सोमवार, 4 मार्च 2019

एक खत पापा के नाम




आदरणीय पापा जी ,
                                सादर प्रणाम ,
  ये नहीं पूछूंगी कि- कैसे है आप ? कहाँ है आप ? क्योकि मैं जानती हूँ -आप उस परमलोक में है जहां सिर्फ आनन्द ही आनन्द है। ये भी जानती हूँ कि उस परम आनंद को छोड़ कर आप कभी कभी हम सब के इर्द गिर्द भी मडराते रहते है। जानती हूँ न अच्छे से आप, को इतना ज्यादा प्यार करते है आप हम सब से कि रह ही नहीं सकते हम सब से ज्यादा देर दूर और मुझसे तो और नहीं। याद है न माँ आप से कितना लड़ती थी मेरे शादी के लिए और आप क्या कहते थे -" मैं नहीं रह सकता अपनी बेटी से एक दिन भी दूर "और माँ गुस्सा होकर कहती -" कितने स्वार्थी बाप है आप " फिर आप झट से कहते -मैं  तुम्हारे साथ दहेज़ में चलूँगा है न  बेटा ,तुम्हारी सास से  कहूँगा कि बहु के साथ उसके बाप को भी कबुल करो तब अपनी बेटी विदा करुँगा और मैं भी आप से लिपट कर कहती -बिलकुल ठीक पापा जी। 

        शायद आप के प्यार के वजह से ही भगवान ने अजीब सा ससुराल ढूढ़ रखा था मेरे लिए जहां कहने को सब थे पर मेरा कोई नहीं था। आप ने तो ठीक से मेरे ससुराल के बारे में पता भी नहीं किया था। आप को पता भी नहीं था कि आप के दामाद को बचपन में ही उनके माँ बाप ने उनकी बुआ को गोद दे दिया था और उसके बाद उनसे कोई अच्छा सम्बन्ध नहीं रखे थे जिस वजह से आप के दामाद उनसे नाराज़ रहते थे और बुआ फूफा के भी जल्द ही इस दुनियां  से चल जाने के बाद वो अपने आप को दुनियां में अकेला ही समझते थे। पहली नज़र में ही दामाद में पता नहीं आपने क्या देखे लिया था कि सिर्फ यही कहते थे - "मेरे पुरे जीवन के पुण्य का फल है ये ,तुम्हे कभी कोई तकलीफ नहीं होने देगा।"आप का कहा बिल्कुल सच ही था पापा। उन्होंने मुझे ही खुश नहीं रखा बल्कि आप सब को भी एक बेटे जैसा प्यार किया। धीरे धीरे परस्थितियां कुछ ऐसी बनती चली गई कि हम सब भाई बहन दिल्ली के एक ही मुहल्ले में थोड़ी थोड़ी दुरी पर ही बस गये। रिटायर्ड होने के बाद आप भी दिल्ली आ गये  और फिर आप मुझसे कभी दूर नहीं रहे। 

    कोई पूजा -पाठ हो ,त्यौहार -पार्टी हो अगर मैं आने में थोड़ी देर कर दूँ तो कितना परेशान हो जाते थे आप। कहते - " सब सुना लगता है तुम्हारे बिना "फिर गले लगा कर माथा चूमते। भैया कितना छेड़ते थे न हमे - " पापा की लाड़ली तो बस यही है हम सब तो यूँ ही है " है न पापा जी। एक दिन तो सब ने पूछ ही लिया आप से - आप रानी को सब से ज्यादा प्यार क्यों करते है "तब आप ने कहा था - तुम चार बच्चे हो मेरे,अगर मैं तुम सब से कुछ कहता हूँ तो तुम सब पूछते हो " क्यूँ  " मगर रानी को कुए में भी कूदने को कहूँ तो बिना किसी सवाल के एक पल भी गवाये बिना कूद जाएगी,बस इतना सा फर्क है। तभी मैं भी उसकी सारी बाते मानता हूँ ,याद रखना तुम सब "ये मेरे आँगन की तुलसी है " कभी तुम सब का बुरा नहीं करेगी ,हमेशा तुम्हारे भले का ही सोचेंगी। कितना प्यार और कितना भरोसा था आप को मुझ पर। 

    पापा जी , क्युँ इतना प्यार करते थे आप हम सब से ,माँ के बिना तो एक पल भी रहना गवारा नहीं था आप को। बताये तो भला इतना भी कोई प्यार करता है अपने बच्चो से, पोते -पोतियो से ,आस -पड़ोस से ,हाँ। आप को अंदाज़ा भी है कितनी तकलीफ हुई थी हमे आप को आखिरी विदाई देते वक़्त। अरे नहीं ,आप तो जाते वक़्त हमे वो दर्द भी देना नहीं चाहते थे तभी तो इस परिस्थिति का सामना करने के लिए भी हमे पहले से तैयार कर दिए थे वो भी दृढ़ता से। बचपन से ही सिखाते थे न आप ,हर परिस्थिति का सामना करना तभी तो आखरी विदाई के पांच दिन पहले से हम सब को मानसिक रूप से यूँ तैयार कर दिया कि हम भाई बहन क्या ,सारे बच्चो ने  भी  आप को ख़ुशी ख़ुशी जाने को कह  दिया।यही चाहते थे न कि आप के जाने के बाद हम सब आप के वियोग में तड़पे नहीं। आप इतने पर भी कहा सुनने वाले थे जब तक माँ ने आप से वादा नहीं किया कि -" आप जाइये मैं हर जन्म में आप के पास ही आऊँगी।" आप सोच सकते है माँ ,जो एक पल भी आप के बिना रह नहीं सकती थी वो अपने हाथो से तुलसी और गंगा जल आप के मुँह में डालते हुए कैसे आप को जाने की इजाजत दी होगी। 

     याद है न वो लम्हा आप को, हाँ -हाँ ,मुझे पता है आप कहेगे - "अरे बेटा भूल जाओ न वो सब " नहीं भूल सकते वो लम्हा पापा जी ,नहीं भूल सकते 31 दिसंबर 2016 का वो मनहूस दिन ,मैं मुंबई में थी और आपने मुझे फोन किया -बेटा मुझे साँस लेने में थोड़ी दिकक्त हो रही है,क्या करू ?और मैंने एक दो होमिओपैथ की दवा बताई और कहा कि -भैया को बुलाये और जल्द से जल्द डॉक्टर के पास जाये।दो घंटे में ही आप की हालत इतनी ख़राब हो गई कि हॉस्पिटल पहुंचते पहुंचते आप I.C.U में चले गए। भगवान की मेहरबानी कि उस दिन आप जाते जाते रुक गये लेकिन उसी दिन से आप की अनंत पीड़ा का सफर शुरू हो गया। क्या -क्या नहीं हुआ आप के साथ, हट्टे कठे मेरे पापा जो जीवन में कभी डॉक्टर के दरवाज़े नहीं गए ,छोटी मोटी बीमारियां होती तो मेरे होमिओपैथ दवा से ही ठीक हो जाते और बड़े शान से कहते -" मेरा डॉक्टर तो मेरी बेटी ही है वो चाहे ज़िंदा रखे या मार डाले ,मैं इन डॉक्टरों के पास नहीं जाता ये रक्षक कम भक्षक ज्यादा हो गए है ,इनके पास से लोग अपनी नसीब से बच के आते है उनके इलाज से नहीं ,नफरत है मुझे उनसे ,रति भर भी इंसानियत नहीं बची इनमे।" 

     आप ने सही ही कहा था पापा ,एक बार जो आप उनके हथे चढ़े तो मौत के मुँह में जाकर ही आप को आराम मिला। दो महीने में पहले फेफड़े में पानी फिर एंजिओग्राफी ,हार्ट व्लॉकेज़ ,फिर ओपन हार्ट सर्जरी सब हो गया और अंत कैसे किया उन डॉक्टरों ने कैंसर बता कर वो भी फोर्थ स्टेज का। दो महीने में चार बार वेंटिलेटर पर गए आप ,लोग एक बार वेंटिलेटर पर जाकर वापस नहीं आते  आप चार बार वापस आये हमारे लिए। मुंबई में मुझे पल पल की आप की खबर मिल रही थी,आप एक ही बात कहते रानी को बुला दो। आप की नतनी को एक बहुत बड़ा काम मिला था फिर भी हमने वो सब छोड़ बड़ी मुश्किल से टिकट की  व्यवस्था कर 8 जनवरी को आप के पास आगये थे।मैं भूल नहीं पाती पापा वो लम्हा, जब मैं आयी और आप से लिपट कर रोने लगी और कहा -क्या हाल कर रखे है आप अपना ,तो आपने भी रोते हुए कहा था - तुम मुझे छोड़कर चली गई थी न इसीलिए मेरी ये हालत हो गई अब तुम आ गई हो न मैं ठीक हो जाऊँगा और नतनी की तरफ देख कहा -तुम्हारे कारण पहली बार मैं अपनी बेटी से दो महीने दूर रहा। और ये सुन वो भी रोने लगी। 

      23 जनवरी को आप का ओपन हार्ट सर्जरी हुआ ,जब तक आप ऑपरेशन थिएटर से बाहर नहीं आ गए पूरा परिवार महामृत्यंजय मंत्र का जाप करता रहा। आप को तो याद ही होगा न पापा जी ,ऑपरेशन के बाद तो सब ठीक ही था ,आप घर आगये ,हम सबने जी जान लगाकर आप की खूब सेवा की , बस सो नहीं पाते थे आप ,सोते ही साँस लेने में दिक्कत होती थी है न पापा ,इसीलिए हम भाई बहन बारी-बारी से हर रात आप के पास सोते थे।लेकिन पापा जी अपने उसमे भी मेरे बिना चैन नहीं था कहते -बेटा ,जिस रात तुम मेरे पास होती हो उस रात में बड़ा सुकून से रहता हूँ और फिर मैं एक रात बीच कर रहने लगी ,पूरा दिन तो आप के साथ ही रहती। माँ कहती- उसे भी तो थोड़ा आराम चाहिए कितना परेशान करेंगे उसे।मुझे तो आप के सेवा करते वक़्त कभी थकावट होती ही नहीं थी। 
    
    सब ठीक हो गया था न पापा जी ,लेकिन अचानक आप की साँस लेने की तकलीफ फिर से  बढ़ने लगी। 15 फरवरी को आप की हालत फिर खराब हुई और आप को फिर से एडमिट करना पड़ा और 16 फरवरी को आप फिर वेंटिलेटर पर पहुंच गये। हमे लगा इस बार तो हम आप को खो ही देंगे। लेकिन भगवान का चमत्कार कहे या आप का प्यार आप फिर एक बार मौत के मुँह से निकल हमारे पास वापस आ गए।  4 -5 दिन के अंदर आप जेनरल वार्ड में आ गये और तेज़ी से स्वस्थ होने लगे, और  लगा सब कुछ ठीक हो गया,अब आप को कुछ नहीं होगा। लेकिन शायद भगवान को अभी मेरी और कठिन परीक्षा लेनी थी ,21 फरवरी को खबर आई कि -आप की नतनी ने जो मूवी साइन की थी उसका शूट 24 से मध्यप्रदेश में होगा। मनु ने वो मूवी आप के कहने पर ही तो साइन की थी ,कितने खुश थे आप ,आप की यही तो ख्वाईश थी कि एक बार मनु को आप बड़े परदे पर देखे। मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करू,मनु को अकेले जाने देना उचित नहीं था ,ये उसका पहला शूट। फिर माँ ने कहा  कि -"ये मनु का भविष्य और तुम्हारे पापा का सपना है तुम जाओ , पापा अब स्वस्थ हो रहे है ,अब उन्हें कुछ नहीं होगा। "

      मैं 22 फरवरी को रात 9 बजे के बस से मध्य्प्रदेश को निकली और आप को अचानक पता नहीं क्या हुआ कि आप उसी रात 3 बजे फिर से वेंटिलेटर पर चले गये। समझ नहीं आ रहा था कि डॉक्टर हमारे साथ छल कर रहे थे या हमारी किस्मत।मैं बस में सोई थी अचानक देख रही हूँ कि आप मेरा हाथ पकडे है और कह रहे है -बेटा अब जाने दो, अब तकलीफ नहीं सहा जा रहा है,मुझे जाने दो बेटा। मैं बोल रही हूँ -नहीं पापा जी ऐसा नहीं कहे ,आप को कुछ नहीं होगा लेकिन आप का हाथ मेरे हाथ से छूट जाता है ,घबड़ा कर मेरी आँखे खुल जाती है। मैं उसी वक़्त हॉस्पिटल में भाई को फोन की लेकिन उसने मुझे कुछ नहीं बताया। पापा जी, बीच के सात दिनों की बात तो आप नहीं जानते होंगे न। मैं बताती हूँ -25 को आप फिर वेंटिलेटर से उतर गये ,डॉक्टरों ने आप का कोई बहुत बड़ा टेस्ट किया और 26 को बताया कि -आप को कैंसर है ,जहर पुरे जिस्म में फैल चूका है ,अब आप लाइलाज हो चुके है ,कितने दिन जिन्दा रहेंगे नहीं पता मगर जब तक जियेगे I.C.U के मशीनों के सहयोग से ही जियेंगे। 
     
     पापा जी ,मैं इन सारी बातो से अनजान थी ,मुझे किसी ने नहीं बताया ,सब जानते थे कि ये सुन कर मैं सब छोड़ छाड़ कर आ जाऊँगी लेकिन पापा जी मेरी आत्मा तो आप से जुडी है ,मुझ लग रहा था कुछ ठीक नहीं है, मेरा मन बहुत बेचैन रहता था ,दिन रात यही दुआ करती कि कुछ अनहोनी हो जाये और ये शूट रुक जाये और आख़िरकार भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ही ली। प्रोडूसर के साथ कुछ समस्या हो गई और शूट रुक गया। 28 फरवरी के दोपहर में जैसे ही मुझे ये बात पता चला मैंने उनलोगो से कहा कि मेरे जाने की व्यवस्था  कर दे ,यूनिट के लोग अभी रूक रहे थे लेकिन मैं ,मनु  दो तीन लोगो के साथ उसी वक़्त निकल पड़ी । मैंने बहन को बताया कि हम यह से निकल रहे है कल सुबह दिल्ली पहुंच जायेगे तो उसने मुझसे कोई सवाल नहीं किया और बोली जल्दी आ जाओ,पापा को भी आज हम घर ला रहे है,10 बजे रात तक वो भी आ जायेगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ -मैंने पूछा -पापा ठीक है न ,तो उसने कहा -हां ,डिस्चॉर्ज हो गए है ,ठीक है। उसके आवाज़ में उदासी थी ,मेरा दिल घबराने लगा ,दिल करता था उड़ के पहुंच जाऊ। 

   एक मार्च को सुबह 7 बजे मैं घर पहुंची तो देखती हूँ आप का पूरा कमरा I.C.U बना है ,हर पल आप के साथ एक डॉक्टर भी था ,हॉस्पिटल घर आ गया था। मेरे होश उड़ गए। बहन ने सारी बात बताई और कहा कि -माँ को अभी कुछ नहीं पता,समझ नहीं आ रहा कैसे बताये ,वो तो खुश है की पापा घर आ गये। मुझे इतनी आत्मग्लानि हुई कि आप के साथ इतना सबकुछ हो गए और मैं आप के पास नहीं थी। आप बहुत ज्यादा कमजोर हो गए थे आप की आवाज़ भी साफ़ से नहीं निकल रही थी ,मैंने आप का हाथ पकड़ आप से पूछा -आप नाराज़ है मुझसे ,मैं कई दिनों से आप के पास नहीं थी। आप ने आश्चर्य से मेरी तरफ देख कर कहा -नहीं तुम तो रोज आती थी हॉस्पिटल में मेरे पास ,नाराज़ क्यों होऊंगा। आप को कभी एहसास ही नहीं हुआ मुझसे दूरी का। कैसा प्यार था आप का । एक मार्च ,उस दिन आप का जन्मदिन था हम सब ने शाम को आप से केक कटवाया और मंत्र उच्चारण के साथ शांतिपाठ किया ,आप बच्चो की तरह खुश हो रहे थे ,सब को अपने हाथो से केक खिलाया आपने ,डॉक्टर को भी आप कहते थे -खाना खा के जाना। आप का प्यार देख वो डॉक्टर भी रो पड़े थे। 

   2 मार्च को आप थोड़े ठीक थे  लेकिन आप के शरीर के सारे ऑर्गेन धीरे धीरे काम करना बंद कर रहे थे और आप के शरीर में पानी भरा जा रहा था। डॉक्टर मूक बने थे ,उनका कहना था -ऐसी हालत में भी कुछ लोग छह छह महीने ,एक साल तक भी ज़िंदा रहते है लेकिन उनकी स्थिति बहुत दयनीय होती है क्योकि शरीर से पानी रिसने लगता है और शरीर पर जख्म बनने लगते  है।  हम समझ नहीं पा रहे थे हम क्या करे ? अपनी तरफ से हर प्रयास कर लिया था हमने ,देवी -देवता ,डॉक्टर -वैध ,प्रार्थना -दुआ सब कुछ। सब का मत था कि माँ को कुछ नहीं बताया जाये लेकिन माँ हर पल मुझसे सवाल करती -"पापा को क्या हो रहा है रानी। " पापा जी, माँ के वो कतार शब्द मुझसे सहे नहीं जा रहे थे और ना ही उन्हें अँधेरे में रखना मुझे उचित लग रहा था और ना ही आप की वो दयनीय अवस्था ही मुझसे देखी जा रही थी.आप ही बताये कैसे देख सकती थी मैं आप की वो हालत ,जरा सी आप को खांसी हो जाती थी तो मैं बेचैन हो जाती ,आप को एक पल भी मैं दर्द में नहीं देख पाती थी। आप और माँ हमेशा यही कहते थे न -" ऐसा लगता है ये हमारी बेटी नहीं हमारी माँ है। " कैसे नहीं बनती माँ आप दोनों की, 13  साल की उम्र से आप दोनों की सेवा करती आ रही हूँ ,भैया तो हमसे दूर रहते थे न ,बेटा -बेटी दोनों रूप में आप दोनों को संभालते आ रही हूँ। सास -स्वसुर भी नहीं मिले जो मेरा प्यार थोड़ा बट जाता। 

     2 मार्च ,रात के ढाई बजे ,मैं और भईया आप के साथ थे आपने कहा -रानी मुझे भूख लगी है,मैं झट से ओट्स बना लाई आप ने दो निवाला बड़ी मुश्किल से खाया था ,आप खाना निगल ही नहीं पा रहे थे,बड़ी मुश्किल से आपने पूछा था -बाबू (मनु )कहाँ है,मैंने कहा -सब ठीक है पापा जी ,आप शुकुन से सो जाये।आपने" हां" कहा ,मैं आप का माथा सहलाने लगी और आपने आँखे बंद कर ली,मैं आप की हालत बर्दास्त नहीं कर पाई और रो पड़ी। मुझे क्या पता था इस बार जो आपने आँखे बंद की तो कभी खोलेंगे नहीं। आपने उसके बाद आँखें खोली ही नहीं। आप का शरीर ख़त्म हो रहा था, आत्मा पीड़ा में थी फिर भी हमारे मोह -प्यार में बंधी थी और  हम दुविधा में ,आप का शरीर जो बेहद तकलीफ में है उसको किसी भी तरह ज़िंदा अपने सामने रख, पापा के होने का सुख ले या आप को अपनी मोह प्यार से आज़ाद कर आप की आत्मा को असीम शांति दे और खुद आप का वियोग सहे। आख़िरकार मैंने तय किया ,आप को इतनी पीड़ा में नहीं रहने दूँगी ,आप जाये उस परमधाम जहां असीम शांति है। हां -हां पापा जी ,ये मेरा फैसला था ,सब मुझसे नाराज़ हो रहे थे ,भईया रो रो कर कह रहे थे -मैं अभी आस नहीं छोडूंगा ,पापा ठीक हो जायेगे रानी,छोटी बहन तड़पकर कह रही थी-पापा को ऐसे कैसे जाने दे दीदी,माँ कैसे जियेगी ,छोटा भाई जिसने सबसे ज्यादा हॉस्पिटल में आप के साथ वक़्त बिताया था ,आप के हर दर्द- तड़प  को करीब से देखा था उसने ,उसकी आँखें आपकी तड़प और अपनी आंसू छुपाते छुपाते खुश्क हो चुकी थी और जुबान निशब्द। 

       3 मार्च को शाम तक भी जब आपने आँखे नहीं खोली ,सिर्फ मशीन पर चल रही टिक टिक आप की धड़कनो का एहसास करा आपके ज़िंदा होने का भ्र्म दे रही थी तब मैं सब को माँ के पास लेके आई ,माँ का हाथ पकड़कर माँ से बोली - माँ अब मैं आप से जो कहने जा रही हूँ उसे बड़े धैर्य से सुनना ,आप पापा को बहुत प्यार करती हो न ,उन्हें तकलीफ में नहीं देख सकती हो न , माँ ने " हां "  में सिर हिलाया और बोली क्या हुआ बेटा - माँ पापा को कैंसर है उनका शरीर अंदर ही अंदर गल रहा है,वो बहुत पीड़ा में है ,देखो कल से उन्होंने आँखें भी नहीं खोली ,इन मशीनों के जरिये उनकी धड़कन चल रही है ,माँ वो तकलीफ में है फिर भी हमारे मोह बस जाना नहीं चाहते ,माँ हम सब को उन्हें अपनी मोह से आज़ाद कर जाने की इजाजत देनी चाहिए ,हम जब तक नहीं कहेंगे वो नहीं जायेगे यूँ ही तड़पते रहेंगे।माँ तड़प कर रो पड़ी ,सब रोने लगे। मैं सारे परिवार को लेके आप के पास  आई थी और सब से बोली -सब आप के माथे को चूमे आप के पैर छुए ,अपनी गलतियों की माफी मांगे और कहे-  "आप जाईये ,हम सब  आप से बहुत प्यार करते है आप को तकलीफ में नहीं देख सकते ,हम आप के लिए नहीं रोयेंगे ,आप भगवान के पास जा के भी हमेशा हमारे साथ रहेंगे। " जो डॉक्टर बैठे थे वो भी बच्चो के मुख से ये बाते सुन रो पड़े, उन्हों ने कहा -वो सब सुन रहे है बस कोई प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे है,आप सब ध्यान से देखे आप की बाते सुन उनके शरीर में हरकत हो रही है। सब ने इजाजत दी लेकिन माँ ने नहीं आई ,कैसे आती ? कैसे कहती अपनी मुख से कि -आप जाये। और मैं जानती थी माँ के कहे बिना तो आप घर से नहीं निकलते थे तो हमेशा के लिए उन्हें छोड़कर कैसे जाते। 

    4 मार्च को आप के शरीर में पानी बहुत ज्यादा भरने के कारण शरीर से पानी रिसने की आशंका थी ,डॉक्टरों ने तय किया कि शाम तक पानी निकलने की कोई व्यवस्था करेंगे। मुझसे आप का यूँ तिल -तिलकर मरना देखा नहीं जा रहा था,माँ बस रोये जा रही थी। शाम 5 बजे मैंने माँ को फिर समझाया -" माँ बोल दो उन्हें जाने को,तुम क्या चाहती हो उनके शरीर की दुर्गती हो "माँ टूट चुकी थी ,उसे समझ आ चूका था। माँ अपने हाथो में गंगा जल और तुलसी पत्र ली और गायत्री मंत्र के साथ आप के मुँह में डाल दिया,और अपने आंसुओ को पोछ,आप के हाथ को अपने हाथो में लेकर बड़ी दृढ़ स्वर में कहा- " मैं आप को इजाजत देती हूँ ,आप शांति से जाये ,हम फिर मिलेंगे,मैं वादा करती हूँ हर जन्म में आप के साथ ही रहूँगी "माँ की बाते सुन आप के जिस्म में बड़ी तेज़ हरकत हुई और आँखो  से आंसू निकलने लगे और फिर तुंरत ही शांत भी हो गया। माँ इतना कह बिना रोये दूसरे कमरे में जाकर सो गयी,ऐसा लगा जैसे उसके सारे काम खत्म हो गए ,उसने नियति को मान लिया। मैं माँ की हालत देख तड़प उठी ,रो तो सकती नहीं थी आप की बहदुर बेटी जो ठहरी ,हमेशा आप यही कहते थे न - " किसी भी परिस्थिति में कमज़ोर नहीं पड़ना, मेरा नाक नहीं कटवाना , मेरा सबसे बहादुर बेटा हो तुम। " आप की यही बात मेरे कानो में गूंज रही थी। अपने पापा की बात तो मैं कभी टलती ही नहीं थी न ,तो कसम से पापा जी मैं बिलकुल नहीं रोई,सच। पापा जी ,मैं रोती तो माँ को कौन संभालता,छोटे बच्चो और बहन भाई को कौन संभालता ,मुझे अपनी जिम्मेदारी का हमेशा से एहसास रहा है आप जानते है न। 

    लेकिन पापा जी , एक बार सोचिये तो सही,मैं कैसे उस दर्द ,उस पीड़ा को सह पाई ,आपकी लाड़ली जो शादी होकर विदा  होने के वावजूद 45 साल की उम्र तक कभी आप से दूर नहीं रही ,आप जब कभी मरने- वरने की बात करते तो मैं छोटे बच्चो के जैसे आप से लड़ पड़ती ,आप के बिना जीने के ख्याल से ही मैं काँप जाती थी। पता  है पापा जी,आप के दामाद सब से कहते थे कि -अगर पापा को कुछ हो गया तो रानी को संभालना मुश्किल हो जायेगा,सब को मेरे लिए ही डर था ,मैं नहीं सह पाऊँगी आप का गम और देखे न मैं कैसे सह गई बल्कि मैंने ही तो सब को संभाला। आखिर कैसे ? हां ,मैं समझ रही हूँ आपने ही मेरे साथ कुछ गड़बड़ किया होगा , है न पापा जी ,जब भी कोई मुश्किल परिस्थिति आती थी आप अपना आशीर्वाद भरा हाथ मेरे सर पे रख देते थे और कहते थे - " विजयी भवः " और मैं जीवन के हर मुश्किल से लड़कर आसानी से निकल आती थी,और फिर आप मेरा सर चूमकर कहते थे -" मेरा बहादुर बेटा "और इसी  तरह आप मुझसे हर मुश्किल काम करवा लेते थे और उस वक़्त भी आपने जरूर वही जादू कर दिया होगा ,हां न ,आप बहुत बुरे है ,मैं आप से कभी बात नहीं करुँगी ,आप को अंदाज़ा भी है कैसे मैंने अपने आप को पथ्थर बना लिया था। 

       माँ के इजाजत देने के बाद मशीन की टिक-टिक आहिस्ता आहिस्ता कम होने लगी और आख़िरकार रात 8 बजे के करीब आप उस सड़े गले शरीर का साथ छोड़ उस परमधाम की ओर रवाना हो गये और छोड़ गये अपना ढेर सारा प्यार ,आशीर्वाद और यादें। वैसे तो आप की बहुत सारी बाते मुझे अच्छी नहीं लगती थी,आप का अपने पराये सब से लगाव  ,सब पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना ,आपकी क्षमाशीलता ,अपने बच्चो को बेइंतहा प्यार और भरोसा करना,मैं जानती थी आप की ये सब बाते एक दिन हमे बहुत रुलायेगी ,इसीलिए मुझे पसंद नहीं थी। माँ से तो प्यार के हद तक प्यार करना ,आप तो हमेशा कहते थे -माला जी मैं आप को छोड़कर कभी नहीं जाऊँगा ,पर  वादा कीजिये हर जन्म में आप मेरी ही रहेगी।" माँ भी तो गुस्सा होती थी आप के इन सब बातो से। अब देखिये कहती है न आपको " धोखेबाज़ " ,कहे भी क्यों नहीं ,दो महीने में आनन -फानन चलते बने ,सोचने समझने का मौका ही नहीं दिया। 

सात समुन्द्र पर से गुड़ियों के बाज़ार से अच्छी सी गुड़ियाँ लाना 
गुड़ियाँ चाहे ना लाना ,पापा जल्दी आ जाना ,पापा जल्दी आ जाना   

    जब हम भाई -बहन छोटे थे तब आप जब कहीं चले जाते तो हम यही गाना गया करते थे। लेकिन अब तो आप इतनी दूर चले गये कि चाह कर भी नहीं आ सकते पर आप सूक्ष्म रूप में हर पल हमारे साथ होते है ये हमे एहसास होता है। 

      पापा जी ,मैं ये पत्र आप को इसलिए लिख रही हूँ ताकि आप को बता सकूं,मैं जानती हूँ आप कही भी होंगे मेरी बाते आप तक जरूर पहुंचेगी और आप को मानना भी पड़ेगा -"  हर जन्म में आप ही मेरे पापा बनेंगे "मैं आपके बिना नहीं रह सकती ,मैं अब कुछ नहीं सुनुँगी,मैंने कह दिया सो कह दिया,मैं आप की ही बेटी बनुँगी। वैसे ,आप की जो बुरी आदत  है " जरूरत से ज्यादा प्यार करने वाला " वो मुझे पसंद नहीं  लेकिन कोई बात नहीं मैं सभाल लुंगी आप को ,जैसे इस जन्म में संभालती थी आप को हर परिस्थिति से। वादा न ,प्लीज़ पापा जी........ 

O.K, तो वादा 
                    आपकी लाड़ली बेटी ,रानी 




ये लेख नहीं है मेरे पापा से मेरे दिल की बात है जो मेरे अंदर ही अंदर घुट रहा था ,मैंने पत्र के माध्यम से उन तक पंहुचा दिया मेरा मन शांत हो गया ,पापा हमेशा कहते थे -"दिल के दर्द को शब्दों में पिरो दो ,दर्द कम हो जायेगा।" पापा की दूसरी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजली स्वरूप ,मेरे पापा जहाँ कही भी हो भगवान उन्हें शांति प्रदान करे। 







39 टिप्‍पणियां:

  1. बेहद मर्मस्पर्शी कामिनी जी माफ करना में पूरा नहीं पढ़ सकती,क्योकि इसी दर्द से एक साल पहले मैं भी गुजर चुकी हूँ एक एक शब्द वहीं सब याद दिला रहे हैं। आपकी मेरी कहानी एक जैसी ही लगती रही है आपके लेख में एक बेटी का पिता के लिए प्रेम देख आँखे भर आईं मेरे भी बड़े भाई ने पिछले वर्ष ऐसी ही पीड़ा सही ज़िंदगी और मौत की जंग लड़ते लड़ते आखिर सदा के लिए साथ छोड़ गए जब अपना कोई साथ छोड़ जाएं बहुत पीड़ादायक होता है। आपके दु:ख को
    बहुत अच्छी तरह से महसूस कर रही हूँ। अंकल जी को सादर नमन 🙏

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    1. अनुराधा जी ,एक दोहा याद आ रहा हैं "जाकें पैर ना फटे बिवाई वो क्या जाने पीर पराई "सच है किसी का दर्द वही समझ सकता हैं जो उस दर्द से गुजरा हो।वैसे तो जीवन मरण नियति हैं लेकिन यूँ आनन फानन किसी अपने का छोड़ जाना कितना दुखदाई हो सकता है ये वही समझ सकता हैं जो इस दर्द से गुजर चूका हैं ,मेरे पापा मेरी पूरी दुनियां थे ना उनसे आगे कुछ था ना पीछे हैं। ये लेख नहीं अपनी पीड़ा को बाहर निकलने का प्रयास था। स्नेह सखी

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  2. अपने कष्ट नही कह पाये
    जब जब वे बीमार पड़े थे
    हाथ नहीं फैलाया आगे
    स्वाभिमान के धनी बड़े थे
    पाई पाई बचा के कैसे,
    घर की दीवारें बनवाई !
    जब देखेंगे खाली कुर्सी, पापा याद बड़े आयेंगे !

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    1. मेरे ब्लॉग पर आप का स्वागत है सतीश जी ,अपना कीमती वक़्त देने के लिए सहृदय धन्यवाद ,सच खाली कुर्सी देख पापा बहुत याद आते हैं ,सादर नमस्कार आप को ...

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  3. दर्द से भीगा एक बेटी की मर्मस्पर्शी खत । मन बहुत दुखी हुआ आपकी व्यथा पढ़ कर । ईश्वर की कृपा से उनका आशीर्वाद सदैव आपके साथ रहेगा ।

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    1. आप के इस सप्रेम वचनो का दिल से शुक्रिया ,स्नेह सखी

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  4. दर्द से भीगा एक बेटी का मर्मस्पर्शी खत । मन बहुत दुखी हुआ आपकी व्यथा पढ़ कर । ईश्वर की कृपा से उनका आशीर्वाद सदैव आपके साथ रहेगा ।

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  5. प्रिय कामिनी -- तुम्हारे इस अप्रितम लेख को पढ़कर निशब्द हूँ !!!!!दिवंगत पिताजी को समर्पित ये लेख हर उस बेटी के मन की अव्यक्त भावनाओं को शब्द देता है जिन्होंने आपकी ही तरह जीवन में इस स्नेहमयी छाया को खोया है | एक बेटी और पिता के बीच हमेशा ही स्नेह का अद्भुत नाता रहा है जिसे लिख पाना बिलकुल भी संभव नहीं | तुमने उन भावनाओं को बहुत ही भावपूर्ण ढंग से लिखा है जो उस समय तुम्हारे भीतर उमड़ी होंगी पापा के अंतिम सफ़र के दृश्य मुझे भी अपने दिवंगत पिताजी के बारे में सुनी बातें याद दिला गये | सखी मैं इतनी भाग्यशाली नहीं थी जो अपने पिताजी के साथ उस समय रहती पर उनके साथ भी दर्दनाक कैंसर का यही अनुभव रहा | | मन की वेदना के ज्वार को तुमने ज्यों का त्यों लेख में उतार दिया | शब्द - शब्द पीड़ा बही -- और सब अनकही कह गई | पिता के लिए इतनी गहन अनुभूतियाँ सराहना से परे हैं इनसे तुम्हारे उनके बीच के अद्भुत रिश्ते का पता चलता है |

    बहुत सी बातें जानी तुम्हारे बारे में

    बहुत ईमानदारी से लिखा गया - मन का यह संवाद दिवंगत आत्मा के प्रति गहन आत्मीयता से भरा भावपूर्ण उद्बोधन है ओ अत्यंत बेजोड़ है |इस के के लिए तुम्हे साधुवाद | स्वर्गीय पापा की पुण्य स्मृति को कोटि नमन | उनके दिए संस्कारों के रूप में हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगे | सस्नेह --

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    1. तुमने सही कहा सखी,पिता के लिए बेटी के प्यार को शब्दों में पिरोना बहुत मुश्किल हैं ,इस प्यार का कोई सानी नहीं ,ये भी सच हैं की एक बेटी के दर्द को जान हर उस बेटी की आखें भर जायेगी जिन्होंने अपने पिता को खोया हैं। सखी ,मैं इसे अपना दुर्भाग्य कहूँ या सौभाग्य कि मैं कभी अपने पापा से दूर रही ही नहीं,जिस कारण उनकी कमी मुझे हर पल खलती हैं। लेकिन तुमने ये भी सही कहा कि उनका आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ हैं। मैंने अपना गम अब तक छुपाये रखा था ,आज तक माँ के सामने रोइ नहीं हूँ। आज ब्लॉग के इन अनजाने दोस्तों के साथ अपना गम साझा कर और उनके प्यार भरे शब्दों को सून मन थोड़ा हल्का लग रहा हैं। इस लेख कों लिखने का मेरा उदेश्य भी यही था कि मेरा दर्द थोड़ा कम हो जाये ,शुक्रिया सखी ,तुम सब के प्यार का

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  6. ना दुआ लगी ना दवा लगी -
    जाने कैसी थी नजर लगी
    सासों की डोर बड़े थामी -
    जब टूटी तब ना खबर लगी !!!!!!

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    1. सच सखी ,उस वक़्त तो हमे भी यही लग रहा था कि जरूर हमारे घर को हमारी खुशियों को किसी की नजर लग गई।

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  7. बहुत अच्छा और भावपूर्ण लिखा है आपने।

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    1. सहृदय धन्यवाद नीतीश जी , आप का मेरे ब्लॉग पर स्वागत है.

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  8. बहुत ही मार्मिक खत ... बस यहीं पर हम सब विवश हैं, पिता को खो चुकी हूँ इसलिए आपका दर्द समझ सकती हूँ , ईश्वर ही सहने की ताकत देते हैं ,आपके पिताजी की स्मृतियों को सादर नमन

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    1. दिल से धन्यवाद सखी ,माँ बाप होते ही हैं अति प्रिये ,किसी को खोने का दुःख वही समझ सकता हैं जिसने अपने किसी प्रिये को खोया हो।

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  9. उत्तर
    1. आप का मेरे ब्लॉग पर स्वागत है जयश्री जी ,सहृदय धन्यवाद

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  10. नमस्ते,

    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 7 मार्च 2019 को प्रकाशनार्थ 1329 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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  11. प्रिय कामिनी जी आपकी हृदय स्पर्शी प्रस्तुति जैसे मेरी जिन्दगी का एक हिस्सा है, मैने भी अपने दोनो पिता को खो दिया मेरे ससुरजी भी मेरे पिता से बढ़कर थे जो स्नेह उन से पाया नही कह सकती की वो मेरे जनक नही ससुरजी थे। दोनो का अगाध प्रेम झटके में टूट गया बस उस हिस्से को हृदय में संभाल कर सहेज रखा है।
    आपके लेख ने तारों को झनझना दिया।
    अप्रतिम अतुलनीय लेख आपका।

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    1. प्रिये कुसुम जी ,माता -पिता का प्यार ईश्वर का दिया वरदान होता हैं ,मैं खुश नशीब थी कि ये प्यार मुझे अथाह मिला ,आप तो मुझसे भी ज्यादा भाग्यशाली रही आप को दो दो पिता का भरपूर प्यार मिला। उन्हें अचानक से खोने का दुःख भी दोनों का एक सा रहा। बस अब यही संतोष कर सकते है की उनका आशीर्वाद हमारे साथ हमेशा रहेगा। ये खत अपनी पीड़ा को कम करने का प्रयास भर था क्युकी उससे मैं निकल नहीं पा रही हूँ। मैंने ब्लॉग लिखने का काम भी सिर्फ इस गम से उभरने के लिए किया था ,खुशनशीब रही की आप सब जैसे दोस्तों का साथ मिल गया ,इसके लिए मैं सखी रेणु का दिल से शुक्रिया अदा करती हूँ,स्नेह सखी

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  12. पिता की जगह कोई नहीं ले सकता है। चले जाना ऐसा लगता है जैसे यात्रा पर गये हों। महसूस करें तो लगता है यहीं कहीं आसपास हैं।

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    1. आदरणीय सर ,सादर नमस्कार ,आप मेरे ब्लॉग पर आये मेरा सौभाग्य ,आपने सही कहा पिता का स्थान कोई नहीं ले सकता ,मुझे भी कभी कभी यही लगता है जैसे वो कही तीर्थ पर गए है लेकिन सर वो मेरे बिना तो तीर्थ पर भी नहीं जाते थे।

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  13. जी कामिनी जी आपका लिखा यह ख़त आज तीसरी बार पढ़े..हर बार पिता और पुत्री के प्रेम की गंगा में से मन भीग गया...अपने पापा से और ज्यादा जुड़ाव महसूस होने लगा.. क्या लिखकर सराहना करे किन शब्दों में श्रद्धांजलि दें यह समझ नहीं पा रहे...बस हृदय से प्रणाम स्वीकार करे मेरा।

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    1. ये मेरे मन की व्यथा थी जिसे शब्दों में पिरो कर मन को सन्तावना देने का प्रयास भर था मेरा ये खत या लेख जो कह ले ,आपने मेरे दर्द को भी अपना लिया ये सौभाग्य है मेरा , मैं धन्य हुई आप सब जैसे दोस्त पा कर,बेटियाँ पिता की लाड़ली होती है और बेटियों के लिए पिता एक पूर्ण संसार ,मेरे पिता भी मेरी पूरी दुनियां थे और यकीनन वो अब भी मेरे साथ होते हैं ,आप के स्नेह का सहृदय धन्यवाद सखी

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  14. पिता और पुत्री के मध्य प्रेम की अजस्र धारा को बहाता यह अनमोल पत्र वाकई आपके मन की व्यथा को व्यक्त करने में सार्थक रहा है, अपने माँ-पिता के प्रति जिसके मन में इतनी श्रद्धा और प्रेम हो वह हृदय सारे अस्तित्त्व से प्रेम किये बिना नहीं रह सकता. विनम्र श्रद्धांजलि आपके पिताजी को.

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    1. मेरे ब्लॉग पर आप का हार्दिक स्वागत है अनीता जी,आपके प्रेम और सान्तवना भरे वचनो से मन बहुत आह्लादित हुआ। पिता पुत्री का सम्बन्ध अतुलनीय होता ही हैं ,सादर स्नेह

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  15. पूज्य पिताजी के लिए आपका हृदयस्पर्शी खत पढ़कर आज वर्षों बाद पहली बार ऐसा लग रहा है कि हमारे जैसा दर्द किसी और ने भी सहा है आज मुझे भी अपनी तकलीफ शेयर करने का मन कर रहा है वरना आज तक मैने कभी इस दर्द को किसी से नहीं कहा क्योंकि मुझे लगा कि कोई इसे समझ ही नहीं सकता। पीड़ा को कम करने के लिए हमने अपने मन में अपने पापा को जीवित कर दिया हर बात उनकी तस्वीर से ऐसे कहनी जैसे उन्हीं से कह रहे हों ...और इसी विश्वास में कई चमत्कार भी हुए हैं हमारे जीवन में.....अगर हम यूँ कहें कि पापा ने हमारा साथ दिया तो लोग हमें पागल समझेंगे... पर सच कह रही हूँ और दिल से कह रही हूँ कि प्यार और विश्वास में बहुत बड़ी ताकत है हमारे अपने भी साथ न होकर भी साथ होते हैं हमारे एहसासों में .....शरीर मरता है आत्मा नहीं...।हर सुख दुख में वे अपने होने का एहसास कराते हैं।
    बहुत ही हृदयस्पर्शी और भावपूर्ण लेखन है आपका...परमपिता और पित्रजनोंं की कृपा सदैव आप पर बनी रहे।

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    1. प्रिये सुधा जी ,हम इस आभासी दुनियां के मित्र शायद इसीलिए बने है ताकि हम अपनी कथा व्यथा बेझिझक एक दूसरे से साझा कर सके और बेहतर तरीके से समझ भी सके ,क्योकि यहां हम सिर्फ उनकी ख़ुशी या गम सुनते है उन्हें व्यक्तिगत गुण या दोष से उन्हें नहीं जाचते -परखते। वो कहते है न कि जहां में ऐसा कौन है कि जिसको गम मिला नहीं "आप अगर किसी की पीड़ा तभी समझ सकते है जब आप उस से खुद गुजरे हो। आप की भावनाये में बखूबी समझ सकती हूँ क्योकि यही अनुभूति मुझे भी होती है मुझे महसूस होता हैंकि पापा हर वक़्त मेरे सामने होते हैं जब भी तकलीफ में होती हूँवो आ जाते है मेरे पास। आप यकीन नहीं करेगी मैं पापा की तस्वीर पर हार नहीं चढ़ाई हूँ। हार चढाने पर ऐसा लगता है वो नहीं है और जी घबराने लगता। ये तो बस अपनी अपनी भावना और विश्वास की बात हैं। आप की बातो ने मुझे भी ये ढाढ़स बधाया कि मैं ही दुखिया नहीं हूँ ,आपके इस प्रेम भरे सान्तवना के लिए दिल से शुक्रिया ,सखी

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  16. कुछ ज़ख्म ऐसे होते हैं जो कभी नहीं भरते। किसी की संवेदना काम नहीं आती। समय धीरे-धीरे उन जख्मों के साथ जीने का आदी बना देता है....ईश्वर का दिया वरदान होता है माता -पिता का प्यार जो सभी को नसीब नहीं होता है ...आप बहुत ही खुश नशीब रही है जो आपको माता पिता का प्यार मिला ... मन की वेदना आपके के लिखे शब्दों में खूब दिख रही है आपके लिखी भावनाओं को पढ़कर आपके दु:ख को महसूस कर सकते है क्योंकि मैं इस दर्द से गुजर चूका हूँ मैं बहुत ही छोटा था जब हमारी माँ हमे छोड़कर इस दुनिया से चली गई तब से आज तक इस दर्द से गुजर रहा हूँ ....पिता के लिए बेटी का इतना स्नेह सराहना के काबिल है कामिनी जी

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    1. आदरणीय संजय जी ,आपके संत्वना भरे शब्दो के लिए दिल से आभार ,बहुत दुःख हुआ ये जान कर कि आप अपनी माँ को बचपन में ही खो चुके हैं। किसी के दर्द को सही मायने में वही समझ सकता है जो खुद ये पीड़ा सह चूका हो। माँ बाप जाकर भी नहीं जाते वो सूक्ष्म रूप में हमेशा हमारे साथ रहते हैं। मैं सच मच बहुत सौभाग्यशाली हूँ जो आजीवन माँ पापा के साथ रही शादी के बाद बेटियों को ये कहाँ नशीब होता है। सादर नमस्कार आप को

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  17. निःशब्द ... सोच सकता हूँ ये सब लिखना आसान नहीं रहा होगा ... रहता भी नहीं लिख के पढ़ते हए खुद को भी कई बार आंसुओं से भोगोया होगा ... माता पिता का रिस्जता ही शायद अनूठा होता है और ये अपनापन जो महसूस करता है वही इसको समझ सकता है ... उनके होते ६० साल की उम्र में भी खुद को बच्चा महसूस करता है इन्सान ... उनकी यादों भी सहारा होती हैं जीने के लिए ...

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    1. आदरणीय दिगम्बर जी ,सच कहा आपने ये पीड़ा वही समझ सकता हैंजो इन रिश्तो के गहराई को समझ सकता हैं और दुनियां में वो अभागे ही होंगे जो माँ बाप के रिश्तो का महत्व ना समझते हैं। आपने ये भी सही कहा ये लेख मेरे आंसू ही है ,ये एक दिन का लिखा नहीं हैं ये दो साल से मेरे अंदर हर पल लिखा जा रहा था। पापा से जुडी मेरी बाते तो इतनी हैं कि लिखती जाऊँ फिर भी ख़त्म नहीं होगा। इसे लेख ना समझ मेरी पीड़ा समझने के लिए दिल से धन्यवाद ,सादर नमस्कार

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  18. कामिनी दी, दिल को छु गया यह खत! सच में बाप-बेटी का रिश्ता कितना अनमोल होता हैं...उसे शब्दों में बयान करना बहुत ही मुश्किल हैं...

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    1. दिल से धन्यवाद ज्योति जी ,सही कहा आपने पापा बेटी के रिश्ते को शब्दों में बया करना वाकई बहुत मुश्किल था ,आभर एवं स्नेह

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  19. प्रिय कामिनी तुम्हारा लेखन दिल से दिल तक जाने में सक्षम है। शुभकामनाएं।

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  20. बड़ी मुश्किल से तबतक पढ़ता रहा, जबतक आंखों के धुंधलेपन में अक्षर भीगकर गलने लगे.......!!!!!!

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  21. बस ,सर अपने अन्दर छुपे दर्द को बाहर निकालने का प्रयास भर था, आपकी आंखें नम हुई,तो शायद मैं अपना दर्द बाखुबी वया कर पाई

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kaminisinha1971@gmail.com

"अब "

 "अब" अर्थात  वर्तमान यानि जो पल जी रहें है...ये पल अनमोल है...इसमे संभावनाओं का अनूठापन है...अनंत उपलब्धियों की धरोहर छिपी है इस ...