मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

प्रकृति संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकती हैं फ़िल्में

 "प्रकृति दर्शन" पत्रिका दिसंबर अंक में प्रकाशित मेरा लेख 

विषय था- फिल्मों में प्रकृति,प्रकृति पर फ़िल्में



शीर्षक -"प्रकृति संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकती हैं फ़िल्में" 

   " प्रकृति" अर्थात वो सृजन जो मानव निर्मित नही है। प्रकृति एक शब्द जिसमे समाहित है सारी भावनाएं....प्रेम-वियोग,राग-अनुराग,रंग-रंगरेज, नृत्य-संगीत,कवि-कल्पना,भोग-योग,बंधन-मोक्ष। प्रकृति जननी है, पोषक है, गुरु है और संहारक भी है। प्रकृति के पाँच तत्व से ही जीव का आस्तित्व होता है और उसी में उसे खो जाना भी होता है। मनुष्य ने जो कुछ भी सीखा वो प्रकृति से ही तो सीखा है। चंचल शीतल हवाओं ने हमें मस्ती सिखाई,कलकल  बहती  नदियों और झरनों की धुन ने हमें  गुनगुनाना सिखाया तो, बादलों की गरज से हमें संगीत मिला। खिलते फूलों से हमने मुस्कुराना सीखा तो पतझड़ से रोना, पेड़ों की छाँव ने हमें शीतल रहना सिखाया तो पर्वतो ने अड़िग रहना।सुबह उगते सूरज में परमात्मा का दर्शन किया तो फूलों में उसी परमात्मा को हँसते हुए देखा।  

  भरत व्यास जी ने एक गीत में कितनी खूबसूरती से इस प्रकृति का बखान किया है कि-

       ये कौन  चित्रकार है  जिसने हरी-हरी वसुंधरा पर नीला-नीला आसमान सजा दिया,चारों दिशाएँ रंग भरी है और फूल-फूल पर श्रृंगार है। सच,जब कभी मैं भी सोचती हूँ तो लगता है कि ये नदी-नाले, पर्वत, निर्झर, वन-उपवन, चंद्रमा-सूर्य, प्रात:-सायं, हवा-पानी, प्रकाश-अंधकार, ऋतुएं ये सभी किस  चित्रकार की कल्पना होगी। इसका सानिध्य पाकर तो प्रत्येक मन कवि और चित्रकार बन जाता। जितने  भी साहित्य, काव्य, नाट्य, वेद-पुराण, उपनिषद् या महाकाव्य रचे गए वह केवल और केवल प्रकृति के सान्निध्य में ही तो रचे गए है।  फिल्म जगत का उदय भी तो किसी कवि और चित्रकार की कल्पना से ही हुआ है तो भला वो प्रकृति से अछूता कैसे रहता। भारतीय फिल्मों का अधिकांश अंश तो प्रकृति के सानिध्य में ही फिल्माये जाते हैं। 

      पुरानी फिल्मों का तो पूरा फिल्मांकन ही प्रकृति की गोद में होता था। कहानी की पृष्ठभूमि तथा उनका नाम भी ज्यादातर  गाँव, खेत खलिहान,और प्रकृति से ही संबंधित होते थे जैसे "दो बीघा जमीन,आया सावन झूम के,बरसात,सावन-भादों,आदि। बाद के फिल्मों में भी और कुछ नहीं  तो कम-से-कम एक गाना तो वादियों में फिल्माया ही जाता था। गीतों में  चाँद-सितारें,फूल-पंक्षी,बाग़-बगीचे,बरखा-बादल, ठंडी हवाओं का जिक्र तो होता ही था। रिमझिम बरसात पर तो अनगिनत गाने फिल्माये गए होंगे। अपने मन और भावनाओं को इन्ही से तो जोड़ प्यार जताया गया है जैसे -ये वादियाँ ये फिजायें बुला रही है तुम्हें, खोया-खोया चाँद नीला आसमां, इन हवाओं में इन फिजाओं में तुमको मेरा प्यार पुकारे, जब चली ठंडी हवा जब उठी काली घटा मुझको ऐ जाने वफ़ा तुम याद आये। प्यार के साथ-साथ उलाहना भी दी गयी - इधर रो रही मेरी आँखें उधर आसमां रो रहा है मुझे करके बरबाद जालिम पशेमान अब हो रहा है,कारे-कारे बादरा जा रे-जा रे बादरा मेरी अटरिया ना शोर मचा आदि। 

      फिल्मों में प्रकृति के गोद में दृश्य तो बहुत फिल्माए गए,उन पर एक से बढ़कर एक अनगिनत खूबसूरत गीत भी लिखे गए मगर, प्राकृतिक संरक्षण पर गिने चुने ही फिल्म बनाये गए है। उनकी भी पटकथा ज्यादातर बस जंगल के बचाव पर ही आधारित है। हाँ, 2018 में एक फिल्म आई थी  "रोबोट 2. 0" उसमे मोबाईल के अत्यधिक यूज से पक्षियों पर मड़राते खतरे की ओर ध्यान  दिलाया  गया है। प्राकृतिक आपदाओं  पर आधारित  फिल्में तो बनती है जिसमे खासतौर पर सूखे और बाढ़ से जूझते किसनों और आमजनों की व्यथा दिखाई गई है जैसे- मदर इंडिया जिसमे सूखा और बाढ़ दोनों का भयावह रूप दिखाया गया है। 2005 की फिल्म "तुम मिले" में भी मुंबई की बारिस का भयानक रूप दिखाया गया है। अभी हाल फिलाहल की फिल्म "कड़वी हवाएँ" जिसकी कहानी दो ज्वलंत मुद्दों पर प्रकाश डालती है-जलवायु परिवर्तन से कही बढ़ता जलस्तर और कही सूखा। फिल्म में एक तरफ सूखाग्रस्त बुंदलखंड की आपदा है तो दूसरी और ओडिशा के तटीय क्षेत्र। लेकिन इस फिल्म के  स्टारकास्ट नामी-गरामी नहीं थे तो वो कम ही दर्शको तक पहुँच सकी। एक फिल्म और आई थी "केदारनाथ" जिसमे सदी के सबसे बड़े प्राकृतिक त्रासदी को फिल्माया गया है। लेकिन इसे भी महज एक प्रेम कहानी के रूप में दिखाया गया है। 

     फ़िल्में समाज का आईना होता है। हाँ,कल और आज में एक बहुत बड़ा अंतर आ गया है पहले के ज़माने की फिल्मों की कहानियों में समाज में जो घटित हो रहा था वो दिखाया जा रहा था मगर अब,जो फिल्मों में दिखाया जा रहा है समाज वैसा ही बनता जा रहा है। मैं फिल्मों की दीवानी हूँ मगर, बेहद अफ़सोस के साथ कहना पड़ रहा है कि - आज समाज में जो भी आराजकता,बेशर्मी,बेहयाई और अपराध बढ़े है उसके लिए फ़िल्मी पटकथा बहुत हद तक जिम्मेदार है। फ़िल्में समाज को बहुत प्रभावित करती रही है और कर भी रही है। इस लिए हर एक विषय पर फ़िल्मी दुनिया की जिम्मेदारी बहुत बड़ी होनी चाहिए। प्रकृति का अपने गीतों में गुणगान करना या प्राकृतिक त्रासदियों को दिखा देने भर से उनकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।उन्हें  "प्रकृति संरक्षण" को मुख्य विषय बनाना होगा। इस विषय पर डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में  तो बहुत बनती है मगर कमर्शियल  फ़िल्में नहीं। जैसा कि फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार का भी कहना है -"डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में समाज की सोच में वो बदलाव नहीं ला सकता जितनी सकारात्मक बदलाव व्यावसायिक फ़िल्में ला सकता है।" क्योंकि दर्शको को प्रसिद्धि प्राप्त नायक-नायिकाओं को  देखना और उन्हें सुनना ज्यादा पसंद है। 

    फ़िल्मी दुनिया ने प्रकृति का नजारा दिखा कर उससे लाभ तो बहुत उठाया है मगर मुझे नहीं लगता कि - "प्राकृतिक संरक्षण" के प्रति उसने अपनी जिम्मेदारी जरा सी भी निभाई हो। अक्षय कुमार की फिल्म "टॉयलेट : एक प्रेम कथा" भी एक सच्ची कहानी पर आधारित थी फिर भी, समाज के एक बड़े तबके तक इस घटना को पहुँचाना और स्वच्छता  के प्रति लोगो को जागरूक करने में उसने अहम भूमिका निभाई। व्यवसायिक सिनेमा ऐसा प्रभाव जमा सकता है क्योंकि दर्शक कलाकारों से जुड़ जाते हैं।आज वक़्त की मांग है कि-फ़िल्मी दुनिया अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए "प्राकृतिक संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने के विषय से संबंधित फिल्मों का निर्माण करें।"  जो काम हम लेखक और प्राकृतिक संरक्षण के प्रति समर्पित सेवाभावी लोग सालों की मेहनत के बाद कर पायेगे वो काम ये फ़िल्मी दुनिया वाले कम समय में आसानी से कर सकेंगे। बस उन्हें अपनी जिम्मेदारी का अहसास भर होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश  ये लोग समाज और पर्यावरण को गंदा करने का ही काम कर रहें है जो बेहद अफसोसजनक है। 

    अथर्ववेद के अनुसार मनुष्य ने प्रकृति से ये शपथ लिया था कि-"तुमसे उतना ही लूंगा जितना तू पुनः हमें दे सके,मैं तेरी जीवनी शक्ति पर कभी प्रहार नहीं करूँगा"हमने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी और प्रकृति कुपित हो गई है। फ़िल्मी दुनिया वाले भी बहुत ले चुके हैं अब देने की बारी है।

"दो बीघा जमीन" फिल्म में सलिल चौधरी का लिखा एक गीत -

धरती कहे पुकार के, बीज बिछा ले प्यार के

मौसम बीता जाए, मौसम बीता जाए

मैं कहूँगी -अब वक़्त बीत रहा है और पर्यावरण के साथ मौसम बदल रहा है संभल सकें तो संभल लें। 



रविवार, 6 नवंबर 2022

"तुलसी विवाह"आस्था की प्रकाष्ठा

 





कल मन्दिर में तुलसी विवाह समारोह था। मैं भी इस विवाह में शामिल थी।जब विवाह की सारी रस्में हो रही थी जैसे वरमाला, कन्यादान और फेरे तो मेरे मन में कई सवाल उठ रहें थे "एक पौधे का एक पत्थर से विवाह"
कैसी प्रथा है?

 कैसी रस्में है ये?

क्या ये ढकोसला है या बेवकूफी?

आज के इस जेट और नेट के युग में भी ये रुढ़िवादिता ?

 देखने-सुनने में कितना अजीब लगता है न ?

दूसरे धर्मो के लोग इसे क्या समझेंगे ?

लेकिन ये है सनातन धर्म की "आस्था की प्रकाष्ठा"  

आज की नई  पीढ़ी के लिए ये सारी बातें जरूर ढकोसला या अन्धविश्वास होगा मगर, ये प्रथाएं सिद्ध करती  है कि-हमारी पौराणिक कथाओं में कुछ तो सत्यता है जो आज भी ऐसी  प्रथाओं को पुरी आस्था-विश्वास और श्रद्धा  साथ निभाया जाता है। लोग इतने प्यार से तुलसी जी को सजा-सँवार रहें थे जैसे अपनी बेटी को सजाते हैं  हल्दी,मेहँदी,चूड़ी-कंगन,बिंदी-सिंदूर और चुँदरी चढ़ा रहें थे। एक वर पक्ष था जो शालिग्राम जी को हाथ में लिए हुए  थे और एक कन्या पक्ष जो तुलसी जी को हाथ में उठाये हुए थे और उनके फेरे लगवाएं गए उससे पहले वधु पक्ष ने तुलसी जी का कन्यादान भी किया। सारे विधि-विधान पुरे आस्था और श्रद्धा के साथ किया गया। 

ये सब देख मैं सोच  थी कि-कितनी गहरी है हमारी सनातन धर्म की जड़ें जो आज भी किसी के हिलाये नहीं हिलती। तुलसी और शालिग्राम जी की कथा तो सर्वविदित है इसे बताने की जरूरत नहीं। बस ये कहना चाहूँगी कि-कुछ बातें ऐसी होती है जो पौराणिक कथाओं की सत्यता स्वयं सिद्ध करती है।

तुलसी जी का नाम वृंदा था। वृंदा एक वैध थी और उनमें निष्काम सेवा भाव कूट-कूटकर भरा था। पंचतत्व का शरीर त्यागने के बाद जब उन्होंने एक पौधे का रूप धारण  किया तब भी वो अपनी प्रवृत्ति नहीं बदली, इस रुप में भी वो अपनी औषधीय गुण से मानव कल्याण ही करती है।तुलसी के पौधे का एक-एक भाग ओषधियें गुणों से भरपूर है। "शालिग्राम" को जीवाश्म पथ्थर कहते हैं। "जीवाश्म" अर्थात "पृथ्वी पर किसी समय जीवित रहने वाले अति प्राचीन सजीवों के परिरक्षित अवशेषों" अर्थात किसी समय ये पथ्थर सचमुच जीवित होगा और शालिग्राम जी गंडकी नदी के अलावा और कहीं क्यों नहीं मिलते? एक पत्थर ही तो है कहीं भी मिल सकते थे।ये सारी बातें कही-न-कही ये सिद्ध करती है कि-कुछ तो सच्चाई थी इन कथाओं में।अब तर्क-कुतर्क करने वालों को तो कुछ कह नहीं सकते।  ये कहानी एक बात और सिद्ध करती है कि भक्त और भगवान के सम्बंध में कोई बड़ा-छोटा नही होता। भक्त वृन्दा के श्राप से भगवान भी मुक्त नही हो सकें।

अब एक बार ये सोचे कि-ये बातें मनगढ़ंत है तब भी प्रकृति और पुरुष का ये अद्धभुत मिलन समारोह ये क्या सिद्ध नहीं करता कि -हमारी सनातन संस्कृति अपनी प्राकृतिक धरोहर को पूजनीय मान इनका पूरी श्रद्धा से संरक्षण करती थी ?

और आज हम अपने ही हाथों से अपनी संस्कृति और प्रकृति दोनों का सर्वनाश कर रहें हैं। 


 


रविवार, 16 अक्तूबर 2022

"एक रिश्ता ऐसा भी"-गतांक से आगे

     

    वसुधा के टैक्सी से उतरते ही आकाश आगे बढ़ा और टैक्सी ड्राइवर को पैसे देने लगा, वसुधा ने रोकना चाहा मगर अभी आकाश ने जो उस पर अपना अधिकार जताया है उसे देख वो कुछ बोल नहीं सकी। बिना किसी औपचारिकता के वो दोनों कॉफ़ी हाउस के अन्दर चलें गये।ऐसा लगा ही नहीं कि वो दोनों इतने अरसे बाद एक दूसरे को देख रहे हैं। "तुम क्या लोगी" - आकाश ने बड़ी बेतकल्लुफी से पूछा । अभी वसुधा कुछ कहती उससे पहले ही बोल पड़ा-"वहीं कॉफ़ी....आज भी पसंद है या...मेरे साथ-साथ कॉफ़ी को भी अलविदा कह चुकी हो- कहते हुए एक सरसरी सी निगाह उसने वसुधा पर डाली। वसुधा मुस्कुराईं-"अलविदा ही तो नहीं कर पाई...आज भी दोनों तहे दिल से पसंद है"।आकाश के चेहरे पर भी फीकी सी मुस्कान आ गई। आकाश बेहद गमगीन लग रहा था उम्र का असर उसके जिस्म पर नहीं मगर चेहरे पर नजर आ रहा था। वसुधा एकटक उसे देखे जा रही थी शायद उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी और आकाश उससे नजरें चुरा रहा था शायद वो अपने दर्द को वसुधा से छुपाने की नाकाम कोशिश कर रहा था। 

     कुछ देर दोनों के बीच खामोशी छाई रही। तब तक वेटर कॉफ़ी लेकर आ गया। कॉफ़ी की सिप लेते हुए वसुधा ने ही मौन तोड़ा-"आज ये उल्टा क्यों हो रहा है पहले तो आप मेरे चेहरे पर टकटकी बांधे रहते थे और मैं नज़रे चुराती थी और आज......"कहते-कहते वसुधा रुक गई। वक़्त बदल गया है वसुधा और मैं भी-आकाश बोला। "हम नहीं बदले आकाश तभी तो सालों बाद भी यूँ आमने-सामने बैठे है....अच्छा कहो, इतने दिनों बाद मुझसे मिलने की क्यूँ बेचैनी हुई"-वसुधा ने आकाश को छेड़ने के लहजे में कहा,वो उसे मुस्कुराते हुए देखना चाहती थी। मगर आकाश के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया उसने अपने पर्स से एक तस्वीर निकलकर मेज पर रख दी और बोला -"पहचानती हो इसे"? वसुधा हाथ में फोटो लेकर मुस्कुराते हुए बोली -हाँ-हाँ,इसे कैसे भूल सकती हूँ ये तो हमारा बेटा साहिल है...मेरा मतलब...आपका बेटा....कहते हुएं वसुधा थोड़ी झेंप सी गई। संकोच न करों...ये तुम्हारा ही बेटा है वसुधा- आकाश बोला। वसुधा को याद आ गया जब आकाश का आखिरी खत उसे मिला था साथ में यही फोटो था। आकाश ने लिखा था - ये हमारा बेटा है वसुधा....मैंने इसका नाम साहिल रखा है.....तुम्हारा ही दिया नाम है...याद है न...भले ही इसने  तुम्हारी कोख से जन्म ना लिया हो....मगर इसमें तुम्हारा ही अक्स है....ये वसुधा और आकाश का "साहिल"  है- वसुधा साहिल की तस्वीर को सीने से लगा कर घंटों रोती रही थी। वसुधा..वसुधा.. आकाश की आवाज पर चौंकते हुए वो वर्तमान में लौटी।

   साहिल की तस्वीर को बड़े प्यार से देखते हुए बोली - अब तो मेरा बेटा जवान हो गया होगा...कैसा लगता है वो। आकाश ने मेज़ पर एक दुसरी तस्वीर रख दी। फोटो देख वसुधा चहकती हुई बोली -कितना स्मार्ट है मेरा बेटा....बुरा नहीं मानिएगा मेरा बेटा आप से ज्यादा स्मार्ट है। इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है...तुम्हारा बेटा था ही मुझसे स्मार्ट....वैसे भी माँ को तो अपना बेटा दुनिया में सबसे ज्यादा प्यारा लगता है - आकाश बोला। उसका एक-एक शब्द मुश्किल से निकल रहा था। वसुधा अपनी धुन में मगन चहकती हुई आकाश के बगल में आकर बैठ गई और तस्वीर दिखती हुई बोली-"था" का क्या मतलब है...इसकी आँखें देखिये कितनी प्यारी है....ऐसा लगता है अभी बोल पड़ेगा। वो अब कभी नहीं बोलेगा वसुधा....वो हमेशा के लिए खामोश हो गया है -बोलते हुए आकाश की आँखें बरस पड़ी। वसुधा अचंभित सी बोली-क्या मतलब है आपका....इसके गले में कुछ हो गया है क्या ?आकाश ने वसुधा के हाथों को कसकर पकड़ लिया जैसे वो हिम्मत जुटा रहा हो और कतार स्वर में बोला -"वो हमें छोड़कर चला गया वसुधा" -आकाश के चेहरे पर एक कठोर भाव था जैसे वो अपने आँसुओं पर बाँध लगाने की कोशिश कर रहा हो। वसुधा घबराई सी बोली -कहाँ चला गया ??? चला गया वसुधा...भगवान जी के पास चला गया - बोलता हुआ आकाश फूट -फूटकर रोने लगा,उसका सब्र टूट गया था,उसने वसुधा के हाथों से ही अपने चेहरे को ढक रखा था। वसुधा बूत सी बन गई थी, उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था। 

    उसने आकाश को अपनी बाँहों में भरकर गले से लगा लिया उसे होश ही नहीं था आस-पास का,आकाश हिचकियाँ लेकर के रोता रहा उसके आँसुओं से वसुधा का दामन भींगता रहा, उसके भी आँसू थम नहीं रहे थे। थोड़ी देर बाद आकाश को ही होश आया वो झट से वसुधा से अलग हो गया।अपने आँसुओं को पोछने के लिए जेब से रुमाल निकल ही रहा था कि वसुधा अपने आँचल से उसके आँसू पोछने लगी फिर उसे पानी का ग्लास दिया,पानी पीकर नॉर्मल होते हुए आकाश बोला-कॉफ़ी ठंडी हो गयी होगी मैं दूसरी आर्डर करता हूँ। नहीं,इसकी जरुरत नहीं है-वसुधा बोली। उसके शब्दों को अनसुना कर आकाश ने वेटर को आवाज लगाई और दो कॉफ़ी और कुछ स्नैक्स आर्डर कर दिया। 

   थोड़ी देर के ख़ामोशी के बाद वसुधा बोली-कैसे हुआ ये। उसने आत्महत्या कर ली-नजरें नीचे किये हुए सपाट शब्दों में आकाश बोला। क्या....???वसुधा चीख पड़ी। हाँ वसुधा...मेरे बेटे...आकाश के बेटे ने आत्महत्या कर ली....पंखें से लटक गया वो....वो कमजोर या बुजदिल नहीं था....मैं लापरवाह था....मैं उसे समझ नहीं सका....ना उसे समझा सका....ना ही उसका साथ दे सका....मैं बुजदिल था वसुधा...मैं बुजदिल था.....मैंने तुम्हारे बेटे को मार दिया....कहते-कहते आकाश फिर सिसकियाँ लेने लगा। वसुधा उसके कंधे पर हाथ रखती हुई बोली-मुझे पूरी बात विस्तार से बताओं आकाश...मेरा दम घुट रहा है। 

   अपने आँसुओं को पोछते हुए आकाश बोलना शुरू किया -वसुधा सारी गलती मेरी थी...शादी के बाद अपने हिस्से की ईमानदारी वरतते हुए मैंने अपनी पत्नी को हमारी कहानी बता दी....मैंने सोचा उसे कही और से पता चलेगा तो दुःख होगा....बता देने से शायद वो मुझे समझेंगी.....तुमसे बिछड़कर खुद को किसी और को सौपना आसान नहीं था मेरे लिए.....मैंने सोचा मेरी पत्नी मेरा सहयोग करेंगी लेकिन....हुआ उल्टा....जब भी कोई छोटी-मोटी बात होती तो वो गुस्से में बोल जाती..."सारा प्यार तो आपने उस वसुधा को दे दिया मेरे लिए आपके पास कुछ बचा ही नहीं है।" उसे  खुश रखने और उसकी इस शिकायत को दूर करने के लिए मैं उसकी हर बात से समझौता करता रहा....लेकिन इसका भी उल्टा हुआ....उसका व्यवहार दिन ब दिन कठोर और स्वार्थी होता गया....घर में सिर्फ उसका शासन चलता....यहॉं तक की बच्चों की पढाई-लिखाई और केरियर के फैसले भी उसी के रहें....उसने मेरे जीवन पर ही नहीं बच्चों के जीवन पर भी कठोर अंकुश लगा रखा था ......उसकी मर्जी के खिलाफ घर में पत्ता भी हिल जाता तो वो कोहराम मचा देती....मैंने खुद को जैसे उसे ही समर्पित कर दिया था....उसके हर फैसले में अपनी रजामंदी दे देता....कहते-कहते आकाश ने ठंडी साँस ली। 

   ये तो तुम्हारी कहानी थी...मेरे बेटे साहिल के साथ क्या हुआ था-वसुधा का लहजा बिल्कुल कठोर था। मेरी कहानी से ही तो उसकी कहानी जुडी थी...साहिल बहुत ही प्यारा और शांत स्वभाव का लड़का था...माँ के कठोर अनुशासन को सर झुककर काबुल कर लेता...उसकी माँ ने कहा इंजीनियरिंग करना है वो मान गया जबकि उसे क्रिकेटर बनाना था....उसकी माँ उसके हर एक्टिविटी पर कड़ा नज़र रखती....इससे क्यों मिला....इससे क्या बात कर रहे हो....लड़कियों से दोस्ती क्यों की....घर सात बजे आना था सवा सात क्यों हुआ...यहाँ तक कि बच्चों के कमरे में उसने सीसी टीवी कैमरा लगवा दिया....ऐसे बहुत से बंदिश थे उस पर ....इस ज़माने में कौन इतनी बंदिशों में रहता है मगर मेरा साहिल रहता था....मेरे बाकि दोनों बच्चें अपनी माँ  के खिलाफ थोड़ा बहुत आवाज भी उठाते मगर वो नहीं....हाँ वसुधा,  मुझे एक बेटा और एक बेटी और भी है  -कहते-कहते आकाश रुक गया। वसुधा ने पूछा-फिर क्या हुआ। ग़हरी सांस लेते हुए वो बोलना शुरू किया-इंजीनियरिंग करने के दौरान कैम्पस सलेक्शन में उसे जॉब मिला लेकिन पैकेज काम था...माँ ने मना कर दिया....फिर पढाई पूरी करने के बाद मेरे बेटे का कही जॉब नहीं लग रहा था....दो साल वो बेकार रहा और माँ के ताने सुनता रहा....उसे एक लड़की से प्यार था मुझे उसके एक दोस्त से ये बात पता चला था लेकिन माँ के डर की वजह से वो उससे भी अलग हो गया....आजिज हो अब वो माँ को जबाब देने लगा....एक दिन बात बहुत बढ़ गई उसने जवान बेटे पर हाथ उठा दिया....साहिल मेरे पास आया और बोला-"पापा अब मैं ये सब नहीं सह सकता मेरा सब्र टूट रहा है" मैंने बेटे को पास बैठकर प्यार किया मगर कहा वही जो हमेशा कहता रहा कि-वो आपकी माँ है न बेटा, आपके भले के लिए ही तो डांटती है। साहिल ने पहली बार मुझसे कहा-"बचपन के पांच साल छोड़ दे तो 20 सालों से मैं आपको देख रहा हूँ...आपने माँ के हर जुल्म को नतमस्तक होकर स्वीकार किया है....आपका जुर्म क्या है जो माँ आपको इतनी सजा देती है....मैं नहीं जानता मगर....मेरा जुर्म इतना  ही है कि "मैं एक बुजदिल इंसान का बेटा हूँ" जिसने ना कभी अपनी हिफ़ाजत की ना अपने बेटे की मगर....मैं अब नहीं सह सकता।"

    कहते-कहते आकाश खामोश हो गया पानी का गिलास उठाकर उसने दो घुट पानी पीकर गला तर किया जैसे आगे की बात कहने  लिए हिम्मत जुटा रहा हो-वसुधा,उसकी बातें सुनकर ख़ुशी हुई....मुझे लगा मेरा बेटा मेरी तरह बुजदिल नहीं है.....वो जुर्म के खिलाफ आवाज़  उठाएंगे लेकिन....अगली सुबह उसका शरीर पंखे से लटकता मिला...साथ में एक पर्ची था "बुजदिल का बेटा बुजदिल ही रहा पापा, इन सब से खुद को आजाद करने का यही तरीका था मेरे पास मैं आपकी तरह पूरा जीवन माँ की कैद में नहीं गुजर सकता" -साहिल की लिखी पर्ची वसुधा की ओर बढ़ाते हुए आकाश चुप  हो गया। 

    तभी वेटर बिल लेकर आ गया -बिल अदायगी करते हुए आकाश उठ खड़ा हुआ और कॉफ़ी हॉउस से बाहर आ गया वसुधा भी उसके पीछे-पीछे बाहर आ गयी। बाहर आते ही आकाश ने कहा- वसुधा,तुम सोच रही होगी कि-ये सारी बातें बताने के लिए मैंने तुम्हें बुलाया था क्या ??वसुधा कुछ बोलती उससे पहले ही वो बोल पड़ा-  हाँ वसुधा,तुम्हें तुम्हारे बेटे के बारे में जानने का हक़ था....तुम्हें ये बताना जरुरी था कि-उसकी सौतेली माँ ने उसके साथ क्या किया....हाँ वसुधा, वो सौतेली माँ ही थी...जो माँ अपने कोख से बच्चें को जन्म देने के वावजूद उसे नहीं समझ सकी...नहीं संभाल  सकी....वो सौतेली माँ ही कहलायेंगी और...एक तुम थी ....जो किसी ना किसी माध्यम से उसकी खबर लेती रहती थी....उसे एक झलक देखने  लिए उसके कॉलेज के गेट पर खड़ी रहती थी....जैसे उसके बाप का तुम इंतज़ार करती थी.....यूँ आश्चर्य से मत देखों...मैं सब जानता हूँ....तुम्हें पता था कि-साहिल इसी शहर में है....कुछ दिनों से उसकी कोई खबर ना मिलने से तुम परेशान थी....लेकिन जिसके माध्यम से तुम ये सारी खबरे लेती थी....मैंने उसे तुम्हें ये खबर देने से मना कर रखा था...ये दर्द मैं तुम्हारे साथ साझा करना चाहता था....मैं तुम्हारा गुनहगार हूँ....ना ही तुम्हें कोई खुशी दे सका ना तुम्हारे बेटे को....वसुधा, मै तुम्हे ये बताने आया था कि जिसे तुम पुजती हो वो तो तुम्हारे प्यार के भी काबिल नहीं है....एक कायर है वो। वसुधा की आँखें बरस रही थी वो कुछ भी बोलने में असमर्थ थी। 

   वसुधा का हाथ पकड़ते हुए आकाश फिर बोला-"वसुधा, मुझे तुम पर गर्व है....मेरी चाहत की आग में चलते हुए भी तुमने अपनी गृहस्थी को बहुत ही खूबसूरती और समझदारी से संभाल रखा है....यूँ क्या देख रही हो .....तुम मेरी खोज खबर रखती थी तो क्या वो माध्यम मुझे तुम्हारी खबर नहीं देता था....हमेशा यूँ ही रहना...और हाँ,आज के बाद मैं तुमसे तभी मिलूँगा जब मैं अपने दोनों बच्चों के जीवन को सँवार लूँगा...तभी तुमसे नज़रे मिलाने के काबिल हो सकूंगा...."वसुधा, रिश्तें सिर्फ मोहर लगा देने से नहीं बनते रिश्ते दिल के होते हैं और दिल से निभाए जाते हैं जो हम निभाएंगे " कहते हुए उसने टैक्सी को रुकने का इशारा किया और वसुधा को बैठने के लिए कहा। 

    दोनों ने एक दूसरे को हाथ हिलाकर अलविदा किया और दोनों की टैक्सी विपरीत दिशा की ओर चल पड़ी। वसुधा सोच रही थी कि - क्या आकाश का कसूर ये था कि उसने वसुधा  से निस्वार्थ प्यार किया या ये कि वो अपनी खुशी के लिए अपने माँ-बाप की मर्जी के खिलाफ नहीं जा सका या ये कि रिश्तें में ईमानदारी रखने  लिए उसने अपनी पत्नी को अपना अतीत  बता दिया या ये कि-एक माँ को अपने बच्चें के लिए बेहद सख्त होते हुए देखकर भी उसने घर की शांति को बनाये रखने के लिए चाहकर भी अपनी पत्नी के खिलाफ नहीं जा सका.....


ये तो वसुधा सोच रही थी मगर.....मैं भी सोच रही हूँ 

बुजदिल कौन था आकाश या साहिल.... 

आकाश जो उस जमाने का था जहाँ अपने लिए आवाज उठाना भी एक जुर्म था.... 

साहिल जो आज की अत्यधिक आजादी वाले युग में था जहाँ अपने हक़ के लिए आवाज उठाई जा रही है फिर भी वो चुपचाप कैसे सहता रहा.... 

या वो औरत जो ना एक अच्छी पत्नी साबित हो सकी ना माँ.... 

या कही वो भी तो अपने प्रेमी से बिछड़ने के कुंठा में तो नहीं जी रही थी....


 

प्रकृति संरक्षण में अहम भूमिका निभा सकती हैं फ़िल्में

  "प्रकृति दर्शन" पत्रिका दिसंबर अंक में प्रकाशित मेरा लेख  विषय था- फिल्मों में प्रकृति,प्रकृति पर फ़िल्में शीर्षक -"प्रकृति ...