसरे की शुरुआत। देखने में तो  ये दोनों एक से ही तो लगते है,एक  सा मौसम और एक  जितनी  ही  तारीखें ,बस दोनों के अंदाज़ अलग होते है।  एक में ढेरों यादें होती है तो दूसरे में अनेको वादें।  

बुधवार, 19 दिसंबर 2018

समंदर - " मेरी नज़र में "

 

       क्या कभी आपने समुंदर किनारे बैठ कर उसकी आती जाती लहरों को ध्यान से देखा हैं ? सागर दिन में तो बिलकुल शांत और गंभीर होता है।  ऐसा लगता है जैसे ,अपना विशाल आँचल फैलाये और उसके अंदर अनेको राज छुपाये ,एक खामोश लड़की हो जिसने सारे जहान के दर्द और सारी दुनियां की गन्दगियों को अपने दामन मे समेट रखा है।  लेकिन फिर भी खामोश है ,किसी से उसे कोई शिकायत नहीं ,कोई दुःख नहीं ,कोई तड़प नहीं। ( वैसे हमेशा से सागर को पुरुष के रूप में ही सम्बोथित किया गया है लेकिन मुझे उसमे एक नारी दिखती है.) हां, कभी कभी हलकी फुलकी लहरें जरूर उठती रहती है।  उस पल ऐसा लगता है जैसे दर्द सहते सहते अचानक से वो तड़प उठती हो और उसके दिल की तड़प ने ही लहरों का रूप ले लिया हो।  

मंगलवार, 11 दिसंबर 2018

" परिवर्तन " या पीढ़ियों में अन्तर

  उम्र के तीसरे पड़ाव में हूँ मैं ,बचपन और जवानी के सारे खूबसूरत  लम्हों को गुजर कर प्रौढ़ता के सीढ़ी पर कदम रख चुकी हूँ। तीन पीढ़ियों को देख चुकी हूँ या यूँ कहे कि उनके साथ जी चुकी हूँ। परिवर्तन तो प्रक्रति का नियम है इसलिए घर परिवार, संस्कार और समाज में भी निरंतर बदलाव होता रहा है और होता रहेंगा । शायद इसीलिए हर पीढ़ी ने दूसरे पीढ़ी को ये जुमला जरूर कहा हैं कि - " भाई हमारे ज़माने में तो ऐसा नहीं होता था ".लेकिन हमारी पीढ़ी ने वक़्त को जितनी तेज़ी से बदलते देखा है उतना शायद ही किसी और पीढ़ी ने देखा हो। और पढ़िये

"अब "

 "अब" अर्थात  वर्तमान यानि जो पल जी रहें है...ये पल अनमोल है...इसमे संभावनाओं का अनूठापन है...अनंत उपलब्धियों की धरोहर छिपी है इस ...