शनिवार, 16 मार्च 2019

एक विरहन ऐसी भी..........

                         
                        

                                                   यारा सिली सिली विरह की आग में जलना। 
                                                   ये  भी  कोई  जीना  हैं , ये  भी कोई  मरना। 
                                                   यारा सिली सिली विरह की आग में जलना। 
   
     विरह एक ऐसी अग्नि हैं जो विरहन के शरीर को ही नहीं आत्मा तक को धीमी धीमी आँच पर सुलगता रहता हैं। "ना मैं जीवति ना मरियो मैं विरहा मारो रोग रे ,वावरी बोले लोग।" बस यही दशा होती हैं उसकी। जब भी कोई विरह गीत ,कवित ,दोहे या छंद लिखे जाते है तो उनकी मुख्य नायिका राधा ,मीरा ,सीता या यशोधरा आदि ही होती हैं।इन सब ने असीम विरह वेदना सही हैं। पर क्या इन सब की विरह-वेदना एक सी थी। शायद नहीं ,जैसे प्रेम के अलग-अलग रूप और एहसास होते हैं वैसे ही विरह के भी कई रूप होते हैं और उनकी वेदना भी अलग -अलग होती  है। वैसे प्रेम और विरह की जो मुलभुत संवेदनाये होती हैं  वो तो एक सी ही होता है। 

    राधा और कृष्ण के विरह गीत तो सबसे ज्यादा गाये जाते है। उनके  मिलन और खुशियों के दिन तो बस चंद साल थे। कहते है किशोरावस्था में ही जब वो एक बार बिछड़े तो फिर कभी नहीं मिले और आजीवन विरह -वेदना में ही जले। परन्तु उन्होंने ये विरह वेदना स्वेच्छा से लिया था जनहित के लिए। इसलिए उनके विरह ने भी आलोकिक रूप धारण कर लिया और उनके प्रेम की अमर गाधा बन गई।राधा विरह में भी सोलह शृंगार कर रहती थी।  वो शरीर से तो दुर थे पर उनकी आत्मा पल भर को भी जुदा नहीं हुई। राधा को कृष्ण के विछोह में भी प्रेम की ही अनुभूति होती रही। उनके लिए मिलान या बिछुड़न जैसे शब्द महत्वहीन थे। कृष्ण कहते है -दो शरीरो का  मिलन या बिछुड़न होता है दो आत्माओ का नहीं। 

    राधा की तरह मीरा भी प्रेम दीवानी थी परन्तु उन्हें तो प्रीतम से मिलन का सुख मृत्यु उपरांत ही मिला। वो तो आजीवन विरह की अग्नि में ही चलती रही मीरा बाई की एक गीत , जिसमे उन्होंने अपने विरह को कुछ  ऐसे जताया है -        पलगा  पर  सोवत कामिनी रे  ( यहां कामिनी से मीरा बाई स्वयं को सम्बोधित करती है )
                        ज्ञान ध्यान सब पी संग लाग्यो 
                        पल में लग गई पलकन मोरी 
                         मिचत ही पल में पीय आयो 
                         जो मैं उठी पीय आदर  देने 
                        जाग पड़ी पीय हाथ ना आयो 
                         और सखी पीय  सोकर खोयो ( यशोधरा )
                         मैं अपना पीय जग गवायो 
    मीरा के विरह में प्रियतम को ना पाकर भी पा लेने का सुख समाहित था जो उन्हें अलौकिक तृप्ति प्रदान करता था। रोती मीरा थी और आंसू कृष्ण के आँखों से निकलते थे ,बिष मीरा ने पिया और जहर कृष्ण को चढ़ा। मीरा के विरह ने जोगन रूप धारण कर लिया।

    सीता माता का विरह तो सबसे ज्यादा पीड़ादायक औरअंतहीन ही रहा। सीता को तो उनके पति ने समाज के लांछन लगाने के कारण उन्हें त्याग  दिया। पति के द्वारा  चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगा कर त्यागे जाने की पीड़ा कितनी भयावह होगी ,कैसे सहा होगा सीता माँ ने उस अपमान के दंश को। सीता माँ ने विरह की पीड़ा को तो तब भी सहा  जब रावण उन्हें हरण कर ले गया था। लेकिन उस विरह की वेला में हर पल एक उमींद थी ,अपने पति पर विश्वास और मान था कि वे उन्हें इस पीड़ा से मुक्त जरूर करेंगे। उस एक वर्ष की पीड़ा को उन्हें ने पति के प्रेम का स्मरण कर उनकी वाट जोहती हुई काट लिया। जब उनके मान सम्मान पर उनके चरित्र पर सवाल खड़ा कर उन्हें आजीवन वनवास दिया गया होगा ,आधी रात को एक अपराधी की तरह उन्हें घर से बेघर किया गया होगा वो भी गर्भवती अवस्था में ,वो पीड़ा कितनी असहनीय रही होगी।  एक साधरण स्त्री के रूप में ये कल्पना भी असहनीय हैं।  अग्निपरीक्षा दे कर अपने  सतीत्व का प्रमाण देने के बाद भी उन्हें आजीवन विरह के साथ साथ अपमान की अग्नि में भी जलना पड़ा।  ऐसे हालत में अपने प्रियतम के लिए जो विरह वेदना होगी वो कैसी होगी ?

    विरह की मारी यशोधरा भी थी। यशोधरा के पति ने संसार से विरक्त हो ,स्वयं को सांसारिक दुखो से मुक्त करने के लिए ,स्वयं को साधने के लिए यशोधरा को त्याग दिया। पति के इस विछोह को अपनी नियति मान वो सह जाती। लेकिन उस विरह में कष्टदायक वेदना ये थी कि -वो मुझ से अपनी पीड़ा कहते ,अपनी मनोदशा बताते, अपनी मनसा बताते ,वो तो संसार को दुखो से मुक्त करने का मार्ग ढूढ़ने जा रहे थे ,मुझे कहते मैं स्वयं ख़ुशी ख़ुशी उन्हें जाने को कहती,उन्होंने तो मुझे  इस काबिल भी नही समझा। तभी तो अपनी व्यथा उन्होंने इन शब्दों में कहा -"सखी ,वो मुझसे कह कर जाते ,मैं उनके मार्ग की बाधक कभी नहीं बनती।"अपनी विरह अग्नि में वो स्वयं को ऐसी जलाई कि सन्यासनी बन पति की ही शिष्या बन गई। 

    एक विरहन ऐसी भी थी जिनकी विरह वेदना इन सब से कही ज्यादा पीड़ा दायक थी , जिन्हे इतिहास में ज्यादा मान नहीं मिला वो थी लक्ष्मण जी की पत्नी उर्मिला। जब राम जी को वनवास हुआ तो सीता जी पत्नी धर्म निभाते हुए पति  के साथ चल पड़ी। भाई लक्ष्मण ने भी अपना भातृ धर्म निभाने की जिद कर वो भी साथ चल पड़े। जब उनकी पत्नी उर्मिला ने भी साथ जाने की अनुमति मांगी तो लक्ष्मण जी ने ये कहकर रोक दिया कि -तुम्हे हमारी अनुपस्थिति में माताओ  का ध्यान रखना है ,और यदि तुम मेरे साथ चली तो भातृ धर्म निभाने में मुझसे कोई चूक ना हो जाये। उन्होंने तो उर्मिला से ये वचन भी ले लिया कि -तुम उदास भी नहीं होना और एक आंसू भी नहीं बहाना वरना मैं अपने कर्तव्य पथ पर डगमगा जाऊँगा। पति के वचन का मान रखते हुए चौदह साल तक उस विरहन ने अपनी आँखों  से विरह -वेदना को बहने भी नहीं दिया। चौदह साल पथराई आँखों से पति की राह तकती रही। एक नवविवाहिता के लिए चौदह साल की ये पीड़ा कितनी कष्टदायक होगी इसकी कल्पना मात्र से आत्मा काँप उठती हैं। लेकिन इस विरहन की वेदना को तो तुलसीदास जी ने भी अनदेखा कर दिया। हां ,मैथलीशरण जी ने उनकी दर्द के मर्म को समझा और उनकी वेदना को शब्दों का रूप दिया। 

      एक विरहन और थी उनका तो नाम भी चंद लोगो को ही पता होगा, वो थी भरत जी की पत्नी मांडवी।उनकी विरह दशा तो सब से अनजानी ही रह गई। उर्मिला ने तो पति के साथ ना होने के कारण दुःख सहा पर मांडवी का दुःख सबसे अलग था वो तो पति के साथ होते हुये भी पल पल पति वियोग में तड़पी। राज्याभिषेक होने के बाद भरत जी राजा तो बने परन्तु एक सन्यासी राजा। वो कभी सिंघासन पर नहीं बैठे और ना ही महल में निवास किया। उन्होंने राजसी वस्त्र छोड़ सन्यासी वेशभूषा ही नहीं अपनाया वरन सन्यासी जीवन शैली भी अपनाया। वे पचवटी वन में निवास करते और पथ्थर के सिले पर सोते। उन्होंने ये सारे त्याग भातृ प्रेम में किया। उनके साथ साथ मांडवी ने भी हर सुखो का त्याग कर अपना पत्नी धर्म निभाया। वो तो महल में होते हुए भी सन्यासनी जीवन व्यतीत की। जब भोजन सामने ना हो तो भूख पर काबू पाया जा सकता हैं परन्तु जब सामने छपन भोग पड़े हो और आप कंद मूल खा रहे है ,जब सामने मखमली विस्तर हो और आप जमीन पर सो रहे है ,जब सामने पति हो और आप उस पति की एक झलक भी ना पा सको ,वो त्याग कितना बड़ा होगा और वो पीड़ा कितनी असहनीय होगी। ये विरह वेदना माड़वी ने चौदह साल सहे। लेकिन उनके त्याग को सरहाना तो दूर उन्हें तो किसी ने महत्व ही नहीं दिया। 

     प्रेम की अनुभूति जितनी सुखदायक होती है उसी  प्रेम में वियोग या बिछोह उतनी ही पीड़ा दायक होती है। ये विरह की पीड़ा सिर्फ प्रेमी प्रेमिका या पति पत्नी के रिश्तो में ही नहीं होता हर उस रिश्ते में होता है जो आपके दिल के ज्यादा करीब होता हैं।जुदाई किसी भी रिश्ते में हो मन ही नहीं तन को भी झूलसा जाती। ये विरह -वियोग ,ये दर्द, ये अगन ये सारे शब्द सारी  संवेदनाये अब बीते  दिनों की बात हो चुकी है। 21वी सदी में ये सारे  शब्द और संवेदनाये अपना मर्म खो चुके हैं। आज तो ब्रेकअप होता हैं और वो भी ख़ुशी ख़ुशी।इतना ही नहीं उस ब्रेकअप का भी जश्न मनाया जाता है। शायद हम इस युग के आखिरी पीढ़ी होंगे जो इन शब्दों को और उनके दर्द को महसूस कर पा  रहे हैं।  

34 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना हमारे सोमवारीय विशेषांक
    १८ मार्च २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. सहृदय धन्यवाद स्वेता जी ,मेरी रचना को मान देने के लिए ,सादर स्नेह

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  2. विरह वेदना पर बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति सखी

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  3. प्रिय कामिनी -- 'विरह ' विषय को विस्तार देता , तुम्हारा ये लेख सचमुच सराहनीय और चिंतन परक है | एक नारी से बढ़कर , दूसरी नारी के मन की वेदना को कौन पहचान और जान सकता है ?इतिहास की जिन नारियों का उल्लेख तुमने लेख में किया सचमुच उनके जीवन से निसृत पीड़ा ने जन जीवन को हमेशा ही करुणा में डुबोया है | उनके जीवन के अनुत्तरित प्रश्नों ने मानवता को बेहाल किया है क्योकि पति को ही एक नारी का सर्वस्व कहा जाता है पर यदि पति ही किसी कारणवश , भले वह उसकी कर्तव्यगत विवशता हो , अपनी पत्नी के साथ अन्याय करे तो इससे बड़ा दुर्भाग्य उसके लिए क्या हो सकता है | बहुत ही सूक्ष्मता से चिंतन कर तुमने श्री राम जी के वनवास को विस्तार देते हुए उसके उपेक्षित पक्ष को उभारा है जो सुधि पाठको के लिए बहुत ही ज्ञानवर्धक रहेगा | सच है कहने को तो वनगमन श्री राम के लिए निश्चित किया गया था पर उसके साथ कही ना कहीं उनके परिवार के हर सदस्य ने वनवास की पीड़ा को जिया | भले ही भौतिक जीवन राजकीय वैभव से शून्य था पर सीता जी को तो फिर भी कुछ सालों के लिए के पति के सानिध्य का सुख मिल गया था - भले बाद में उनके जीवन से विरह की छाया कभी नहीं गई |

    || उर्मिला ने भी बिना किसी कारण के पति से विछोह का दारुण दुःख सहा तो मांडवी ने पास रहकर भी पति से दूरी की पीड़ा सही | अहिल्या के मानवी से पाषाणी रूप में सालों जीने की वेदना को लिखने में कोई लेखनी कहाँ सक्षम है | त्रिकालदर्शी पति ने उनकी मासूमियत को ना पहचान उन्हें अपनी तपस्या के अहम में डूबकर पत्थर हो जाने की जो शाप दिया तो उस समय क्या उनका जी नहीं कांपा होगा ? समर्पित पत्नी के अनजाने में हुए अपराध को क्षमा करके ऋषि गौतम उत्तम पति के रूप में इतिहास में जाने जाते पर अपनी साधना शक्ति को उन्होने एक निरीह नारी के ऊपर आजमाया | बुद्ध ने भी अपनी प्रिया यशोधरा को बिना बताये छोड़कर एक नारी को, एक वेदना में जीते जी हमेशा केलिए धकेल दिया | उस कीकरुणा इतिहास के माथे पर सदा के लिए ठहर गयी | पर तुमने सच कहा हमारी पीढ़ी आखिरी रहेगी जो उस विरह वेदना को महसूसती है | बढ़ते भौतिकवाद में इस गहन संवेदनाओं के लिए कहाँ जगह बची है ? सुंदर , चिंतन को प्रेरित करते सुंदर लेख के लिए मेरी ढेरों शुभकामनाये सखी | साथ में होली के त्यौहार के लिए बधाई और मंगल कामनाएं | सस्नेह --

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    1. मेरी लेख पर इतनी विस्तृत और अनमोल प्रतिक्रिया देने के लिए सहृदय धन्यवाद सखी ,मेरी लेखनी में जो कसर बाकि थी उसे तुमने पूरा कर दिया ,इतिहास में कितनी ही ऐसी किस्से भरे पड़े हैं पर आम जनो ने उन्हें ही जाना जिन्हे तात्कालिक साहित्यकरो ने अपने साहित्य में स्थान दिया। विरह वेदना सिर्फ नारियों ने ही नहीं सहा यकीनन उन पुरुषो ने भी सहा होगा जिन्होंने किसी भी परिस्थिति बस अपनी प्रियसी का त्याग किया होगा। फर्क यही हैं कि कही वो अपने पुरुष अहम के वश में थे कही सामाजिक परस्थितियों के और कही खुद के आस्तित्व की खोज में। नारियों की पीड़ा असहनीय इसलिए हो गई क्योकि ना उनकी कोई गलती होती और ना ही कोई स्वार्थ लेकिन हर बार किसी न किसी रूप में बलिवेदी पर उन्हें ही बिठाया गया। यकीनन आज की नारियों ने खुद को बलि का बकरा बनने से इंकार कर दिया हैं ,तभी तो आज वो कुछ ज्यादा ही उग्र हो गई हैं ,यकीनन इस युग की हम आखिरी पीढ़ी हैं। आप सब को भी होली की ढेरो शुभकामना ,सादर स्नेह

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  4. वाह!!कामिनी जी ,विरह -वेदना को आपनें अपने शब्दों से खूबसूरत रूप दिया है । होली की अग्रिम शुभकामनाएं .

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    1. सहृदय धन्यवाद शुभा जी , मेरी रचना को पसंद करने के लिए ,आप सब को भी होली की ढेरो शुभकामना ,सादर स्नेह

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  5. बहुत सुंदरता से विरह के अनेकों रूपों का विस्तार से वर्णन बहुत आकर्षक बना है। हृदय स्पर्शी और उपेक्षित पात्रों पर भी विचार करती आपकी लेखनी सचमुच अद्भुत है। बहुत सुंदर आलेख टीका के साथ।
    अप्रतिम।

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    1. सहृदय धन्यवाद कुसुम जी , मेरी रचना पर अपनी अनमोल प्रतिक्रिया देने के लिए आभार ,सादर स्नेह

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  6. बहुत ही सुन्दर लेख....इतिहास की विरही नारियों पर ज्ञानवर्धक और हृदयस्पर्शी लेख लिखा है आपने...और ये सत्य है कि शायद ये सब महसूस करने वाले हम आखिरी पीढ़ी हो...पर दर्द तो दर्द है हाँ उससे निबटने के तरीके भले ही बदल जायें... ब्रेकअप का रिजल्ट भी मानसिक बीमारी के रूप में नयी पीढी झेल ही रही है...

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    1. दिल से शुक्रिया सुधा जी ,आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आभार ,आपके विचारो से मैं भी सहमत हूँ दर्द तो दर्द है तकलीफ तो होती ही हैं ,ये भी सच है की युवापीढ़ी इस ब्रेकअप की वजह से मानसिक रूप से बीमार हो रहे है पर ये भी सच कि इस दुःख की वजह वो स्वयं हो रहे हैं परिवार ,समाज या परिस्थितियों की भूमिका नगण्य हो रही हैं। वैसे भी प्रेम हैं तो जुदाई हैं और जुदाई हैं तो दर्द भी होगा ही ,भले ही इसका रूप-प्रारूप बदल जाये। आभार एवं स्नेह

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  7. विरह वेदना पर अप्रतिम लेख कामिनी जी ।

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    1. दिल से शुक्रिया... मीना जी ,आपकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आभार

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    1. सहृदय धन्यवाद .....सखी, आप को मेरा लेख अच्छा लगा आभार...

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  9. विरह की वेदना से तप से निकला प्रेम एक अलग स्वाभिमान लिए होता है ... जितनी प्रेम कथाएं हैं जो अमर अजर हैं उनका अंत अधिकाँश विरह की वेदना में तप कर ही कुंदन बना है ... मील का पत्थर बना है ...
    वेदना के रंग को बाखूबी आकार दिया है आपने ...

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    1. आप की इस अनमोल प्रतिक्रिया के लिए दिल से शुक्रिया ,दिगम्बर जी ,होली की हार्दिक शुभकामनाये

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  10. बहुत सुंदर वर्णन।
    होली की हार्दिक शुभकामनाएं।
    नयी पोस्ट: मंदिर वहीं बनाएंगे।
    iwillrocknow.com

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    1. दिल से शुक्रिया ,नितीश जी ,आप को भी होली की हार्दिक शुभकामनाये

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  11. होली के पावन अवसर पर आपको अशेष व अनन्त शुभकामनाएं 🙏🙏

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    1. आप को भी होली की हार्दिक शुभकामनाये मीना जी ,रंगो का ये पावन पर्व आप के और आप के पुरे परिवार को खुशियों के रंगो से सराबोर कर दे।

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  12. प्रेम की अनुभूति जितनी सुखदायक होती है उसी प्रेम में वियोग या बिछोह उतनी ही पीड़ा दायक होती है विरह वेदना का विस्तार से वर्णन किया है आपने
    बहुत ही सुंदर हृदयस्पर्शी लेख कामिनी जी......,होली के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाये !!

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    1. सहृदय धन्यवाद संजय जी ,आप को भी होली की हार्दिक बधाई

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  13. बहुत सुंदर....आप को होली की शुभकामनाएं...

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    1. सहृदय धन्यवाद ,मेरे ब्लॉग पर आप का स्वागत हैं आदरणीय

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  14. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (16 -06-2019) को "पिता विधातारूप" (चर्चा अंक- 3368) पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ....
    अनीता सैनी

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    1. सहृदय धन्यवाद अनीता जी ,मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार आप का ,स्नेह

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  15. बहुत सारगर्भित लेख.

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    1. सहृदय धन्यवाद ओंकार जी ,सादर नमस्कार

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