गुरुवार, 25 फ़रवरी 2021

"ह्यूमन साइकोलॉजी"

 


 

 "आजकल पाँव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे 

          बोलो देखा है कभी तुमने मुझे उड़ते हुए " 

इस गीत की मधुर सुरलहरी वातावरण को एक सुखद एहसास से भर रहा  है सोनाली खुद को आईने में निरखते हुए अपनी बालों को सवाँर रही है और गीत के स्वर के साथ स्वर मिलाते हुए  गुनगुना भी रही। और मैं ...खुद को निरखती हुई सोनाली को निरखे जा रही हूँ। अचानक सोनाली की नजर मुझ पर  पड़ी, मेरी भावभंगिमा को देख वो थोड़ी झेप सी गई। थोड़ा शर्म थोड़ा नखरा दिखाते हुए बोली-"क्या देख रही हो माँ।" मैंने मुस्कुराते हुए कहा-"बस, अपनी बेटी को खुश होते हुए देख रही हूँ....उसके चेहरे के निखरते हुए रंग-रूप को देख रही हूँ....उसके बदले हुए हाव-भाव को देख रही हूँ।वो मेरे पास आकर मुझसे लिपटते हुए बोली-" हाँ माँ,जब से राज मेरे जीवन में आया है न सबकुछ अच्छा-अच्छा सा लग रहा है" फिर मेरे चेहरे को गौर से देखते हुए पूछ बैठी -"तुम भी खुश हो न माँ"  मैं झट से खुद को उससे  अलग कर ये कहते हुए उठ गई कि -अब हटो मुझे जाने दो, बहुत काम पड़ा है। पता नहीं ऐसा क्यूँ लगा जैसे सोनाली ने मेरी दुखती रंग पर हाथ रख दिया हो या मेरी कोई चोरी पकड़ ली हो। 

(राज और सोनाली की कहानी जानने के लिए पढ़े-"पीला गुलाब " और "बदनाम गालियाँ या फूलों से भरा आँगन ")

   राज और सोनाली ने जब से मेरे सामने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया था और मैंने उनकी ख़ुशी पर अपनी रज़ामंदी की मुहर लगा दी थी तब से वो दोनों बड़े खुश रहने लगे थे और मेरे आगे भी थोड़े खुल से गए थे। अब उन्हें अपनी भावनाओं को छुपाने की जरूरत जो नहीं थी। चुकि शुरू से भी मैं उनके साथ दोस्त बनकर ही रही थी तो अब वो मुझे और भी अच्छा दोस्त समझने लगे थे और उन्हें मुझसे कोई खास झिझक नहीं थी। मगर वो अपनी मर्यादाओं का उलंघन कभी नहीं करते। राज हमारे ही बिल्डिंग के एक फ्लैट में ही रहता था तो काम से आने के बाद अक्सर वो हमारे साथ ही रहता था या यूँ कहे सिर्फ सोने अपने घर जाता था। वैसे तो ज्यादा वक़्त वो दोनों मेरे साथ ही गुजारते थे,कही भी आना जाना हो मुझे साथ ही लेकर जाते थे। मैं कहती भी कि -बेटा, आप दोनों जाओं मुझे रहने दो। पर दोनों नहीं मानते कहते, आपके बिना मज़ा नहीं आएगा....फिर आप घर में अकेली कैसे रहोगी....क्या करोगी, वगैरह-वगैरह। वो दोनों एक दूसरे के साथ खूब मौज-मस्ती करते,एक दूसरे को छेड़ते या लड़ते,लड़ने के बाद सॉरी बोल एक दूसरे को मनाते,एक दूसरे की पसंद के खाने बनाते या ऑडर कर मंगवाते, एक दूसरे के पसंद-नापसंद का भी पूरा ख्याल रखते।जब से राज मिला था सोनाली रोज सुबह उठकर मेरे लिए चाय बनाकर मुझे जगाने आती। मुझे प्यार करके जगाने के बाद कहती- माँ राज को बुला लाऊँ। मैं भी हामी भर देती वो ख़ुशी-ख़ुशी भागकर जाती और राज को बुला लाती फिर हम तीनो एक साथ ही चाय पीते। जबकि, पहले मुझे चाय लेकर सोनाली को जगाना पड़ता था। उसे ऐसा करते देख मुझे बेहद ख़ुशी होती और तसल्ली भी कि-मेरी सोनाली बड़ी हो गयी अब कल को घर-गृहस्ती का बोझ जब उसके कंधे पर पड़ेगा तो वो सरलता और ईमानदारी से संभाल लेगी। 

    उनका ये प्यार और साथ देखकर मैं खुश होती ..बहुत-बहुत खुश होती मगर, कभी-कभी मन यूँ ही उदास हो जाता। जब भी उन दोनों को एक दूसरे में मगन देखती, हँसी-ठिठोली करते देखती.....होठों पर तो मुस्कान आ जाती मगर, पता नहीं क्यूँ आँखों में आँसू भी आ जाते। उन दोनों की ख़ुशी मेरे लिए बहुत मायने रखती थी यूँ कहे अनमोल थी मगर, उनकी ख़ुशी को देखकर अंदर एक टीस सी उभर जाती। शायद, थोड़ी जलन सी भी होने लगती....एक खालीपन सा महसूस होने लगता......अपने जीवन को टटोलने लगती.....ये तलाश मुझे अतीत में धकेल देती.....अतीत में घूमते हुए खुद से सवाल कर बैठती -"क्या मैंने जीवन जिया हैं या बस वक़्त गुजरा है ?"  वक़्त भी कैसा कि- जिसे खगालने पर ख़ुशी के एक मोती तक को पाने का सुख भी ना मिलाता  हो..... एक दुःख अंदर कचोटने लगता काश,  हम भी आज की पीढ़ी में जन्म लिये होते.....हमारे माँ-बाप भी हमारी भावनाओं को समझ पाते....अतीत की गलियों में भटकते-भटकते आँखों में ऐसी चुभन होने लगती कि -आँसू स्वतः ही निकल पड़ते.....आँसुओं के खारेपन का स्वाद आते ही झट, वर्तमान में लौट आती......आँसू पोछती.....खुद को मजबूत करती और खुद से ही एक प्रण लेती....."जो मुझे नहीं मिला वो मैं  अपनी संतान को दूँगी....वो हर ख़ुशी  पाने में उनका साथ दूँगी जो उनके वर्तमान और भविष्य दोनों को महका दे।" और वो पल मुझे खुद पर ही गर्व करने के लिए काफी होता। ऐसे  लम्हे  एक बार नहीं कई बार मेरे आगे से गुजरता.....मैं उदास होती....भीतर एक टीस उभरती....जिस पर खुद ही मरहम लगाती.....खुद की हौसला अफजाई करती......खुद की ही पीठ थपथपाती मगर, खुद पर गुजरते इन पलों का एक भी असर अपनी सोनाली पर ना होने देती। 

    साइकोलॉजी पढ़ा तो बहुत था मैंने मगर,  इन दिनों मैं ह्यूमन  साइकोलॉजी के कुछ खास थ्योरी को अच्छे से महसूस कर पा रही हूँ। आप कितने भी निस्वार्थी हो जाओं, कही ना कही एक छोटा सा स्वार्थ छुपा ही रहता है......आप कितने भी त्यागी बन जाओं मगर, कही ना कही उस त्याग की कसक दिल में बनी ही रहती है..... दूसरे की ख़ुशी में कितने भी खुश हो जाओं मगर, हल्की सी जलन आपको जलाती ही है।  (वो दूसरा आपका सबसे प्रिय ही क्यों ना हो ) इतना ही नहीं खुद को किसी के ख़ुशी का निमित समझना या खुद को ये  श्रेय देना कि-मेरी वजह से ये अच्छा हुआ है, ना चाहते हुए भी आपके भीतर अहम भाव ला ही देता है। एक और सच से रूबरू हुई "बहुत ज्यादा ख़ुशी भी कभी-कभी तन्हाई और खालीपन का एहसास करवाती है।" सच,यही है "ह्यूमन  साइकोलॉजी"

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2021

"बैठ झरोखे सोच रही हूँ----"

मेरी पहली कविता, एक तुच्छ प्रयास 

(जानती हूँ गलतियाँ बहुत हुई होगी,यकीन करती हूँ कि-आप सब के सानिध्य में सीख भी जाऊँगी )

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बैठ झरोखे सोच रही हूँ 

क्यूँ,पतझड़ के दिन आते हैं

         हर वर्ष बसंत आकर             

क्या, जीवन-पाठ  पढ़ाते हैं  

परिवर्तन है सत्य सृष्टि का 

याद दिलाकर जाते हैं 

रंग बदलते शाखों के पत्ते 

धीरे-धीरे मुरझाते हैं 

तोड़कर बंधन 

अपनी शाखों से 

फिर धरा पर गिर जाते हैं 

 सूनी डाली हो जाती है 

दर्द लिए  बिछड़न का 

बैठी-बैठी मैं देखूं 

ढंग भी ये कुदरत का  

अगली सुबह 

अब उसी शाख पर 

नई सृजन देख रही हूँ 

छोटी-छोटी कोमल पत्तियां  

नन्हे शिशु के कोमल तन सा 

जन्म देकर नई रचना को 

 प्रकृति हमें समझाती है 

जन्म-मरण तो लगा रहेगा 

जीवन आनी-जानी है 

चंचल शैशव धीर-धीरे 

यौवन को छूता जाएगा  

यौवन खुद के रूप पर 

इठलाता नजर आएगा

लेकिन एक समय के बाद  

बुढ़ापा भी आएगा  

सत्य-सनातन है मृत्यु तो  

हे मानव ! इससे तू 

कब तक भाग पायेगा 

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चित्र-स्वयं के कैमरे से 

रविवार, 14 फ़रवरी 2021

"बदनाम गलियाँ या फूलों से भरा आँगन"



 राज और सोनाली के द्वारा दिए गए पीले गुलाब की महक उस वक़्त तो पुरे वातावरण को सुखद अनुभूति से भर रहा था मगर कही एक डर भी कोने में दबा हुआ था। तो अगले दिन मैंने उन दोनों को बिठाकर पूछ ही लिया -

(राज और सोनाली की कहानी जानने के लिए पढ़ें-मेरी लघुकथा "पीला गुलाब )

" ये चाहत और पसंदगी वक्ती तो नहीं जो आज कल का रिवाज बन गया है या मैं यकीन कर लूँ कि -ये सचमुच प्यार ही है "

 मेरी गोद में सर रखते हुए सोनाली बोली -" प्यार क्या होता है माँ " ?  किसी का साथ आपको अच्छा लगने लगे,उसकी हर छोटी से छोटी बात आपके दिल को छूने लगे,उसके साथ हँसना- रोना  अच्छा लगने लगे यदि ये प्यार है तो शायद हमें प्यार हो गया है-उसने भी बड़ी सादगी से जबाब दे दिया। 

बेटा,प्यार सिर्फ साथ रहना,हँसना और रोना नहीं है,प्यार एक गहरा एहसास है,एक अत्यंत पवित्र भावना है जो हृदय के अतल गहराइयों में जन्म लेता है जो निश्छल, निर्मल और वासना रहित होता है। बाकी, आजकल तो इसकी परिभाषा बदल दी गई है। लेकिन प्यार का स्वरूप तो यही है और यही रहेगा।  

बेटा, ढाई अक्षर के इस प्यार को छूना आसान होता है पाना भी आसान होता है मगर संभालना बहुत मुश्किल।दो लोग मिलकर भी इस ढाई अक्षर को नहीं संभाल पाते।  बस  यही समझ नई पीढ़ी के पास नहीं होने के कारण प्यार का रूप बिगड़ता चला जा रहा है। आज तो प्यार दैहिक हो चुका है,दैहिक सुख को ही प्यार का नाम दे दिया गया है। माना, दैहिक मिलन प्रेम की प्रकाष्ठा होती है परन्तु, प्रेम आत्मा का मिलन है देह इसका माध्यम,देह का आकर्षण चंद दिनों का होता है और जब वो सरलता से मिलने लगता है तो बहुत जल्द ये आकर्षण फीका पड़ने लगता है फिर जिसे "प्रेम" नाम दिया जाता है वो बदलकर कोई और देह तलाशने लगता है। 

मुझे नहीं पता आप दोनों  के प्रेम का क्या रूप है मगर,यदि सच्चा प्रेम चाहते हो तो देह को परे रखना और खुद को तीन कसौटी पर तौलना धीरज-धैर्य,विश्वास और आपसी समझ-बुझ। इन तीन कसौटी पर जब खुद को खरा उतार लेना तब इस प्रेम को एक "संबध" का नाम देकर अपनी गृहस्थी की शुरुआत करना क्योंकि प्रेम के पावन रूप के सफर की असली मंजिल तो यही है। 

अब यहाँ "संबंध" का अर्थ समझना  भी बहुत जरुरी है। संबंध का मतलब एक "लेबल" नहीं है जो रिश्तों पर लगाया जाता है माँ-बाप,भाई-बहन,पति-पत्नी वगैरह-वगैरह। "संबंध" से मेरा मतलब सम+बंध भी नहीं है। क्योंकि संबंधों में समानता कभी-कभी अहम भाव को भी जन्म देती है। "संबंध" का मतलब फर्क होते हुए ऐसे जुड़े जैसे सागर से नदी। ऑक्सीजन -ऑक्सीजन मिलकर पानी नहीं बनाते ,पानी बनाने के लिए ऑक्सीजन में हाइड्रोजन की निश्चित अणु को मिलाने की आवश्यकता होती है। अतः कह सकते है कि -"संबंध से एक तीसरी वस्तु का जन्म होता है जो संबंध को  पूर्णता प्रदान करता है।" शायद,इसीलिए "दाम्पत्य-संबंध" के साथ संबंध शब्द जुड़ा है। इसीलिए दाम्पत्य-संबंध को निभाने के लिए भी धीरज-धैर्य,विश्वास और आपसी समझ-बुझ की निश्चित मात्र के मिलान की नितांत आवश्यकता होती है तभी प्रकृति में नई सृजन होती है। 

 और सबसे जरुरी बात हृदय में जैसे ही सच्चे प्रेम का भाव उत्पन्न होता है तो साथ ही साथ "समर्पण" का भाव भी स्वतः उत्पन्न हो जाती है। "समर्पण " ही सच्चे प्रेम की सही पहचान होती है। 

 मैं जानती हूँ आप दोनों में बहुत फर्क है पर यकीन भी करती हूँ कि-यही फर्क आप दोनो को आपसी ताल-मेल भी बिठाने में सहयोग करेगा। यदि फर्क इतना भी हो कि -"एक को चावल पसंद है और दूसरे को रोटी" तो प्रेम इतना हो कि -रोटी से चावल खाने में भी दोनों को सुखद अनुभूति  हो। फर्क मिटाकर चंदन और पानी की तरह घुल-मिल जाना ही "प्रेम' होता है। आगे आप दोनों खुद समझदार हो ,अपने प्रेम को आप किस ओर ले जाना चाहते हो वो आप पर निर्भर है-"बदनाम गलियों में या फूलों से भरे आँगन में"। 

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2021

"पीला गुलाब "



   मैं बड़ी तन्मयता से लैपटॉप पर अपने काम में बीजी थी तभी, राज और सोनाली मेरे पास आकर खड़े हो गए। मैंने सर उठाये बिना ही सवाल किया-क्या बात है ? मम्मी बिज़ी हो क्या....कुछ खास नहीं, बोलो -मैंने उनकी तरफ देखते हुए कहा। दोनों के चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ  शर्म और  घबड़ाहट भी साफ़-साफ़ नजर आ रही थी । मम्मी..पहले आप आँखें बंद करों, राज आपको कुछ देना चाहता है - सोनाली ने धीरे से कहा। मैंने जैसे ही राज की तरफ देखा वो भागकर कमरे के बाहर चला गया। मैं सब समझ रही थी फिर भी आँखे बंद करते हुए बोली-लो कर लिया,अब बोलो। दोनों ने मेरी गोद में एक-एक "पीला गुलाब" रखा और भाग खड़े हुए।गुलाब को देखकर मैं मुस्कुरा दी,दिल चाहा कहूँ -" I knew it" . मगर, अनजान बनी बोली -अरे,फूल दे रहे हो या मार रहें हो इधर आओ दोनों। सोनाली पास आई, राज अब भी कमरे के बाहर से झाँक रहा था। मैंने कहा -आप  क्यूँ छुपे हो आप भी आओं। राज बेहद घबड़ाया हुआ था, दोनों पास आकर बैठ गए। मैंने दोनों के माथे पर प्यार किया और दोनों को गले लगाते हुए बोली-"बेवकूफों मैं तो बहुत पहले से जानती थी तुम दोनों को ही समझने में छह साल लग गए।" 

    राज मेरा हाथ पकड़ते हुए बोला -आज "प्रॉमिस-डे " पर मैं आपसे प्रॉमिस करता हूँ कि -मैं कभी भी आपको कोई शिकायत का मौका नहीं दूँगा.....कभी आपके विश्वास और भरोसे को नहीं तोडूँगा....ऐसा कुछ भी नहीं करूँगा जिससे दोनों परिवारों के मान-मर्यादा को ठेस पहुंचे, मेरे दूसरे हाथ को पकड़ते हुए सोनाली ने भी उसके हाँ में हाँ मिलते हुए सर हिला दिया। दोनों की आँखे भरी हुई थी,दोनों ने मेरी गोद अपना सर छुपा लिया। मेरी भी आँख भर आई, दोनों का माथा सहलाते मैंने हुए कहा- "मैं जानती हूँ बेटा ,मुझे आप दोनों पर पूरा भरोसा है।" थोड़ी देर तक ख़ामोशी छाई रही फिर मैंने कहा -चलो,इसी बात पर पिज्जा पार्टी करते है,राज...फटाफट ऑडर करों,तीनों ने मुस्कुराते हुए एक दूसरे को सहमति दे दी। 

राज और सोनाली की दोस्ती छह साल पहले एक इंस्टिटूइट से शुरू हुई थी। पहली मुलाकात से ही दोनों में अच्छी दोस्ती हो गई थी। सोनाली जब भी उससे मिलकर आती तो  घंटों उसी की तारीफ किया करती। उस वक़्त सोनाली सत्तरह साल की थी और राज उससे छह महीने बड़ा था। मुझे आज भी वो दिन याद है जब मैं पहली बार राज से मिली थी। सोनाली से दोस्ती किये उसे एक महीना भी नहीं हुआ था कि अचानक एक दिन वो सोनाली के साथ  घर धमक आया था उसके साथ सोनाली का एक और दोस्त भी था। सोनाली बोली-माँ ये दोनों जबर्दस्ती घर आ गए है मैं तो लाना ही नहीं चाहती थी। फर्मलिटी करते हुए मैंने कहा-कोई बात नहीं  बेटा -ये भी तो आपका ही घर है...अब, घर आये को मैं क्या कहती। मेरी बात सुनते ही वो सोनाली को छेड़ता हुआ बोला -" सुना न, ये भी मेरा ही घर है।" मैंने उन्हें चाय-नास्ता कराया। रात के आठ बजे का वक़्त था मेरे पतिदेव ने फोर्मलिटी में कह दिया -रात का खाना-वाना खिलाकर भेजों बच्चों को,फिर क्या था दोनों डट गए बोले-हाँ अंकल, अब डिनर करके ही जाऊँगा। पहले तो मुझे बहुत गुस्सा आया -"अरे ये क्या मान-ना-मान मैं तेरा मेहमान "  पर पता नहीं क्यूँ राज को देखते ही मुझे  भी ऐसा ही लगा जैसे मैं उसे वर्षो से जानती हूँ और राज,वो तो दो घंटे के अंदर ही घर से लेकर किचन और यहाँ तक कि -डाइनिंग टेबल तक पर कब्ज़ा कर चूका था,वो मुझे खाना सर्व कर रहा था ,बिलकुल "कल हो ना हो "के शाहरुख़ खान की तरह। इससे पहले सोनाली का कोई लड़का दोस्त घर में इतनी देर कभी  नहीं रुका था ,ऐसा पहली बार हो रहा था। हम कुछ असहज थे पर राज ने कब हमें सहज कर दिया और कब वो हमारे दिल पर कब्जाकर लिया हमें पता ही नहीं चला। 

धीरे-धीरे इनकी दोस्ती बढ़ती चली गई और राज ने हमारे पुरे खानदान के दिलों में अपना स्थान बना लिया। मुझे दिख रहा था कि-इनकी दोस्ती सिर्फ दोस्ती नहीं है लेकिन "मेरी सोनाली" प्यार-मुहब्बत तो समझती ही नहीं थी। मेरी सोनाली को दोस्ती शब्द से ही इतना प्यार था कि वो हर एक को दोस्त बनाकर ही ज्यादा खुश रहती थी। कभी-कभी राज की बातों से ये स्पष्ट हो जाता कि-वो दोस्ती से आगे बढ़ रहा है। एक बार मैंने राज को टटोला भी था। उसने बड़े प्यार से जबाब दिया था -"मेरे चाहने से कुछ नहीं होता आंटी...अगर, मेरी फीलिंग वो जान जाएगी तो आप तो जानती ही है वो.....फिर मेरी दोस्त भी नहीं रहेंगी और मैं इतनी प्यारी दोस्त को खोना नहीं चाहता.....उसके साथ-साथ मैं आपको भी खोना नहीं चाहता।" राज सोनाली से भी ज्यादा मुझसे जुड़ गया था और मुझे भी वो अपने सगे बेटे सा प्यारा था। 

मगर,शायद उनकी दोस्ती को किसी की नज़र लग गई। उन दोनों में किसी बात को लेकर जबर्दस्त झगड़ा हो गया। मेरी सोनाली स्पष्टवादी है उससे कोई भी गलत बात बर्दास्त नहीं होती,अपने सिद्धांतों की इतनी पक्की है कि -उसके आगे वो प्यारा-से प्यारा दोस्त भी त्याग सकती है। जो की मुझे  भी पसंद है। मैंने सोनाली से कहा भी था "राज मुझे  बहुत प्रिय है" -उसने बड़े ही रूखे स्वर में कहा-"वो आपका बेटा रह सकता है मेरा दोस्त नहीं।" मैं समझती थी ये वक़्ती गुस्सा है। परिस्थिति ही कुछ ऐसी हो गई थी कि -उन दोनों को ही नहीं समझा सकती थी और दोस्ती टूट गई। सोनाली ने अपना दोस्त त्याग दिया मगर मुझसे अपना बेटा नहीं त्यागा गया। मैं जानती थी कि - दोनों ने ही गलतियाँ की है मगर वो गलती प्रतिकूल परिस्थितियों की वजह से हुई है। एक ना एक दिन ये ठीक हो जायेगा। राज दूसरे शहर चला गया मगर मैंने उससे कभी सम्पर्क नहीं तोड़ा। फोन से बराबर उसका हाल-चाल लेती रही। दोनों के दिलों में प्यार होते हुए भी कड़वाहट ज्यादा हावी था। मैंने भी वक़्त पर सब छोड़ दिया। 

शायद,नियति का खेल था ,चार साल बाद हम फिर मिलें।इस बीच मेरी सोनाली भी पहले से ज्यादा समझदार हो गई थी। रिश्तों में कहाँ और कैसे एडजेस्टमेंट करना है वो बाखूबी सीख चुकी थी और राज को भी अपनी गलतियों का अहसास हो गया था वो भी जिंदगी को समझने लगा था। परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बनी कि मज़बूरीवश ही उन्हें साथ समय गुजरने का मौका मिला। दोनों ने एक दूसरे की भावनाओं को समझा और उसको मान भी दिया और आज.... 

एक बार बातों-बातों में सोनाली ने मुझ से पूछा था -माँ अगर, मुझे कोई पसंद आ गया तो मैं आपको कैसे बताऊँगी....सीधे-सीधे बोलना तो मुश्किल होगा....तब,मैंने कहा था -" जिस दिन तुम्हे सच्चे दिल से किसी से प्यार हो जाये,तुम्हे लगने लगे कि -यही मेरा सच्चा साथी है उस दिन मुझे एक "पीला गुलाब" दे देना मैं समझ जाऊँगी। और ....मेरी सोनाली को सच्चा साथी मिल गया था और मुझे मेरा बेटा। आज मेरे बच्चों ने मुझे मान दिया, मेरी परवरिश को मान दिया। मुझे गर्व है अपनी परवरिश पर और उस माँ की परवरिश पर भी जिसका बेटा राज है।

" माँ कहाँ खोई हो,पिज्जा आ गया "सोनाली ने आवाज़ दी तो मैं बीते दिनों से बाहर आ गयी। मैंने हँसते हुए  डायलॉग चिपका दिया -" हमारी उम्र में पहली नज़र में ही पता चल जाता है कि लड़का-लड़की के बीच क्या चल रहा है "मगर,तुम आजकल के वेवकूफ बच्चे जिन्हे पेरेंट्स ने साथी चुनने की आज़ादी दे रखी है उन्हें बड़ी देर से समझ आ रहा है कि-"हमें क्या चाहिए"। माँअअ..कहते हुए सोनाली मुझसे लिपट गई,मैं भी-मैं भी.... कहता हुआ राज भी गले लग गया। 

गुरुवार, 11 फ़रवरी 2021

"अश्रु गंगाजल "


 

आज ना जाने फिर क्यूँ आवाक हूँ.....अतीत और भविष्य के मध्य....वर्तमान में सतत दोलित....एक अबोध पेंडुलम की तरह.......संबंधों की डोर से बँधी.....मैं झूलती जा रही हूँ......तभी, आँखें कुछ आश्वस्त होती है.......शायद, आसमान की बुलंदियों को....छूने की मधुर कामना से......मगर, भावनाओं के अप्रत्यशित प्रहार से.....मैं चूर-चूर हो जाती हूँ....संबंधों की डोर टूट जाती है,

और तब मैं.....

    एक अनाम अतुल गहराईयों में......लुढ़कने लगती हूँ......आधारहीन  पत्थर की तरह.....तभी, भावनाओं से आहत मेरा शरीर........छपाक से किसी की आग़ोश में गिर पड़ता है.......जो शायद,मेरा ही इंतजार कर रहा था..... ना जाने कब से .......मैं कुछ कह नहीं सकती......वो इंतजार था या.....मुझ पर अनायास उमड़ा उसका दयाभाव......जिसने मुझे अपने दामन में संभाल लिया......मेरे गिरने से....... प्रतिक्रिया में उठी तरंगों की उफाने.......गर्जनघोष से नभ को ललकार उठी.......या शायद, उस प्रिय के प्रहार से व्यथित होकर.......मैं खुद हर्ष से पुलकित हो.....खिलखिला उठी थी.....एक मधुर हल्केपन का अहसास.....मेरा रोम-रोम रोमांचित हो रहा है.....

मगर ये क्या---- 

उस जल का विश्लेषण कर.......उस खारे नमकीन जल को चखकर......मैं पुनः आवाक हो जाती हूँ.....  मुझे विश्वास नहीं कि- वो जल है......अरे,यह तो मेरे प्रियतम का दिया हुआ.....पूर्व जन्म का प्रसाद है.......जो अश्रु बनकर उसकी आँखों  के कोर से......ना जाने कब से बह रहा है......और उस अश्रु गंगाजल के खारे झील में.....मैं डूबती चली गई .... .मेरे सारे जख्म भर चुके हैं..... उस अमृत का पान कर मैं निर्मल हो चुकी हूँ.......

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2021

"तुम्हारी आँखें हमारी आँखों से अलग थोड़े ही है "


 

 "नानी माँ, अगर मैं अपनी पसंद से शादी कर लुंगी तो क्या आप उसे अपना लेंगी " मनु ने नानी माँ को       गले लगाते हुए बड़े प्यार से पूछा। हाँ ,अपना ही लेंगे और कर भी क्या सकते हैं .....आखिर रहना तो    तुम्ही को है उसके साथ....इसीलिए अपनी पसंद से लाओ तो ही बेहतर है - नानी माँ ने भी उसी प्यार से जबाब दे दिया। 

     मैंने तुरंत एतराज किया -"ये क्या माँ,हमें तो लड़को से बात  करने की भी आजादी नहीं थी,बात क्या हमें तो किसी लड़के की तरफ देखना तक मना था और इसे अपनी पसंद से शादी करने की इजाजत मिल रही है "

     जमाना बदल गया है बेटा .....जमाना नहीं आप भी बदल गयी हो -मैंने तुनुकते हुए कहा। जमाने के साथ बदलना ही पड़ता है बेटा-माँ ठंठी साँस लेते हुए हँस पड़ी। 

मनु ने मुझे टोकते हुए कहा -" मम्मी पहले मुझे बात करने दो ....नानी माँ, मैं चाहती हूँ कि मैं जिससे भी शादी करूँ आप सब उसे मुझसे भी ज्यादा प्यार करें ....आप सब की ख़ुशी और रजामंदी  मेरे लिए बहुत मायने रखता है, इसलिए आप खुलकर बोले.... "

अरे,बेटा जी... मुझे तुम पर पूरा भरोसा है "तुम्हारी आँखें हमारी आँखों से अलग थोड़े ही है "

नानी माँ के बातों की गहराई को मनु ने समझा या नहीं  ये तो नहीं पता बस,  इतना सुनते ही वो ख़ुशी से नानी माँ से लिपट गई और मुझे बड़ी जोर की हँसी आ गई। क्यों हँस रही हो माँ -मनु ने हैरानी से पूछा।   मैंने कहा- कुछ नहीं बेटा। 

सच, हमारे बुजुर्ग कितने सयाने होते है बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाते हैं  बिना डोर के भी आपको कितने ही बंधनों में बाँध देते हैं । 

 "तुम्हारी आँखें हमारी आँखों से अलग थोड़े ही है " 

 ये कहकर माँ ने मनु को इजाजत भी दे दिया और हिदायत भी कि -  पसंद वही करना जो हमारे संस्कारों में  बँधा हो, हमारी संस्कारों से बाहर जाने की इजाजत नहीं है तुम्हें। इसीलिए तो, बुजुर्ग हमारे "मार्गदर्शक भी होते है और मार्गरक्षक भी।"

  

"माँ बारिश क्या होती है ?"

        "माँ फिल्मों में सावन के रिमझिम पर इतने सारे गीत क्यों बने है.....क्या ख़ासियत थी इस महीने की....हमने तो कभी इसे इतना बरसते नही ...