शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

रक्षाबंधन -" कमजोर धागे का मजबूत बंधन "

    

    
     सावन का रिमझिम महीना हिन्दुओं के लिए पावन महीना होता है। आखिर हो भी क्यों नही ये देवो के देव "महादेव" का महीना जो होता है और इसी महीने के आखिरी दिन यानि पूर्णिमा को रक्षाबंधन का त्यौहार मनाया जाता है। रक्षाबंधन भाई-बहन के प्रेम को अभिव्यक्त करने का एक जश्न है। जिसे आम बोल-चाल में राखी कहते हैं । 
    सुबह-सुबह नहा-धो कर पजामा-कुर्ता पहने भागते-दौडते अति उत्साहित लड़के और प्यारा सा फ्रॉक या लहँगा-चुन्नी पहने, हाथ में पूजा की थाली लिए हुए इतराती फिरती लड़कियाँ। कही कोई भाई अपनी छोटी बहन को मना  रहा है उससे छोटे-छोटे, प्यारे-प्यारे वादे कर रहा है कि - "आज से मैं तुम्हें  बिल्कुल नहीं मारुंगा, तुम्हें कभी नहीं सताऊँगा, तुम्हें  ढेर सारी चॉकलेट भी दूँगा प्लीज, मुझे राखी बाँध दो" और कही कोई बहन, भईया को मना रही है कि -"मैं मम्मी से तुम्हारी कभी कोई शिकायत नहीं करुँगी, अपने खिलौने भी दे दूँगी, तुम्हारी हर बात मानूँगी प्लीज, मुझसे  राखी बँधवा लो।" सच ,बड़ा प्यारा नज़ारा होता है।
    राखी के दिन मैं भी अपने बचपन में खो जाती हूँ। हम चार भाई-बहन है,दो बहन और दो भाई। इसके अलावा चाचा ,बुआ के बच्चे, कुल मिलाकर 12-13 भाई-बहन। हम सब में सगे भाई-बहनों जैसा ही प्यार था,कोई पराया था ही नहीं। राखी के दिन हम सारे इकठ्ठे होते थे और राखी बँधवाने का कार्यक्रम एक साथ ही होता था, सारे भाई एक लाइन में बैठ जाते थे और हम सारी बहनें आरती का थाल हाथ में लिए खड़ी रहती थी। मैं सबसे बड़ी थी, सारे भाई पहले मुझसे ही राखी बँधवाना चाहते थे क्योँकि मैं सबको एक समान प्यार करती थी और सभी मुझे भी उतना ही प्यार देते थे। मैं एक लाइन से बड़े भाई से शुरू कर छोटे तक पहुँचती थी। सब एक दूसरे को अपने हाथो से मिठाई खिलाते थे और प्यार से गिफ्ट देते थे। वो गिफ्ट चाहे पांच रूपये का ही क्यों न हो, भाई वो अपनी बचत के पैसे से लाते थे और वो  हमारे लिए लाखों रूपये से भी कीमती होते थे। बड़ा ही पवित्र होता है ये बचपन का प्यार.... 
    राखी पर्व का नाम लेते ही शायद ही ऐसा कोई हो जिसे अपने बचपन की याद ना आती हो। वैसे तो हर त्यौहार का असली मजा तो बचपन में ही आता है लेकिन राखी की तो बात ही अलग होती है। भाई-बहन का असली प्यार झलकता है, कोई दिखावा नहीं, कोई लालच नहीं, कोई मन पे बोझ नहीं। जितना ज्यादा बचपन में इस त्यौहार का आनंद होता है उतना ही बड़े होने के बाद इस त्यौहार का रंग-रूप बिगड़ जाता है। मैं ये नहीं कहूँगी कि भाई-बहन के बीच का प्यार कम हो जाता है बस उस प्यार पर औपचारिकता भारी पड़ जाती है और प्यार धूमिल हो जाता है। मुझे इस राखी में बनाये गए एक रिवाज़ से सबसे ज्यादा शिकायत है -"वो है, तोहफों का आदान-प्रदान " और मेरे बिचार से इसी रिवाज़ ने ही बड़े होने पर इस त्यौहार को बोझ बना दिया। 
     अगर ये उपहारों का लेन-देन परम्परा ना हो कर "खुशी" होती तो राखी हमेशा अपने बचपन वाले स्वरूप में, भाई बहन का प्यार दिन-ब-दिन बढ़ता कभी कम नहीं होने देता। क्योंकि बचपन में जो उपहार प्यार से दिया जाता था बड़े होने पर औपचारिकता के साथ-साथ बोझ भी बन गया। वास्तव में राखी हम हिन्दुस्तानियों के लिए इतना पवित्र धागा है कि-अपने खून के रिश्ते की तो बात ही छोड़ें, किसी अनजाने और अपने जाति-धर्म से अलग व्यक्ति को भी अगर कोई लड़की एक बार ये धागा बाँध  देती है तो आजीवन निभाती है। 
     वैसे तो इस पवित्र बंधन की बहुत सी कहानियाँ मशहूर हैं मगर आज मैं आप को इससे जुडी अपने बचपन की एक दस्तान सुनती हूँ। बात उन दिनों की है जब मैं 15 -16 साल की थी। हमारे पापा बिजली बिभाग में इलेक्ट्रिशियन थे और हम सरकारी क्वार्टर में रहते थे। उन्हीं दिनों एक इंजीनियर का परिवार ट्रांस्फर होकर आया था। हमारी उनसे अभी अच्छे से जान-पहचान भी नहीं हुई थी। उनके 10 और 12 साल के दो बेटे थे, कोई बेटी नहीं थी। उनके आने के महीने बाद ही राखी पर्व आ गया था। हम सारे भाई-बहन हर साल की तरह इकठ्ठे  थे और राखी बाँधने का कार्यक्रम चल रहा था उसी बीच  उनका बड़ा लड़का आ गया। वो थोड़ी देर खड़ा होकर सब देखता रहा फिर दौडता हुआ चला गया। थोड़ी देर बाद उसकी माँ उसे लेकर आई। बच्चें का रो-रो कर बूरा हाल था आँखें सूजी थी,सिसकी अभी भी बंद नहीं हुई थी। हम सब डर गए कि क्या हो गया इसे? उसकी माँ मेरे पास आई और बोली -"बेटी क्या तुम मेरे बेटे को राखी बाँध सकती हो ये रोये जा रहा है कि-मुझे रानी दीदी से ही राखी बँधवानी है (घर में सब मुझे रानी बुलाते हैं  )मैंने उसे पहले प्यार करके चुप कराया फिर, मैंने कहा कि -"चाची राखी एक दिन का बंधन नहीं है, ये सिर्फ एक धागा नहीं है जिसे मैं आज बाँध दूँ और फिर भूल जाऊँ, अगर आज मैं इसे राखी बाँधूगी तो ये हमेशा के लिए मेरा भाई हो जायेगा, आप को मंजूर हो तो बोलिये।" उस लड़के की माँ कुछ बोलती इससे पहले वो लड़का मेरा हाथ पकड़कर बोल पड़ा -"हाँ-हाँ ,मैं आजीवन आप का साथ निभाऊंगा, आप मेरे हाथ पर राखी बाँध दे मैं आप का हाथ कभी नही छोड़ूंगा।"
     सब हँस पड़े, मैंने उसे राखी बाँध दी। उसने बड़े प्यार और आदर से मेरे पैर छूए और अपनी जेब से निकाल कर एक टॉफी पकड़ा दी।उस वक़्त उसकी कही हुई बात को ना उसकी माँ ने गंभीरता से लिया और ना ही मेरे परिवार वालों ने, सबको लगा बच्चा है और उसकी बहन भी नहीं है इसीलिए बोल दिया, 3 साल बाद उनका  ट्रांस्फर हो जायेगा और वो चला जायेगा फिर कहानी खत्म। लेकिन मैं उस बच्चें के मन की पवित्रता समझ रही थी उसके  मुख से निकला एक-एक शब्द मेरी आत्मा को छू गया था। उसके हाथ पकड़ने का एहसास आज तक मुझे महसूस होता है। उस बच्चें ने सच कहा था आज वो 44 साल का हो गया है और एक सफल डॉक्टर है और मुझसे बहुत दूर भी रहता है। 5 -6 साल पर हम कभी-कभी मिलते हैं  लेकिन आज भी वो मेरा हाथ उसी प्यार और ख़ुलूस के साथ पकड़ रखा है। आज भी उसका प्यार एक मासूम बच्चें की तरह निश्छल और निस्वार्थ है। खून के रिश्ते के भाई-बहन स्वार्थवश बिखर गए लेकिन आज भी मैं उसकी  "प्यारी रानी दीदी " और वो भी मेरा " प्यारा मासूम पिंकू" ही है। ये होता है राखी के एक कमजोर धागे का मज़बूत बंधन। यूँ ही नहीं इस त्यौहार को पवित्र मानते हैं। 


     मेरी भगवान से यही प्रार्थना हैं कि-"कभी किसी बहन से उसका भाई ना बिछड़े ना ही कभी किसी बहन से उसका भाई रूठे " और हर भाई -बहन से ये आग्रह हैं कि-"कभी भी अपने बीच कोई दीवार ना आने दें चाहे वो दीवार स्वार्थ की हो चाहे, किसी व्यक्ति बिशेष की। 


छोटी बहना चूम के माथा

भईया तुझे दुआ दे
सात जनम की उम्र मेरी
तुझको भगवान लगा दे
अमर प्यार है भाई-बहन का
जैसे सुभद्रा और किशन का

मोल नहीं कोई इस बंधन का
ये राखी बंधन है ऐसा.... 
ये राखी बंधन है ऐसा....
******
आप सभी को राखी की ढेरों शुभकामनाएं 

25 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शनिवार (०१-०८ -२०२०) को 'बड़े काम की खबर'(चर्चा अंक-३७८०) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    --
    अनीता सैनी

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    1. मेरी रचना को स्थान देने के लिए हृदयतल से आभार अनीता जी

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  2. आपने रक्षाबंधन जैसी पवित्र त्योहार पर बचपन की यादे ताजा कर दी... बहुत अच्छा...

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    1. इस सुंदर प्रतिक्रिया के लिए सहृदय धन्यवाद सर,राखी में बचपन की याद आ ही जाती है ,सादर नमन आपको

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  3. वाह!सखी कामिनी जी ,बहुत सुंदर भावों से सजी रचना । सच में ये बंधन होता ही इतना प्यारा है ...।

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    1. आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए दिल से धन्यवाद सखी,सादर नमन आपको

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  4. बहुत कुछ याद दिला दिया आपने सखी। भाई-बहन के अटूट बंधन की बहुत सुंदर भावपूर्ण प्रस्तुति।

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  5. वाह !! रक्षाबंधन पर भाई -बहन के अटूट स्नेह पर लाजवाब अभिव्यक्ति ...
    छोटी बहना चूम के माथा
    भईया तुझे दुआ दे
    सात जनम की उम्र मेरी
    तुझको भगवान लगा दे..,
    बहुत ही भावपूर्ण सृजन कामिनी जी ।

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    1. दिल से शुक्रिया मीना जी,सादर नमस्कार

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  6. प्रिय कामिनी तुम्हारे लेख ने निशब्द और भावुक कर दिया |इस मासूमियत भरे त्यौहार को देनलेन की कुप्रथा ने बहुत ही आडम्बर पूर्ण बना दिया है |बचपन की राखी का बहुत सजीव लिखा तुमने सखी | लहंगा चुन्नी पहने
    नन्ही रानी सखी शब्दों में साकार हो रही है | हम लोग बहुत भाग्यशाली हैं जिन्होंने संयुक्त परिवार के वो आद्म्बर्हीं त्यौहार देखे हैं |रानी दीदी और नन्हे पिंकू की प्यारी सी कहानी मन को छू गयी | बहुत ही सुंदर शब्दों में लिखा तुमने सखी | दुआ है तुम और तुम्हारे नन्हे पिंकू का निर्मल प्रेम सदा बना रहे और स्नेहिल बंधन सदैव बना रहे | ऐसे मुंहबोले रिश्ते असली रिश्तों से किसी भी तरह कम नहीं होते बस इन्हें निभाना आना चाहिए | राखी पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं सखी |

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    1. दिल से शुक्रिया सखी,स्नेह से भरपूर तुम्हारे इस प्रतिक्रिया के लिए आभार सखी,हाँ यही दुआ चाहिए मुझे जैसा मेरा रिश्ता इस मुंहबोले भाई से अब तक बना है आगे भी बना रहें।ढेर सारा स्नेह तुम्हे भी

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  7. बहुत ही भावपूर्ण एवं लाजवाब सृजन
    बचपन की यादे ताजा हो गयी....सही कहा उपहारों के लेन देन ने इस पवित्र रिश्ते को औपचारिक बना दिया।

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  8. दिल से शुक्रिया सुधा जी,सादर नमस्कार

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  10. बहुत सुंदर बहुत ही सुंदर ।
    निशब्द हूं मैं कामिनी जी आपने कितनी सुंदर था से एक संस्मरण के साथ अमूल्य सी बात कह दी।
    बहुत बहुत सुंदर।

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    1. सहृदय धन्यवाद कुसुम जी,आपका आशीष यूँ ही बना रहे,सादर नमस्कार

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  11. बचपन की कितनी ही यादें आपने ताज़ा कर दी हैं ....
    राखी का त्यौहार और उस दिन का ण सिर्फ महत्त्व बल्कि उल्लास भी अलग होता है ...

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  12. आज पुनः पढ़ा आपका ये भावपूर्ण लेख...।सच में कुछ रिश्ते खून के या पास के ना होकर भी दिल से बहुत करीब होते हैं मेरे भी हैं एक धरमभाई। पच्चीस सालों से कभी हमारे रिश्ते में कोई शिकन नहीं आई मेरे बिन बोले ही मेरे मन के भावों को पढ़ लेते हैं मुझे तो लगता है वो मेरे अपने ही थे जिन्हें भगवान ने गलती से दूर कर दिया फिर इस तरह मिलवाया...।

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    1. तहे दिल से शुक्रिया सुधा जी,आपने तो मेरे दिल की बात कह दी सुधा जी,कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं जो खून के रिश्तों से भी ऊपर होते हैं ,मेरा भी मेरे इस भाई के साथ ऐसा ही रिश्ता है। एक बार फिर से शुक्रिया एवं सादर नमन

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  13. सभी के बचपन की स्मृतियों को ताजा करने वाली पोस्ट। लाजवाब प्रस्तुति।

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kaminisinha1971@gmail.com

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