शनिवार, 20 मार्च 2021

"पद और प्रतिष्ठा"

बात उन  दिनों की जब हम सब छोटे-छोटे थे। मेरे पापा  इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में कार्यरत थे,हमें सरकारी  क्वार्टर  मिले थे। हमारी  कॉलोनी में साफ-सफाई के लिए,बागवानी के लिए और घरों के टॉयलेट-बाथरूम तक के सफाई के लिए अलग-अलग कर्मचारी थे। उन्ही कर्मचारियों में एक थे "रामचंद्र अंकल" जी हाँ,हम उन्हें अंकल कहकर ही बुलाते थे, वो हमारे टॉयलेट-बाथरूम और नालियों की सफाई करने हर रोज आते थे। अब उन दिनों की  मानसिकता के हिसाब से आप समझ ही सकते हैं कि-घर के बुजुर्ग उनके साथ कैसा व्यवहार कर सकते हैं। उन दिनों तो छुआ-छुत जैसी बीमारी अपने प्रवल रूप में थी। लेकिन.....हमारे घरों में ये कम होता था, थोड़ा बहुत दादी करती थी बाकी कोई नहीं। लेकिन रामचंद्र अंकल के लिए पापा की सख्त हिदायत थी कि उनके साथ कभी कोई गलत व्यवहार नहीं करेगा। उन्हें दफ्तर से लेकर सबके घरों में भी उतना ही सम्मान मिलता था जितना बाकी बड़े कर्मचारियों को मिलता था। दरअसल अंकल का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि कॉलोनी के साहब भी उन्हें "रामचंद्र जी" कहकर सम्बोधित करते थे बाकी उम्र के हिसाब से भईया,चाचा अंकल बुलाते थे। साहब को पीठ पीछे गालियाँ भले दे दी जाए ,मगर रामचंद्र अंकल के लिए... पीठ पीछे भी उनकी तारीफ ही होती थी। 

पापा.. दादी कहती है कि- "रामचंद्र अंकल तो मेहतर है छोटी और नीच जाति  के है और तो और वो बहुत छोटे कर्मचारी भी है "फिर भी सभी लोग उन्हें इतना मान-आदर क्यूँ देते हैं ? मेरे भोले मन को ये बाते उलझा रही थी सो एक दिन मैंने पापा से पूछ ही लिया। पापा ने उस दिन एक बात बड़े प्यार और गंभीरता से समझाई  जो आज तक मैं कभी नहीं भूली। पापा ने कहा -"बेटा "प्रतिष्ठा"  पद और जाति से नहीं मिलती, प्रतिष्ठा अपने व्यक्तित्व और व्यवहार से कमानी पड़ती है " और रामचंद्र ने ये कमाया है। फिर पापा ने उनकी कहानी बताई-रामचंद्र अंकल के पापा इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में कार्यरत थे जब वो 14 साल के थे तभी उनके पापा गुजर गए। उनके पापा का स्वभाव भी बड़ा मृदुल था और हर एक हाकिम उन्हें मानता भी था और इज्जत भी देता था। उन  साहब लोगो ने जब रामचंद्र अंकल की आर्थिक मदद करनी चाही तो उन्होंने मना कर दिया। तब वो लोग उन्हें चाय-पानी पिलाने के लिए रख लिया और इस बहाने उनकी मदद करने लगे। जब वो 18 साल के हुए तो उनके  पापा के जगह पर ही उन्हें नौकरी पर रख लिया। 

रामचंद्र अंकल कठोर परिश्रमी,मृदुभाषी और बड़े  स्वभिमानी भी थे कभी किसी से उनका झगड़ा तो दूर कहा-सुनी भी नहीं होती, बच्चें  हो या बड़े साहब सबके साथ उनका व्यवहार नपातुला होता ,चेहरे पर शालीनता भरी एक मुस्कुराहट सदैव बनी रहती। इसी  कारण कभी कोई साहब तक भी उनके साथ दुव्यवहार कर ही नहीं पाया और उन्हें "रामचंद्र जी' ही कहकर सम्बोधित किया और अपने बच्चों से भी उनका आदर करने को कहा। 

मुझे आज भी याद है उनकी जेब टॉफियों से भरी रहती थी जो भी कोई बच्चा उनके करीब आता  तो उन्हें "नमस्ते अंकल" जरूर कहता था और वो बड़े प्यार से उसकी हथेली पर दो टॉफियाँ रख देते थे और बच्चें "थैंक्यू अंकल" कहते हुए खुश हो जाते थे। आज खबर आई कि रामचंद्र अंकल नहीं रहे.... , जिनके  व्यवहार ने बालपन में ही मुझे ये सीखा दिया था कि -"प्रतिष्टा कमानी पड़ती है"

उनकी याद आई तो ये संस्मरण आप से साझा कर लिया। 


36 टिप्‍पणियां:

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  2. प्रिय सखी कामिनी, मन को भावुक और आँखों को नम कर गया तुम्हारा ये संस्मरण। रामचंद्र अंकल के बारे में जान कर अच्छा लगा तो उनके ना रहने पर बहुत दुःख हुआ। उत्तम व्यवहार और स्वाभिमान ने उन्हें हर एक की नजरों में ऊँचा उठाया ये सब उनके उदार और स्वाभिमानी व्यक्तित्व के कारण हुआ। प्रतिष्ठा कमाने के लिए हमें अपने सहज गुणों को विकसित करना ही पड़ता है। प्रेरक लेख के लिए आभार सखी। दिवंगत अंकल की पुण्य स्मृति को सादर नमन। 🙏🙏

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    1. सहृदय धन्यवाद सखी,ऐसे व्यक्तित्व सोचने पर मजबूर कर देते है कि-क्या प्रतिष्ठा ज्ञान,पद और जाति के नाम पर ही मिलती है या अपने व्यक्तित्व से कमानी पड़ती है?बस इसी सोच को साझा कर लिया। तुम्हारे स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार

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  3. रामचंद्र जी को विनम्र श्रद्धांजलि . आपने आज तक याद रखा बहुत बड़ी बात है ... सीख भी बहुत अच्छी ली कि पद और प्रतिष्ठा कमानी पड़ती है ...

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    1. सहृदय धन्यवाद संगीता दी,ऐसे व्यक्तित्व भूले नहीं जाते दी, आपके स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार एवं नमन

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  4. रामचंद्र जैसी नेक और सज्जन आत्मा को श्रद्धांजलि। सुंदर और सार्थक संस्मरण प्रस्तुति के लिए आपको धन्यवाद।

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    1. सहृदय धन्यवाद वीरेंद्र जी, आभार एवं नमन

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  5. "मुझे आज भी याद है उनकी जेब टॉफियों से भरी रहती थी जो भी कोई बच्चा उनके करीब आता तो उन्हें "नमस्ते अंकल" जरूर कहता था और वो बड़े प्यार से उसकी हथेली पर दो टॉफियाँ रख देते थे और बच्चें "थैंक्यू अंकल" कहते हुए खुश हो जाते थे। आज खबर आई कि रामचंद्र अंकल नहीं रहे.... ,
    रामचंद्र जी को विनम्र श्रद्धांजलि। बहुत सुन्दर संस्मरण कामिनी
    जी ।

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    1. दिल से शुक्रिया मीना जी, बचपन की बातें भुलती ही नहीं,सादर नमन आपको

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  6. नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार ( 22-03 -2021 ) को पत्थर से करना नहीं, कोई भी फरियाद (चर्चा अंक 4013) पर भी होगी।आप भी सादर आमंत्रित है।

    चर्चामंच पर आपकी रचना का लिंक विस्तारिक पाठक वर्ग तक पहुँचाने के उद्देश्य से सम्मिलित किया गया है ताकि साहित्य रसिक पाठकों को अनेक विकल्प मिल सकें तथा साहित्य-सृजन के विभिन्न आयामों से वे सूचित हो सकें।

    यदि हमारे द्वारा किए गए इस प्रयास से आपको कोई आपत्ति है तो कृपया संबंधित प्रस्तुति के अंक में अपनी टिप्पणी के ज़रिये या हमारे ब्लॉग पर प्रदर्शित संपर्क फ़ॉर्म के माध्यम से हमें सूचित कीजिएगा ताकि आपकी रचना का लिंक प्रस्तुति से विलोपित किया जा सके।

    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।

    #रवीन्द्र_सिंह_यादव

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    1. मेरी रचना को स्थान देने के लिए हृदयतल से आभार सर, सादर नमस्कार

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  7. बहुत ही मार्मिक और प्रेरक संस्मरण, कामिनी जी, मैं भी अपने बचपन की कोई कहानी नहीं भूली हूं, मेरे पास ऐसे बहुत से लोगो की कहानियां और कविताएं हैं जो मुझे अंदर तक झकझोरती हैं, आपके इतने सुंदर मन को ईश्वर हमेशा ऐसे ही सुंदर बनाए रखे ।

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    1. आप के अपनत्व से भरे वचनों के लिए तहेदिल से शुक्रिया जिज्ञासा जी,उस जमाने में ऐसे ही किरदार थे जो चाह कर भी भुलाये नहीं जाते थे.. इस स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए हृदयतल से आभार एवं सादर नमस्कार

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  8. वाह!सखी ,सुंदर और प्रेरक प्रसंग को आपनें बखूबी चित्रित किया है । ऐसे लोग दुनियाँँ में कम ही होते है ।रामचंद्र जी को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏🏻

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    1. दिल से शुक्रिया शुभा जी, बिल्कुल सही कहा आपने,सादर नमन आपको

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  9. बहुत अच्छा लेख । पहले लेलोगो की कुछ मानसिकता ही दूसरी थी । हमारे बाबू जी तो पर्वों पर चपरासियों के पैर tk छुलवातेथे।यही कारण है कि उनके मर जाने के बाद भी उनके बच्चे भी अभी तक हमसे जुड़े हुए हैं । आपके इस लेख ने बहुत पुरानी यादें ताजा कर दी ।

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    1. बिल्कुल सही कहा आपने सर, पहले पद से ज्यादा उम्र को आदर देते थे. सहृदय धन्यवाद आपका

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    1. सहृदय धन्यवाद सर, स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर,सादर नमन

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  11. उफ.... बहुत मार्मिक संस्मरण...

    इलेक्ट्रीसिटी बोर्ड मेरा भी विभाग है, इसलिए भी मुझे बहुत जाना पहचाना सा लगा। इस विभाग में करंट लगने से फेटल-नॉनफेटल एक्सिडेंट के चपेट में आने से अनुकम्पा नियुक्ति में आए विकलांग/मृतक कर्मचारियों की संतानों की व्यथा- कथा को आपने बहुत निकट से महसूस कर यह संस्मरण लिखा ... इस हेतु साधुवाद 🙏

    हार्दिक शुभकामनाओं सहित,
    डॉ. वर्षा सिंह

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    1. हां वर्षा जी, ऐसे दृश्यों को मैंने भी बड़ी करीब से देखा है और जिया भी है,कई बार तो मेरे पापा भी ये करेंट का दर्द झेले हैं, मेरा संस्मरण आप के हृदय तक पहुंचा जान कर खुशी हुई, दिल से शुक्रिया एवं सादर नमस्कार

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  12. जिनके व्यवहार ने बालपन में ही मुझे ये सीखा दिया था कि -"प्रतिष्टा कमानी पड़ती है"
    रामचंद्र जी को विनम्र श्रद्धांजलि।
    सादर

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    1. दिल से धन्यवाद प्रिय अनीता जी,ढेर सारा स्नेह आप को

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  13. सुंदर और सार्थक संस्मरण प्रस्तुति । रामचंद्र जी को विनम्र श्रद्धांजलि।

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  14. 👌👌👌वाह! बहुत ही बेहतरीन 👌👌👌

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  15. इज्जत काम की होती है, हमारे यहाँ भी उम्र के हिसाब से मान किया जाता है, जात धर्म पद के हिसाब से नही, सुंदर और सार्थक संस्मरण, रामचंद्र अंकल को विनम्र श्रद्धांजलि , सच्चे अच्छे लोग कम होते जा रहे हैं

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    1. सही कहा आपने, बहुत बहुत धन्यवाद ज्योति जी

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  16. सार्थक व प्रेरक आलेख - - आपकी रचनाओं में एक अलग ही वास्तविकता का अहसास होता है - - साधुवाद सह।

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    1. सराहना हेतु हृदयतल से धन्यवाद एवं सादर नमस्कार

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  17. आदर एवं प्रतिष्ठा तो वहीं सार्थक होती है जो कमाई गई हो । आंखें नम कर देने वाला संस्मरण साझा किया कामिनी जी आपने । जो भी पढ़ेगा, एक अनमोल सीख पाएगा ।

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  18. प्रतिष्ठा कमानी पड़ती है...सुन्दर सीख देता बहुत ही हृदयस्पर्शी संस्मरण...।

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  19. प्रतिष्टा कमानी पड़ती है- बिल्कुल सही कहा।

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kaminisinha1971@gmail.com

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