रविवार, 25 सितंबर 2022

"वसुधैव कुटुम्बकम "



    भारतीय "हिन्दू संस्कृति" सबसे प्राचीनतम संस्कृति मानी जाती है और इस संस्कृति का मुलभुत सिद्धांत था "वसुधैव कुटुम्बकम "अर्थात पूरी वसुधा ही हमारा परिवार है। इस परिवार में मानव ही नहीं, प्रकृति और समस्त जीवों का भी स्थान था। हिन्दू संस्कृति में प्रकृति और जीवों का इतना गहरा रिश्ता है कि -दुनिया की सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद का प्रथम मंत्र ही "अग्नि" की स्तुति में रचा गया है। समय-समय पर पेड़-पौधे और जीवों की पूजा तो सर्वविदित है। 

     "हिन्दू धर्म" में अनगिनत त्यौहार मनाये जाते हैं। हर त्यौहार के पीछे कोई ना कोई उदेश्य जरूर होता है। अब नवरात्री पूजन को ही लें -  "नवरात्री" के नौ दिन में नौ देवियों का आवाहन अर्थात आठ दिन में देवियों के अष्ट शक्तियों को खुद में समाहित करना ( रोजमर्रा के दिनचर्या के कारण हम अपनी आत्मा के असली स्वरूप को खो देते है..उसका जागरण करना )और नवे दिन देवत्व प्राप्त कर दसवे दिन अपने अंदर के रावण का वध कर उत्सव मनाना। जब अंदर का रावण मर जायेगा तो जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ होगी, फिर घर-घर खुशियों के दीप जलाकर दीपावली मनाऐगे ही। भारतीय संस्कृति में  प्रचलित प्रत्येक त्यौहारों  पर यदि हम गहनता से चिंतन करें तो ये स्पष्ट होगा कि इनके पीछे आध्यात्म की प्रमुखता तो थी ही साथ-साथ एक बहुत बड़ा पारिवारिक,सामाजिक,मनोवैज्ञानिकऔर प्रकृति संरक्षण का उदेश्य भी छिपा होता है।नवरात्रि में देवी पूजन कर अपनी आत्मा की शक्तियों को जागृत करने से भी पहले हम पंद्रह दिन अपने पतृदेवों का पूजन कर उनकी आत्मा को तृप्त करते हैं ताकि अष्ट शक्तियों को जागृत करने के लिए   हमें जो बल चाहिए, वो पतृदेवों के आशीर्वाद से हमें मिल सकें। और पतृदेवो के प्रति सच्ची श्रद्धा-विश्वास और कर्तव्य परायणता की सीख तो गणपति जी से अच्छा कौन दे सकता है,इसलिए पतृपक्ष से पहले हम ग्यारह दिन मातृ-पितृ भक्त गजानन की पूजन करते हैं।इस तरह सारे त्यौहारों को क्रमबद्ध कर इस तरह से व्यवस्थित  किया गया है जो हमें समय-समय पर जीवन को बेहतर बनाने की सीख देते हैं। 

     "हिन्दू धर्म" के प्रत्येक त्यौहारों में तन-मन और वातावरण दोनों की शुद्धता को प्रमुखता दी गई है। दशहरा में मन की शुद्धता तो दीपावली में वातावरण की शुद्धता।  चार माह के बारिस के मौसम के बाद सर्दी के मौसम का आगमन होता है और बरसात के मौसम में घर के अंदर से लेकर बाहर तक गंदगी और कीड़ें -मकोड़ों की संख्या काफी बढ़ जाती है। सर्दी बढ़ने से पहले अगर इनकी सफाई नहीं हुई तो बीमारियों का प्रकोप बढ़ जायेगा। हमारे पूर्वजों ने दिवाली को लक्ष्मी पूजा से भी जोड़ा और कहा कि अपना घर और अपने आस-पास का वातावरण अगर साफ नहीं रखोगे तो लक्ष्मीजी तुमसे नाराज़ हो जाएगी और तुम्हारे घर नहीं आएगी।स्वाभाविक है, यदि घर में बिमारियों का प्रकोप होगा तो लक्ष्मी नाराज़ ही कहलाई न।  दिवाली पर तेल या घी के दीपक जलाने की परम्परा बनाई ताकि उस दीये के आग में वो सारे बरसाती कींट -पतंगे जल कर खत्म हो जाये जो हमारे शरीर के साथ-साथ आगे चलकर हमारे खेतो को भी नुकसान पहुँचायेगें। घी और तेल से निकलने वाले धुएं हमारे पर्यावरण को शुद्ध करेंगें।

      दीपावली के बाद बिहार और उतरप्रदेश के कुछ क्षेत्र में "छठ पूजा" का भी बहुत बड़ा महत्व है। इस त्यौहार के पीछे भी हमारे पूर्वजो की बड़ी गहरी मानसिकता रही है ।(इस त्योहर के बारे में विस्तारपूर्वक जानने  लिए पढ़े मेरा ये लेख-आस्था और विश्वास का पर्व -" छठ पूजा "ये  एक मात्र ऐसा पौराणिक पर्व है जो ऊर्जा के देवता सूर्य और प्रकृति की देवी षष्ठी माता को समर्पित है। पृथ्वी पर हमेशा के लिए जीवन का वरदान पाने के लिए ,सूर्यदेव और षष्ठीमाता को धन्यवाद स्वरूप ये व्रत किया जाता है।इस पूजा में अपने अंतर्मन की सफाई के साथ-साथ पर्यावरण की सफाई, जिसमे नदी-तालाब की सफाई को प्रमुखता दी गई थी।  इस पूजा में प्रकृति से प्राप्त हर एक वस्तु की पूजा की जाती है जो ये संदेश देता है कि -प्रकृति ने जो भी  वस्तु हमें  प्रदान की है उसका अपना एक विशिष्ट महत्व होता है इसलिए किसी भी वस्तु का अनादर नहीं करें।हमारे हर पूजा-पाठ,हवन-यज्ञ के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण अवश्य होता है। 

   काश !  हम समझ पाते कि-इतने सुंदर ,पारिवारिक ,सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सन्देश देने वाले  इन त्यौहारों को जिन्हे हमारे पूर्वजों ने कितना मंथन कर शुरू किया होगा जिसमे सर्वोपरि "प्रकृति" को रखा गया था। लेकिन आज यह पावन- पवित्र त्यौहार अपना मूलरूप खो चूके हैं। इनकी शुद्धता ,पवित्रता ,सादगी ,सद्भावना ,और आस्था महज दिखावा बनकर रह गया है।भारतीय संस्कृति और त्योहारों पर हम गहनता से चिंतन करे तो पाएंगे कि-प्रकृति संरक्षण का ऐसा कोई संस्कार अखंड भारतभूमि को छोड़कर अन्यत्र कही देखने को नहीं मिलेगा। शायद, यही कारण है कि-और देशो के मुकाबले हमारे देश में प्रकृति से संबंधित हालात अभी भी बेहतर है। दूसरे देश तो भौतिक चकाचोंध में अपना सब कुछ लुटा चुके हैं और थककर भारतीय परम्परा अपनाने के लिए अग्रसर हो रहे हैं और हम अपना महत्व अब भी नहीं समझ पा रहें हैं। यदि आज भी हम सतर्क हो जाए तो स्थिति सुधर सकती है। 

   अब हमें धर्म और त्योहारों के मूलरूप को फिर से समझना ही होगा -कब तक हम धर्म (धर्म भी नहीं धर्म का छलावा )के नाम पर खुद का ,समाज का और अपने पर्यावरण का शोषण करते रहेंगे ? क्या क्रिसमस ,ईद , दिवाली और नववर्ष पर पटाखें  जलाने से ही हमारा त्यौहार मनाना सम्पन होगा ?क्या जगह-जगह  रावण जलाकर ही हम ये सिद्ध कर सकते  हैं  कि हमने रावण को मार दिया? रावण भी ऊपर से देखकर हँस रहा होगा और कहता होगा - "मूर्खो मारना ही है तो अपने भीतर के रावण को मारो,मैं तो तुम सब के अंदर जिन्दा हूँ ,तभी तो किसी ना किसी रूप में हर साल हज़ारो की जान ले ही लेता हूँ ,पाँखंडियों खुद के  भीतर के रावण को तो मार नहीं सकते इसलिए हर साल मेरे पुतले को जला मुझे मारने का ढोंग करते हो। "लक्ष्मी माता भी हँसती होगी कि -पटाखें जलाकर,प्रदूषण फैलाकर मेरे ही स्वरूप "प्रकृति" को नष्ट कर रहे हो और मुझसे ही अन्न-धन और खुशियों की सौगात माँगते हो,मेरी दी हुई प्राणवायु को प्रदूषित कर मुझसे ही जीवन का वरदान माँगते हो "कहाँ से दूँगी मैं तुम्हें ये खुशियाँ"?

     त्यौहार जीवन में खुशियाँ लाने के लिए होती है दुखों को दावत देने के लिए नहीं। हिंदुत्व वैज्ञानिक जीवन पद्धति है। प्रत्येक हिन्दू परम्परा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक रहस्य छिपा है। इसे समझने और अपनाने का वक़्त आ गया है। अभी नहीं तो कभी नहीं.....

आईये,इस साल  हम सभी  प्रण ले कि-हर त्यौहार पूर्ण भारतीय परम्परा के साथ मनाएंगे 

अपने घर और वातावरण को नव जीवन प्रदान करेंगे। 

और पुरे विश्व में एक बार फिर से  "वसुधैव कुटुम्बकम " का संदेश देगे। 



 



मंगलवार, 13 सितंबर 2022

"सत्य ना असत्य"

  

आज मैं आप सभी को एक कहानी सुनाती हूँ। आप भी अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से इसका "अर्थ" निकाल सकते हैं। 

एक बाबा जी थे। लोगों का मानना था कि -बहुत पहुँचे हुए संत है जो कहते हैं सत्य हो जाता है,खासतौर पर संतानहीन माँ-बाप को बच्चों के बारे में जो बताते हैं वो तो बिल्कुल सत्य होता है। बाबा जी भक्तों को उत्तर एक पर्ची पर लिख कर देते थे। अब,जब भी कोई दम्पति आकर पूछता कि-"बाबा जी,मुझे बताये कि-लड़का होगा या लड़की" तो बाबा जी एक पर्ची पर लिख देते "बेटा ना बेटी" लोग अपनी-अपनी बुद्धि के हिसाब से या यूँ कहे मनोकामना के हिसाब से अपना उत्तर स्वयं सोच लेते थे। अब,अक्सर तो लोग बेटे की ही कामना कर खुश होते हैं। तो जब उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती और वो बाबा जी को धन्यवाद देने आते तो बाबा जी भी बड़े शान से छाती चौड़ी करके बोलते -"मैंने कहा था न बेटा,ना बेटी"यानि तुम्हे तो बेटा ही होना था। लोग खुश हो जाते। अब जिन्हे बेटी हो गई  और बेटी तो शायद ही किसी को चाहिए होता है तो वो दुखी होकर बाबा जी के पास आता तो बाबा जी बड़े प्यार से कहते-कोई बात नहीं बच्चें मैंने तो पहले ही कह दिया था कि-"बेटा ना,बेटी" तुम समझे ही नहीं। अब जिन्हे काफी इंतजार के बाद भी कुछ नहीं होता वो बाबा जी के पास शिकयत लेकर आता अपना दुखड़ा रोने लगता कि- बाबा जी मुझे तो ना बेटा हुआ ना बेटी मेरी झोली तो खाली ही रह गई तो बाबा जी सांत्वना भरे शब्दों में रूखे गले से बोलते-"मेरा तो कलेजा फट रहा था तुम्हें ये कहते हुए इसीलिए सांकेतिक रूप से कह दिया था "बेटा ना बेटी" अर्थात अभी तुम्हारे नसीब में कुछ भी नहीं था मेरे बच्चें,तुम्हें अभी प्रतीक्षा करनी होगी। और इस तरह बाबा जी का धंधा बड़े मजे से चलता था नाम,यश और धन किसी चीज की कमी नहीं थी ना आगे भविष्य में ही होनी थी क्योंकि लोगों को क्या चाहिए एक "सांत्वना" और वो उन्हें मिलता रहा उनकी झोली भरे ना भरे बाबा जी की भरती रही। 

 बाबा जी के पर्ची पर लिखे सांकेतिक भाषा को लोगो ने कितना समझा मैं नहीं जानती लेकिन धीरे-धीर इसका चलन जरूर बढ़ता जा रहा है ।  हमारे राजनेता तो पहले से ही इसमें माहिर है। वैसे ये कहना भी अतिशयोक्ति होगी कि-ये सिर्फ राजनेताओं ने ही सीखा है अब तो हम सभी ने भी बड़ी आसानी से बाबा जी की भाषा के साथ तालमेल बिठा लिया है। अब हम भी "ना सत्य बोलते है ना असत्य" समय और जगह के मुताबिक "सत्य ना असत्य" में एक अल्पविराम चिन्ह देकर उसका माने-मतलब बदल देते हैं और अपनी बातों को सिद्ध कर देते हैं।

वैसे देखा जाए तो ये भी एक कला है। आप क्या कहते हैं ???

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

प्रेम और करुणा के पर्याय है "कृष्णा"

 



प्रेम और करुणा के पर्याय है "कृष्णा" जिन्होंने बताया "जिसके हृदय में प्रेम के साथ करुणा का भी वास है सही अर्थ में वही सच्चा धर्माचार्य है, वही सच्चा भक्त है, वही सच्चा प्रेमी है। 

सोलह कला सम्पन्न कृष्ण की यदि हम सिर्फ एक शब्द में व्याख्या करें तो वो है "प्रेम"। "प्रेम" जो उन्होंने अपनी प्रेमिका राधा और अपनी पत्नी रुक्मणि से किया,अपने संगी साथी ग्वाल-बाल और गोपियों से किया। "प्रेम" जो वो यशोदा माँ और नंद बाबा से करते थे,"प्रेम" जो वो अर्जुन,उद्धव और सुदामा से करते थे, "प्रेम" जो वो अपनी बहन सुभद्रा और अपने अग्रज दाऊ से किया करते थे। प्रेम जो वो अपने देश समाज और संस्कृति करते थे जिसके लिए उनका जीवन संघर्षरत रहा। कृष्ण ने हर एक रिश्ते को पूर्ण समर्पण से निभाया। कृष्णा ने संदेश दिया प्रेम हो या भक्ति एक ही बात है दोनों का मूल एक ही है "पूर्ण समर्पण"। इसमें पाने की लालसा नहीं होती देना और सिर्फ देना होता है।कृष्ण ने जिसे मन से अपना माना उसका साथ जीवन भर नहीं छोड़ा। जीवन की प्रत्येक लड़ाई वो रिश्तों के लिए ही लड़े और रिश्तों को साथ लेकर ही जीवन की लड़ाइयाँ भी जीती । उन्होंने समझाया- "रिश्ते हमारे जीवन के आधार है,हमारी सबसे बड़ी धरोहर है इसे सच्चे दिल से निभाओं" और जिस  हृदय में सच्चे प्रेम का वास हो वहाँ करुणा स्वतः ही आ जाती है।

कृष्ण को भगवान ना मानकर यदि सिर्फ एक इंसान मान उनके सम्पूर्ण जीवन पर गौर करें तो अपने जीवन के हर मोड़ पर उनके जीवन से शिक्षा ले सकते हैं। उनका पूरा जीवन ही एक शास्त्र हैं। 

चले बचपन से शुरू करते हैं-

कहते हैं कि -गोकुल वासियों का सारा दूध कंस मथुरा मंगवा लेता था और गोकुल के बच्चों को दूध-दही नसीब नहीं होता था। तो कृष्ण ने हँसी-ठिठोली में ग्वाल-बाल को माखन-मिश्री चुराकर खाना सिखाया,गायों को चराते-चराते उन्हें गायों के स्तन से दूध पीना सिखाया और ये समझाया कि -अपने विवेक-बुद्धि से बिना किसी को हानि पहुँचाये भी अपना भला कर सकते हैं। खेल-खेल में अलग-अलग मुद्राएं बनाकर योग से परिचय करवाना,ये संदेश था कि-अपने शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बेहतर खान-पान और नियमित योग कितना जरूरी है।जीवन में नृत्य-संगीत का कितना महत्व है ये कृष्ण-लीला के सिवा और कहाँ सिखने को मिल सकता है। 

किशोरावस्था में जब राधा रानी से प्रेम किया तो पूर्ण समर्पण से किया लेकिन सिर्फ अपने प्रेम को पाने की लालसा में कभी अपने कर्तव्यों से मुँह नहीं मोड़ा। जरुरत पड़ने पर अपने देश और समाज के लिए एक पल में अपने प्रेम का त्याग भी कर दिया। यहाँ उन्होंने ये सीखा दिया कि-अपने निजी सुख से ऊपर देश और समाज के लिए अपना कर्तव्य है। युवावस्था में अपने अथक प्रयास से ही अपने राज्य द्वारका की स्थापना की। राज-काज मिलने पर अपने सुख और एश्वर्य में डुब नहीं गए बल्कि निकल पड़े सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त अरजकता और अशांति को दूर कर शांति कायम करने।इस कार्य के दौरान मिलने वाले लांक्षन और पीड़ा से भी वो नहीं धबराऐ ।ये कार्य करते हुए उनका एक ही सन्देश था "निष्काम कर्म"।कभी भी उन्हें विश्व विजयी बनने की लालसा नहीं हुई जबकि वो चाहते तो उनके लिए कुछ भी असम्भव नहीं था। ना ही उन्हेने किसी भी अच्छे कर्मो का श्रेय खुद को दिया। किसी भी कार्य को करने से पहले उनका सिर्फ एक उदेश्य होता था मानवमात्र का कल्याण और उस कार्य के बीच अपने लिए मिलने वाले मान-अपमान की कभी परवाह नहीं किया। 

कृष्ण ने अपने जीवन में  "निष्काम कर्म" और "शांति" को सर्वोपरि माना। कृष्ण ने हमें ये समझाया कि-चाहे समाज हो या हमारा खुद का मन जब तक वहाँ शांति नहीं होगी कोई रचनात्मक कार्य हो ही नहीं सकता। शांति और निष्काम कर्म की भावना ही आपने व्यक्तित्व,समाज और देश को उन्नति की ओर ले जा सकता है। जीवन में हमेशा शांति का मार्ग अपनाये साधन का नहीं। कोई भी फैसला बिना सोचे समझे अधीर होकर ना ले क्योंकि आपके हर एक फैसले का असर आपकी भावी पीढ़ी भुगतती है अर्थात अपनी सोच को विस्तार दे। 

कृष्ण जिन्होंने सीखाया विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य को धारण रखें।जिसने भी ऐसा किया वो सबसे बुरी परिस्थिति में भी सबके लिए बेहतर सुअवसर निकल लाता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है -"युद्ध के विभीषिका के बीच गीता का ज्ञान" 

समाज में नारी का सम्मान करना कृष्ण से बेहतर कौन सीखा सकता है। एक नारी के सम्मान के लिए ही वो लड़ते रहें। कृष्ण ने जीवनपर्यन्त ना परिस्थितियों से भागना सीखा और ना ही परिस्थितियों का रोना रोया।उनका सम्पूर्ण जीवन ही सघर्षरत रहा परन्तु कभी भी ना वो रुके ना टूटें। कृष्ण का सम्पूर्ण जीवन चरित्र सिर्फ इसी सिद्धांत पर चला कि-हम संसार को सिर्फ देने आये है- प्रेम,करुणा,सेवा सहयोग,आदर-सम्मान, आदर्श-संस्कार और ज्ञान। 

कृष्ण मात्र कथाओं में पढ़ा या सुना जाने वाला पात्र नहीं है, ना ही सिर्फ मूर्ति बनाकर पूजे जाने वाले ईश्वर है वो चरित्र और व्यवहार में उतारे जाने वाले देवता है।सिर्फ उनका जन्मोत्सव मनाकर ढोल-नगाड़े बजाकर हम जन्माष्टमी का व्रत नहीं मना सकते। "व्रत" का अर्थ होता है "वरतना" यानि जीवन में एक संकल्प को धारण करना। यदि हम कृष्ण के एक गुण को भी धारण ना कर सकें तो हम सच्चे व्रती नहीं है। 

आईये, इस जन्माष्टमी हम संकल्प लें कि-उनके एक गुण को भी धारण कर समाज के लिए नहीं तो कम से कम अपने परिवार के लिए आदर्श बन जाए। तभी हम सच्चे कृष्ण भक्त कहलायेगें। 

आप सभी को कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनायें 


गुरुवार, 7 जुलाई 2022

" तुम्हें गीतों में ढालूँगा सावन को आने दो....."




 "छाई बरखा बहार पड़े अंगना फुहार....", 

"पड़ गए झूले सावन रुत आई रे...."

"पुरवा सुहानी आई रे ऋतुओं की रानी आई रे...." 


ऐसे कितने ही अनगिनत गीत है जो आज भी जब सुनाई पड़ते हैं तो मन खुद-ब-खुद झूमने लगता है। 

"पीली पीली सरसों फूली 

पीले उड़े पतंग 

अरे पीली पीली उडी चुनरिया 

ओ पीली पगड़ी के संग 

गले लगा के दुश्मन को भी 

यार बना लो कहे मलंग 

आई झूम के बसंत,झूमो संग संग में 

आज रंग लो दिलों को एक रंग में 

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उपकार फिल्म का ये गाना सुनते ही  प्रकृति का वो मनोरम दृश्य आपको खुली आँखों से दिखाई देने लगता है। उदास मन भी झूम उठता है गुनगुनाने लगता है सारे गीले-शिकवे भूल किसी को गले लगाने को मन मचल उठता है। दरअसल ये सिर्फ गीत के बोल नहीं है ये तो हमारे मन के भाव है जो प्रकृति की सुंदरता को देखते ही खुद-ब-खुद  उमड़ने लगते हैं। अक्सर हमने महसूस किया है कि -हम कितने भी उदास हो कितनी भी परेशानियों में घिरे हो परन्तु किसी पार्क में या फूलों के बगियाँ में चले जाये,किसी झरने, नदी, ताल-तलईया या समुन्द्र के पास चले जाये, तो मन अथाह सुख के सागर में गोते लगाने लगता है। थोड़ी देर के लिए ही सही हम सारे गम भूल जाते हैं। आप अपने ही छोटे से गमले में लगे छोटी-छोटी फूलों के पास बैठ जाए यकीनन आपको थोड़ी देर के लिए सुकून जरूर मिल जायेगा। 


आखिर ऐसा क्यों होता है ?क्या हमने कभी इस बात पर गौर किया है ?

क्यूँ आज भी जबकि पहले जैसी आबो-हवा नहीं रही फिर भी फूलों का खिलना, भवरों का गुनगुनाना,बादलों का उमड़ना,घटाओं का गरजना,बूंदों का बरसना,मदमस्त वयारों का तन को छूकर निकल जाना हमें रोमांचित कर देता है ?क्यूँ पहाड़ों को देख,नदी, झरने को देख हमारा मन कवि बन जाता है ? आज भी क्यूँ कवियों का प्रिय विषय "प्रकृति" ही है? शहर की भीड़-भाड़,गाड़ियों का शोर,शॉपिंग मॉल की चमक-धमक,से ऊब हम छुट्टियां मनाने पहाड़ों पर ही  क्यूँ जाते हैं ? 

   इन सारे "क्यूँ" का एक ही जबाब है कि-हमारा जीवन ही नहीं हमारी खुशियों की शुरुआत भी प्रकृति से ही होती है और अंतिम मोक्ष भी वही मिलता है। मानव और प्रकृति एक दूसरे के पूरक है,एक के बिना दूसरे का अस्तित्व संभव ही नहीं। मानव जन्म से मरण तक इसी प्रकृति के गोद में रहता है। प्रकृति हमें माँ की तरह पालती है,बाप की तरह पोषित करती है,एक मित्र की तरह हमें अनंत खुशियाँ देती है और हमारा मनोरंजन भी करती है,मूक प्रकृति  मौन रहकर भी पग-पग पर एक गुरु की भाँति हमें ज्ञान भी देती है और अंत समय में अपने आँचल में समेट कर खुद में हमें विलीन भी कर लेती है। तो इससे हमारा अटूट लगाव होना स्वभाविक ही है। इस बात को जानते हुए भी आज हम नासमझ बन बैठे है और इसकी नाकदरी करते रहते हैं। एक बार खुद का मंथन करना बहुत जरूरी है कि-हमारी ख़ुशी क्या है और किससे है ?

 "प्रकृति"का मतलब ही होता है "सर्वश्रेष्ठ कृति" ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना। 

ईश्वर ने अपने  ही स्वरूप को  प्रकृति के रूप में सजाया और इसका आनंद उठाने के लिए,इसका उपभोग करने के लिए और इसको संरक्षित करने के लिए सौप  दिया अपनी दूसरी श्रेष्ठ कृति "अपने मानस पुत्रो" के हाथों में। हमारी ख़ुशी से लेकर गमी तक में प्रकृति हमारी साथी और साक्षी दोनों बनी रहती है। प्रकृति से ही संगीत उत्पन होता है और प्रकृति की गोद में ही नृत्य का जन्म होता है। प्रकृति हमारी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक,सांस्कृतिक और आध्यत्मिक विकास की कारक बनी है। गौरवशाली परम्परा और अनूठी संस्कृति के देश हमारे भारत में तो प्रचीन काल से ही इसके साक्ष्य मिलते रहें हैं कि-प्रकृति हमारे लिए कितनी पूजनीय है। ऋग्वेद के अनुसार जल,वायु,अग्नि,समुद्र,नदी, वृक्ष ये सभी देवता स्वरूप है और आराधना करने योग्य है। धरती को माँ का स्थान मिला। हमारे तीज-त्योहारों में,पारंपरिक गीतों में आज भी प्रकृति पूजन का महत्व है। पति की लम्बी उम्र के लिए बरगद की पूजा करना,शादी के रस्मों में आम-महुआ का व्याह,मिट्टी और कुआ पूजन की रस्में होती ही है। 

परन्तु अफ़सोस ये सब अब सिर्फ दिखावा भर होता है अब हम बस लकीर पीटते हैं। इसके महत्व को हम कब का अनदेखा कर चुके हैं। अब सावन में झूले नहीं पड़ते...अब बसंती वयार अपने अल्हड़पन में नहीं बहती....अब बरखा की रिमझिम बुँदे नहीं बरसती.....अब तो आसमान से आफत बरसती है या आग। अब सावन के महीने में बेटियां अपने बाबुल के घर नहीं जाती.....ना ही सखियों के साथ झूला झूलते हुए गीत गुनगुनाती है। अब सर्दियों की वो मीठी धुप नहीं मिलती.....गर्मियों में आम के बगीचे की ठंढी छाँव नहीं मिलती....कोयल के सुर के साथ बच्चे अपना सुर नहीं मिलाते....बादलों को उमड़ते देख मोरनी का नाच देखना सबको नसीब नहीं है। 

ये सारी खुशियाँ अब हम से दूर हो चली है या यूँ कहे कि-भौतिक सुखों की लालसा में हमने खुद ही इससे मुख फेर लिया और आज जीवन में तनाव और डिप्रेशन को जगह दे दिया। अगर सचमुच ये भौतिक सुख हमें ख़ुशी और सुकून देती तो हम इनसे ऊब कर पहाड़ों पर छुट्टियां बिताने नहीं जाते। जो पहाड़ों की गोद में खेले बढे है उन्हें महल कभी रास नहीं आता। वो अपना जन्नत छोड़कर आना कभी नहीं चाहेंगे। क्योंकि असली सुकून वही है। 

आज सच पूछे तो हमारे जीवन से "ख़ुशी" शब्द ही खो गया है। अब तो त्योहारों का रूप भी कृत्रिम हो चुका है। कोई भी त्यौहार अब जीवन में क्षणिक खुशियाँ भी लेकर नहीं आती क्योंकि परिवार जो खंडित हो चूका है। हम सिर्फ भौतिक सुखों के मृगतृष्णा के पीछे भाग रहे हैं। प्रकृति से नाता क्या तोडा ख़ुशी और सच्चे प्यार से भी नाता टूट गया। अब कहाँ है वो प्रेमी मन, जो गुनगुनाता था.... 

"इन हवाओं में,इन फिज़ाओं में तुझको मेरा प्यार पुकारे"

अब कहाँ किसी प्रेमिका के आने पर प्रेमी फूलों से गुहार करता है कि-

"बहारों फूल बरसाओं मेरा महबूब आया है"

अब तो दिल बस एक ही गीत गुनगुनाता है-"जाने कहाँ गए वो दिन...."

   फिर से दिल चाहता है....उन दिनों को देखना जब,फुलवारियों में फूलों के साथ हम झूमा करते थे.....जब,बारिश के पानी में नगधड़ंग बच्चे दौड़ लगते थे....जब आम के बगीचे में बुजुर्गो की चौपाल लगती थी....जब बसंत की बहार में सरसों के पीली-पीली फूलों के बीच दो दिल मिलते थे....जब सावन में  झूले पर झूलती हुई सखियाँ एक दूसरे से ठिठोली करती थी....

 फिर से दिल चाहता है..... सावन की राह तकते हुए कोई सच्चा प्यार ये कहे -

" तुम्हें गीतों में ढालूँगा सावन को आने दो....." 









रविवार, 26 जून 2022

"तू कविता या गीतिका"





ना मैं कविता, ना ही गीतिका,

मैं तो नज़्म पुरानी हूँ। 

ना भुला पाओगे कभी जिसे,

मैं वो अधुरी कहानी हूँ।। 


तेरी लग्न में मस्त-मगन,

मैं एक प्रेम दीवानी हूँ। 

अटूट स्नेह की डोर बंधी, 

मैं तो तेरी रानी हूँ।।


मीरा की मैं भक्ति गीत हूँ, 

विरहन राधा प्यारी हूँ। 

सोहनी की मैं मधुर तान हूँ, 

हीर की नेत्रवारि हूँ।।


प्यार का एक नगमा हूँ, 

तेरे  होठों पे सजती हूँ। 

तेरी पावन-पवित्र आँखों में, 

बूंद बन सिसकती  हूँ।।


 सांसों में तेरी घुली हुई, 

तेरे दिल की मै धड़कन हूँ। 

रूह में तेरी बसी हुई,  

तेरे रगो की मैं शोणित हूँ।। 


 तेरी ख्वाबों की गलियों में, 

मैं दिन रात भटकती हूँ।

तेरी यादों की आँगन में,

बादल बन बरसती हूँ।।


ना पास तुम्हारे आ पाऊँ 

ना दुर तुमसे जा पाऊँ 

जो तुम को छू गुजर जाती है   

मैं वो पवन सुहानी हूँ  


माना, बंधी हूँ सीमाओं में 

फिर भी, मौजों की रवानी हूँ 

मर्यादाओं में बंधी हुई

मैं संस्कार पुरानी हूँ।।

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 (चित्र-गूगल साभार से ) कविता 

शुक्रवार, 17 जून 2022

"आ अब लौट चले"




"निकले थे कहाँ जाने के लिए,पहुँचे  है कहाँ मालूम नहीं 

        अब अपने भटकते क़दमों को,मंजिल  का निशां मालूम नहीं "


इस सदी के मानव जाति का आज यही ह्रस हो रहा है "कहाँ जाने के लिए निकले थे और कहाँ पहुँच गए है"।   

एक युग था जब मानव घर से  निकलता था आध्यात्म की तलाश में,निर्वाण की तलाश में,मानव कल्याण के मार्ग की तलाश में ,विश्व शांति के उपाय की तलाश में और खुद की तलाश में....जब लौट कर आता था तो खुद का ही नहीं सम्पूर्ण मानव जाति का कल्याण करता था। उन्हें पता होता था वो कहाँ और क्यों जा रहें और यकीन होता था कि  जब लौटेगे तो शुभ फल के साथ। जब जीने के मूल्य कुछ और थे,साधन कुछ और,प्राथमिकता  कुछ और होती थी। जब ऐश्वर्य की अधिकता के वावजूद "साधा जीवन और उच्च विचार" था। जब संघर्ष भी होता था तो सिर्फ  अपने मान-मर्यादा,स्वाभिमान-संस्कार और अधिकार  की रक्षा हेतु। जब प्रकृति भी भरपूर थी तब भी मानव तो मानव जानवर भी उससे उतना ही लेते थे जितने से उनकी क्षुधा पूर्ति हो  जाए। जितना लेते  थे उससे कही ज्यादा प्रकृति को वापस  भी करते थे संतुलन बना रहता था। घर,समाज और देश में शांति के साथ-साथ  वातावरण में भी शांति व्याप्त होता था।  उन दिनों की कल्पना करने मात्र से ही आज भी शांति की अनुभूति होती है। क्यूँ,सच कहा न ?

ज्यादा नहीं आज से तीस-पैतीस वर्ष पूर्व तक भी जीवन इतना मुश्किल तो नहीं था जितना अभी है। सूरजदेव कितनी भी तपिश बरसाए आम-बरगद और पीपल की  ठंडी छाँव हर जगह मिल  जाती थी,गर्मी बढ़ते ही बगीचे की ठंडी छाँव में खाट बिछ जाया करते थे,जब प्यास बुझाने  के लिए सिर्फ पशु-पक्षी और जानवरों  के लिए ही नहीं मानव के लिए भी नदी,ताल-तलईयां और कुपो में भरपूर स्वच्छ जल था। मट्टी के घड़े में सौंधी खशबू से भरा जल तन और मन दोनों को शीतलता प्रदान करने में सक्षम होता था। जीवन सुखद स्वप्नों सा था। आज तो शहर को छोड़े गांव में भी  यदा-कदा ही ये सब देखने को मिलता है। चंद सालों में क्या से क्या हो गया,है न  ??

अब कुछ लोगों का उत्तर होगा "जीवन बहुत आरामदायक और सुविधाओं से लेस हो गया,क्या कुछ नहीं पाया हमने,विज्ञान के चमत्कार ने हमारी हथेलियों में वो ऊर्जा भर दी कि क्षण भर में हम चाँद को छू लेते है,प्यास बुझाने लिए ताल-तलैया तक चलकर कौन जाए, घर में ही शीतल पेय की मशीन पड़ी है,पेड़ों की छाँव किसे चाहिए जब एक बटन दबाते ही सारा घर ठंडा-ठंडा,कूल-कूल हो जाए। शीतल ठंडी हवा का तो मोल ही ख़त्म हो गया,घर हो या ऑफिस चिल ही चिल है। अब इनसे कोई पूछे कि- जब इतने चिल हो ही तो फिर गर्मी-गर्मी क्यों चिल्लाना। अच्छा हाँ,एसी से  निकलते ही तुम्हारा कोमल तन सूरज की तपिश को नहीं सह पाता होगा न। वैसे जनाब हकीकत भी यही है कि-गर्मी आप जैसे लोगो के लिए है भी कहाँ,जलवायु परिवर्तन से आपको क्या ? गर्मी तो बस गरीबो और पशु-पक्षियों के लिए है,उनके एसी-कूलर और फ्रिज को तो तुमने तबाह बर्बाद कर दिया। अपने सुख-सुविधा और अत्यधिक की चाह में तुमने अपना वर्तमान ही नहीं भविष्य को भी जहनुम बना दिया। थूकेगी आने पीढ़ी तुम सब पर,तोहमत लगाएगी कि-तुम सब के किये की  सजा हम और हमारी आने वाली नस्लें भोगेगी। 

अविष्कार करना अनुचित नहीं होता,गलत होता है बिना सोचे-समझे उनका  ज़रूरत से ज्यादा उपभोग करना,उसके  हानिकारक पहलू के विषय में सोच-विचार नहीं करना। हमने भी यही किया -"कहाँ जाने की लिए निकले थे और कहाँ पहुँच गए है।"हम भी एक दिन घर से निकले थे अपने जीवन को सहुलियतो से भरने, चांद तारों पर घर बनाने, धरती से आकाश की दुरी को नापने, पाया भी बहुत कुछ परन्तु, क़ीमत क्या चुकाई ? हमारी नादानी ने हमें मौका ही नहीं दिया सोचने का कि प्रकृति से अप्राकृतिक होने की हमें सजा क्या मिलेगी?  आज सूरज आग उगल रहा है,दिन-ब-दिन गर्मी अपनी अपनी हदे पार करती जा रही है,नदी-तालाब सुख गए, पेड़ झुलस रहें हैं, धरती तप रही है, अम्बर जल रहा है। हमारे नौनिहालों का बचपन बदहाल है और वो घर में कैद रहने को मजबूर है,अब हमारे बनाये एसी-कूलर भी नाकाम हो रहें हैं, अब क्या करेंगे ??

ये अविष्कारों के जनक और हमारे बाप-दादाओ ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि- हम किस आग में झोंक रहे हैं अपनी नस्लों को और ना अभी तक हमें ही सोचने की फुर्सत मिली है।विज्ञान ने ही हमारा भला किया और विज्ञान ही हमारा विनाश भी कर रहा है क्योंकि कोई भी गतिविधि सीमावद्ध ही अच्छी और सार्थक होती है। जलवायु परिवर्तन और  बढ़ते तापमान ने हर एक जागरूक इन्सान की चिंता बढ़ा दी है। यदि इस पर अभी भी रोक लगाने का प्रयास नहीं किया गया तो आने वाले दिन इतनी डरावनी होगी जिसकी कल्पना मात्र से ही रूह कंपा जा रही है।

समस्या होती है तो सामाधान भी होता है। ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका सामाधान ना हो। इस तपते और बदलते वातावरण के साथ  दिनचर्या अर्थात सोने,उठने,काम करने,या स्कूल और दफ्तर के समय को बदलना विकल्प नहीं है। दिनचर्या बदलने से तापमान नहीं बदलने वाला, बदलना ही है तो खुद को बदलिए। अपने जीवन शैली को ही  बदलना होगा और कोई विकल्प है ही नहीं । अब ये ना कहे कि-एक हमारे करने से क्या होगा ? "हमें लौटना ही होगा अपनी भारतीय जीवन शैली की ओर"  जो प्रकृति और संस्कृति दोनों के करीब थी ।भारतीय सभ्यता सबसे पुरानी वेदिक सभ्यता है जहाँ "सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय" का सिद्धांत था। सर्वजन से अभिप्राय सिर्फ मनुष्य जाति से ही नहीं था इनमे पेड़-पौधे, पशु-पक्षी,समेत सम्पूर्ण ब्रह्मांड आता था। बहुत जी लिये पश्चिमी जीवन शैली से, अब तो उन्हें भी एहसास हो गया है कि उनका तरीका सही नहीं था उन्होंने "यूटर्न" ले लिया है और हमारी सभ्यता अपना रहें हैं।लेकिन हम अभी भी अपनी छोड़ दूसरों के नकल में ही लगे है। अपनी मानसिकता बदलिए,सब कुछ बदलना आसान हो जायेगा। अब ये भी ना कहे कि सिर्फ भारत के लोगो के बदलने से क्या होगा बाकि दुनिया तो परमाणु युद्ध के कगार पर खड़ी है,रूस और यूक्रेन के युद्ध ने वातावरण का कितना नाश किया होगा ?? हम अपने हिस्से की जिम्मेदारी ले सकते हैं पूरी दुनिया की नहीं और हमें पूरी ईमानदारी से वही निभाना है।   

 सोशल मिडिया में जहाँ बहुत बुराई है वहाँ कुछ अच्छाई भी है ये हम पर निर्भर है कि- हम अच्छाई को बढ़ावा दे रहें हैं या बुराई को। सोशल मिडिया पर दिख रहा है कि -बहुत से ऐसे लोग है जो प्रकृति को लेकर फिक्रमंद है। प्रकृति के संरक्षण की दिशा में बहुत से जागरुक लोग नित्य नए प्रयास भी कर रहे हैं और सफल भी हो रहें हैं। उनमे से एक तो हमारे "आदरणीय संदीप जी" ही है। मुझे सोशल मिडिया पर ऐसे कई पेज मिलते है जहाँ पर परम्परागत पुरानी जीवन शैली को अपनाकर  प्रकृति को संरक्षित करने के प्रयास में जागरूक लोगो के बारे में बताया जाता है। जीवन शैली बदलेगी तो प्रकृति खुद को स्वतः ही बदल लेगी। करोना-काल में इस बात के प्रत्यक्षदर्शी हम स्वयं रहें हैं। एक सोशल पेज को में यहाँ साझा कर रही हूँ। इस पेज को साझा करते हुए मेरा उदेश्य सिर्फ इतना है कि-हम इनसे प्रेरणा ले सकते हैं। मैंने अपनी जीवन में इससे प्रेरित होकर बदलाव किये है। (मैं इस पेज को वक्तिगत फायदे के लिए प्रमोट नहीं कर रही) यकीन मानिये, हमारे छोटे-छोटे प्रयास वातावरण में बड़े-बड़े बदलाव लाने में सक्षम है। 

नोट-सोशल मिडिया पेज का नाम है-EcoFreaks by Anuj Ramatri (एक बार देखिएगा जरूर )

("प्रकृति दर्शन"पत्रिका के जून अंक में प्रकाशित मेरा लेख,आदरणीय संदीप जी को बहुत बहुत धन्यवाद )


 



गुरुवार, 26 मई 2022

"सच्ची प्रहरी तो तुम हो "माँ"



कहते हैं, सब मुझको "सैनिक"

पर, सच्ची प्रहरी तो तुम हो "माँ" 

मैं सपूत इस जन्मभूमि का 

ज्ञान ये तुमने दिया। 


मस्त-मगन था तेरी गोद में 

भेज दिया तुमने फिर रण में। 

बोली, माटी का कर्ज़ चुकाओ 

मातृभूमि के लाल कहलाओ। 


आँचल तेरा छूट गया "माँ"

छूटा गाँव, घर और चौबारा। 

रोया था मैं फूट-फूट के

जिस दिन छूटा था साथ तुम्हारा। 


तुमने मुझको जन्म दिया "माँ"

इस मिट्टी ने पाला है। 

मातृभूमि का कर्ज़ चुकाना 

तुमने ही तो सिखलाया है। 


तू ही हिम्मत,तू ही हौंसला 

शौर्य उपहार तुमने दिया है। 

चीर सकूँ दुश्मन का सीना 

वो,बल भी तुमने दिया है। 


आज धरा का कर्ज़ चुकाकर 

तिरंगे में लिपट गया "मैं"। 

तेरी ममता का मान बढ़ाकर 

लो,देश का बेटा बन गया "मैं"। 

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 देश के वीर सपूतों को और उन्हें जन्म देने वाली वीरांगनाओं को मेरा सत-सत नमन                                                                                          

रविवार, 15 मई 2022

"विश्व वानिकी दिवस" के दिन जलता वन



पुरे विश्व में रिश्तें,समाज,पर्यावरण,किसी व्यक्ति विशेष और यहाँ तक की बीमारियों को भी याद रखने के लिए एक खास दिन तय किया गया है। मगर,क्या सिर्फ एक दिन तय कर देने से उन रिश्तों,उन परम्पराओं, हमारी संस्कृति और प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है ? ये दिन यकीनन एक खास उदेश्य से तय किये गए थे,इन के माध्यम से हम अपनी अगली पीढ़ी को उस विषय से परिचित करा सकें,उन्हें जागरूक कर सकें और उन्हें ये जिम्मेदारी भी दे सकें कि इसे आगे तुम्हे निर्वाह करना है। मगर क्या ऐसा हो पा रहा है ?

आज से तीस साल पहले  ऐसा ही एक दिन तय किया गया था "विश्व वानिकी दिवस" जो हर साल 21 मार्च को मनाया जाता है। यह दुनियाभर में लोगों को वनों की महत्ता तथा उनसे मिलने वाले अन्य लाभों की याद दिलाने के लिए पिछले 30 वर्षों से मनाया जा रहा है। विश्व वानिकी दिवस का उद्देश्य यही था कि विश्व के सभी देश अपनी वन−सम्पदा और वनों को संरक्षण प्रदान करें। मगर,सोचने वाली बात है -अगर इस विषय की गंभीरता को समझकर इस दिवस को हम दिल से मनाये होते और एक पौधा लगाकर भी अपना कर्तव्य निभाए होते तो क्या आज पर्यावरण की ये दुर्दशा हुई होती ? सबसे दुखद बात ये है कि "इसी महीने में सबसे ज्यादा वन जलते भी है।" जब हमें पहले से पता होता है कि-इन्ही दिनों जंगल जलते है तो वन विभाग पहले से सतर्क क्यों नहीं रहता या वो भी दिवस मनाने में व्यस्त रहते है ?

 

पहले ऐसा कोई दिन तय नहीं किया गया था मगर फिर भी,वनों के प्रति सब दिल से समर्पित थे। वनों की महत्ता कौन नहीं जानता कि पेड़ पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच का काम करते हैं और पृथ्वी के तापमान को नियंत्रित करते हैं। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई एवं सिमटते जंगलों की वजह से भूमि बंजर और रेगिस्तान में तब्दील होती जा रही है जिससे दुनियाभर में खाद्य संकट का खतरा मंडराने लगा है। वन न केवल पृथ्वी पर मिट्टी की पकड़ बनाए रखता है बल्कि बाढ़ को भी रोकता और मिट्टी को उपजाऊ भी बनाए रखता है। 

मगर,आज पृथ्वी पर लगभग 11 प्रतिशत वन ही संरक्षित है जो विश्व पर्यावरण की दृष्टि से बहुत ही कम है। स्वस्थ्य पर्यावरण हेतु पृथ्वी पर लगभग एक तिहाई वनों का होना अति आवश्यक है। लेकिन विकास की अन्धी होड़, जनसंख्या विस्फोट, औद्योगिकरण एवं गलत वन नीतियों के कारण वनों के क्षेत्रफल में लगातार कमी आ रही है जो एक विश्व स्तरीय समस्या बन चुकी है।नये पेड़-पौधे लगाना तो दूर, जो है हम उसे भी गवाते जा रहें हैं। 

मानव सभ्यता के प्रारम्भ से ही मनुष्य का जंगल से गहरा रिश्ता रहा है।जंगल ही वो स्रोत है जहाँ से हमें ऑक्सीजन की सबसे ज्यादा आपूर्ति होती है साथ ही जलाने के लिए ईंधन की पूर्ति, खेती में प्रयुक्त होने वाले औजार, खाद हेतु पत्तियाँ,  जानवरों के लिए चारा और घास, घर बनाने के लिए लकड़ी आदि और सबसे जरुरी औषधियों के लिए अनमोल जड़ी-बूटियों का  सबसे बड़े स्रोत वन ही रहे हैं।पहाड़ों में रहने वाले लोगों के लिए जीवनयापन का मुख्य आधार अभी भी खेती और पशुपालन रहा है। इन दोनों का आधार स्थानीय वनों से प्राप्त होने वाली उपज है।जंगल हमारे पशु-पक्षियों,जानवरों का घर है। यहाँ आज भी अनेक दुर्लभ जीवों की प्रजातिया पाई जाती है,जंगल के साथ उनका भी आस्तित्व जल रहा है। हर साल पुरे विश्व में जंगल की आग तबाही मचा रहा है।  

 हमारे भारत में भी हर साल गर्मियों के मौसम में झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू−कश्मीर के जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ती ही जा रही है। पिछले साल तो सर्दियों के मौसम में ही उत्तराखंड के जंगल जलने लगे थे इस बार भी मार्च आते ही तापमान में ऐसा परिवर्तन हुआ कि 8 मार्च से लेकर 14 मार्च तक जंगल में आगजनी की 20 घटनाएं दर्ज की जा चुकी थी जिनमे 24.5 हेक्टर जंगल का क्षेत्र प्रभावित हुआ था। यदि वन विभाग उसी वक़्त सचेत हो जाते तो ये तबाही नहीं होती।अब तक सिर्फ उत्तराखंड में  604 वनाग्नि की घटनाएं रिपोर्ट की जा चुकी हैं और  कुल 822 हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। इसका पर्यावरण पर कितना बुरा असर हो रहा है वो अकल्पनीय है। 

अब सवाल ये उठता है कि-ये आग कैसे लगती है और क्यों बेकाबू भी हो जाती है ?

जंगल में आग लगने के कई कारण होते हैं। गर्मियों के मौसम में गर्म हवा, ज्यादा तापमान के कारण सूखा पड़ना है।  सूखा पड़ने पर तो ट्रेन के पहिए से निकली एक चिंगारी भी आग लगा सकती है, इसके अलावा कभी−कभी आग प्राकृतिक रूप से भी लग जाती है, ज्यादा गर्मी की वजह से पत्तों या टहनियों में घर्षण के कारण या फिर बिजली कड़कने या गिर जाने से भी आग लगती है।आग लगने के मुख्य कारण बारिश का कम होना भी है। जंगलों में आग लगने का सबसे बड़ा कारण इंसानी लापरवाही है। 

इनमे से सबसे महत्वपूर्ण है-मजदूरों द्वारा शहद, साल के बीज जैसे कुछ उत्पादों को इकट्ठा करने के लिए जानबूझकर आग का लगाया जाना और फिर उसे सावधानी से  नहीं बुझाना। 

दूसरा कारण-कैम्पफायर, बिना बुझी सिगरेट फेंकना, जलता हुआ कचरा छोड़ना आदि भी है। 

तीसरा कारण-आस-पास के गाँव के स्थानीय लोगों द्वारा दुर्भावना से आग लगा देना या आग लगने पर तत्काल वन विभाग तक सुचना नहीं पहुँचाना। 

अब लपरवाह तो इंसान है ही अगर नहीं होता तो पर्यावरण की ऐसी हालत नहीं होती मगर स्थानीय लोगों में दुर्भावना क्यों ?

वन कानून जंगलों को दो भागों में बांटता है आरक्षित वन और संरक्षित वन। आरक्षित वनों में शिकार, चराई,पेड़ों की कटाई आदि सहित अनेक गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, जब तक कि कोई  विशिष्ट आदेश जारी नहीं किए जाते हैं और संरक्षित वनों में कभी-कभी जंगल के किनारे पर रहने वाले समुदायों के लिए ऐसी गतिविधियों की अनुमति दी जाती है, जो आंशिक रूप से या पूर्ण रूप से वन संसाधनों या उत्पादों से अपनी आजीविका चलाते हैं।तो जब कुछ समुदाय के लोगों को रोक-टोक के कारण अपनी आजीविका पालन में परेशानियाँ आती है तो गुस्से में वो अपनी ही सम्पदा को आग लगाने का दुष्कर्म कर देते हैं। जबकि वनों को बचाने और पुनर्जीवित करने में सबसे बड़ा योगदान स्थानीय ग्रामीणों का ही रहा  है लेकिन अक्सर वन विभाग उन्हें जंगलों से दूर रखना ही वनों की सेहत के लिये फायदेमंद मानता है। 

पौधों का रोपण और देखभाल एक सामुदायिक एवं आध्यात्मिक गतिविधि है।जो कि जंगल के आस-पास के समुदाय स्वेच्छा से करते थे। वनों को वो देवता समझते थे। लेकिन ये अधिकार उनसे छीन लिया गया और समूचे जगलात को एक महकमे के हवाले कर दिया गया कि ये जंगल का ख्याल रखेंगे। वनों की तुलना में ये महकमा एक तिनके बराबर है वनों के इतने मुद्दे है कि वो एक विभाग के बस की बात नहीं। वैसे तो उत्तराखंड में वन पंचायत ने इस सन्दर्भ में अच्छा काम किया है। मगर यदि अब भी जंगल पर समुदाय का हक़ होता और उन्हें जंगल बचाव कार्य में भागीदार बनाया गया होता तो शायद जंगल की आग की इतनी भयावह स्थिति नहीं होती क्योंकि जंगल उनका घर है और अपने घर को जलता कोई नहीं देख सकता। 

जंगलों की आग से न केवल प्रकृति झुलस रही  है, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारे व्यवहार पर भी सवाल खड़ा होता है कि-हम कितने लापरवाह और स्वार्थी हो चुके हैं ? जंगलों में विभिन्न पेड़−पौधे और जीव−जन्तु मिलकर समृद्ध जैवविविधता की रचना करते हैं। पहाड़ों की यह समृद्ध जैवविविधता ही मैदानों के मौसम पर अपना प्रभाव डालती है फिर भी हम नहीं चेत रहें है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि ऐसी घटनाओं के इतिहास को देखते हुए भी कोई ठोस योजना नहीं बनाई जाती है। सबसे दुःखद घटना है कि-एक व्यक्ति जिन्हे "वृक्ष-मानव" के नाम से जाना जाता था जिन्होंने अपना सारा जीवन इन जंगलों के नाम कर दिया था,जिनके शब्दों में- "तीन किलो की कुदाल मेरी कलम है,धरती मेरी किताब है,पेड़-पौधे मेरे शब्द है,मैंने इस धरती पर हरित इतिहास लिखा है" ऐसे स्वर्गीय विश्वेश्वर दत्त सकलानी जी के उगाए जंगल का हरित इतिहास भी तेज हवा के साथ उठ रहे दावानल में राख हो गया है।ये हमारे और सरकार दोनों के लिए बड़ी शर्म की बात है। 

पेड़ संस्कृति के वाहक है, प्रकृति की सुरक्षा से ही संस्कृति की सुरक्षा हो सकती है।पेड़−पौधे रहेंगे तो हमारा वजूद रहेगा। उनके नष्ट होते ही मानव सभ्यता का भी पतन हो जायेगा।इसलिए हर नागरिक का धर्म है कि वह वनों की रक्षा और वानिकी का विकास में अपना योग्यदान करें।वन संसाधनों के बेहतर प्रबंधन और संवर्धन से ही हम भावी पीढ़ी का जीवन सुरक्षित रख सकेंगे। हमें अगर जिन्दा रहना है तो प्रकृति से प्रेम करना ही होगा वरना सर्वनाश निश्चित है। सरकार को भी वनों की अवैध कटाई और इस आगजनी की समस्या को गंभीरता से लेना होगा और पिछली गलतियों से सबक लेकर आगे की योजना बनानी होगी। वन विभाग या वन पंचायत को जंगलो के आस-पास के ग्रामीण समुदाय को जागरूक करना होगा उन्हें प्रशिक्षित करना होगा, साथ ही साथ उन्हें ये यकीन भी दिलाना होगा कि -"ये अब भी तुम्हारा ही घर है इसे सहेजना तुम्हरा  कर्तव्य है इससे उतना ही लो जितने से तुम्हारी भी जीविका चले और इसका भी आस्तित्व बना रहें।"  हम अपनी सम्पदा में बढ़ोतरी यदि नहीं कर पा रहें है तो कम से कम जो धरोहर मिली है उसे ही सहेज ले। 


मई महीने के "प्रकृति दर्शन" में मेरा ये लेख प्रकाशित हुआ है। जिस वक़्त लेख लिखा था स्थिति बहुत भयावह थी  उम्मींद थी कि जल्द ही संभल जायेगी मगर, अब तक हालत में कुछ विशेष सुधार नहीं हुआ है ,गर्मी का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है। भगवान सबको सद्बुद्धि दे। 
आपसे एक विनम्र निवेदन है -"संदीप जी प्रकृति संरक्षण के प्रति जागरूकता लाने के लिए प्रयासरत है,एक जागरूक नागरिक के रूप में हमें भी उनका सहयोग करना चाहिए और कुछ नहीं तो लेखन के माध्यम से ही हम इस शुभ कार्य के भागीदार बन जाए "

बुधवार, 4 मई 2022

"मत करो पानी बर्बाद"

  


    मैं दिल्ली महानगर में रहती हूँ (वैसे फ़िलहाल तो मुंबई में हूँ ) यहाँ पानी की जो किल्लत है वो जगजाहिर है । मगर, आज मैं आप सभी से दिल्ली वालों की एक शर्मनाक आदत को साझा करना चाहती हूँ। उनकी सिर्फ़ इस आदत की वजह से मुझे ये कहते हुए बहुत शर्म आती है कि "मैं दिल्ली से हूँ " 

    दिल्ली वाले जितना ज्यादा पानी का रोना रोते हैं उससे कहीं ज्यादा वो पानी की बर्बादी करते हैं।कम से कम मैंने इतनी ज्यादा पानी की बर्बादी कहीं नहीं देखी।आज से 25 साल पहले जब मैं दिल्ली आई थी उस वक़्त लोगों को पानी के लिए परेशान  होते देखती तो बड़ी दया आती थी। हम तो थे बिहार से वहाँ कभी पानी और हवा की किल्ल्त नहीं हुई थी (फिर भी हम पानी, बिजली की बर्बादी नहीं करते थे) तो मेरे लिए ये बड़ी दर्दनाक परिस्थिति थी। मैं बहुत परेशान और दुखी हो जाती थी कि-क्या दिन आ गए है ? लेकिन जैसे-जैसे यहाँ के आबो-हवा को समझने लगी तो लगा इनके साथ जो हो रहा है उसके जिम्मेदार ये खुद है। सप्लाई वाटर (पीने का पानी) की जो ये बर्बादी करते थे (और अभी भी करते हैं ) उसे देख मेरा खून खौल उठता था। कई बार तो पड़ोसियों से कहा-सुनी भी हो जाती। यहाँ के लोग पीने के पानी से ही घर के दरो-दिवार और यहाँ तक कि सड़कों को भी धोते है। कपडे धोने में भी पीने के पानी का यूज ही करते हैं वो भी बहुत लापरवाही से। आप  यकीन नहीं करेंगे जब पानी का टैंकर आता है  तो यहाँ की स्थिति जंग जैसी हो जाती है। जिसका रसूख है वो तो टंकी ही भर लेता है और नहाने-धोने,कपडे धोने,बर्तन धोने तक में यूज़ करता है और जो बेचारा है उसे तो पीने तक को पानी नसीब नहीं होता। इस बात को लेकर कई बार पानी के टैंकर के पास हाथापाई तक होती ही रहती है। आपने अख़बारो में कई बार इस पर ख़बरें पढ़ी  भी होगी। यदि सभी तरीके से सिर्फ पीने के लिए पानी लेते तो एक टैंकर एक मुहल्ले के लिए काफी होता मगर यहाँ ये भावना तो होती ही नहीं है। 

    वर्तमान समय में परिस्थितियाँ बहुत हद तक सुधरी है मगर अभी  भी कई इलाकों में पानी की बहुत ही ज्यादा किल्ल्त है। जिसे पानी मिल रहा है वो दूसरे के दर्द से आँख चुराए हुए है। ऐसा नहीं है कि-उन्हें तकलीफ का अंदाज़ा नहीं बस "आज मेरी जरूरत की पूर्ति हो रही है न, बाकियो से क्या लेना-देना" ये भावना भरी हुई है।जब सप्लाई वाटर आता है तो आप जिधर भी नज़र घुमा ले हर घर के टंकी से पानी ओवर फ्लो होकर गिरता नज़र आएगा आपको। (वैसे केजरीवाल ने फ्री का पानी बिजली देकर लोगों की लापरवाही को और बढ़ावा दे दिया है, पानी बिजली की कीमत तो पहले भी  पता नहीं था अब और सोने-पे-सुहागा हो गया है। उस पर मजे की बात ये कि जो सबसे ज्यादा बर्बादी करते हैं महंगाई का रोना भी सबसे ज्यादा वही रोते हैं  ) ऐसी लापरवाही जैसे कि -पानी का मोटर चला कर सो गए हो। कितनी बार तो अपने पड़ोसियों को फोन कर के मैंने जगाया है और टोका है कि-कितना पानी बर्बाद करते हो आप ? तो जबाव मिलता है- "अरे, क्या हो गया थोड़ा सा पानी गिर गया तो, आप भी न मिसेज सिन्हा ओवर रिएक्ट करते हो"। और जिस दिन पानी नहीं आता है उस दिन सबसे ज्यादा हाय-तौबा मचाने वाले भी वही लोग होते हैं जो पानी की सबसे ज्यादा बर्बादी करते हैं। संग का रंग चढ़ता ही है तो मेरी भाभी भी वैसे ही पानी की बर्बादी करने लगी।रोको-टोको तो वहीं भाषा बोलती जो अक्सर सभी बोलते हैं कि- " एक मेरे ना करने से क्या होगा" एक दिन मेरा पांच साल का भतिजा उन्हें छत पर पानी बिखेरते हुए देख लगभग चीखते हुए उनसे बोला-" सारा पानी तुम लोग ही खत्म कर दो, हमारे बड़े होने तक पानी बचेगा ही नहीं,हम तो प्यासे ही मरेंगे " उसकी इस बात पर मेरी भाभी को अक्ल आईं और उस दिन से उन्होंने पानी बर्बाद नहीं करने की कसम खाई। अपने भतिजे की बातें सुन उस दिन मुझे महसूस हुआ कि- हम बच्चों को क्या सिखायेंगे शायद, अब बच्चें ही हमें सिखाये और जैसे मेरी भाभी को सद्बुद्धि मिली काश, सबको मिल जाए।

    यमुना नदी किचड़ सा बना पड़ा है। पानी के कारण इतनी दुर्दशा होने के वावजूद किसी की आँख नहीं खुल रही। मैं सरकार या प्रशासन से क्यों शिकायत करूं जबकि दोष हमारा है हम ही जागरूक नहीं हो रहें हैं। प्रशासन तो फिर भी जैसे-तैसे पानी की व्यवस्था कर ही रहा। गन्दे पानी को ही कैमिकल प्रोसेस से शुद्धिकरण कर हम तक पहुंचाया जा रहा है। नदी,ताल तलैया सब सूख रहें हैं फिर भी हम जाग नहीं रहें। मेरा अपना अनुभव है कि- जितना बड़ा शहर है वहाँ उतना ही प्रकृति सम्पदा की कमी है और वहाँ के लोग उतना ही ज्यादा लापरवाही से प्रकृति का दोहन कर रहें हैं। गर्मी तेजी से बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में जगह-जगह पानी की किल्ल्त भी होती जा रही है। समुन्द्र के खारे पानी को मीठा बनाने का प्रयोग जल रहा है। यदि हम प्रकृति के प्रति जागरूक नहीं हुए तो एक दिन समुन्द्र तक को पी जाएंगे। लोगों को जागरूक करने के लिए एक बहुत बड़े मुहिम की दरकार तो है ही मगर उससे पहले  हमें खुद को सुधारने की जरूरत ज्यादा है। मेरा मानना है कि-यदि हम जागरूक हो गए तो आधी समस्या का समाधान तो हो ही जाएगा। मैंने स्वयं अपने आस-पास के लोग को टोकते और समझाते हुए सुधारने का प्रयास किया है और बहुत हद तक मुझे सफलता भी मिली है।हमारे छोटे-छोटे प्रयास ही बदलाव लाने में सक्षम है। 

(मेरा ये लेख अप्रैल महीने के प्रकृति दर्शन पत्रिका में आया था )








गुरुवार, 21 अप्रैल 2022

"मेरी पुस्तक का क्लाइमेक्स"





कहते हैं- कलाकारों की दुनिया अक्सर काल्पनिक होती है।वो अपनी कल्पनाओं में ही खुबसूरती का लुभावना जाल बुन ले या बदसुरती का ताना-बाना और फिर उसी में खुद को खोकर सुन्दर सृजन करने की कोशिश करता है। अक्सर ये भी कहते हैं कि- कलाकार बड़े संवेदन शील होते हैं। प्यार- नफ़रत, मिलन-वियोग, दुःख-दर्द आदि संवेदनाओं को महसूस करने की क्षमता उनमें आम लोगों से कही ज्यादा होती है।अर्थात कभी वो कल्पनाओं में खोकर और कभी खुद की भावनाओं को ही वो अपनी लेखनी या कुंजी के द्वारा व्यक्त करते हैं।

"कल्पनाओं की दुनिया" तक तो ठीक है मगर जहाँ तक सच्ची संवेदनाओं की बात है, तो मेरा मन अक्सर ये सवाल करता है कि-

क्याकोई भी चित्रकार या रचनाकार अपनी कृति में अपने मन के सच्चे भावों को ही उकेरता है? क्या, सचमुच उसकी लेखनी या कुंजी समाज का आईना होता है? क्या सचमुच, वो समाज के दर्द और पीड़ा को महसूस कर के ही अपनी भावनाओं को व्यक्त करता है? क्या सचमुच, प्रेम की गहरी अनुभूति या बिछड़ने की टीस को महसूस करके ही अपनी कविता या कहानियों में प्रेम रस उड़ेल पाता है? क्या गरीबी, भुखमरी, मानवता, संवेदना उसके दिल पर गहरे असर कर जाती है और वो तड़प उठता है और उसका दर्द ही उसकी लेखनी या कुंजी के माध्यम से उजागर होता है?
शायद, नहीं। दुनिया में शायद दस प्रतिशत रचनाकार ही होंगे जिनके दिल की सच्ची भावनाएं ही उनकी चित्रकारी या लेखन में समाहित होगी।

हमारे ब्लॉग जगत की नन्ही रचनाकार मनीषा अग्रवाल ने अपनी एक कहानी "निशब्द" में लेखक के दोहरे चरित्र को बड़ी ही खूबसूरती से उजागर किया है।जो कि व्यवहारिकता के धरातल पर सत प्रतिशत सत्य है। अक्सर यही निष्कर्ष निकलता है कि-"ये कलाकार, चित्रकार या साहित्यकार सिर्फ और सिर्फ नाम यश के ही भुखे होते हैं। अपनी कृतियों में झुठी भावनाओं को व्यक्त करते-करते वो कब भावनाहीन हो जातें हैं उन्हें खुद भी पता नहीं चलता। 
मनीषा अग्रवाल की कहानी को पढ़कर मुझे एक सच्ची कहानी याद आ गई जो हमारे हिन्दी के शिक्षक ने सुनाई थी। ये एक सुप्रसिद्ध विदेशी लेखक की कहानी थी समय के साथ मैं उनका नाम और स्थान भुल चुकी हूँ परन्तु विषय-वस्तु अच्छे से याद है।

आज ये कहानी मैं आप सभी से साझा करना चाहती हूँ- बात काफी पुरानी है एक विदेशी लेखक थे जो मानव मनोविज्ञान पर काफी शोध कर उसी विषय पर एक उपन्यास लिख रहें थे।उनका घर छोटा था और शोर-शराबा भी ज्यादा होता था इसलिए वो शहर से दूर एक टुटी-फुटी झोपड़ी में चलें जाते,एक तरह से वो निर्जन स्थान घने जंगल के बीच था, जहाँ कोई भी उनके कार्य में बांधा उत्पन्न नहीं कर सकता था।
उनके उपन्यास की चर्चा मिडिया में जोर-शोर से थी।उनका उपन्यास लगभग पुरा होने को था उन्होंने मिडिया में उसके प्रकाशन की एक निश्चित तारीख भी दे रखी थी मगर किताब का क्लाइमेक्स उनके मन मुताबिक नहीं हो पा रहा था जिसको लेकर वो काफी परेशान थे। कागज़ पर कागज़ भरते और फाड़ते  जाते, प्रकाशन की तारीख नजदीक आती जा रही थी ‌।एक दिन वो अपने गंतव्य की ओर मन ही मन ये सोचते हुए जा रहें थे कि आज किताब की समाप्ति करके ही घर लौटूंगा। उस दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी सो घरवालों ने उन्हें जाने से मना भी किया मगर वो अपना रेनकोट पहने और निकल पड़े। अपनी झोपड़ी के करीब पहुंचने ही वाले थे कि उन्हें एक बच्चे के रोने की आवाज आई, उनके कदम ठिठक गए वो सोचने लगे कि इस घने जंगल में बच्चा कहाँ से आ गया। परन्तु, अगले ही पल उन्हें अपने किताब को पुरा करने का ख्याल आ गया और उन्होंने बच्चे के रोने की आवाज को अनसुना किया और झोपड़ी की ओर बढ़ चले। बारिश बहुत तेज होने के कारण झोपड़ी में पानी भर चुका था और सब कुछ गीला हो चुका था। अपने किताब के पन्नो को तो उन्होंने बहुत सम्भाल कर एक बक्से में रखा था सो वह सुरक्षित था।  उन्होंने बक्से से किताब को निकाला और उसी बक्से को पोंछ उस पर अपनें बैठने की जगह बनाई और क्लाइमेक्स लिखने के लिए खुद को एकाग्र करने लगे। तभी तेज़ बिजली कड़की जिसकी आवाज से वो कांप गए और अचानक उन्हें उस बच्चे का ख्याल आ गया।इस ख्याल ने उनकी एकाग्रता छिन ली और उनका मन बच्चे के लिए बेचैन होने लगा। उनके कदम स्वतः ही आवाज की दिशा में बढ़ने लगे।पास जाकर देखा तो एक नवजात शिशु बारिश में भीग रहा है किसी बेरहम ने उस भयानक बरसात में बच्चे को मरने के लिए छोड़ दिया था। लेखक ने झटपट अपने रेनकोट को उतारा और उसमें बच्चे को लपेट कर झोपड़ी की तरफ भागा। बच्चा बुरी तरह भीग चुकी था और अब ठंड के कारण उसकी आवाज भी अब गले में रूध रही थी। झोपड़ी में भी सब कुछ भीगा था और अब तो लेखक भी पुरी तरह भीग चुका था। बच्चे की हालत धीरे-धीरे गंभीर होती जा रही थी ‌। लेखक समझ ही नहीं पा रहा था कि बच्चे को कैसे गरमाहट देकर उसकी जान  बचाएं। क्योंकि लकड़ी से लेकर खरपतवार तक पानी में तर-बतर थे। आखिर वो पल आया जब लेखक को महसूस हुआ कि यदि तत्क्षण बच्चे को गरमाहट नहीं मिली तो वो मर जाएगा। लेखक ने बिना सोच-विचार किए उस झोपडी में एक मात्र सूखी वस्तु अपने किताब के पन्नो को जला-जला कर बच्चे को गरमाहट देना शुरू किया। आखिरी पन्ने के जलते ही बच्चे ने आँखें खोल दीं।तब तक बारिश भी रूक चुकीं थीं और सुरज ने भी अपनी आँखें खोल दी थी। लेखक ने बच्चे को अपने सीने से लगा लिया और घर की ओर चल पड़ा। अगले दिन उसके उपन्यास के प्रकाशन का दिन था। मिडिया वाले उनसे मिलने आए । ये बात भी पहले से चर्चा में था कि लेखक को अपने किताब का क्लाइमेक्स लिखने में ही देरी हो रही है।सो मिडिया वालों का पहला प्रश्न ही यही था कि"क्या आप को अपने किताब का क्लाइमेक्स मिल गया।" लेखक ने बच्चे को अपनी गोद में उठाकर सबको दिखाते हुए कहा- ये है मेरी पुस्तक का क्लाइमेक्स, इसने मुझे मानवता का और मानव मनोविज्ञान का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया है, मेरे जीवन की सर्वोत्तम कृति है ये। फिर उन्होंने अपनी सारी आपबीती सुनाई। ये कहानी मेरे दिल में गहरे छप गई थी मैंने उसी दिन तय किया था जब भी लिखना हुआ  तो सत्य ही लिखूँगी वो चाहे खुद की हो,समाज की हो या संस्कृति और प्रकृति की हो। 

  लेखन समाज से, परिवार से वास्तविकता से विमुख होकर कल्पना जगत में खोकर नहीं होता है वो तो व्यवसाय होता है। सच्चा लेखक वहीं है जो हृदय में उमड़ते सच्ची भावनाओं को कागज पर उकेरे और साथ ही साथ समाज में व्याप्त दुःख दर्द को महसूस कर उसे दूर करने के लिए, समाज में बदलाव लाने के लिए भी प्रयासरत रहें।
 कहते हैं कि कलाकार कल्पनाओं की दुनिया में हक़ीक़त ढुंढने का प्रयास करते हैं और लोगो के हृदय में एक सुखद अनुभूति देना चाहते हैं मगर, कल्पना कल्पना होती है और हक़ीक़त हक़ीक़त । कल्पनाओं में आप दुनिया को ये सपना तो दे सकते हैं कि ये दुनिया इतनी खूबसूरत होती तो क्या कहने? मगर हक़ीक़त में जीकर आप सिर्फ लिखेंगे ही नहीं...बल्कि उसे महसूस करके आप दुनिया में बदलाव भी ला सकते हैं।




गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

"कू कू करती कोयलिया तुम...."

आज सुबह-सुबह कोयल की कुकू से जब आँखें खुली तो एक बार को लगा मैं स्वप्न देख रही हूँ...

मुंबई की "अँधेरी नगरी" और कोयल की आवाज़.....? 

अरे नहीं, ये तो हकीकत था....मन मयूर बन झूम उठा... 

और फिर कुछ ख़्यालात उमड़ने लगे....सोचा शब्दों में पिरो लू.... 

अब छंदबद्ध ठीक-ठाक है की नहीं वो तो आप जाने....

उसका ज्ञान तो मुझे है नहीं बस, अपनी भावनाएं व्यक्त कर दी मैने 

त्रुटि हो तो क्षमा चाहती हूँ। 




कू कू करती कोयलिया तुम,

आज कहाँ से आई हो ?

मेरे गांव के उस जहाँ से, 

इस जहाँ में कैसे, आई हो ?


पत्थर के घर, पत्थर के जन,

पथरीली भावनाएं जहाँ है। 

कंक्रीट के इस शहर में

कहो ! कैसे, तुम आई हो ?


बड़े दिनों बाद, सुन तेरी  तान

नाच उठा  मन  मेरा है। 

ऐसा लगता है यादों के,

 नंदनवन संग लाईं हो। 


मुधुर-मधुर ये तान तुम्हारी

आज  हिय में हुक उठाती है। 

गांव, घर-आंगन,बाग-बगीचे,

सखियों की याद दिलाती है। 

 

तेरे सुर में सुर  मिलाकर, 

हम तुम संग ही तो गाते थे। 

तुझसे भी ज्यादा हम तो, 

खुद पर ही इतराते थे। 


अच्छा,चलो बता दो अब तो 

इस नगर कैसे आयी हो ?

राह भुली अपने उपवन का

या, हमें जगाने आईं हो। 


जागो ! ऐ पुत्र धरा के

अपनी आँखें खोलो तुम,

प्रकृति है अनमोल रत्न धन 

 क्या,ये समझाने आई हो ?


या, सन्देशा लाई हो तुम

अपने संगी-साथी का।

 वन-उपवन है घर हमारे,

मत काटो बेदर्दी से। 

ना आग लगाओ इन जंगलों में,

जो जीवन आधार हमारे। 


या, तड़पकर तुम भी,

ये  बद्दुआ  देने आई हो। 

जैसे घर जलाया मेरा,

जलोगे उस आग में तुम भी। 

हम ना रहेंगे तो, 

तुम भी ना रहोगे

क्या,ये धमकाने आई हो ?


सच,कोयल हम गुनहगार है,

इस जल-थल और गगन के। 

अब बारी है, कठिन सजा की

हाँ,तुम ये बतलाने आई हो। 




गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

मुमकिन है क्या ?

    



     कभी-कभी मुझे ये सोचकर बड़ा अचरज लगता है कि जो चीजे हमें अपनी जीवन को पकड़ने में मदद देती है,वही  चीज़े हमारी पकड़ से बाहर होती है। हम ना खुद उसके बारे में सोच सकते हैं ना किसी दूसरे को बता सकते हैं। क्या कोई अपने जन्म के घड़ी के बारे में कुछ याद कर सकता है या अपनी मौत के अनुभव को बता सकता है ? अपनी जन्म और मौत की घड़ी के अनुभव को साझा करना तो थोड़ा बेतुका है मगर, जब आपके आँखों के आगे किसी जीव का जन्म होता है वो चाहे इंसानी हो या पशु-पक्षी का उस पल की अनुभूति को भी क्या आप साझा कर सकते हैं ? 

    एक शख़्स जो आपके वज़ूद का अहम हिस्सा हो और वो आपकी ओर टकटकी बंधे हुए...आपकी ही हाथों में दुनिया को अलविदा कह चलता बने और आप कुछ ना कर सकें....आपनी बेबसी के उस पल को क्या आप शब्दों में वयां कर सकते हैं ? आपको पता है "मौत निश्चित" है चाहे वो अपनी हो या किसी और की मगर,  फिर भी किसी के मौत के बाद जीवन में आई खालीपन को आप शब्दों में किसी को पढ़ा सकते हैं ?

    जीवन और मौत तो थोड़ी दार्शनिक पीड़ा हो गई मगर, ख़ुशी के पलों में भी जो हमारी आंतरिक मनःस्थिति होती है उसे ही दुबारा हम फिर कभी उसी रूप में महसूस कर पाते हैं क्या ? क्या कोई अपने विवाह के अनुभव को हूबहू अपने भीतर दोहरा सकता है ? क्या हम उस अनुभव को साझा कर सकते हैं जब आप अपने भीतर के अकेलेपन को थोड़ा सरकाकर किसी दूसरे को वहाँ आने की इज़ाज़त देते है ? आपके भीतर के अकेलेपन को हौले से सरकाकर कब उस जगह पर कोई कब्ज़ा कर लेता है और आपको पता भी नहीं चलता। आपको पता ही नहीं चलता कि कब आपका वज़ूद आपके लिए ही बेमानी हो गया और उसके वज़ूद से जुडी छोटी-छोटी बातें भी आपके लिए अहमियत रखने लगी। ये सब जो आपको खुद पता नहीं फिर उस पल को दुबारा हूबहू महसूस करना या उसे शब्दों में पिरोना सम्भव है ? प्रथम मिलन की ख़ुशी और प्रीतम से बिछुड़न की पीड़ा को याद कर आपके भीतर एक ख़ुशी का उन्माद  या हुक जरूर उठ सकती है मगर हूबहू उस अनुभव को दुबार जीना या दूसरों को बताना संभव है क्या ?

      बच्चें  माँ-बाप के जीवन का अहम हिस्सा होते हैं, माँ-बाप उनकी ख़ुशी और जिम्मेदारियों को उठाने में जो सफर करते हैं उस 20-25 साल की पीड़ा और समझौते को क्या कोई बच्चा हूबहू जान पता है या जानना चाहता है ? माँ-बाप जो बच्चों के लिए अपना समस्त जीवन त्याग चुके होते हैं वही माँ-बाप जीवन संध्या में अपने जीवन यापन के लिए उन बच्चों के मोहताज़ होकर उनकी ओर लाचारी से देखते रहते हैं.....उनकी हृदय की इस पीड़ा को वो बच्चा कभी जान सकता है ? हाँ, वही बच्चा जब खुद माँ-बाप के उम्र तक आकर उस पीड़ा से गुजरता है तो थोड़ी देर लिए उसे अहसास भर होता है मगर उस दर्द को हूबहू जानना.....इतना ही नहीं जब मृत्यु उनके सामने खड़ी होती है तो.... उसी प्यारे बच्चें की एक झलक देखने की तड़प....बेटे की एक झलक देखने के लिए दरवाजे से टंगी उनकी आँखों को  पढ़कर उनकी मनोदशा को हूबहू कलमबद्ध करना मुमकिन है क्या ?

     चाहे कोई कितना भी बड़ा कलम का धनी क्यों ना हो जाए कुछ बातों और अनुभव को अल्फ़ाज़ों में वयां करना ना- मुमकिन है। लेखक उनकी भावनाओं को अपना नजरिया दे सकते हैं मगर, किसी की मनःस्थिति को लयबद्ध  नहीं कर सकते। किसी और की क्या....कोई अपनी ही भावनाओं को हूबहू कलमबद्ध करना तो दूर दुबारा हूबहू उस स्थिति को जी भी नहीं सकता....

( ये मेरा अपना नजरिया है )

मंगलवार, 29 मार्च 2022

"माँ या बेटी..."




 

"अरे 11 बज गए" माँ को फोन करना था इंतज़ार कर रही होगी" नीरा अपने आप में ही बड़बड़ाई। किसको कॉल करना है...कितनी बार याद दिलाऊँ माँ, नानी चली गई....इतनी दूर जहाँ से कोई कॉन्टेक्ट नहीं हो सकता....मनु ने नीरा को पीछे से पकड़ते हुए कहा। अरे हाँ,मैं तो भूल ही जा रही हूँ -कहते हुए नीरा ने मुँह फेर लिया शायद, मनु से अपनी आँसुओं को छुपाना चाहती थी। माँ के जाने के बाद नीरा जब तक मायके में थी तब तक तो रश्मो-रिवाज में बिजी थी मगर जब से घर वापस आई थी रोज का यही हाल था। अक्सर दिन के 11 बजे और शाम को 7-8 बजे माँ को फोन करना उसकी दिनचर्या में शामिल था और उस टाइम पर वो अनायास फोन उठा ही लेती। मगर जैसे ही याद आती कि "माँ अब नहीं रही" उसके अंदर कुछ टूटता सा महसूस होने लगता। 

पिछले चार-पाँच महीना का दिनचर्या भी उस पर इस कदर हावी था कि-दिन हो या रात जब भी उसकी आँख लगती "आई माँ "कहते हुए वो उठ बैठती। पति और बेटी ने उसे बहुत हद तक संभाल लिया था...उन दिनों से उसे बाहर निकलने की भी पूरी कोशिश कर रहे थे  मगर, नीरा कैसे भुला पाती उन चार-पाँच महीनों को....जिसका एक-एक पल माँ के इर्द-गिर्द उनकी  सेवा में ही गुजरा था। चार-पाँच महीना क्या वो तो बीते चालीस साल से माँ की सेवा कर रही थी और अचानक एक दिन उसे छुट्टी मिल गई उसे लग रहा था जैसे उसके जीवन में कुछ करने को बचा ही नहीं.... 

मम्मा, अब बाहर आ जाओं  इन सब से चलो, मैं आपका सर सहला देती हूँ सो जाओं थोड़ी देर- मनु ने नीरा को बड़े प्यार से समझाया तो नीरा की ऑंखें फिर भर आई बोली- चालीस साल बेटा, भूलने में वक़्त तो लगेगा न...बेटा मैं  लगभग दस साल की थी.....उन दिनों माँ बहुत बीमार हो गई.....डॉक्टरों ने उन्हें तीन महीने का बेड रेस्ट बता दिया और मैंने  पूरा घर संभाल लिया....ना कभी माँ पुरी तरह ठीक हुईं और ना ही मेरे जीवन से वो तीन महीने कभी ख़त्म हुए....

 नीरा फिर अतीत की गहराईयों में खो गई....शादी के बाद भी वो मायके की जिम्मेदारियों से कहाँ मुक्त हो पाई थी....क्योंकि ससुराल में तो उसे परिवार मिला ही नहीं....इसलिए माँ-पापा ने उसे हमेशा खुद से ही बाँधे रखा और खुद नीरा भी माँ-पापा भाई बहनों की जिम्मेदारियाँ संभालते-सँभालते उनसे ऐसी जुड गई थी कि उससे भी वो बंधन तोडा ना गया। भाई जब तक कुंवारे थे अपने थे...शादी होते ही वो गैर के हो गए। बड़ा भाई तो बिलकुल बीवी के पल्लू से बंध गया...हाँ,छोटा अपनी बीवी से लड़-झगड़कर जुड़े रहने की कोशिश करता रहा और आखिरी वक़्त में भी माँ छोटे वाले भाई के घर ही रही थी। तन-मन दोनों से थक गई थी वो जिम्मेदारियाँ उठाते-उठाते ऊपर से भाभियों के लालझन ने उसे और तोड़ दिया था और फिर.....माँ के जाते ही अचानक से उसे सारी जिम्मेदारियों से मुक्ति मिल गई, कभी उसको खुद का वज़ूद हल्का लगने लगता और कभी इस खालीपन से वो बेचैन होने लगती।ऐसा नहीं था कि उसके ऊपर अपने घर-परिवार की जिम्मेदारी नहीं थी लेकिन फिर भी उसे लगता जैसे सारा काम खत्म हो गया है....जबकि उसे भी पता था...काम ख़त्म नहीं हुआ है बस....जीवन का एक अध्याय समाप्त हुआ है... 

माँ की जीवन के आखिरी चार-पाँच महीने तो नीरा के लिए बेहद सुखद भी थे और कष्टदायक भी। सुखद इसलिए कि-आखिरी दिनों में उसे माँ की भरपूर सेवा करने का अवसर मिला और कष्टदायक इसलिए कि  माँ की पीड़ा उससे देखी नहीं जाती। जब माँ कुछ खाने की जिद्द करती और वो नहीं दे पाती,जब माँ अपनी शारीरिक पीड़ा से कराह उठती,बिस्तर से उठ कर घूमने की जिद्द करती, नहाने की जिद्द करती तो उसकी और अपनी बेवसी पर नीरा तड़प उठती थी। नीरा के लिए माँ एक-दो साल की छोटी बच्ची बन गई थी...छोटे बच्चें की तरह उसकी मालिस करना,स्पंजिंग करना,डाईपर बदलना,उसे सजाना-संवारना,अपने हाथो से खाना खिलाना, उसका दिल बहलाने के लिए घंटो उससे बातें करना, उसे भजन और गीता का पाठ सुनाना और उसके सारे नखरे उठाना बस...यही उसकी और उसके छोटे भाई की दिनचर्या बन गई थी। हाँ,उसका छोटा भाई भी अपनी बीवी की नाराजगी सहते हुए भी माँ के सेवा में एक बेटी की तरह से लगा था। 

  फिर कहाँ खो गई माँ....मैं जानती हूँ नानी माँ तुम्हारी माँ कम बेटी ज्यादा थी मगर....तुम्हारी एक बेटी मैं भी हूँ...अब मुझ पर ध्यान दो -मनु ने हँसते हुए कहा। नीरा ने मनु को गले लगा लिया वो उससे कहना चाहती थी..."अब तुम्ही तुम हो" मगर...होठ खामोश रहे उसके। उसकी चुप्पी देख मनु ही बोली- अच्छा ये राज तो बताओं नानी तुम्हारी माँ से बेटी कैसे बन गई....वो तो तुम्हारे साथ मुझसे भी ज्यादा नख़रे दिखाती थी....उतना तो मैंने भी तुम्हें तंग नहीं किया जितना उन्होंने किया। नीरा हँस पड़ी उसे माँ की आखिरी दिनों की बातें याद आ गई बोली- पता है बेटा, आखिरी दो महीने तो नानी बिलकुल छोटी बच्ची बन गई थी....हर वक़्त वो मेरा दुपट्टा पकडे रहती थी...अगर थोड़ी देर के लिए भी मैं उससे दूर हो जाती तो "माँ-माँ" चिल्लाने लगती और सबको परेशान कर देती....जब पास आऊँ तो मुझसे नाराज होकर बात नही करती...फिर मुझे उसको घंटों मनाना पड़ता और फिर ना छोड़कर जाने का वादा करना पड़ता...रात को जब सोती तब भी मुझे कसकर पकड़े रहती और पूछती...."सो जाऊँगी तो छोड़ कर जाओंगी तो नहीं" फिर....खुद ही हँसकर कहती -"माँ के साथ भी ऐसा ही किया करती थी" एक पल में मेरी बेटी बन जाती तो दूसरे पल में मेरी माँ....और कभी मुझे पहचानती ही नहीं, मुझसे पूछती- "तुम कौन हो" सबको पहचानती बस मुझे ही भूल जाती.....कभी-कभी तो मुझसे ही पूछती " नीरा कहाँ है मेरी नीरा को बुला दो"  जब मैं कहती- "मैं नीरा हूँ माँ तुम्हारी नीरा"  तो बड़े ही दार्शनिक अंदाज़ में कहती- "पता नहीं  मुझे क्या हुआ है,  तुम तो मेरी कस्तूरी बन गई हो...हर पल मेरे पास होती हो फिर भी मैं तुम्हें ही ढूँढती रहती हूँ"  

    मगर, ऐसा क्यों था माँ....तुम्हारा और उनका रिश्ता मुझे कभी समझ ही नहीं आया- ये कहते हुए मनु के चेहरे पर कुछ अलग ही भाव थे। नीरा ने गहरी साँस लेते हुए कहा- मैं भी कभी नहीं समझ पाई बेटा- सच, मेरा उनका रिश्ता कुछ अजीब ही था.....वो तो मुझे ही अपनी माँ मानती थी....पता नहीं क्यूँ उसको यकीन था कि- मैं उसकी  पिछले जन्म की माँ हूँ....अब पूर्वजन्म में विश्वास वजह था या मेरा उसका जरूरत से ज्यादा ख्याल रखना वो तो परमात्मा ही जाने...वो अक्सर बीमार रहा करती थी और दस साल की उम्र से ही मैं उसकी सेवा करती रही....सेवा करते-करते कब वो मेरी माँ से मेरी बेटी बनी....हम दोनों नहीं जा पाए...तुमने तो देखा नहीं था न....आखिरी पल में भी उसकी आँखे मुझ पर ही टिकी थी मैं उसके चेहरे को साफकर क्रीम लगा रही थी....तुम्हे तो पता ही है न, नानी को क्रीम से कितना लगाव था...मैं उनसे बोल भी रही थी....चिंता ना करों जाते-जाते भी क्रीम लगाकर ही भेजूँगी और...पता है उसकी आँखे अचानक बड़ी हो गई और घुट्टी-घुट्टी सी आवाज आई "माँ"  मैं बोल भी रही हूँ हाँ,बोलो न और....मैं वहाँ से हाथ धोने चली गई...मामा देख रहा था बोला-माँ चली गई दीदी....और मैं सुन सी खड़ी देखती रह गई...उसने मेरे हाथों में ही प्राण तज दिया था....आखिरी शब्द "माँ" कहते हुए और मैं समझ ही नहीं पाई बेटा कि- मेरी माँ जा रही है- कहते-कहते नीरा फफक पड़ी।  मत रो माँ....नानी कितनी तकलीफ में थी...हम सब उनकी तकलीफ देखकर भगवान से उन्हें ले जाने की ही तो प्रार्थना कर रहें थे...उनका जाना जरूरी हो गया था....मनु नीरा के आँसुओं को पोछते हुए उसके सर को अपनी गोद में रख सहला रही थी....और छोटे बच्चे की तरह समझा भी रही थी...नीरा को लगा जैसे अब वो छोटी बच्ची है और मनु उसकी माँ बन गई है...... 





[चित्र-गूगल से साभार]  



"वसुधैव कुटुम्बकम "

    भारतीय "हिन्दू संस्कृति" सबसे प्राचीनतम संस्कृति मानी जाती है और इस संस्कृति का मुलभुत सिद्धांत था "वसुधैव कुटुम्बकम &quo...