बुधवार, 2 जनवरी 2019

जीवन का अनमोल "अवॉर्ड "

                                                                   " नववर्ष मंगलमय हो "
                                                       " हमारा देश और समज नशामुक्त हो "

                                           नशा जो सुरसा बन हमारी युवा पीढ़ी को निगले जा रहा है...
                                    अपने आस पास नजरे घुमाये देखे...आये दिन कई घर और ज़िंदगियाँ 
                                इस नशे रुपी सुरसा के मुख में समाती जा रही है। मेरे जीवन से जुड़ा मेरा ये 
                                                  संस्मरण नशामुक्ति के खिलाफ एक आवाज़ है........


        सुबह-सुबह अभी उठ के चाय ही पी रही थी कि फोन की घंटी बजी...मैंने फोन उठाया तो दूसरी तरफ से  चहकते हुए शालू की आवाज़ आई, हैलो माँ --" Merry Christmas" मैंने कहा -" Merry Christmas you too" बेटा , मैं अभी-अभी सो कर उठी हूँ और उठते ही मैंने सोचा सबसे पहले अपने सेंटा को  Wish करूँ--वो चहकते हुए  बोली।  मैंने कहा --बेटा, मैं तो आप से इतनी दूर हूँ और...पिछले साल से मैंने आप को कोई गिफ्ट भी नहीं दिया..फिर मैं आप की सेंटा कैसे हुई? उसने बड़े प्यारी आवाज़ में कहा -" माँ,आप जो हमें गिफ्ट दे चुकी है उससे बड़ा गिफ्ट ना किसी ने दिया है और ना दे सकता है...उससे बड़ा गिफ्ट तो कोई हो ही नहीं सकता "  मैं थोड़ी सोचती हई बोली --ऐसा कौन सा बड़ा  गिफ्ट मैंने दे दिया आप को बच्चे, जो मुझे याद भी नही। रुथे हुए गले से वो बोली -" पापा " आपने हमें हमारे पापा को वापस हमें दिया है माँ। ये सुन मैं निशब्द हो गई। 


     मुझे ऐसा लगा जैसे इस जीवन का सबसे बड़ा अवॉर्ड दे दिया हो मेरी बेटी ने मुझे। ईश्वर ने मुझे जो ये मनुज तन दिया है उससे मैंने कुछ तो ऐसा काम किया जो मेरी बेटी ने मुझे इतना बड़ा सम्मान दिया। सार्थक हो गया मेरा जीवन। मुझे वो सारी परेशानियां ,सारी कठिनाइयाँ ,लोगो की गालियाँ सब याद आने लगी लेकिन वे मुझे तकलीफ नहीं दे रही थी बल्कि एक सुखद एहसास करा रही थी। मैं ईश्वर को धन्यवाद देने लगी -हे प्रभु, अगर आप ने मुझे उस वक़्त वो शक्ति ना दी होती तो शायद मैं उस वक़्त एक दृढ निश्चय के साथ एक कठोर फैसला नहीं ले पाई  होती और आज मेरी शालू उस उपहार से वंचित रह जाती जो उसके जीवन की  सबसे बड़ी ख़ुशी है। 

     सच ,उस दिन पता नहीं मुझमे कहाँ से इतनी हिम्मत आ गई थी जो मैंने सारे परिवार के सामने कह दिया -" गुड्डी वापस अपने घर नहीं जायेगी वो यही रहेगी हमारे साथ दिल्ली में " सुन के सब स्तब्ध रह गये ,माँ पापा घबड़ा गये और भैया गुस्से में उठ कर चले गए। मैंने अपनी बात पुरी की - उसे वहाँ उस नर्क में भेजने से अच्छा है हम तीनो बच्चें समेत गुड्डी को मार डाले...अपनी बहन का यूँ रोज-रोज घुट-घुट कर मरना...मुझसे नहीं देखा जाता। " पापा ने कहा -  लेकिन ये कोई समाधान नहीं है बेटा ,कोई और रास्ता होगा। कोई रास्ता नहीं है पापा...उस नशेड़ी आदमी को जब तक उस के वातावरण से बाहर नहीं निकला जायेगा और सही तरीके से  इलाज नहीं करवाया जायेगा वो ठीक नहीं होंगे...रातों- दिन वो नशे में डूबे रहते हैं...सड़को पर यहाँ -वहाँ गिरे पड़े मिलते हैं...घर आ के कितने तमाशे करते हैं...पापा, आप एक बार इन बच्चों के डरे सहमे चेहरे तो देखें...जब वो चीखते-चिल्लाते हैं तो बच्चें कैसे सहमे से दुबक जाते हैं....पापा, समझने की कोशिश कीजिये वो नेपाल का बॉडर इलाका है जहां ७-८ साल के बच्चें भी नशा करते हैं वहाँ अपने रॉनी का भविष्य क्या होगा....ये दोनों लड़कियाँ  जो अभी मात्र सात साल और दस साल की है उनके जेहन पर कैसा असर होगा...जब वो देखेगी कि रोज रात को उसके पापा इधर - उधर नाले में पड़े होते हैं और उनकी  माँ उन्हें  उठा कर लाती है तो कैसी मानसिकता  बनेगी उनकी...मैं एक सांस में अपनी बात बोले जा रही थी। आप देखें तो पापा, शालू अभी से कितनी डरी  सहमी रहती है....पापा इन बच्चों का भविष्य खराब होते और अपनी बहन को यूँ  तिल - तिल कर मरते मैं नहीं देख सकती....उसके ससुराल वाले तो हाथ पर हाथ धरे तमाशबीन बने है....ऐसे हालत में हमें कुछ न कुछ तो करना होगा न पापा  - ये कहते -कहते मैं रो पड़ी।

    पापा थोड़े फिक्रमंद हुए और बोले -बेटा दामाद जी को कैसे रोकेंगे वो तो यहाँ किसी कीमत पर रूकने को राज़ी नहीं होंगे। मैंने कहा - मेरे पास एक उपाय है...हम किसी बहाने से गुड्डी को यहाँ रोक लेते हैं और उन्हें जाने देते हैं....थोड़े-थोड़े दिन करके गुड्डी को एक महीने रोकेंगे फिर उन से कह देंगे की गुड्डी अब वहाँ नहीं जाएगी आप को ही यहां आना होगा....पापा, मैं जानती हूँ वो मना करेंगे...वो और उन के घरवाले गुस्सा भी होंगे लेकिन....मुझे पक्का यकीन है वो एक न एक  दिन यहाँ जरूर आएंगे क्योकि मैं उनकी सबसे बड़ी कमजोरी जानती हूँ....वो गुड्डी को बहुत प्यार करते उससे दूर वो नहीं रह पाएंगे....हमें उनके इसी कमजोरी का फायदा उठा कर उन्हें उस नर्क से वापस ले कर आना है। पापा बहुत डरे हुए थे बोले -बेटा, कही  दमाद जी और उनके घर वाले गुड्डी को हमेशा के लिए छोड़ दिए उसे तलाक दे दिये तो मेरी बच्ची का क्या होगा। मैंने पापा को समझाया -पापा, पहली बात तो ये कि वो लोग ऐसा कुछ नहीं करेंगे और अगर तलाक दे भी देते हैं तो क्या हमारी बहन इस काबिल है कि वो अपने बच्चों को पाल सकती है....एक ऐसा इंसान जिसे अपने परिवार से ज्यादा नशा प्यारा है और उसका परिवार जो तमाशबीन बना एक औरत और तीन बच्चों को तिल-तिल  कर मरते हुए देख रहा है....वैसे पति और वैसे ससुराल से अच्छा है वो अकेली जिये। मैंने अपनी बातों पर जोर देते हुए कहा -पापा, आप मुझ पर यकीन करें...भरोसा रखें  मैं अपनी बहन का घर तोड़ नहीं रही बल्कि उसके टूटे हुए घर को बसाने की बात कर रही हूँ...मेरे पास पुख्ता प्लान है बस....आप मेरा साथ दे।

    मेरे समझने पर पापा माँ मान गए।  मैंने गुड्डी को समझाया कि -मेरी बहन  एक बात याद रखना...एक बार जो हम कदम उठा लगे तो पीछे मूड कर नहीं देखना है फिर चाहे जीत हो या हार वापस नहीं लौटेंगे...ये कसम खाओ .....मैं तुम्हारा घर बसाऊंगी यकीन रखना बहन मुझ पे। मेरी बहन ने मुझ पर भरोसा किया और मैंने भगवान पर और हम चल पड़े एक इंसान को नशामुक्त करा उसके पत्नी और बच्चों के पास वापस लेकर आने के अभियान पर।

      मेरे पति ने और छोटे भाई ने भरपूर साथ दिया। मैं अपनी बहन और बच्चों को अपने घर ले के आ गई। पापा ने कहा था कि मैं उन्हें मायके में ही रहने दूँ, पर मैंने पापा को समझाया कि-ये संघर्ष बहुत बड़ा है पता नहीं कितने दिन लगे...मैं अपनी बहन और बच्चों को भाभियों पर बोझ नहीं बनने दूंगी...आप सारा खर्च उठालेगे फिर भी अगर भाभियो ने बच्चों को किसी भी चीज़ के लिए रोका-टोका तो गुड्डी क्या मैं नहीं सह पाऊँगी....ये बच्चें मेरे भी है माँ कहते  हैं मुझे....उनका किसी चीज़ के लिए तरसना मैं नहीं सह पाऊँगी...मैं कोई धना सेठ नहीं लेकिन फिर भी मेरे पास जो कुछ होगा हम प्यार से मिल बाँट के खा लगे। फिर जैसा हमने सोचा था वही हुआ जैसे ही हमने दमाद जी से कहा -गुड्डी नहीं  जाएगी आपको दिल्ली आना  होगा ,उसी पल युद्ध का शंखनाद हो गया,सारी प्रतिक्रियाऐ वैसे ही हुए जैसे हमने सोच रखा था।

      पहले तो उसके ससुराल वालो  ने  पापा को उल्टा सीधा सुनाया फिर तलाक की धमकी भी देने लगे। मैंने पापा को समझाया था कि- आप उन लोगो से कोई बहस नहीं करेंगे बस, इतना ही कहेगे कि -आप सब को जो उचित लगे करे लेकिन मेरी बेटी वापस नहीं जाएगी....आप अपने भाई को यह भेजे हम उनका इलाज करवाएंगे....उनका उस माहौल से निकलना जरुरी है....वहाँ रहते हुए वो कभी नशामुक्त नहीं हो पायेगे ,पापा ने वैसा ही किया। मेरे बहनोई और उनके घरवालों को समझ आ गया था कि ये सब किया-धरा मेरा है और मेरी बहन मेरे घर में है। वो जब भी बहन को फोन करते तो मुझे गन्दी-गन्दी गालियाँ देते ,यहाँ  तक कि शालू जो मेरी बहन की बड़ी बेटी है और मात्र १० साल की थी उसे भी फोन कर मेरे लिए गन्दी गालियाँ  और बदुआएँ देते। फ़ोन रख शालू मुझे पकड़कर रोने लगती और बोलती - माँ वो लोग और पापा आप को बहुत कोसते हैं....गालियाँ देते हैं...मुझे बिल्कुल अच्छा  नहीं लगता। तो मैं उसे समझती कि -कोई बात नहीं बच्चें ,उनकी गालियाँ मेरे लिए फूल बन जाएगी जिस दिन आप  के पापा अच्छे हो जायेगे। 


     बहन को मेरे पास रहते हुए जब ३-४ महीने हो गए और उधर बहनोई ने पी पी कर अपना बुरा हाल कर लिया। मैंने बहन को समझाया था कि -  जब भी नशे के हालत में वो फोन करे तुम एक ही बात बोलना " आजाये मेरे पास "आख़िरकार मेरे बहनोई टूटने लगे और एक दिन उन्होंने मुझे गन्दी गाली देते हुए बोला  कि -" मैं आऊँगा लेकिन उसके घर में नहीं आऊँगा " मैं बस इसी पल के इंतज़ार में थी मैंने १० दिन के अंदर ही बहन को एक अलग घर लेके अपने घर से सारे सामन की व्यवस्था कर उसे बसा दिया ,साथ के साथ २५००० के एक छोटी सी रकम से उसके लिये एक छोटी सी स्टेशनरी की दुकान भी कर दी। जैसे ही  मेरी बहन ने  उन्हें बताया कि  अब वो अलग घर में है तो मेरे बहनोई अपने घर वालो की मर्ज़ी के खिलाफ अपने बच्चो के पास आ गए। लेकिन समस्या ये थी कि यहाँ आने के बाद भी वो दिन रात नशे में धुत ही रहते थे। हमने लाख समझाया लेकिन कोई असर ना होता। तब हमने उन्हें नशामुक्ति केंद्र में भेजवा दिया जहां वो एक साल रहे,फिर उनकी कांसलिग हुई तब जाकर धीरे धीरे उनका नशा छूटा 


     इन सारे घटनाक्रम में ३-४ साल लग गए क्योकि मेरे बहनोई दिल्ली आते तो जरूर मगर १ - २ महीने से ज्यादा नहीं रुकते थे। बच्चो की याद आती तो आजाते और फिर जब घर वालो का दबाव होता तो वापस चले जाते। तब तक बहन के घर का सारा खर्च बच्चो की पढाई- लिखाई का खर्च मैं और पापा उठाते। जब हमने बहनोई को नशामुक्ति केंद्र में डाला तो उनके घरवालों को थोड़ा बहुत समझ आने लगा कि हमलोग उनका घर नहीं तोड़ रहे है बल्कि उनके भाई की जान बचा रहे है ,वो ये समझे की उनके भाई को उस माहौल से दूर करना कितना जरुरी था फिर वो लोग नॉर्मल हो गए और आर्धिक रूप से मदद भी करने लगे। आज मेरे बहनोई पूर्णतः स्वस्थ हो चुके है।  वो इस व्यसन के शिकार शुरू से नहीं थे शादी के १० साल बाद गलत संगत की वजह से उन्हें नशे की लत लग गई थी। पैसे की कमी तो उनके पास थी नहीं बस कर्म ही खोटे थे सो मेरे समझने पर बच्चो के भविष्य के लिए वो अपना घर बना दिल्ली में ही बस गए। २५००० की छोटी रकम से खोली गई दुकान आज बड़ी हो गई है।


    मेरे बहनोई मुझे अपनी बड़ी बहन मानते थे और है भी लेकिन नशे का गुलाम व्यक्ति जब खुद का नहीं होता तो मेरा क्या होता इसीलिए वो जब बुरे हाल में थे तो मुझे अपना दुश्मन समझ भला बुरा कहते थे ये बात मैं अच्छे से समझती थी इसलिए उस वक़्त के उनके किसी भी बातो को मैंने महत्व नहीं दिया था। आज मेरे वही बहनोई मेरे एक आवाज़ पर आधी रात को भी आ जायेगे। शालू जिसका बालमन एक एक घटनाक्रम का साक्षी था और जो इन सारी बातो को दिल से लगाई हुई थी और कहती थी कि -" माँ ना होती तो हमारा क्या होता "(वो सारे बच्चे मुझे माँ ही कहते है ) और आज क्रिसमस के दिन वो मुझे " सेंटा " कह अपनी कृत्यज्ञता जताई है। जब मैं इन सारे जंग से गुजर रही थी तो मैं ये सबकुछ अपना फ़र्ज़ समझ कर कर रही थी क्योकि मैं अपनी बहन और  उसके बच्चो को यूँ घुट घुट कर मरते नहीं देख पा  रही थी  बस इसीलिए मैंने अपने जीवन के ५ साल उसके साथ संघर्ष मे गुजरे। मेरे अंदर ये डर भी था कि मैंने जैसा सोचा है ऐसा नहीं हुआ और गुड्डी को उनलोगो ने छोड़ दिया या बहनोई को कुछ  हो गया तो क्या होगा,सारा इलज़ाम मेरे सर होगा सब मुझे ही दोषी कहेगे।  लेकिन दिल में ये विश्वास था कि मैं इन बच्चो को खुशियां देने निकली हूँ तो मेरा भगवान मेरे साथ है और मैं जरूर कामयाब रहूँगी।गुड्डी को बसा कर मैं खुश थी लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरा बच्चा मेरे किये का इतना बड़ा अवार्ड देगा मुझे ,सेंटा कह कर सम्मानित करेगा। आज मैं अपने आप को सौभाग्यशाली मानती हूँ कि-" मैं  शालू की माँ हूँ "


    मैं यहां अपनी और अपनी बहन की जीवनगाथा नहीं सुना रही बल्कि इस आपबीती के माध्यम से ये बताना चाहती हूँ कि -आज कई औरतो का घर इस नशे की आग में झुलस रहा है और उसका साथ उसके ही परिवार वाले नहीं देते  बल्कि दोष भी उस औरत को ही दिया जाता है कि -" तुम्ही में कोई कमी होगी जो वो इस नशे की राह पर चल निकला है "मेरी बहन के साथ भी ऐसा ही होता था। ( हां मैं मानती हूँ कि कभी कभी औरत भी कसूरवार होती है ) परिवार के सदस्य बस एक दूसरे पर इलज़ाम लगते हुए तमाशबीन बने रहते है और एक इंसान मौत के मुह में चला जाता है और एक परिवार बर्बाद।  ऐसे वक़्त में परिवार के हर सदस्य को मिल कर इस समस्या का समाधान ढूढ़ना चाहिए और भटके हुये राही को राह पर ले आना चाहिए। .इसके लिए साम -दाम -दंड -भेद  सारी तरकीबे लगा उसे नशामुक्त करवा एक परिवार को जीते जी मरने से बचाना चाहिए।इन  दिनों  मेरी एक दोस्त का भाई जो मात्र ३५ साल का है ,शराब पी - पीकर उसका  लिवर ख़त्म हो  चूका है औरआज वो  ज़िंदगी और मौत से जूझ रहा है, तीन छोटे छोटे बच्चे है ,क्या करेगी वो औरत ,कैसे पालेगी बच्चो को,तरस आता है ऐसे आदमियों पर।ऐसा एक घर का किस्सा नहीं है आज कल तो ये व्यसन मुँह फाड़े खड़ा है। 


    मैं अक्सर सोचती हूँ कि -नशे में  ऐसी क्या बात है जो लोग इसके मोहपाश में गिरफ्त होकर इसके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते है ,घर -परिवार ,सुख -चैन ,वर्तमान -भविष्य यहां तक कि अपने स्वस्थ और प्राणो तक की बाज़ी लगा देते है। कोई क्यों हो जाता है यकायक नशे का दीवाना , गुलाम ,कठपुतली बन रह जाता है वो नशे का। क्यों हो जाता है वो पराधीन ,विवश और सम्मोहित। इसके पीछे क्या कारण हो सकता है आंतरिक ,मनोवैज्ञानिक या भौतिक। क्या वो यथार्थ से कन्नी काटने के लिए पीता है या यथार्थ से भागने के लिए ,पलायन के लिए या आत्मविश्वाश जगाने के लिए।  वास्तव में अलग अलग लोग अलग अलग कारणों  से पीते  है जबकि समान्य कारणों से इसके गुलामो जाते है। 


     जब हम सोचते हैकि -लोग पीते क्यों है ? तो समान्यतः इन बातो पर ध्यान जाता है कुछ लोग तो बेकारी में पीते है तो कुछ काम की अधिकता के कारण पीते है ,कुछ लोग सोहबत में पीते तो कुछ अपनी ऊब मिटने के लिए ,कभी गम बहाना बनता है पीने का तो कभी ख़ुशी ,कोई बंधन के आकर्षण में पीता है तो कोई बंधनमुक्त होने के लिए ,कोई  गरीबी से परेशान होकर  पीता है तो किसी के लिए सुख सम्पनता के अधिकता पीने का कारण  बनती है। पीने का कारण कुछ  भी हो पर अंजाम एक सा होता है " बर्बादी और सिर्फ बर्बादी "  ये सब जानते है ,सब समझते है फिर भी जो एक बार इस मदिरा  को अपना  लिया तो उससे छुटकारा पाना मुश्किल हो  जाता है। 


    लोग कहते है कि नशा महबूबा है साथ लेके जाती है लेकिन मैं मानती हूँ कि -वो महबूबा नहीं बल्कि एक बेश्या और रखैल है। क्योकि कोई महबूबा अपने महबूब को और उसके घरौदे को सलामत देखना चाहती है,उसका बुरा नहीं चाहती वो तो एक रखैल या बेश्या का काम है जो पहले अपना गुलाम बनती है फिर बर्बाद कर देती है। तो ऐसी परिस्थिति में अगर सारा परिवार एक होकर इस नशे रुपी राक्षसनी के खिलाफ खड़े हो जाये तो वो हार मानेगी ही जरूर। ये मुहीम सिर्फ एक वयक्ति बिशेष के लिए नहीं बल्कि  पुरे समाज के लिए जरुरी है। वैसे कई  जगहो पर औरतो ने इस नशे  खिलाफ आंदोलन छेड़ रखा है परन्तु इसमें परिवार का सहयोग मिलना बहुत जरुरी है। तभी हमे पूर्णतः सफलता मिलेगी। जैसे हमारे परिवार ने हमारी शालू को उसके पापा के रूप मैं उसकी खुशियां लौटाई। 


                                                                   
                                                               " मेरी बेटी शालू को समर्पित "

41 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय कामिनी बहन नशा मुक्ति ओर बहुत ही सार्थक क़दम, आज हमरे समाज में दीमक की तरह नशा निगल रहा है, जवान ओर बच्चें दोनों ही इस के आग़ोश में समा रहे है ,बहुत अच्छा लेख है,
    आप ने अपनी बहन को माध्यम बनाया, बहुत बहादुरी का क़दम, आज अगर अपने इस पर अपने ही पर्दा डाल दे, तब मद्त कौन करें ,बहुत ही सराहनीय लेख 👌

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    1. प्रिये अनीता जी ,सहृदय धन्यवाद , अनीता जी ये हमारी आपबीती है ,हमने इस नशे की वजह बहुत कुछ सहा है। 24 दिसंबर को मुझे खबर मिली की मेरी प्रिये दोस्त का भाई जीवन और मृत्यु से जूझ रहा है उसका लिवर खत्म हो चूका है ,वो मात्र 35 साल का है लगभग वो भी 8 -9 साल से इस नशे का आदी हुआ है जब से मेरे बहनोई हुये थे। हम खुशनसीब रहे कि हमारा परिवार एक जुट होकर लड़ा और हमने अपने बहनोई को बचा लिया। मुझे अपनी दोस्त के भाई और उसके परिवार वालो के लिए बेहद दुख हुआ और फिर अगले दिन 25 दिसंबर को जब मेरी बहन की बेटी शालू ने मुझे" सेंटा "कहा तो मुझे एहसास हुआ कि हमने कितनी बड़ी जंग लड़ी थी।तब मैंने सोचा क्यूँ न इसे आप सब से साझा करू कही कोई एक इसे पढ़े और इससे प्रेरित हो कोई एक घर भी बचा ले। आपने मेरे लेख को सराहा कर मेरे लेखन को सार्थक किया आभार एवं स्नहे ..............

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  2. नशे के सच को उजागर करती सार्थक और सटीक प्रस्तुति
    बधाई

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    1. आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है मान्यवर ,सहृदय धन्यवाद...... सादर नमन आपको

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ४ जनवरी २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. सह्रदय धन्यवाद......... स्वेता जी,आपने मेरे लेख को साझा कर मुझे कृतार्थ किया है आभार एवं सादर स्नेह.......

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  4. बेहद सार्थक और संदेशप्रद रचना

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    1. सहृदय धन्यवाद....... अभिलाषा जी ,सादर स्नेह

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  5. कामिनी जी आपके हौसले और जज्बे को नमन । नशामुक्ति के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को पढ़कर महसूस करना और उन विषम परिस्थितियों को झेलना अलग अलग बातेँ हैं । आप वाकई में 'सेंटा' एक परिवार के लिए ।

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    1. आप के हौसला आफजाई के लिए शुक्रिया मीना जी ,जब हम कुछ करने को ठान लेते है तो हिम्मत खुद ब खुद आ जाती है और बात जब बच्चो की हो तो और ज्यादा। आपने मेरे लेख पर अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया दी आभार आपका ,स्नेह

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  6. "आज मेरे वही बहनोई मेरे एक आवाज़ पर आधी रात को भी आ जायेंगे"
    जैसे ही इस पंक्ति को पढा मैं भावुक हो गया।
    साहसिक व्यक्तित्व का वर्णन।

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    1. आप का मेरे ब्लॉग पर स्वागत है मान्यवर ,आभर आपका जो आपने मेरे लेख पढ़े,मेरे बहनोई मुझे बड़ी बहन का मान देते है और नशामुक्त होने के बाद उन्हें अहसास हुआ कि हमने उनके लिए क्या किया है तो अपनी कृत्यज्ञता व्यक्त करने के लिए वो आज हमारे दुःख सुख में एक भाई की तरह खड़े होते है।

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  7. नशा एक अभिशाप है। यह एक ऐसी बुराई है, जिससे इंसान का अनमोल जीवन समय से पहले ही मौत का शिकार हो जाता है। इन पदार्थो के सेवन से व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक व आर्थिक हानि पहुंचने के साथ सामाजिक वातावरण भी प्रदूषित होता है। साथ ही स्वयं व परिवार की सामाजिक स्थिति को भी नुकसान पहुंचता है। वह नशे से अपराध की ओर अग्रसर हो जाता है। नशा अब एक अंतरराष्ट्रीय विकराल समस्या बन गई है। बच्चों से लेकर बड़े-बुजुर्ग व विशेषकर युवा वर्ग बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। इस अभिशाप से समय रहते मुक्ति पाने में ही मानव समाज की भलाई है.........बहुत ही सराहनीय लेख... सटीक प्रस्तुति आभार लेख के लिए

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    1. सहृदय धन्यवाद संजय जी ,अपने मेरे लेख पर अपनी प्रतिक्रिया देकर मेरा मनोबल बढ़ाया है,हमने तो इस अभिशाप को भोगा है, सादर आभार...............

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    1. आप का मेरे बलॉग पर स्वागत है दिग्विजय जी ,आप के इस प्रोत्साहन के लिए सहृदय धन्यवाद..... सादर नमन

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  9. कामिनी जी ऐसे लेख जो यथार्थ और सार्थक हो समाज के लिये एक प्रेरणा है। आये दिन नशे के कारण परिवार बर्बाद हो रहे हैं असमय मौतें और विरासत में बच्चों को नशा स्थान्तरित हो रहा है पीढी दर पीढी विनाश का मुह देख रही है । आपके साहसिक कदम ने एक पुरे परिवार को बचा लिया आपका ये कदम जितनी भी प्रशंसा करू कम ही होगा ।
    सत्य और भुक्तभोगी लेख सटीक समर्थ ।

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    1. सहृदय धन्यवाद कुसुम जी ,समाज में व्याप्त इस व्यसन को पारिवारिक एक जुटता ही ख़त्म कर सकती है ऐसा मेरा अनुभव है ,हमने उस दौरान बहुत कुछ सहा जिसे शब्दों में लिख पाना भी मुश्किल है ,
      आभार....... स्नेह

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  10. बहुत सुन्दर लेख....आपके जज्बे को नमन...सचमुच आप उन बच्चों, की सेन्टा ही तो हैं...बहुत सुन्दर सार्थक एवं लाजवाब...

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    1. आप का मेरे बलॉग पर स्वागत है सुधा जी ,आप के इस अनमोल वचन और प्रोत्साहन के लिए सहृदय धन्यवाद..... ,स्नेह

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  11. नम नयनों से नमन कामिनी जी की नेक कामना को! बहुत सार्थक लेख। आभार और बधाई।

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  12. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  13. प्रिय कामिनी -- सबसे पहले तुम्हारे मिलनसार स्वभाव ने जो तुम्हे थोड़े समय में ही इतना लोकप्रिय बना दिया उसके लिए मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करों | बहुत खुश हो जाती हूँ जब देखती हूँ कि ब्लॉग जगत के सशक्त हस्ताक्षर तुम्हारे लेख का मान बढ़ाने अनायास चले आते हैं | तुम्हारा ये संस्मरण पढ़कर बहुत अच्छा लगा कि तुम्हारी सजगता की वजह से बहन का घर संसार फिर से बस गया | तुम्हारी इस बहादुरी और सकारात्मक सोच को नमन करती हूँ | नशा आज की भ्रामक संस्कृति की एक पहचान सी बन गया है जो मुझे भी चिंता में डाल देता है खासकर जबसे मेरा युवा बेटा बाहर पढने के लिय गया है - तबसे | आजकल तो बेटियां भी इस व्यसन से अछूती नहीं रही हैं ऐसा मैं जब कहीं पढती सुनती हूँ तो हैरानी में डूब जाती हूँ | इस सौभाग्य के लिए मैं ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि मुझे ऐसा परिवार मिला है जहाँ इस बुराई के लिए कोई जगह नहीं -- पर समाज में अपने आसपास इस व्यसन में गिरफ्तार कितने ही लोगों को देखा है और उनके आचरण से परेशान परिवार को देखती हूँ तो बहुत दुःख होता है कि एक इन्सान की गलती से पूरा परिवार किस तरह आहत होता है | भविष्य की पीढ़ी का इस बुराई से जुड़ना बहुत ही दुखद और दुर्भाग्य पूर्ण है | पिछले साल मैं पंजाब में दो शादियाँ में शामिल हुई | वहां युवाओं को आकंठ नशे में डूबकर झूमते देखकर मैं बहुत परेशान हो गयी | शादी के बहाने से इन युवाओं की पीने की प्रबल इच्छा छुपाये नहीं छुप रही थी |मुझे ये भी पता चला अनगिन लोग शराब के अलावा अनेक नशों के शिकार हैं जिनके परिवार उनके इस व्यसन की वजह से बहुत पीड़ा झेल रहे हैं | कितना अच्छा हो उन्हें भी तुम्हारे जैसा कोई मार्गदर्शक मिल जाए और उनकी जिन्दगी संवर जाए | सार्थक प्रयास और सुंदर संस्मरनात्मक लेख के लिए सस्नेह आभार और बधाई |

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    1. हां सखी ,ये व्यसन बहुत बुरी तरह सब पर हावी हो चूका है ,यहां मुंबई में तो खुलेआम लड़कियां तक नशा करते दिख जाती है ,सिगरेट पीना तो आम बात है ,वैसे तो ये व्यसन चारो तरह है पर पंजाब का तो बुरा हाल है। सखी मेरे घर में भी ये बुरी आदत किसी में नहीं है पता नहीं अचानक से बहनोई कैसे इसके चुगुल में फंस गए। वो तो भगवान का लाख लाख धन्यवाद कि -हम सब मिल के उन्हें बचा लिए। मेरे लेख पर अपना कीमती समय देने के लिए सहृदय धन्यवाद सखी ,स्नेह .....

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  14. एक बच्चे के मुंह से सैंटा का उचारण पाना सचमुच सबसे बड़ा इनाम है | तुम इस सम्मान के सर्वथा योग्य हो प्रिय पेय कामिनी| मेरा प्यार |

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    1. तुमने सही कहा सखी ,बहन की बेटी के मुख से भावुकता और सम्मान से भरा ये " सेंटा " शब्द ही मुझे ये लेख लिखने को प्रेरित किया वरना मैंने कभी नहीं सोचा था कि अपने घर की कहानी किसी से साझा करुँगी ,उसकी बातो ने मुझे ये प्रेरणा दी कि मैं अपनी दस्ता दुनिया को सुनाऊ शायद किसी और को भी किसी बच्चे का सेंटा बनने की प्रेरणा मिले ,आभार...... सखी

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  15. आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है. https://rakeshkirachanay.blogspot.com/2019/01/103.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद!

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    1. आदरणीय राकेश जी ,सादर नमस्कार ,आपने मेरे लेख को पढ़ा और उससे अपने पेज पर स्थान दिया ये मेरे लिए सौभाग्य की बात है ,आपका तहे दिल से शुक्रिया .....

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  16. नशे का कारण कोई भी कुछ कहे ये बस उसकी कमजोरी है ... अपने आप पर काबू पा सके इंसान इस बात की मदद करनी चाहिए ... आधुनिकता का आवरण ओढ़े कुछ सभ्य मानने वाले लोग इसको और फैलाने में लगे हैं ... अच्छा संस्मरण है जो प्रेरित करेगा दूसरों को भी ... सार्थक आलेख ...

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया... दिगंबर जी,आप ने सही कहा ये एक मानसिक कमजोरी है जो व्यक्ति को नशे का गुलाम बनता है ,आप के बहुमूल्य प्रतिक्रिया के लिए आभार........

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  17. बहुत ही सुंदर कहानी ,नशा एक नहीं कई जिंदगी को भी बर्बाद करता है ये तो सच है ,आपको भी होली जैसे पावन पर्व की ढेरो बधाई ।नमस्कार

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    1. सहृदय धन्यवाद ज्योति जी ,मेरे ब्लॉग पर आप का दिल से स्वागत हैं आप को और आप के समस्त परिवार को भी होली की हार्दिक बधाई

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  18. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (20-12-2020) को   "जीवन का अनमोल उपहार"  (चर्चा अंक- 3921)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. मेरी रचना को चर्चा मंच पर स्थान देने के लिए दिल से धन्यवाद सर.सादर नमस्कार आपको

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  19. काम‍िनी जी नमस्कार, इतनी अच्छी कहानी और वो भी नशे के ख‍िलाफ...वाह...मुझे कहानी पढ़े दो घंटे हो गए हैंं और अभी तक इसी पर सोच रही हूं... बेहद बेहद बेहद उम्दा कहानी ...

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    1. अलकनन्दा जी,ये कहानी नहीं है,ये हमारे परिवार की जीवनगाथा है जो पल हमने भोगा है,आपकी प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से धन्यवाद एवं सादर नमस्कार आपको

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  20. सराहनीय एवं प्रेरक ....
    बहुत बधाई एवं साधुवाद 🌷

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    1. दिल से धन्यवाद शरद जी,.आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए आभार ,सादर नमस्कार आपको

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  21. बहुत बहुत मर्म स्पर्शी , भीतर तक मन को आंदोलित कर देने वाली रचना

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    1. दिल से धन्यवाद सर.आपकी प्रतिक्रिया अनमोल है ,सादर नमस्कार आपको

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kaminisinha1971@gmail.com

"तू कविता या गीतिका"

ना मैं कविता, ना ही गीतिका, मैं तो नज़्म पुरानी हूँ।  ना भुला पाओगे कभी जिसे, मैं वो अधुरी कहानी हूँ।।  तेरी लग्न में मस्त-मगन, मैं एक प्रेम...