शुक्रवार, 20 दिसंबर 2019

" एक सोच "-  बदलाव  की ओर पहला कदम

   

    हर तरफ हाहाकार मचा हैं ,हर आत्मा चीत्कार कर रही हैं ,हर मन की भावनाएं आक्रोशित हो रही हैं। हर हृदय व्यथित हैं,दुखी हैं हालत से ,परिवार और बच्चों से ,समाज से ,कानून से ,व्यवस्था से,पर्यावरण से। दोषारोपण कर रहे हैं एक दूसरे के मानसिकता पर ,युवापीढ़ी पर ,सरकार पर । प्रश्नचिन्ह लगा रहे कि -क्या होगया हैं मानव को ,कहा जा रहा हैं हमारा समाज ,क्युँ मरती जा रही हैं संवेदनाएं ,आखिर और कितना गिरेगा मनुष्य ,कहा जा कर रुकेगी हमारी ये तत्कालीन सभ्यता ?ऐसे कितने सवाल रोज उठ रहे हैं ,एक स्वर में हम कह रहे हैं -"कितने बुरे दिन आ गए हैं ,ये तो घोर कलयुग  हैं। "

   कुछ के लिए तो ये सिर्फ शोर मचाना भर हैं ,उन्हें बस ये जताना हैं कि -देखो जी, मैं भी देश समाज और मानवता के लिए चिंतित हूँ जबकि बहुत हद तक इन परिस्थितियों के जिम्मेदार वे स्वयं होते हैं। इसी हालत में कुछ मनुष्यरूपी जानवर भी हैं जो मस्त हैं अपनी मस्ती में ,सूअरों की तरह कीचड़ में डूबे हुए,उन्हें सिर्फ अपनी स्वार्थपूर्ति नजर आती हैं ,उन्हें तो बस भूख मिटानी हैं अपनी क्षुधा की , अपनी जिस्म की ,वो गिद्धों की तरह बोटियाँ नोच नोचकर खा रहे हैं ,वो बोटी इंसानी जिस्म की हैं या जानवरों की कोई फर्क नहीं उन्हें। दूसरों के  तन और मन दोनों को प्रताड़ित करना ही इन  पिचासरुपी आत्माओं का काम होता हैं।
    परन्तु कुछ संवेदनशील आत्माएं हैं जो विचलित हो रही हैं इंसान और प्रकृति के इस बदलते स्वरूप को देखकर ,चिंतित हो रही हैं कि -कहाँ तक जाएगी ये बर्बरता ,कब तक बने रहेंगे हम गैरजिम्मेदार,क्या मनुष्य अंततः जानवर ही बन जाएगा ?बंदर से विकसित होकर मानव बने थे और अब धीरे धीरे दानव और भेड़ियां या उनसे भी गिरे हुए वेह्शी दरिंदे बनते जा रहे हैं। नहीं पता कहाँ अंत होगा इसका? हवाओं में साँस लेना मुश्किल हैं ,पानी पीने के लायक नहीं ,भोजन जहरीले हो चुके हैं ,मानव को नोच कर मानव खा रहा हैं ,दुःख -दुःख और सिर्फ दुःख ही नजर आ रहा हैं ,क्या ये धरती नरक बन जाएगी ?कोमल आत्माएं अधीर हो रही हैं, खुद को लाचार महसूस कर रही हैं ,विकल हैं कि -कैसे बदलेगे  ये हालत ,ये परिस्थितियाँ ,ये समाज ,ये  पर्यावरण ?
   बस एक बार इन परिस्थितियों से खुद को इतर रख चिंतन करें -घर -परिवार ,देश -समाज मानव मात्र से बनता हैं और मानव बनता हैं संवेदनाओं से ,संवेदनाएं ख़त्म तो मानव -दानव और जानवर सब एक समान , संवेदनाएं उपजती हैं हमारी अच्छी सोच और शुद्ध विचारों से ,और शुद्ध विचार  पनपते हैं हमारे अच्छे संस्कारों से। हमारे संस्कार ही हमारा कर्म निर्धारित करते हैं और हमारे कर्म ही हमारा भाग्य या हमारी परिस्थिति जन्य दशा निर्धारित करता हैं।
   परिस्थिति और परिवेश एक दिन में नहीं बनता और ना ही बिगड़ता हैं। ये एक धीमी प्रक्रिया हैं इसलिए ये बदलाव हमें दीखता नहीं ,जब तक हमें इस बदलाव का अहसास होता हैं तब तक परिस्थितियाँ हमारे नियंत्रण से बाहर चली गई होती हैं। परिस्थितियां  खुद नहीं आती ,परस्थितियों के पैर नहीं होते ,हम बुलाते हैं उन्हें आमंत्रण देकर ,जब वो आ जाते हैं और जब तक नियंत्रण में होते हैं तब तक हमें उनके अच्छे या बुरे प्रभाव का एहसास ही नहीं होता ,फिर जब वो नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं तो हम विचलित होने लगते हैं। अक्सर एक पीढ़ी के द्वारा आमंत्रित की हुई परिस्थितियों के प्रभाव को उनकी अगली पीढ़ी और फिर उनकी अगली पीढ़ी भुगतती हैं। 
   हर तरफ शोर हैं "घोर कलयुग आ गया हैं ",घोर कलयुग एक दिन में तो आया नहीं हैं। इसे आमंत्रित तो हमारे दादा -परदादों ने किया था ,हमारे माँ -बाप की पीढ़ी ने उसे  फूलने-फलने  में पानी देने का काम किया। उन बेचारों की नादानी ये थी कि -" इन परस्थितियों का आगे क्या प्रभाव पड़ेगा ये वो समझ ही नहीं पाए और उनसे गलतियाँ होती चली गई."  परन्तु हमारी पीढ़ी को ये " घोर कलयुग "का बुरा प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा था फिर भी हमने सावधानियां वरतने के वजाय खुद को लाचार बना उन परस्थितियों के आगे सर झुकाते ही नहीं चले गए वरन अपनी स्वार्थपरता में लिप्त हो उसे और बद-से-बतर बनाते चले गए.ये कह कर अपना पला झाड़ते चले गए कि -एक मेरे सुधरने से क्या होगा और आज जब परिस्थितियाँ  सुरसा की तरह मुँह फाड़े हमें निगलने के लिए आ खड़ी हुई हैं तो सबसे ज्यादा हाय -तौबा भी हम ही मचा रहे हैं। 
   सबसे ज्यादा हाय -तौबा वही मचाता हैं जो जानता हैं कि "ज्यादा गलती हमने की हैं "परन्तु ना इस बात को वो खुद कबूल करना चाहता हैं ना ही दुनिया के सामने आने देना चाहता हैं ,इतना ही नहीं सबके सामने खुद को सुर्खरू भी रखना चाहता हैं। अभी के परस्थिति में भी ज्यादा संख्या ऐसे ही लोगो की हैं। जो बेचारे नादान हैं वो तो मंथन करने में लगे हैं कि " कहाँ चूक हो गई मुझसे ,कैसे सुधार लाऊँ " परन्तु इनकी संख्या बहुत कम हैं। एक तीसरा तबका भी हैं जिनका  काम ही होता हैं हैवानियत फैलाना ,ऐसे हैवान हर युग में होते थे ,होते हैं और होते रहेगें। 
   परिस्थितियाँ जैसे बिगड़ती हैं वैसे धीरे धीरे उनमे सुधार भी लाया जा सकता हैं अगर ये " हाय -तौबा मचाने वाला तबका " अपनी गलतियों को स्वयं ही काबुल कर ले (दुनिया के सामने कबूलने की जरूरत नहीं हैं )और "नादान लोगों "का हाथ थाम उनके साथ सुधार के रास्ते पर चल पड़ें तो इन हैवानो से मुक्ति मिल सकती हैं और फिर समय का अच्छा दौड भी लाया जा सकता हैं। फिर शायद जिन  बुरे दिनों से हम गुजर रहे हैं वो हालत अगली पीढ़ी को ना देखना पड़ें। 
   परिस्थितियों का रोना रोना छोड़ ,एक बार हम खुद से एक सवाल करें कि -क्या घर- परिवार ,बाल -बच्चे ,माँ -बाप ,भाई- बहन ,दोस्त -रिश्तेदार ,आस -पड़ोस से हमारे अच्छे संबंध हैं ?क्या उनके प्रति ,समाज और पर्यावरण के प्रति हमने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया हैं? क्या हम खुद को कुछ लोगों के नजरों में भी स्नेह और सम्मान के काबिल बना सकें हैं? यदि हमारा मन एक पल में बिना झिझके " हाँ "में उत्तर देता हैं तो हमें घोर कलयुग की चिंता ही नहीं करनी। हम  बेफिक्र रहे हमारे आस -पास आज भी सतयुगी वातावरण हैं। ऐसे सकारात्मक ऊर्जा वाले वातावरण में हम बिलकुल सुरक्षित हैं। परन्तु.......यदि हमें उत्तर सोचने के लिए तर्क -वितर्क करना पड़े या दूसरों को जिम्मेदार ठहराना पड़े तो हमें "घोर कलयुग ,घोर कलयुग "कहकर चिल्लाने का भी कोई हक नहीं हैं। 
  क्योकि इस तत्कालीन परिवेश को बनाने में हमारा भी पूरा योग्यदान हैं। हर युग ,हर परिस्थिति की शुरुआत घर से ही होती हैं। हमसे तो एक घर ,चंद रिश्तेदार ,माँ -बाप और बच्चे नहीं संभलते ,अपने साथी तक को तो हम पूर्ण सहयोग दे नहीं पाते और हम ही हैं जो समाज, कानून और सरकार पर अपनी बड़ी बड़ी राय देते रहते हैं। यकीनन हम सब अपने अपने विचारों का शुद्धिकरण कर, ईमानदारी से अपना अपना घर संभाल ले तो बाकि परिस्थितियां अपने आप संभल जाएगी। दुनिया में अगर प्यार ,शांति और भाईचारा चाहिए तो वो शुरुआत घर से ही होगी। 
    " सतर्कता गई दुर्घटना हुई " ये बात भी यूँ ही नहीं कही गई हैं। शुद्ध और सकारात्मक सोच के साथ साथ सतर्कता ही इस परिस्थिति से निकलने में हमारी सहायता कर सकती हैं। किसी भी घटनाक्रम पर तर्क वितर्क करने से बेहतर सोच यही हैं कि हम सदा ही ये कोशिश करें कि  अपने घर -परिवार में ,आस पड़ोस में सतर्कता वरते और एक ऐसी सकारात्मक ऊर्जा का संचार कर सकें जो आगे हमें ये दिन ना दिखाए। जो गुजर गया उसे बदला नहीं जा सकता पर आगे ना हो इसकी कोशिश तो की जा सकती हैं। 

ये सत्य हैं कि -" हम सुधरेंगे युग सुधरेगा ,हम बदलेगें युग बदलेगा "और सत्य हर तर्क -कुतर्क से परे हैं।


सोमवार, 2 दिसंबर 2019

ब्लॉग का एक साल -" एक यादगार सफर "





  वो कहते हैं न कि -" शामें कटती नहीं और साल गुजर जाते हैं ",देखें न ,कैसे एक साल गुजर गया पता ही नहीं चला,हाँ आज मेरे ब्लॉग के सफर का एक साल पूरा हो गया। कभी सोचा भी नहीं था कि मैं अपना ब्लॉग बनाऊँगी ,ब्लॉग की छोड़ें कभी कुछ लिखूँगी ये भी नहीं जानती थी ,हाँ कुछ लिखने के लिए हर पल दिल मचलता जरूर था। तो ,जहाँ चाह होती हैं वहाँ राह खुद -ब -खुद मिल जाती हैं। हाँ ,कभी -कभी देर हो जाती हैं पर मिलती जरूर हैं और मुझे भी मिली। आज ही के दिन  सखी रेणु ने मेरे ब्लॉग को आप सभी से साझा किया था और  पहली टिप्पणी भी की थी और देखते ही देखते 4 -5 दिनों में ही आप सभी ने सहर्ष मुझे अपना लिया था। मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था ,सब सपना सा लगता था।
सखी रेणु ,जो इस आभासी दुनिया में मेरी पहली प्रशंसक ,मार्गदर्शक और प्यारी सहेली बन कर आई। उन्होंने मेरे ब्लॉग का लिंक साझा कर मेरा परिचय ब्लॉग जगत के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों से कराया। मैं सखी रेणु की आजीवन आभारी रहूँगी  ,उन्होंने मुझे अपने स्नेह के काबिल समझा और साथ ही आप सभी दिग्गज साहित्य प्रेमियों से मुझे रूबरू भी कराया। अगर सखी रेणु ने मेरा साथ ना दिया होता तो मेरा ब्लॉग यूँ ही कही अंधकार में गुम होता। 
 ब्लॉग पर अपना पहला लेख तो मैंने 8 /10 /2018 को ही प्रकाशित किया था पर मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि इसे साझा कैसे करूँ। मुझे तो ब्लॉग का B भी नहीं पता था। ब्लॉग का नाम मैंने पहली बार अपनी एक दोस्त (जो मुझसे 12 -13 साल छोटी हैं और इंटरनेट की दुनिया में पूरी तरह रची बसी हैं )के मुख से सुना था। आज से डेढ़ साल पहले जब मैं अपनी बेटी के साथ दिल्ली से मुंबई शिफ्ट हो रही थी तो मैं थोड़ी चिंतित थी कि मुंबई में मैं अपना वक़्त कैसे गुजारूंगी ,बेटी तो अपने काम पर चली जाएगी तो मैं क्या करुँगी ? अनजाना जगह ,ना कोई दोस्त ,ना रिश्तेदार ,पुरे दिन का खालीपन ये सोच मैं थोड़ी परेशान थी। दिल्ली में फुर्सत ही नहीं मिलती हैं ,दिन के  4 -5 घंटे तो होमियोपैथिक प्रक्टिस में ही गुजर जाता हैं फिर घर -परिवार ,दोस्त -रिश्तेदार इन सब में दिन कैसे गुजर जाता हैं पता ही नहीं चलता लेकिन वहाँ क्या करुँगी ये सोच में चिंतित हो रही थी।  जब मेरी दोस्त मुझसे मिलने आई तो बातों बातों में मैंने अपनी परेशानी उससे कही तो उसने कहा -दीदी आप ब्लॉग लिखना शुरू कर दे ,आप किसी भी विषय पर अच्छा बोल लेती हैं ,आपके खालीपन को दूर करने का ये अच्छा तरीका होगा। मैंने कहा -मुझे तो इंटरनेट का अच्छा ज्ञान भी नहीं हैं ,कैसे बनाऊंगी मैं ब्लॉग। उसने कहा -कुछ मुश्किल नहीं बस गूगल पर जाकर blogger .com टाइप करो और फिर फेसबुक की तरह उसपर अपना अकाउंट बना लो। उस वक़्त उससे ज्यादा कुछ जानने का समय  नहीं था। लेकिन ब्लॉग बनाना इतना भी आसान नहीं था वो भी उसके लिए जिसने अपना फेसबुक अकाऊंट भी खुद से नहीं बनाया हो। 
मुंबई आने पर महीना दिन तो व्यवस्थित होने में और घूमने में गुजर गया। उसके बाद जब बेटी काम पर जाने लगी तो बस ,मेरा अकेलापन मुझे काटने लगा। फिर अपनी दोस्त की कही बात याद कर मैंने गूगल सर्च करना शुरू किया,youtube पर सर्च कर ब्लॉग की एक एक बात समझने की कोशिश करने लगी। दो महीने के अथक प्रयास के बाद आख़िरकार मैं अपना ब्लॉग बनाने में कामयाब हुई। लेकिन ब्लॉग पर पाठक कहा से लाऊँ ,इसी खोजबीन में  मुझे शब्दनगरी मंच के बारे मै ज्ञात हुआ। मैंने उसपर अपना अकाउंट बनाया ,इस मंच से अपना लेख प्रकाशित करना मुझे थोड़ा आसान लगा। मैंने डरते डरते इस पर अपना एक  लेख  "प्यार एक रूप अनेक "प्रकाशित कर दिया। अगले दिन शब्दनगरी के द्वारा भेजे गए मेल को देख मेरी ख़ुशी और आश्चर्य का ठिकाना ना रहा ,उन्होंने मेरे लेख को "आज का सर्वश्रेष्ठ लेख "से सम्मानित कर मुख्यपृष्ठ  पर डाला था ,एक दो टिप्पणियाँ भी आ गई। मेरे लिए इतनी काफी था ,मैं कोई बड़ी साहित्यकार तो हूँ नहीं और नाही मुझमे बहुत ज्यादा प्रसिद्धि के चाह थी।  मैंने सोचा  इसी बहाने अच्छी अच्छी रचनाएँ पढ़ने को भी मिल जाएगी और कुछ लिखने का भी प्रयास करती रहूँगी ,मुझे अच्छा लगने लगा। मेरा सौभाग्य मेरी लगभग सभी लेखो को शब्दनगरी नै सर्वश्रेष्ठ लेख से सम्मानित किया ,इसके लिए मैं हमेशा शब्दनगरी की आभारी रहूंगी। 
फिर एक दिन  शब्दनगरी पर लिखे मेरे एक लेख पर सखी रेणु की प्रतिक्रिया आई। उनके स्नेहिल पहली प्रतिक्रिया से ही मुझे अपनत्व का एहसास होने लगा। हम बहुत जल्द एक दूसरे से घुल -मिल गए। वैसे आभासी दुनिया में मैं जल्दी से किसी से मित्रता करने में थोड़ी झिझकती हूँ। लेकिन  रेणु से मिलकर मुझे अच्छा लगने लगा। रेणु  ने मुझे अपने ब्लॉग पर आने का निमंत्रण दिया और साथ ही ये भी कहा कि -कामिनी तुम अपना ब्लॉग बनाओं ।मैंने रेणु को अपने ब्लॉग का लिंक भेजा और उनसे ये भी कहा कि वो मेरा मार्गदर्शन करें। अगले ही दिन रेणु ने मेरे ब्लॉग का लिंक आप सब से साझाकर मेरे जीवन में नई ख़ुशी ,नई ऊर्जा और नया उत्साह भर दिया। रेणु ने मुझे आप सब साहित्य प्रेमियों से मिलवाया ,साथ ही साथ मेरी टंकण अशुद्धियों के लिए भी मुझे सचेत करती रही ,मैं हमेशा रेणु की आभारी रहूँगी। 
एक सखी का हाथ थामकर चली थी पता ही नहीं था आगे सफर में मुझे इतने सारे संगी -साथियों का सानिध्य और स्नेह मिल जाएगा। आदरणीया  बिभा दी ,यशोदा दी ,साधना दी जैसे सम्मानित रचनाकारों का आशीर्वाद मिला ,आदरणीया  कुसुम जी ,मीना भरद्वाज जी ,मीना शर्मा जी ,सुजाता जी ,शुभा जी ,सुधा देवरानी जी ,अनुराधा जी ,अभिलाषा जी ,ज्योति जी,कविता जी ,नीतू जी जैसी स्नेहिल सखियों का स्नेह ,सहयोग और प्रोत्साहन मिला ,मेरे ब्लॉग पर इनकी निरंतर उपस्थिति ने हर पल मेरा मनोबल बढ़ाया और मैं कुछ अच्छा लिखने का प्रयास करती रही हूँ। इतना ही नहीं श्वेता जी ,अनीता सैनी जी और अनु जी जैसी प्यारी बहनो का साथ मिला जिन्होंने मेरी रचनाओं को " पाँच लिंको का आनन्द "और चर्चामंच जैसे प्रतिष्ठित मंचो पर साझा कर मुझे अपने स्नेह डोर से बांध लिया। 
आदरणीय दिग्विजय अग्रवाल जी ,रूपचन्द्र  शास्त्री जी ,रविंद्र सिंह यादव जी ,सुशील कुमार जोशी जी , विश्वमोहन जी ,ज्योति खेर जी ,पुरुषोत्तम जी ,दिगंबर जी जैसे ब्लॉग जगत के प्रतिष्ठित वरिष्ठ रचनाकार जिनकी रचनाओं को पढ़ने तक का सौभाग्य भी मुझे शायद कभी नहीं मिलता, उनके रचनाओं को पढ़ने का आनन्द भी मिला और उनका स्नेह ,आशीर्वाद और प्रोत्साहन पाकर मैं धन्य हुई। आदरणीय शशि जी ,लोकेश जी ,पंकज प्रियम जी रोहतास जी ,संजय भास्कर जी जैसे प्रतिष्ठित साहित्यकरों ने मेरी  रचना पर अपनी अनमोल प्रतिक्रिया देकर मेरा उत्साहवर्धन करते रहे। मैं कहाँ इस काबिल थी कि आप सभी का सानिध्य पा सकती थी ,आप सभी से जुड़कर मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानती हूँ। इस एक साल में जीवन ने मुझे बहुत बड़ा सदमा भी दिया परन्तु आप सब के बीच रहकर मैं उससे भी जल्दी उभर पाई। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास हैं कि आप सभी का  स्नेह और सहयोग मुझे हमेशा मिलता रहेगा। अगर इस एक साल के सफर में मुझसे कभी भी कोई भूल हुई हो तो मैं आपसभी से क्षमाप्रार्थी हूँ।  आप सभी का तहे दिल से आभार और सादर नमस्कार 
मेरा पहला लेख जिसमे अनगिनत गलतियाँ थी
हर पल सिखाती जिंदगी

शनिवार, 2 नवंबर 2019

अतीत के झरोखें से



    शाम के चार बज गए हैं ,पापा और भईया दोनों शोर मचा रहे हैं  -"जल्दी करों सब ,जल्दी निकलो  वरना घाट पर जगह नहीं मिलेंगी "और बच्चे हैं कि उनका सजना सवरना ही ख़त्म नहीं हो रहा ,किसी को कान के बुँदे पहनने  हैं ,तो किसी का बाल सवारना बाकी हैं,किसी ने तो अब तक कपड़ें ही नहीं पहनें हैं। मैं जल्दी जल्दी जैसे तैसे साड़ी बाँधी ,बालों को लपेट जुड़ा बना ही रही थी कि भईया चिल्लाएं -"रानी में दउडा [ जिसमें छठपूजा का सामान जाता हैं ] लेकर निकल रहा हूँ जल्दी आओ" मैं अभी आई ,अरे बेटा आप सब  भी जल्दी आ जाओं मैं छठीमाता को लेकर निकल रही हूँ -बोलते हुए मैं एक हाथ में पूजा की  डलियाँ और दूसरे हाथ से माँ का हाथ पकड़कर तेजी से  निकल पड़ीं। [ दउडा को भी छठीमाता स्वरूप ही मानते हैं तो दउडा और व्रती दोनों साथ ही  घर से निकलेगें यही परम्परा हैं ]
    
   मेरी नजर जैसे ही घड़ी पर गई ये सारे दृश्य चलचित्र की भाँति मेरी आँखों के आगे से गुजरने लगे,चार बजते ही घाट पर जाने के लिए  बिलकुल यही शोर होता था। चार दिन तक घर का माहौल कितना खुशनुमा होता था ,सब अपने अपने जिम्मेदारियों को निभाने में रत रहते साथ साथ एक दूसरे से हँसी ठिठोली भी करते रहते,शाम घाट के दिन भी सुबह ढाई तीन बजे तक उठकर पकवान बनाने में लग जाना ,बनाते तो दो तीन ही लोग थे पर सारा परिवार जग जाता था ,सुबह से ही छठीमाता के गाने होने लगते ,शाम के घाट जाने के लिए सब अपने अपने तैयारियों में जुट जाते ,शाम घाट से वापस आकर कोशी भरने का काम होता ,सारा परिवार हवन करता ,फिर फिर मैं माँ के पैरो में तेल मालिस करती ,फिर खाना खा कर जल्दी जल्दी सोने की तैयारी क्योंकि सुबह ढाई बजे तक उठकर घाट जो जाना है देर हुई तो जगह नहीं मिलेंगी न,घाट पर झिलमिलाती लाड़यों से सजी पंडाल में ,सर्दी में ठिठुरे हुए बैठकर सूर्यदेव के उदय होने का इंतज़ार करना। जैसे ही सूर्य देव उदित हुए अर्घ्य देना शुरू करना ,अर्घ्य देने के बाद माँ सबको टीका लगाती,औरतो के मांग में सिंदूर लगती और सबको अपने हाथो से प्रसाद देती ,हम माँ का पैर छूकर उनसे आशीर्वाद लेते ,फिर घर आकर माँ के पैर पखारने के लिए परिवार के सभी छोटे-बड़े सदस्य  लाइन में लग जाते। सबके करने के बाद मैं माँ का पैर गर्म पानी से धोती और तेल मालिस करती फिर तुलसी, अदरक के साथ नींबु का शर्बत बनाकर देती,उनके लिए सूजी का पतला सा हलवा बनाकर उन्हें पारण कराती ,एक एक दृश्य याद आने लगी और मेरी आँखे स्वतः ही बरसने लगी ,अंतर्मन में दर्द भरने लगा, यूँ लगा जैसे आँसुओं  का सैलाब उमड़ पड़ेंगा,मैंने खुद को संभाला और झट से डायरी और कलम ले आई ,तत्काल यही तो मेरे सच्चे साथी बनें हैं और बैठ गई यादों के झरोखें के आगे और देखने लगी अतीत के वो खुशियों  भरे पल जो हम सपरिवार साथ में बिताए हैं। सच, जितना दर्द देती हैं न उतना ही सुकून भी देती हैं ये यादें और आज इस दर्द भरे अकेलेपन में मुझे सुकून की बड़ी दरकार हैं।
   वैसे छठीमाता के सेवा में भी एक परम् सुख की अनुभूति होती हैं। व्रत कोई भी करें चाहे माँ या बहन सेवा की जिम्मेदारी मेरी ही होती हैं [पहले माँ के घर ही बहन और माँ दोनों करती थी माँ ने जब उद्यापन कर दिया तो सारा परिवार बहन के घर एकत्रित होते हैं ] खरना [व्रत का दूसरा दिन]के दिन शाम के चार बजे से ही मेरी डियूटी छठपूजा वाले कमरे में हो जाती। प्रसाद बनाने की ,व्रती का हर काम करने की जिम्मेदारी मेरी होती ,हां,सुबह  पकवान [ठेकुआ ] बनाने में बहन और भाभी मदद करती थी।जब तक सूपली और दउडा  सज नहीं जाता  ,पूजा की सारी सामग्री  एकत्रित नहीं हो जाती  मैं भी सिर्फ जल पीकर ही रहती हूँ। जब तक व्रती को पारण नहीं करा देती घर से लेकर घाट तक पूजा की सारी जिम्मेदारी मेरी ही तो होती हैं और आज कैसा दिन हैं ,घाट जाने का वक़्त हो चूका हैं और मैं सारे परिवार से बहुत दूर अकेली बैठी आँसू बहा रही हूँ। नियति के आगे किस की चली हैं, यहाँ तो सबको  झुकना ही पड़ता हैं। मैं अपने आप से ये वादा करती हूँ -अगले साल फिर से धूम धाम से छठीमाता का स्वागत करेंगे ,मेरे बच्चें  जो आज गमगीन बैठे हैं कल उन्हें मैं फिर से वही मुस्कुराहट और खुशियाँ दूंगी। 
    जिंदगी रूकती तो हैं नहीं ,जाने वाले की कमी कभी कोई और पूरा नहीं कर सकता। हाँ ,मेरी बहनोई नहीं होंगे ,हल्ला मचाने वाले मेरे पापा भी नहीं होंगे पर उन्हें याद कर हम आँसू नहीं बहाएंगे। बच्चों के उज्वल भविष्य के कामना से हम फिर से छठपूजा करेंगे ,फिर घाट पर जाते वक़्त वही सजना सवरना होगा।सच, छठपूजा में बच्चों का उत्साह उनकी तैयारियां देखते ही बनती हैं ,घाट पर कौन सबसे ज्यादा सुंदर लगेगा ,जैसे व्याह -शादी में होता हैं। मैं बच्चों को कभी उनकी खुशियाँ  मनाने से नहीं रोकती ,मैं भी वैसी ही थी। अक्सर उन्हें सजते सवरते देख मैं भी अपने दिन याद करने लगती। हमने तो अपने बच्चों को घर की हर जिम्मेदारी से दूर कर दिया हैं पर हमारे वक़्त में ऐसा नहीं होता था। बचपन से लेकर युवा अवस्था तक उम्र के हिसाब से हमें  हमारी जिम्मेदारियाँ सौप दी जाती थी। पूजा के दिनों में भी यही नियम थे। 
    बचपन में तो छठ घाट जाने के समय तक पापा से मेरी फरमाइसे ही ख़त्म नहीं होती ,सर से पैर तक सजना होता था मुझे,सब कुछ नया होता था। उतना शृंगार तो मैंने शादी के बाद भी कभी नहीं किया। अब सोच कर खुद पर बड़ी हँसी आती हैं।युवावस्था होने पर तो घर के कामों  की मेरी जिम्मेदारियाँ और बढ़ गई थी फिर भी सारा काम ख़त्म कर मैं,मेरी सारी बहनें और मेरी बुआ तैयार होने के लिए दादी से दो घण्टे का समय मांग ही लेते थे । हम पहले ही कह देते जितना काम करवाना हो अभी करवा लो तैयार होने के बाद और घाट पर हम कुछ नहीं करने वाले। घाट पर की सारी जिम्मेदारी  माँ -पापा भैया और चाचा लोगो की होती। हम तो बस घाट का नजारा देखते ,अरे देखे भी कैसे नहीं ,वही से तो हमें लेटेस्ट कपडे और मेकअप  का पता चलता था। 
   हमारे समय में इंटरनेट तो था नहीं ,हमें तो ये सब जानने के लिए पुरे साल इंतज़ार करना  पड़ता था । सुबह के घाट पर तो कुछ ज्यादा ही उत्सुक रहते थे ,ये देखने के लिए कि स्वेटर की नई डिजाइन कौन कौन सी आई हैं।उस समय तो इस माह तक सर्दी पड़नी शुरू हो जाती थी और सबके लिए एक नया स्वेटर तो बनाना ही चाहिए था।मैं तो नए स्वेटर के बिना घाट पर जा ही नहीं सकती थी और वो भी बिलकुल नए डिजाइन में,रात रात भर जागकर हम स्वेटर बनाते थे। जो भी लोग मुझे जानते थे वो मेरे स्वेटर को देखने के इंतजार में रहते थे। स्वेटर बुनाई को लेकर अजीब पागलपन था मुझ में ,जूनून कह सकते हैं। घाट पर तो मेरी नजर सबके स्वेटर पर ही होती ,किसी के स्वेटर को बस एक झलक देख लूँ सारे पैटर्न मेरे आँखों में फोटो की तरह खींच जाते थे और घाट से लौटते हो ऊन और सलाई ले कर बैठ जाती और सारे पैटर्न को बना कर जब तक रख नहीं लेती मुझे चैन नहीं मिलता था।
   अब तो वैसी कोई उत्सुकता लड़कियों में दिखती ही नहीं ,[ ना किसी पूजा के प्रति ,ना किसी काम के प्रति ,ना बड़ों के सेवा और सम्मान के प्रति ]अब तो वो खुद की ही सूरत पर इतराती सेल्फी लेने में बिजी रहती है उन्हें किसी और चीज़ से मतलब ही नहीं होता। क्योकि इन्हे तो हर चीज़ आसानी से मिल जाता हैं। हमें तो बहुत परिश्रम के बाद कुछ मिलता था। क्या दिन थे वो -" छठपूजा आस्था ,विश्वास ,श्रद्धा और प्रेम से भरा एक उत्सव था "अब भी हमारा परिवार तो  एक जुट हो सुख दुःख साथ बाँटते हैं,वही उत्सव मानते हैं।  हमारा परिवार यूँ ही एकजुट रहे ,मुझे पूर्ण आस्था और विश्वास भी हैं कि -" छठीमाता की कृपा से हम सपरिवार अगले साल फिर से धूम धाम के साथ उनका स्वागत करेगें। "
  "  हे छठीमाता ,सबको सद्ज्ञान और सद्बुद्धि दे ताकि ये पृथ्वी फिर से साँस लेने योग्य हो सकें ,आपका स्वागत हम फिर से सच्ची आस्था ,विश्वास और प्रेम से कर सकें। "

बुधवार, 30 अक्तूबर 2019

आस्था और विश्वास का पर्व -" छठ पूजा "


  " छठ पूजा " हिन्दूओं का एक मात्र ऐसा पौराणिक पर्व हैं जो ऊर्जा के देवता सूर्य और प्रकृति की देवी षष्ठी माता को समर्पित हैं। मान्यता है कि -षष्ठी माता ब्रह्माजी की मानस पुत्री हैं,
प्रकृति का छठा अंश होने के कारण उन्हें षष्ठी माता कहा गया जो लोकभाषा में छठी माता के नाम से प्रचलित हुई। पृथ्वी पर हमेशा लिए जीवन का वरदान पाने के लिए ,सूर्यदेव और षष्ठीमाता को धन्यवाद स्वरूप ये व्रत किया जाता हैं। सूर्यदेव की पूजा अन्न -धन पाने के लिए और षष्ठीमाता की पूजा संतान प्राप्ति के लिए ,यानि सम्पूर्ण सुख और आरोग्यता की कामना पूर्ति हेतु इस व्रत की परम्परा बनी। 

    यह त्यौहार बिहार का सबसे लोकप्रिय त्यौहार हैं जो झारखंड ,पूर्वी उत्तरप्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में भी मनाया जाता हैं। वर्तमान समय में तो यह त्यौहार इतना ज्यादा प्रचलित हो चुका हैं कि विदेशो में भी स्थान पा चुका हैं। छठपूजा की बहुत सी पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं ,पुराणों के अनुसार प्रथम मनुपुत्र प्रियव्रत और उनकी पत्नी मालिनी ने पुत्र प्राप्ति के लिए ये व्रत पहली बार किया था। ये भी कहते हैं कि भगवान राम और सीता जी भी वनवास से अयोध्या लौटने के बाद राज्याभिषेक के दौरान उपवास कर सूर्य आराधना की थी। द्रोपदी और पांडवों ने भी अपने राज्य की वापसी की कामनापूर्ति के लिए यह व्रत किया था। ये भी  कहते हैं कि सूर्यपुत्र कर्ण ने इस व्रत को प्रचलित किया था जो अङ्गदेश [ जो वर्तमान में मुंगेर और भागलपुर जिला हैं ] के राजा थे। राजा कर्ण सूर्य के उपासक थे वो प्रतिदिन नदी के पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे और बाहर आकर प्रत्येक आगंतुक को दान देते थे। 
   
    छठीमाता कौन थी ? सूर्यदेव से उनका क्या संबंध था ?छठपर्व की उत्पति के पीछे पौराणिक कथाएं क्या थी ?इस व्रत को पहले किसने किया ?इस व्रत के पीछे मान्यताएं क्या थी ? ढेरों सवाल हैं परन्तु मेरे विचार से सबसे महत्वपूर्ण  सवाल ये हैं कि -  इस व्रत के पीछे कोई सामाजिक संदेश और वैज्ञानिक उदेश्य भी था क्या ? 
जैसा कि मैंने  इससे पहले वाले लेख [ हमारे त्यौहार और हमारी मानसिकता ] में भी इस बात पर प्रकाश डाला हैं  कि -हमारे पूर्वजों द्वारा प्रचलित प्रत्येक त्यौहार के पीछे एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक और सामाजिक उदेश्य छिपा होता था। 
तो चलें, चर्चा करते हैं कि - छठपूजा के पीछे क्या -क्या उदेश्य हो सकते थे ?छठपर्व को चार दिनों तक मनाएं जाने की परम्परा हैं।नियम कुछ इस प्रकार हैं - 
     पहला दिन -  सुबह जल्दी उठकर गंगा के पवित्र जल से स्नान करना और उसी शुद्ध जल से भोजन भी बनना ,घर ही नहीं आस -पास की भी सफाई करना ,नदियों की भी सफाई विस्तृत रूप से करना ,भोजन मिट्टी के चूल्हे में  आम की लकड़ी जलाकर ताँबे या मिट्टी के बर्तन में ही बनाना ,भोजन पूर्णरूप से सात्विक होना चाहिए [लौकी की सब्जी ही बनती हैं क्योंकि ये स्वस्थ के लिए फायदेमंद होती हैं ] पहले आस -पास के वातावरण को शुद्ध करना फिर खुद को बाहरी और अंदुरुनी दोनों शुद्धता प्रदान करना ,खुद को बिषैले तत्वों से दूर करके लौकिक सूर्य के ऊर्जा को ग्रहण करने योग्य बनाना  अर्थात पहला दिन -" तीन दिन के कठिन तपस्या के लिए खुद को शारीरिक और मानसिक रूप से तैयार करने का दिन।" 

     दूसरा दिन - पुरे दिन निर्जला उपवास रखना , शाम को शुद्धता के साथ रोटी , गुड़ की खीर और फल मूल को केले के पत्ते पर रखकर पृथ्वी माँ की पूजन करना और वही प्रसाद व्रती को भी खाना और जितना हो सके लोगों को बाँटना।  इस तरह ,पृथ्वी जो हमारा भरण -पोषण करती हैं उनके प्रति अपनी कृतज्ञता जताते हैं। दूसरा दिन सिर्फ एक बार रात्रि में वो प्रसाद ही भोजन करते हैं। 

     तीसरा दिन -पुरे चौबीस घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं ,संध्या के समय पीले वस्त्र पहनकर ,नदी के जल में खड़े होकर ,डूबते सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं  ,उन्हें फल -मूल और पकवान अर्पण करते हैं। जल और सूर्य की ऊर्जा हमारे जीवन का आधार हैं ,उन्हें भी अपनी श्रद्धा अर्पित कर धन्यवाद देते हैं।सूर्य की पूजा कर जब घर आते हैं तो पाँच गन्नो का घेरा बनाते हैं उसके अंदर एक हाथी  रखते हैं, एक कलश में फल मूल और पकवान भर कर हाथी के ऊपर रखते हैं ,बारह मिट्टी के बर्तन में भी फल मूल और पकवान भरकरऔर बारह दीपक जलाकर उस हाथी के चारों तरफ सजाकर रखते हैं। पाँच गन्ने पंचतत्व के प्रतीक जिससे हमारा शरीर बना हैं ,हाथी और कलश सुख समृद्धि के प्रतीक ,बारह मिट्टी के बर्तन  हमारे मन के बारह भाव के प्रतीक ,इन समृद्धों को जीवन में देने के लिए ईश्वर को धन्यवाद स्वरूप जगमगाते दीपक।  

     चौथा दिन - उन्ही सब समग्रियों के साथ उगते सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित कर अपनी आरोग्यता की  कामना के साथ व्रत का समापन। उसके बाद व्रती अन्न -जल ग्रहण करती हैं और जो भी सामग्री पूजा में प्रयोग की गई होती हैं, उस प्रसाद को अधिक से अधिक लोगों में बाँटते हैं। 

     छठपूजा की पूरी  प्रक्रिया हमें शारीरिक और मानसिक शुद्धता प्रदान करने के लिए हैं ताकि हमारी आरोग्यता बनी रहे। पूजा की पूरी विधि हमें अपने जीवनदाता के प्रति कृतज्ञता जताना सिखाती हैं ,उगते सूर्य से पहले डूबते  सूर्य को अर्घ्य देना हमें सिखाता हैं कि घर परिवार में हम अपनी संतान [ जो उगते सूर्य हैं ] के प्रति तो स्नेह रखते हैं परन्तु अपने वुजुर्गों [ जो डूबते सूर्य के समान हैं ]को पहले मान दें।  

    छठपूजा के रीति रिवाज़ों पर अगर चिंतन करे तो पाएंगे कि -यही एक त्यौहार हैं जिसकी पूजा में किसी ब्राह्मण की आवश्यकता  नहीं पड़ती ,इसमें जाति का भी भेद भाव नहीं दिखता ,बांस के बने जिस सूप और डाले में प्रसाद रखकर अर्घ्य अर्पण करते हैं वो समाज की नीची कहे जाने वाली जाति के पास से आता हैं ,मिट्टी के बर्तन को भी मान देते हैं। इस व्रत में अनगिनत सामग्रियों का प्रयोग होता हैं जो  सिखाता हैं कि -प्रकृति ने जो भी  वस्तु हमें  प्रदान की हैं उसका अपना एक विशिष्ट महत्व होता हैं इसलिए किसी भी वस्तु का अनादर नहीं करें। इस व्रत में माँगकर प्रसाद खाना और व्रती के पैर छूकर आशीर्वाद लेने को भी अपना परम सौभाग्य मानते हैं। व्रती चाहे उम्र में छोटी हो या बड़ी,पुरुष हो या स्त्री ,चाहे वो किसी छोटी जाति से हो या बड़ी जाति से का भी हो, उन्हें छठीमाता ही कहकर बुलाते हैं। इसतरह ये पर्व अपने अभिमान को छोड़ झुकना भी सिखाता हैं। 

      व्रत से पहले समृद्ध लोग हर एक व्रतधारी के घर जाकर व्रत से सम्बन्धित वस्तुएँ अपनी श्रद्धा से देते हैं जिसे पुण्य माना जाता हैं यानि यह व्रत हममें सामाजिक सहयोग की भावना भी जगाता हैं। मान्यता हैं कि -जब आप कठिन रोग या दुःख से गुजर रहे हो तो भीख माँगकर व्रत करने और जमीन पर लेट लेटकर घाट [नदी के किनारे ]तक जाने की मन्नत माँगे ,आपके सारे दुःख दूर होगें। अर्थात प्रकृति हमें सिखाती हैं -अपने गुरुर अपने अहम को छोड़ों तुम्हारे सारे दुःख स्वतः ही दूर हो जायेंगें। 

    छठपूजा की पूरी प्रक्रिया में बेहद सावधानी बरती जाती हैं। कहते हैं कि -छठीमाता एक गलती भी क्षमा नहीं करती ,ये डर हमें अनुशासन भी सिखाता हैं -जीवन में हर एक कदम सोच -समझकर रखें ,आपकी एक भी गलती को प्रकृति क्षमा नहीं करेंगी और उसकी सज़ा आपको भुगतनी ही पड़ेंगी। 

    परिवार के  साथ और सहयोग का महत्व तो हर त्यौहार सिखाता हैं परन्तु छठपूजा परिवार के प्यार ,सहयोग और एकता का बड़ा उदाहरण प्रस्तुत करता हैं। इस व्रत में सिर्फ एक व्यक्ति व्रत रखता हैं जो ज्यादातर  परिवार की स्त्री मुखिया ही होती हैं ,बाकी सारा परिवार सहयोग और सेवा में जुटा रहता हैं। 20 साल पहले तक तो यही नियम था. परिवार ही नहीं पुरे खानदान में एक स्त्री व्रत रखती थी [परन्तु बदलते वक़्त में बहुत कुछ बदल गया हैं ]इस पूजा में सारा खानदान एकत्रित होता था।  जैसे बेटी के व्याह में सब एकत्रित होते हैं तथा अपने श्रद्धा और सामर्थ के अनुसार सेवा और सहयोग करते हैं। जब आखिरी दिन छठीमाता की विदाई हो जाती हैं तो घर का वहीं वातावरण होता हैं जैसे बेटी के विदाई के बाद होता हैं ,वही थकान ,वही उदासी ,वही घर का सूनापन। [वैसे बिहार में छठिमाता को पृथ्वीलोक की बेटी ही मानते हैं जो साल में दो बार ढ़ाई दिनों के लिए पीहर आती हैं ]

     मुझे आज भी अपने बचपन की छठपूजा के दिन बड़ी शिदत से याद आती हैं [बचपन से लेकर जब तक शादी नहीं हुई थी ] हमारा पूरा खानदान[ जो लगभग 30 -35 सदस्यों का था] बिहार स्थित बेतिया शहर में दादी के घर छठपूजा के लिए एकत्रित होता था। साल के बस यही चार दिन थे जो पूरा खानदान बिना किसी गिले -शिकवे के सिर्फ और सिर्फ ख़ुशियाँ मनाने के लिए एक जुट होता था। व्रत सिर्फ दादी रखती ,माँ -पापा उनके सेवक होते और मैं और मेरी छोटी बुआ माँ पापा के मुख्य सहयोगी।दादी के गुजरने के बाद परिवार की मुखिया होने के नाते  माँ ने व्रत शुरू किया और मैं उनकी सेवक बनी ,मेरी छोटी बहन सहयोगी। समय बदलाव के साथ हर परिवार में व्रत रखने लगे और यह त्यौहार खानदान से परिवार में सिमट गया। अब तो हर कोई अकेले अकेले ही व्रत रखने लगे ,परिवार की भी उन्हें जरूरत नहीं रही। 



    इतने सुंदर ,पारिवारिक ,सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सन्देश देने वाले  इस त्यौहार को हमारे पूर्वजों ने कितना मंथन कर शुरू किया होगा। लेकिन आज यह पावन- पवित्र त्यौहार अपना मूलरूप खो चूका हैं। इसकी शुद्धता ,पवित्रता ,सादगी ,सद्भावना ,और आस्था महज दिखावा बनकर रह गया हैं। छठपूजा में व्रती पूरी तपश्विनी वेशभूषा  में रहती थी और आज की व्रती अपने सौन्दर्य का प्रदर्शन करती रहती हैं। जिस प्रकृति की हम पूजा करने का ढोंग कर रहे हैं उसका इतना दोहन कर चुके हैं कि वो कराह रही हैं। जिसका दंड छठीमाता हमें दे भी रही हैं पर हम अक्ल के अंधे देख ही नहीं पा रहे हैं। प्रकृति विक्षिप्त हुई पड़ी हैं ,समाज दूषित हो चला हैं ,परिवार बिखर चुका हैं ,व्यक्ति बाहरी और अंदुरुनी दोनों तरह से अपना स्वरूप बिगाड़ चुका हैं ,अपनी शुद्धता ,पवित्रता ,शांति और खुशियों को खुद ही खुद से दूर कर चुका हैं ,ऐसे में कैसे छठीमाता का आगमन होगा और कैसे उनकी पूजा होंगी ? यदि दिखावे की पूजा हुई भी तो क्या वो फलित होंगी ?

सही कहते हैं हमारे बड़े बुजुर्ग कि -
                                              " ना अब वो देवी रही ,ना वो कढ़ाह "

[अर्थात ,ना पहले जैसे भगवान में आस्था रही ना ही वैसी भावना से पूजा ]  

फिर भी, इसी उम्मीद के साथ कि- एक ना एक दिन शायद हम अपने त्योहारों को उसी मूलरूप में फिर से वापस ला सकें। ऐसी कामना के साथ छठपूजा की हार्दिक शुभकामनाएं,  छठीमाता आप सभी के घर परिवार को सुख ,शांति ,समृद्धि और आरोग्यता प्रदान करें। 


सोमवार, 21 अक्तूबर 2019

हमारे त्यौहार और हमारी मानसिकता

ये है हमारी परम्परागत दिवाली 

गैस चैंबर बन चुकी दिल्ली को क्या कोई सरकार ,कानून या धर्म बताएगा कि  " हमें पटाखे जलाने चाहिए या नहीं?" क्या  हमारी बुद्धि- विवेक बिलकुल मर चुकी है ? क्या हममे सोचने- समझने की शक्ति ही नहीं बची जो हम समझ सकें कि - क्या सही है और क्या गलत ? क्या अपने जीवन मूल्यों को समझने और उसे बचाने के लिए भी हमें किसी कानून की जरुरत है ? क्या हमें हमारे बच्चों के बीमार फेफड़े नहीं दिखाए देते जो एक- एक साँस मुश्किल से ले रहे है ? क्या तड़प तड़प कर दम तोड़ते हमें हमारे बुजुर्ग दिखाई नहीं देते ?तो लानत है हम पर,  हम इंसान क्या जानवर कहलाने के लायक भी नहीं है।  और पढ़िये 

शनिवार, 5 अक्तूबर 2019

माँ तेरे चरणों में ...

   " नवरात्रि " हमारे मयके के परिवार में ये त्यौहार सबसे ज्यादा धूमधाम से मनाया जाता था। जब हम बहुत छोटे थे तब से  पापा जीवित थे तब तक। नौ दिन का अनुष्ठान होता था जप ,उपवास ,भजन कीर्तन ,हवन ,कन्या भोजन सब कुछ बड़े ही बृहत स्तर पर होता था।हमारे घर पंडित जी नहीं आते थे ,हमारे पापा स्वयं सब कुछ कराते थे।  नौ दिन ऐसे हर्षोउल्लास में गुजरते थे कि उसकी यादे अब भी ऐसे जीवित हैं जैसे सब कुछ कल की बात हो। पर अब सबकुछ खत्म हो चूका हैं ,पापा अपने साथ वो सारे हर्षोउल्लास लेकर चले गये हैं और छोड़ गये हैं अपने दिए संस्कार और ढेरों यादें ,अपनी वो मधुर आवाज़ जिसमे  वो माता का ये भजन भावविभोर होकर गाते थे। जब वो " हे माँ ,हे माँ " की तान लगाते तो उनकी आँखों से आँसू की धारा निकल उनके पुरे मुख को कब भिगो जाती थी ये उन्हें भी पता नहीं चलता था।सुननेवाले भी मन्त्र्मुग्ध हो जाते। हमारे कानों में तो अब भी उनकी वो भक्ति रस में डूबी तान गूँजती रहती हैं। आज पापा की याद में वो भजन मैं आप सब से भी साझा कर रही हूँ। ...... 




माँ तेरे चरणों में
हम शीश झुकाते हैं 
श्रद्धा पूरित होकर
दो अश्रु चढ़ाते हैं 

झंकार करो ऐसी
सदभव उभर आये 
हे माँ ,हे माँ 
हुंकार भरो ऐसी
दुर्भाव उखड़ जायें॥
सन्मार्ग न छोड़ेगें

हम शपथ उठाते हैं॥
माँ तेरे चरणों में..... 
यदि स्वार्थ हेतु माँगे

दुत्कार भले देना।
हे माँ ,हे माँ
जनहित हम याचक हैं
सुविचार हमें देना॥
सब राह चलें तेरी

तेरे जो कहाते हैं॥
माँ तेरे चरणों में.....
वह हास हमें दो माँ

सारा जग मुस्काये।
हे माँ ,हे माँ
जीवन भर ज्योति जले

पर स्नेह न चुक पाये॥
अभिमान न हो उसका

जो कुछ कर पाते हैं॥
माँ तेरे चरणों में.....
विश्वास करो हे! माँ  

हम पूत तुम्हारे हैं।
हे माँ ,हे माँ
बलिदान क्षेत्र के माँ

हम दूत तुम्हारे हैं॥
कुछ त्याग नहीं अपना

बस कर्ज चुकाते हैं॥
माँ तेरे चरणों में 
हम शीश झुकाते हैं। 
श्रद्धा पूरित होकर

दो अश्रु चढ़ाते हैं॥


माता के चरणों में आओ, हम सब शीश झुकायें।
हीन, तुच्छ, संकीर्ण वृत्ति को, हम सब दूर भगायें।।
लोभ, मोह,अभिमान भाव को,आओ दूर करें हम।
हैं सपूत माता को हम सब, यह विश्वास दिलायें।।

पर्दा नहीं जब कोई खुदा से ....



    
    " पर्दा "  यानि किसी भी खूबसूरत  या बदसूरत व्यक्ति ,वस्तु या बातो के ऊपर एक आवरण रख देना या यूँ भी कह सकते हैं कि उसकी हक़ीक़त को छुपा देना। जीवन में हमे अक्सर जरूरत पड़ ही जाती हैं एक ऐसे आवरण की जो हमारे जिस्म को, हमारी सोच को, हमारे बोल को, यहां तक की हमारे कर्मो को भी ढके रखे। जिस्म को तो एक पर्दें से ढकना जरुरी हैं ये तो सभ्यता हैं। हम आदि मानव तो रहे नहीं जिसको जिस्म  पर भी पर्दें डालने की जरुरत नहीं थी। जिस्म को तो कभी कभी  लोगो की बुरी नजर से बचाने के लिए जरुरत से  ज्यादा भी छुपाना पड़ता हैं। लेकिन  सोच ,बोल और कर्म को पर्दे की क्या जरूरत ? पर इन्हे भी छुपाना पड़ता हैं ???? 

     अब सवाल ये उठता हैं कि हमे किससे छुपाना पड़ता हैं  खुद से ,खुदा से या दुनिया वालो से। हम दुनिया वालो से भले ही सब कुछ छुपा ले पर खुद से और खुदा से कुछ छुपाना  मुमकिन हैं क्या ? खुदा की बात छोड़े क्या हम अपने सोच ,बोल और कर्म पर अच्छाई या बुराई रुपी पर्दा  डाल कर खुद के मन से वो सब छुपाने में सफल हो पाते  हैं क्या ? कभी ना कभी तो हमारा मन उस पर्दे से बाहर निकलने के लिए मचलेगा न ????

    कभी  कभी आप अपने अच्छे कर्मो को तो छुपा सकते हैं, छुपाना भी चाहिए क्योकि " अपना आप बड़ाई " शोभा नहीं देता। वैसे भी अच्छे कर्मो पर तो आप ज्यादा दिन तक पर्दा डाल भी नहीं सकते। क्योकि अच्छे कर्मो की खुश्बू बंद दरवाजे से भी   खुद ब  खुद बाहर निकल समूचे वातावरण को सुगंधित कर देती हैं। हाँ  ,बुरे कर्मो को आप जरूर पर्दा-दर - पर्दा ढ़क सकते हैं। अपनी गन्दी अंतरात्मा पर अच्छाई का आवरण डाले बहुत ही सम्भ्रांत व्यक्तित्व आप को आपने आस पास हमेशा देखने को मिल ही जाते होंगे या यूँ भी कह सकते हैं कि ऐसे ही लोगो की तदाद ज्यादा हैं, हम चारो तरफ से उनसे ही घिरे हैं। 

     मैं अक्सर सोचती हूँ ऐसे व्यक्ति जो अच्छाई का आवरण ओढ़े घूमते हैं उनका मन कभी तो उन्हें धिधकारता होगा। हाँ ,जरूर धिधकारता होगा ,आप लाख अपने अंतर्मन को दबाना चाहे वो चीत्कार जरूर करेगा ,आप उसकी आवाज़ को भले ही अनसुना करे पर वो चीख चीख कर अपनी आवाज़ खुदा तक जरूर पंहुचा देगा। फिर कुछ छुपा नहीं रहेगा ,सारे पर्दे हट जायेगे ,सारे राज खुल जाएंगे। फिर कहाँ जाकर और किस चीज से आप अपना मुख छुपायेंगे। सोचे जरा ........ 

     मुझे बचपन में सुनी  एक कहानी याद आ रही है -एक व्यक्ति था सात्विक  जीवनशैली ,सात्विक विचार और सात्विक भोजन अर्थात उसका  व्यक्तित्व दुनिया के सामने संतरूपी था। परन्तु  वो जैसा दिखता था वैसा था नहीं तो जाहिर हैं वो सारे गलत काम पर्दे में करता था। वो जब भी नदी में नहाने जाता और जब वो पानी में डुबकी लगता तो पानी के अंदर ही बड़ी  चालाकी से एक मछली गटक जाता और मन ही मन खुश होकर कहता -" ऐसा चोरी किया जो खुदा ने भी नहीं देखा " एक दिन एक मछली उसके गले में अटक गई और खुदा ने उसे समझा दिया कि मुझसे कुछ नहीं छिपा। उसे अपने किये की सजा मिल गई। 

      ये कहानी  पापा अक्सर हमे सुनाया करते थे जब भी हम कुछ गलत करते थे और वो हमे पकड़ लेते तो यही जुमला कहते - आप लोग  क्या सोच रहे थे कि " ऐसा चोरी किये जो खुदा ने भी नहीं देखा " और ये कह वो ठहाके लगाकर हंसने लगते।  हम सब झेप जाते थे और अपनी गलती मान पापा के आगे कान पकड़ लेते थे। बचपन में तो इस कहानी के असली भाव को हम समझ नहीं पाते थे लेकिन अब समझ आता हैं कि -हम लाख कोशिश करे अपने व्यक्तित्व को, अपने सोच -विचार को ,अपने बोल को और अपने कर्मो को कभी भी किसी भी तरह के पर्दे से नहीं ढक़ सकते या यूँ भी कह सकते हैं कि ऐसा कोई पर्दा ईश्वर ने बनाया ही नहीं जिससे ये ढका जा सके। हाँ , अपने मद में मदहोश हम ये झूठा प्रयास अवश्य करते रहते हैं। 

     आज ऐसे कई उदाहरण हमारे सामने हैं कि कल  जिन्होंने भी संत का नकाब ओढ़ रखा था ,आज वो दुनिया के सामने बेनकाब हैं। लाख पर्दे में अपने गुनाहो को छुपा लो वो एक न एक दिन सबको नजर आ ही जायेगा। क्यों छुपाये हम अपनी खूबसूरती या बदसूरती को किसी से ? क्यों किसी भी वस्तु की हकीकत को छुपाने के लिए उस पर आवरण रख दे ? क्यों मुख से ऐसा कुछ निकले जिसके प्रभाव को कम करने के लिए हमे उसके ऊपर कोई दूसरी बात कह कर पहली  बात पर आवरण डालना पड़े ? क्यों हम ऐसा कोई भी काम करे जिस के लिए  हमे खुद से , खुदा से या जग से मुँह छुपाना पड़े ? 
   क्युँ न हम अपनी सोच को ,अपने लफ्जो को ,अपने कर्मो को इतना प्रभावशाली और पारदर्शी बनाएं कि हमे किसी भी आवरण की जरूरत ही ना पड़े। अपनी नजरों को इतना पाक बनाएं कि किसी को भी अपनी खूबसूरती या बदसूरती को छुपाना ही ना पड़े। क्युँ न हम ऐसे काम करे कि निःसकोच हो, बिना डरे, हम शान से सर उठाकर ये कह सके -
                               
                             " पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बंदो से पर्दा करना क्या "







गुरुवार, 26 सितंबर 2019

तेरे सुर और मेरे गीत .....

                           
                                                     " तेरे  सुर और मेरे  गीत 
                                             दोनों मिलकर बनेगे प्रीत " 


      इस गीत के सिर्फ एक पंक्ति से  ही गीतकार भरत व्यास ने जीवन में सच्चे प्रेम और ख़ुशी को पाने का हर रहस्य खोल दिए हैं। यदि  सुर और गीत की तरह एक हो गए तो जीवन में शास्वत प्रेम की धारा स्वतः ही बहने लगेगी। फिर ना कोई बिक्षोह का डर होगा ना कोई मिलने की तड़प। फिर इस  नश्वर जगत में  भी जीवन  इतना सुरमयी हो जायेगा कि जीते जी स्वर्ग सुख की अनुभूति हो जाएगी। 


     इस गीत के एक पंक्ति ने ही जीवन के बड़े गूढ़ रहस्यो को अपने भीतर समाहित कर रखा हैं कि सच्ची प्रीत वही हैं ,सच्चा रिश्ता वही हैं जो सुर और गीत की तरह एकाकार हो। उस वक़्त के तत्कालीन परिवेश में ( जब ये गीत रचा गया था ) ये भावनाएं विशुद्ध रूप से देखने को मिलती थी। परन्तु आज के समाज में हर एक रिश्ते में  " अपनी ढ़पली अपना राग  " जैसे हालात हैं। कोई अपना  सुर दे रहा हैं तो कोई अपना ही गीत गए जा रहा हैं। उन्हें नहीं मतलब हमारे सुर और गीत एक दूसरे से मिल भी रहे हैं या नहीं ,हर एक को अपना ही  किया हुआ अच्छा लग रहा हैं। बस एक दूसरे को दोष देने में लगे हैं कि - " मेरे तो सुर बड़े मधुर हैं तुम्हारे ही गीत के बोल अधूरे हैं " तो कोई कहता हैं - " नहीं जी ,मैंने तो गीत के बोल बहुत सुंदर लिखे हैं तुमने ही सही सुर नहीं दिए।" 
    
    कोई नहीं कहता -"  मैं अपने  गीतों के बोल को तुम्हारे  सुरो के अनुरूप बदल लेती हूँ। "  या " मैं तुम्हारे हर गीत के बोल को अपने सुरों में बड़े प्यार से  पिरो लुगा। "  माना किसी और के गीत के साथ सुर और ताल मिलना कभी कभी मुश्किल हो जाता है.गीत को सुर ना दे पाए तो क्या हुआ सुर को ताल तो दे ही सकते हैं वो भी नहीं कर पाए तो भी कोई बात नहीं सुर के साथ सुर तो मिला ही सकते हैं। दूरदर्शन पर बहुत पहले एक गीत आता था " मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा " अगर हम  सुर से सुर ही  मिला ले तो भी हमारा जीवन सुरमयी हो जायेगा। 


      जब तक एक गीत को सुंदर सुरो से लयबद्ध नहीं किया जायेगा तब तक  मनभावन संगीत सुनने को नहीं मिलेगा। परन्तु आज के परिवेश में व्यक्ति के जीवन में ना सुर हैं ना ताल ,गीत के बोल भी भावहीन हो चुके हैं ,ऐसे में  मधुर संगीत कहाँ से सुनाई देगा। हर तरफ बस हाहाकार मचा हैं ,हर रिश्ते में दरार पड़ी हैं ,चाहे वो पति पत्नी हो ,माँ -बेटी हो ,पिता- पुत्र हो ,दोस्त- रिश्तेदार हो या प्रेमी- प्रेमिका हो। क्योकि जीवन से सच्चा संगीत चला गया हैं ,संगीत बेसुरा हुआ पड़ा हैं और भावनाएं खंडित। हर एक  मनुष्य की आत्मा तड़प रही हैं एक मधुर बोल सुनने को, जिसे सुन उसका  अंतःकरण भी  सुरमयी बन सके। लेकिन समस्या ये हैं कि सब सुनना ही चाहते  हैं कोई बोलने का प्रयास नहीं कर रहा। पहले आप खुद अपने अंतःकरण से एक सच्चा और मधुर सुर तो निकलो ,उस सुर पर कोई ना कोई एक मधुर गीत की रचना जरूर कर देगा। 


      सिर्फ संगीत में ही नहीं ,जीवन में भी सुर और ताल का मिलना बहुत ही जरुरी हैं।जीवन का सुर और ताल हैं -सच्ची "श्रद्धा और विश्वास " ये दोनों जिस किसी भी रिश्ते में समाहित होगा उस रिश्ते में संगीत की तरह मधुरता तो होगी ही, साथ ही साथ इस तरह के प्यारे रिश्ते से जन्मे जीवन संगीत की मधुरता  से उस व्यक्ति का जीवन ही नहीं वरन उसका घर- परिवार और  समाज भी सुरमयी  हो जायेगा।  गीतकार रविन्द्र जैन ने आज  के दौड में सच्चे प्यार के लिए तरसते  हर एक दिल की ख्वाहिश को कुछ इस तरह से वया किया हैं -


                                           तु जो मेरे सुर में सुर मिला ले ,संग गा ले।  
                                          तो जिंदगी हो जाये  सफल।। 
                                  तु जो मेरे मन को घर बना ले ,मन लगा ले। 
                                            तो बंदगी हो जाए सफल।। 

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

जाने चले जाते हैं कहाँ .....

                       

                                 जाने चले जाते हैं कहाँ ,दुनिया से जाने वाले, जाने चले जाते हैं कहाँ 
                                                  कैसे ढूढ़े कोई उनको ,नहीं क़दमों के निशां 

     अक्सर, मैं भी यही सोचती हूँ आखिर दुनिया से जाने वाले कहाँ चले जाते हैं ?कहते हैं  इस जहाँ  से परे भी कोई जहाँ है, हमें छोड़ शायद वो उसी अलौकिक जहाँ में चले जाते हैं। क्या सचमुच ऐसी कोई दुनिया है ? क्या सचमुच आत्मा अमर है ? क्या वो हमसे बिछड़कर भी हमें देख सुन सकती हैं ? क्या वो आत्माएं भी खुद को हमारी भावनाओं से जोड़ पाती है ? क्या वो दूसरे जहाँ में जाने के बाद भी हमें  हँसते देखकर खुश होते हैं और हमें  उदास देख वो भी उदास हो जाते हैं ? श्राद्ध के दिन चल रहे हैं सारे लोग पितरो के आत्मा की तृप्ति के लिए पूजा -पाठ ,दान पुण्य कर रहे हैं ,क्या हमारे द्वारा  किये हुए दान और तर्पण हमसे बिछड़े हमारे प्रियजनों की आत्मा तक पहुंचते हैं और उन्हें तृप्त करते हैं ? ऐसे अनगिनत सवाल मन में उमड़ते रहते हैं ,ये सारी बाते सत्य हैं या मिथ्य ?

      युगों से श्राद्ध के विधि -विधान चले आ रहे हैं, हम सब अपने पितरो एवं प्रियजनों के आत्मा की शांति के लिए पूजा -पाठ, दान -पुण्य और जल तर्पण करते आ रहे हैं। आत्मा जैसी कोई चीज़ का इस ब्रह्माण्ड में आस्तित्व तो है इसकी पुष्टि तो विज्ञान भी कर चूका है। पर क्या इन बाहरी क्रियाकलापों से आत्मा को तृप्ति मिलती होगी ? मुझे नहीं पता आत्मा तिल और जल के तर्पण से तृप्त होती है या ब्राह्मणों को भोजन कराने से ,गाय और कौओ को रोटी खिलाने से या गरीबों में वस्त्र और भोजन बांटने से, मंदिरो में दान करने से या पूजा -पाठ -हवन आदि करने से। 

     मुझे तो बस इतना महसूस होता है कि हमसे बिछड़ें  हमारे प्रियजनों की आत्मा  एक अदृश्य तरगों के रूप में हमारे  इर्द गिर्द तो जरूर रहती है और हमें  दुखी  देख तड़पती है और हमें  खुश देखकर संतुष्ट होती है, उनके द्वारा  दिए गए अच्छे संस्कारों का जब हम पालन करते हैं तो उन्हें शांति मिलती है,  अपने प्रियजनों को सुखी और संतुष्ट देख उन्हें तृप्ति मिलती है  और हमारे सतकर्मो  से उन्हें मोक्ष मिलती है। 


     मुझे तो यही महसूस होता है, जिन्हे हम प्यार करते हैं वो आत्माएं शायद हमारे आस -पास ही होती है उन अनदेखी  हवाओं की तरह बस हमें  छूकर गुजर जाती है।उन्हें याद करके एक पल के लिए आँखें मूंदते ही हमें  उनका स्पर्श महसूस होने लगता है। हम ही उन्हें महसूस नहीं करते शायद वो भी हमारे सुख दुःख, आँसू और हँसी को महसूस करते  होंगे तभी तो यदा-कदा हमारे  सपनो में आकर  हमें  दिलासा भी दे जाते हैं और कभी -कभी तो अपने होने का एहसास भी करा जाते  हैं । 


     शायद, मृतक आत्माओं के प्रति हमारी सच्ची श्रधांजलि ही श्राद्ध हैं। सिर्फ विधि -विधान का अनुसरण नहीं बल्कि हर वो कार्य जिसमे परहित छुपा हो और पूरी श्रद्धा के साथ की गयी हो, अपने पितरो के प्रति आदर ,सम्मान और प्यार के भावना के साथ की गई हो, अपने पितरो के सिर्फ सतकर्मो को याद करके की गई हो वही सच्ची श्रधांजलि है। 

       शायद, ये श्राद्धपक्ष सिर्फ हमें  हमारे पितरो और प्रियेजनों की याद दिलाने ही नहीं आता बल्कि हमें  ये याद दिलाने के लिए भी आता है कि -एक दिन हमें  भी इस जहाँ को छोड़ उस अलौकिक जहाँ में जाना है जहाँ  साथ कोई नहीं होगा  सिर्फ अपने कर्म ही साथ जायेगे और पीछे छोड़ जायेगे अपनी अच्छे कर्मो की दांस्ता और प्यारी सी यादें  जो हमारे प्रियेजनो के दिलो में हमारे लिए हमेशा जिन्दा रहेगी और वो अच्छी यादें हमारे वर्तमान व्यक्तित्व पर ही निर्भर करेगी। 

     गलत कहते हैं लोग -" खाली हाथ आये थे हम ,खाली हाथ जायेगे " ना हम खाली हाथ आये हैं ना खाली जायेगे। हम जब जायेगे तो साथ अपने कर्मो का पिटारा लेकर जायेगे और जब भी फिर इस जहाँ में वापस आना होगा तो उन्ही कर्मो के हिसाब से अपने हाथों  में अपने भाग्य की लकीरें ले कर आयेगे। हां ,भौतिक सुख-सुविधा के सामान और अपने प्रिये यही पीछे छूट जायेगे। 

     यकीनन ,ये श्राद्ध हमें  याद दिलाने आता है कि -इस दुनिया में तुम्हारा आना जाना लगा रहेंगा और तुम्हारे कर्म ही तुम्हारे सच्चे साथी है। इस श्राद्धपक्ष मैं अपने  प्रिय पापा और भाई तुल्य बहनोई जो मुझे भी अपनी बड़ी बहन सा  मान और स्नेह देते थे उनके प्रति अपनी सच्ची श्रधांजलि अर्पित करती हूँ और उन्हें ये वचन भी देती हूँ कि-मैं उनके अधूरे कामो को, अधूरे सपनो को पूरा करने की पूरी ईमानदारी से कोशिश करुँगी। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे।    

मंगलवार, 16 जुलाई 2019

गुरु वंदना

गुरुपर्व के पावन अवसर पर " गायत्री परिवार "द्वारा रचित एक हृदयस्पर्शी गुरु वंदना आप सब के साथ साझा कर रही हूँ जो मेरे पापा को अत्यंत प्रिये था और वो इसे हर वक़्त गुनगुनाया करते रहते थे और कहते थे इससे मुझे गुरु की शक्ति मिलती हैं। 

गुरु वो हाथ हैं जो मुश्किल घडी में भी हमे थामे रखता हैं 



गुरुवर  तुम्ही बता दो,किसके शरण में जायें     
किसके चरण में गिरकर ,मन की व्यथा सुनायें  
गुरुवर तुम्ही बता दो-----

 अज्ञान के तिमिर ने चारो तरफ से घेरा
क्या रात है प्रलय की ,होगा नहीं सवेरा 
क्या होगा नहीं सवेरा ---
पथ और प्रकाश दो तो ,चलने की शक्ति पायें  
गुरुवर तुम्ही बता दो -------

जीवन के देवता का ,करते रहे निरादर 
कैसे करे समर्पित ,जीवन की जीर्ण चादर  
जीवन की जीर्ण चादर -----
यह पाप की गठरियाँ ,क्या खोलकर दिखायें  
गुरुवर तुम्ही बता दो-----

माना कपूत हैं हम, क्या रुष्ट रह सकोगे 
मुस्कान ,प्यार, अमृत ,क्या दे नहीं सकोगे 
क्या दे नहीं सकोगे-------
दाता तुम्हारे दर से ,जायें तो कहाँ जायें  
गुरुवर तुम्ही बता दो -------
दाता तुम्ही बता दो --------

गुरुपर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ,आप सब पर गुरु की कृपा बनी रहें .... 






शनिवार, 29 जून 2019

आत्ममंथन



    आराधना का मन आज बहुत व्यथित हो रहा था। वो फुट फुट  कर रो रही थी और खुद  को कोसे भी जा रही  थी। अपने आप में ही बड़बड़ाये जा रही थी "क्या मिला मुझे सबको इतना प्यार करके,सब पर अपना आप लुटा के ,बचपन के सुख ,जवानी की खुशियाँ तक लुटा दी तुमने ,सबको बाँटा ही कभी किसी से कुछ मांगा नहीं लेकिन आज फिर भी खाली हाथ हो,क्यों ?"वो खुद को कोसे जा रही थी और रोये जा रही थी।

रविवार, 16 जून 2019

यादें पापा की

     

    पितृदिवस के अवसर  पर सोशल मीडिया में  पिता से संबंधित एक से बढ़कर एक भावुक कर देने वाली रचनाये पढ़कर मुझे भी अपने पापा की याद बहुत सताने लगी हैं। सोची , मैं भी अपने पापा के याद में कुछ लिखुँ ,पर क्या   लिखुँ ? कहाँ से शुरू करुँ ?  मुझे तो उनकी हर छोटी से छोटी बात भी बड़ी शिदत से याद आती हैं। वो दिन, जब ज़मीन पर आड़े टेढ़े पैर रखते देखकर पापा मुझे सही ढंग से चलने का तरीका सिखाते हुए ये कहे थे कि -" रानियाँ ऐसे चलती हैं अदाओं से ",मेरे लिए ढेर सारे रंग बिरंगी चूड़ियाँ लाते थे और कहते मेरी बेटी की कलाई पर चूड़ियाँ बहुत सजती हैं, उन्हें पता था चूड़ियाँ  देखते ही मैं चहक उठती थी या वो दिन याद करू, जब  स्कुल का रिजल्ट आता तो भईया अपना मार्कसीट छुपा देते और खुद भी छुप जाते थे क्योकि हमेशा मेरे नंबर उनसे ज्यादा अच्छे होते थे और फिर पापा का मुझे ढेर सारा प्यार करना और ये कहना -" यही मेरी रानी बेटी हैं ये मेरा नाम रोशन करेगी " मुझे फिल्मे देखने का बड़ा शौक था और पापा बचपन से लेकर मेरे शादी होने तक मुझे मेरी हर पसंदीदा फिल्म दिखाते  थे ,खुद साथ लेकर जाते थे। बचपन से ही हर बार परीक्षा शुरू होने के एक दिन पहले पापा मुझे फिल्म दिखाने  जरूर ले जाते थे। क्योकि मैं फरमाईश करती थी कि -अगर फिल्म नहीं दिखाएंगे तो मेरा पेपर ख़राब हो जायेगा और पापा मेरी हर फरमाईश पूरी करते थे।

शनिवार, 15 जून 2019

क्या हम अपने नौनिहालों को इंसानियत का पाठ पढ़ा पाएंगे ??

     


     कहते हैं कि-" हमारे देश में तैतीस करोड़ देवी देवता निवास करते हैं " क्या ये सच हो सकता हैं ? हम तो तैतीस का नाम भी ठीक से नहीं जानते। फिर हमे क्यों बताया गया कि तैतीस करोड़ देवी -देवता हैं? ये बाते सतयुग के लिए कहते हैं और सतयुग में हर एक नर में नारायण का वास  माना जाता  था। "देवता "यानी देने वाला ,उस समय के हर एक मनुष्य  में सिर्फ देने का गुण विद्यमान होता था कोई किसी से मांगता नहीं था। तो कही ऐसा तो नहीं कि-उस समय की जनसंख्या ही तैतीस करोड़ थी और सारे सदविचारों से परिपूर्ण ,खुद से पहले दूसरे के भले के बारे में सोचने वाले , नेक नियत वाले ,एक दूसरे पर विश्वास करने वाले थे ,सब केवल दुसरो को देना जानते थे ,मांगना या छीनना उन्हें नहीं आता था शायद इसीलिए  उन्हें देवता की उपाधि दी गई थी और जो इन गुणों के विपरीत गुण वाले थे उन्हें दानव कहा गया। परमात्मा तो सिर्फ एक ही हैं तो बाकि इंसानो को दो श्रेणी में रखा गया हो  " देवता और दानव "

रविवार, 2 जून 2019

विवाह -संस्कार


     हिन्दू धर्म में जन्म से लेकर मरण तक कई संस्कार होते हैं जैसे -पुंसवन संस्कार ,अन्नप्रासन संस्कार ,मुंडन संस्कार ,उपनयन संस्कार ,विवाह संस्कार एवं दाह -संस्कार आदि।वैसे तो संस्कार सोलह मने गए हैं (कही कही तो 48 संस्कार भी बताये गए हैं ) लेकिन ये छह संस्कार तो महत्वपूर्ण हैं जो अभी तक अपने टूटे बिखरे रूप में  निभाए ही जा रहे हैं।  " संस्कार "यानि वो गुण जो सिर्फ आपके शरीर से ही नहीं वरन आत्मा तक से जुड़ जाते हैं। मान्यता ये हैं कि -आत्मा से जुड़े गुण एक जन्म से दूसरे जन्म तक स्थाई रूप से बनी रहती हैं। यदि आत्मा पूर्व जन्म से कोई दुर्गुण लेकर आयी भी  हैं तो ये सारे संस्कार उस आत्मा की सुधि भी करते हैं। और शायद इसीलिए विवाह संस्कार भी होते हैं और ये मानते हैं कि -विवाह एक जन्म नही वरन जन्म-जन्म का साथ होता हैं। 

सोमवार, 20 मई 2019

दम तोड़ती भावनायें

   


     "क्या ,आज भी तुम बाहर जा रहे हो ??तंग आ गई हूँ मैं तुम्हारे इस रोज रोज के टूर और मिटिंग से ,कभी हमारे लिए भी वक़्त निकल लिया करो। " जैसे ही उस आलिशान बँगले के दरवाज़े पर हम पहुंचे और नौकर ने दरवाज़ा खोला ,अंदर से एक तेज़ आवाज़ कानो में पड़ी ,हमारे कदम वही ठिठक गये। लेकिन तभी बड़ी शालीनता के साथ नौकर ने हमे अंदर आने का आग्रह किया। अंदर एक बड़ा सा गेस्ट रूम था जो सारे आधुनिक प्रसाधनो से सुसज्जित था। नौकर हमे बैठने का इशारा कर ये कह कर चला गया कि -मैडम को आप के आने की सुचना देता हूँ। अंदर जाते ही वो आवाज़ जो अब तक चीखने  सा हो चूका था और तेज़ आने लगी।स्पष्ट हो चूका था कि पति पत्नी एक दूसरे पर चीख चिल्ला  रहे हैं।  मैंने अपनी दोस्त स्वाति की तरफ प्रश्नसूचक निगाह से देखा ,उसने धीरे से कहा -कोई बात नहीं न बैठो ,बड़े  घरो में तो ये सब होता ही रहता है। मैंने कहा - क्या ,ये चीखना -चिलाना ? वो बोली - हां ,इग्नोर करो। 

शनिवार, 11 मई 2019

" माँ "

      


   " मदर्स डे " आने वाला हैं अभी से सोशल मिडिया पर " माँ " शब्द पूरी तरह छा चूका हैं। सोशल मिडिया का वातावरण माँ मयी हो गया है, एक धूम सी हैं " माँ " पर ,कितनी सारी प्यारी प्यारी ,स्नेहिल कविताऐ  रची जाएगी , कहानियाँ लिखी जायेगी और स्लोगन और quotes तो पूछिये मत एक से बढ़कर एक लिखे जायेगे। कुछ देर के लिए मन भर्मित सा हो जायेगा -"  हम तो यूँ ही बोलते रहते है कि -आज कल भावनाएं  मर चुकी हैं ,बच्चे माँ बाप की कदर नहीं करते ,वगैरह वगैरह। अरे नहीं ,देखे तो हर एक की भावनाए कैसी उमड़ी रही हैं ,सब के दिलो  में माँ के लिए प्यार ही प्यार दिखाई दे रहा हैं ,सब माँ के प्यार -दुलार ,त्याग और संस्कार की कितनी अच्छी अच्छी बाते कर रहे हैं। कैसे कह सकते हैं.हम ...ऐसा कि- बच्चे माँ बाप से सरोकार नहीं रखते। देखो तो, इन दिनों सभी माँ के भक्त ही दिखाई दे रहे हैं।

सोमवार, 6 मई 2019

हँसते आँसु



हजारो तरह के ये होते हैं आँसु
अगर दिल में गम हैं तो रोते हैं आँसु
ख़ुशी में भी आँखे भिगोते हैं आँसु
इन्हे जान सकता नहीं ये जमाना
मैं खुश हूँ मेरे आँसुओं पे न जाना
मैं तो दीवाना ,दीवाना ,दीवाना 


 "मिलन " फिल्म का ये गाना वाकई लाजबाब हैं। आनंद बक्शी के लिखे बोल रूह तक में समां जाते हैं। सच ,जब अंतर्मन में भावनाये मचलती हैं तो दिल की सतह पर दर्द की तपिस से जो बादल उमड़ते हैं वो आँखों से पानी की बून्द बन बरस जाते हैं।  आँसु ,महज आँखों से बहती पानी की बून्द भर नहीं हैं , ये आँसु प्रियतम के वियोग में बहे तो आँखों से लहू के कतरे बन बरसते हैं तो वही  प्रिये मिलन के इंतज़ार में बहे आँसु  फूल बन राहो में बिखर जाते है और प्रियतम से गले मिलते ही ये आँसु मोती बन जाते हैं। और जब कभी कोई अपना छल करता हैं तो यही आँसु  आँखों से अंगारे बन बरसने लगते हैं। सच ,आँसु  के भी कितने रूप है ? 

मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

" भाग्य विधाता "- कौन ??

  


  " मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं हैं " बचपन से ही ये सदवाक्य  सुनती आ रही हूँ। कभी किताबो के माध्यम से तो कभी अपने बुजुर्गो  और ज्ञानीजनों के मुख से ये संदेश हम सभी तक पहुंचते रहे हैं। लेकिन ये पंक्ति मेरे लिए सिर्फ एक सदवाक्य ही हैं । क्योकि मैंने कभी किसी को ये कहते नहीं सुना कि "हमारा जीवन ,हमारा भाग्य जो हैं वो मेरी वजह से हैं " मैंने  तो सब को यही कहते सुना हैं कि "भगवान ने हमारे भाग्य में ये दुःख दिया हैं।" हाँ ,कभी कभी जब खुद के किये किसी काम से हमारे जीवन में खुशियाँ आती हैं तो हम उसका श्रेय खुद को जरूर दे देते हैं और बड़े शान से कहते हैं कि " देखिये हमने बड़ी सोच समझकर ,समझदारी से ,अपनी पूरी मेहनत लगाकर फला काम किया हैं और आज मेरे जीवन में खुशियाँ आ गयी। " लेकिन जैसे ही जीवन में दुखो का आगमन होता हैं हम झट उसका सारा दोष ईश्वर और भाग्य को दे देते हैं। क्यूँ ? जब सुख की वजह हम खुद को मान सकते हैं तो दुखो की जिम्मेदारी हम ईश्वर पर कैसे दे सकते हैं ? हमारी समझदारी तो देखे ,ऐसे वक़्त पर अपने आप को दोषमुक्त करने के लिए हमने एक नया स्लोगन बना लिया " ईश्वर की मर्ज़ी के बिना तो पत्ता भी नहीं हिल सकता। "

"अब "

 "अब" अर्थात  वर्तमान यानि जो पल जी रहें है...ये पल अनमोल है...इसमे संभावनाओं का अनूठापन है...अनंत उपलब्धियों की धरोहर छिपी है इस ...