गुरुवार, 18 अगस्त 2022

प्रेम और करुणा के पर्याय है "कृष्णा"

 



प्रेम और करुणा के पर्याय है "कृष्णा" जिन्होंने बताया "जिसके हृदय में प्रेम के साथ करुणा का भी वास है सही अर्थ में वही सच्चा धर्माचार्य है, वही सच्चा भक्त है, वही सच्चा प्रेमी है। 

सोलह कला सम्पन्न कृष्ण की यदि हम सिर्फ एक शब्द में व्याख्या करें तो वो है "प्रेम"। "प्रेम" जो उन्होंने अपनी प्रेमिका राधा और अपनी पत्नी रुक्मणि से किया,अपने संगी साथी ग्वाल-बाल और गोपियों से किया। "प्रेम" जो वो यशोदा माँ और नंद बाबा से करते थे,"प्रेम" जो वो अर्जुन,उद्धव और सुदामा से करते थे, "प्रेम" जो वो अपनी बहन सुभद्रा और अपने अग्रज दाऊ से किया करते थे। प्रेम जो वो अपने देश समाज और संस्कृति करते थे जिसके लिए उनका जीवन संघर्षरत रहा। कृष्ण ने हर एक रिश्ते को पूर्ण समर्पण से निभाया। कृष्णा ने संदेश दिया प्रेम हो या भक्ति एक ही बात है दोनों का मूल एक ही है "पूर्ण समर्पण"। इसमें पाने की लालसा नहीं होती देना और सिर्फ देना होता है।कृष्ण ने जिसे मन से अपना माना उसका साथ जीवन भर नहीं छोड़ा। जीवन की प्रत्येक लड़ाई वो रिश्तों के लिए ही लड़े और रिश्तों को साथ लेकर ही जीवन की लड़ाइयाँ भी जीती । उन्होंने समझाया- "रिश्ते हमारे जीवन के आधार है,हमारी सबसे बड़ी धरोहर है इसे सच्चे दिल से निभाओं" और जिस  हृदय में सच्चे प्रेम का वास हो वहाँ करुणा स्वतः ही आ जाती है।

कृष्ण को भगवान ना मानकर यदि सिर्फ एक इंसान मान उनके सम्पूर्ण जीवन पर गौर करें तो अपने जीवन के हर मोड़ पर उनके जीवन से शिक्षा ले सकते हैं। उनका पूरा जीवन ही एक शास्त्र हैं। 

चले बचपन से शुरू करते हैं-

कहते हैं कि -गोकुल वासियों का सारा दूध कंस मथुरा मंगवा लेता था और गोकुल के बच्चों को दूध-दही नसीब नहीं होता था। तो कृष्ण ने हँसी-ठिठोली में ग्वाल-बाल को माखन-मिश्री चुराकर खाना सिखाया,गायों को चराते-चराते उन्हें गायों के स्तन से दूध पीना सिखाया और ये समझाया कि -अपने विवेक-बुद्धि से बिना किसी को हानि पहुँचाये भी अपना भला कर सकते हैं। खेल-खेल में अलग-अलग मुद्राएं बनाकर योग से परिचय करवाना,ये संदेश था कि-अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बेहतर खान-पान और नियमित योग कितना जरूरी है।जीवन में नृत्य-संगीत का कितना महत्व है ये कृष्ण-लीला के सिवा और कहाँ सिखने को मिल सकता है। 

किशोरावस्था में जब राधा रानी से प्रेम किया तो पूर्ण समर्पण से किया लेकिन सिर्फ अपने प्रेम को पाने की लालसा में कभी अपने कर्तव्यों से मुँह नहीं मोड़ा। जरुरत पड़ने पर अपने देश और समाज के लिए एक पल में अपने प्रेम का त्याग भी कर दिया। यहाँ उन्होंने ये सीखा दिया कि-अपने निजी सुख से ऊपर देश और समाज के लिए अपना कर्तव्य है। युवावस्था में अपने अथक प्रयास से ही अपने राज्य द्वारका की स्थापना की। राज-काज मिलने पर अपने सुख और एश्वर्य में डुब नहीं गए बल्कि निकल पड़े सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त अरजकता और अशांति को दूर कर शांति कायम करने।इस कार्य के दौरान मिलने वाले लांक्षन और पीड़ा से भी वो नहीं धबराऐ ।ये कार्य करते हुए उनका एक ही सन्देश था "निष्काम कर्म"।कभी भी उन्हें विश्व विजयी बनने की लालसा नहीं हुई जबकि वो चाहते तो उनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं था। ना ही उन्हेने किसी भी अच्छे कर्मो का श्रेय खुद को दिया। किसी भी कार्य को करने से पहले उनका सिर्फ एक उदेश्य होता था मानवमात्र का कल्याण और उस कार्य के बीच अपने लिए मिलने वाले मान-अपमान की कभी परवाह नहीं किया। 

कृष्ण ने अपने जीवन में  "निष्काम कर्म" और "शांति" को सर्वोपरि माना। कृष्ण ने हमें ये समझाया कि-चाहे समाज हो या हमारा खुद का मन जब तक वहाँ शांति नहीं होगी कोई रचनात्मक कार्य हो ही नहीं सकता। शांति और निष्काम कर्म की भावना ही आपने व्यक्तित्व,समाज और देश को उन्नति की ओर ले जा सकता है। जीवन में हमेशा शांति का मार्ग अपनाये साधन का नहीं। कोई भी फैसला बिना सोचे समझे अधीर होकर ना ले क्योंकि आपके हर एक फैसले का असर आपकी भावी पीढ़ी भुगतती है अर्थात अपनी सोच को विस्तार दे। 

कृष्ण जिन्होंने सीखाया विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य को धारण रखें।जिसने भी ऐसा किया वो सबसे बुरी परिस्थिति में भी सबके लिए बेहतर सुअवसर निकल लाता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है -"युद्ध के विभीषिका के बीच गीता का ज्ञान" 

समाज में नारी का सम्मान करना कृष्ण से बेहतर कौन सीखा सकता है। एक नारी के सम्मान के लिए ही वो लड़ते रहें। कृष्ण ने जीवनपर्यन्त ना परिस्थितियों से भागना सीखा और ना ही परिस्थितियों का रोना रोया।उनका सम्पूर्ण जीवन ही सघर्षरत रहा परन्तु कभी भी ना वो रुके ना टूटें। कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन चरित्र सिर्फ इसी सिद्धांत पर चला कि-हम संसार को सिर्फ देने आये है- प्रेम,करुणा,सेवा सहयोग,आदर-सम्मान, आदर्श-संस्कार और ज्ञान। 

कृष्ण मात्र कथाओं में पढ़ा या सुना जाने वाला पात्र नहीं है, ना ही सिर्फ मूर्ति बनाकर पूजे जाने वाले ईश्वर है वो चरित्र और व्यवहार में उतारे जाने वाले देवता है।सिर्फ उनका जन्मोत्सव मनाकर ढोल-नगाड़े बजाकर हम जन्माष्टमी का व्रत नहीं मना सकते। "व्रत" का अर्थ होता है "वरतना" यानि जीवन में एक संकल्प को धारण करना। यदि हम कृष्ण के एक गुण को भी धारण ना कर सकें तो हम सच्चे व्रती नहीं है। 

आईये, इस जन्माष्टमी हम संकल्प लें कि-उनके एक गुण को भी धारण कर समाज के लिए नहीं तो कम से कम अपने परिवार के लिए आदर्श बन जाए। तभी हम सच्चे कृष्ण भक्त कहलायेगें। 

आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें 


"वसुधैव कुटुम्बकम "

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