सोमवार, 7 जनवरी 2019

" बृद्धाआश्रम "बनाम "सेकेण्ड इनिंग होम "







" बृद्धाआश्रम "ये शब्द सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते है। कितना डरावना है ये शब्द और कितनी डरावनी है इस घर यानि "आश्रम" की कल्पना। अपनी भागती दौड़ती ज़िन्दगी में दो पल ढहरे और सोचे, आप भी 60 -65 साल के हो चुके है ,अपनी नौकरी और घर की ज़िम्मेदारियों से आज़ाद हो चुके है। आप के बच्चो के पास फुर्सत नहीं है कि वो आप के लिए थोड़ा समय निकले और आप की देखभाल करे।(कृपया ये लेख पूरा पढ़ेगे )

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 वो करेंगे भी कैसे ? उनकी लाइफ तो हम सब के लाइफ से भी ज्यादा बिजी होगी हम अपने जवानी के दिनों में अपने सारे काम -काज करते हुए भी अपने अपनों के लिए खासतौर पर अपने माँ -बाप के लिए थोड़ा वक़्त निकल ही लेते थे। लेकिन हमारे बच्चो के शब्दों में उनकी लाइफ हमसे ज्यादा टफ यानि  मुश्किल है। अरे भाई ,उन्हें अपने जॉब के बाद जो वक़्त मिलता है वो वक़्त तो वो अपने बीवी बच्चो और दोस्तों को देंगे या आप को देंगे। आप तो उनके लिए उनकी थर्ड पयोरिटी यानि त्रियतिये स्तर के ज़िम्मेदारी होंगे न। कहाँ से निकलेंगे आप के लिए वक़्त। ऐसी हालत में आप कल्पना कीजिये वो आप के साथ क्या करेंगे।

अगर वो मिडिल क्लास के है तो वो अपने घर में एक छोटा कमरा आप को दे देगे और समय समय अपर आप के खाने पिने की व्यवस्था कर देंगे बस हो गई उनकी ज़िम्मेदारी पूरी। अगर पैसे वाले है या उनकी नौकरी विदेश में या किसी बड़े शहर में है तो उनके लिए आप को अपने साथ रखना थोड़ा मुश्किल होगा। वो कहेगे -"आप को साथ तो रख नहीं सकते और आप को अकेले भी नहीं छोड़ सकते तो अच्छा है हम आप को" बृद्धाआश्रम "भेज दे,वह आप की देखभाल होगी और हम  साल -छह महीने में आप से मिलने आते रहेंगे ,फ़ोन रोज करेंगे आप परेशान ना हो "

अरेरे दोस्तों , "आप तो डर गए है न "यकीनन इन सारी बातो की कल्पना भी बेहद डरावनी लगती है। लेकिन डरने से क्या होगा आज की युग की हक़ीक़त ही यही है। " घर "की संख्या  घटती जा रही है और बृद्धाआश्रम की संख्या बढ़ती जा रही है। मेरी समझ से इसके पीछे दो बड़ी वजह है एक तो वाकई आज की पीढ़ी की लाइफ स्टाइल बड़ी टफ हो गई है। उनकी अपनी नौकरी,बीवी -बच्चो की बेहिसाब फ़रमाइसे,दोस्त ,सोशल मिडिया पे उनकी एक्टिविटी  और उससे भी बड़ी बात उनके लिए उनकी खुशिया ही सर्वोपरि हो गई है. और दूसरी वजह वही है जिसका जिक्र हम ने अपने पहले के लेख में किया है कि "बेटियाँ बहु नहीं बन पा रही है "लोग तो यु ही कहते है की बेटे बुढ़ापे की लाठी होते है। मेरा मानना है की असली लाठी बहुये होती है। क्युकी सारी ज़िम्मेदारी तो वही उठती है। 

खैर ,जो भी हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज की दौड की ये भयावह सच्चाई हैं। चलिये,अब इन सारी समस्याओ को एक अलग नज़रिये से देखते हैं। मेरे नज़रिये से " बृद्धाआश्रम "शब्द को हमारी मानसिकता ने डरावना बना दिया है। अगर बृद्धाआश्रम को हम अपने जीवन के " दूसरी पारी का घर "समझे तो वो उतना डरावना नहीं लगेगा बल्कि शायद हमे आत्मिक सुकून भी देगा। यकीनन देगा। 

अब आदि काल में चलते है,हमने अपने दादी -नानी की कहानियो में " वानप्रस्थ "का जिक्र जरूर सुना होगा राजा-महाराजा जब अपना उत्तराधिकारी घोसित कर उसे राजगद्दी सौप देते थे और अपनी जिमेदारियो से मुक्त हो कर खुद के लिए ज़ीने, भगवत भजन कर अपना परलोक सुधारने,अपना आत्मज्ञान बढ़ाने और मोह माया से दूर होने के लिए वन में जा कर निवास करते थे.जिसे " वानप्रस्थ " कहते थे। (राजा ही नहीं उस वक़्त के आम जन भी यही करते थे) याद कीजिये,उस वक़्त ये नहीं कहा जाता था कि -" राजगदी मिलने के बाद बेटे ने माँ बाप को वन भेज दिया " नहीं ,ऐसा कोई नहीं कहता था क्युकी उन्हें जबरदस्ती नहीं भेजा जाता था बल्कि माँ बाप स्वेच्छा से जाते थे। बाद के समय में भी जब बुजुर्ग अपनी जिमेदारियो से मुक्त हो जाते थे (खास कर के पुरुष ) तो गांव के बाहर एक चौपाल बना लेते थे जहाँ वो अपने हमउम्र के साथ रहते ,अपना समय अपनी मर्ज़ी से बिताते थे। 


लेकिन जैसे जैसे समय बदला लोग नौकरी पेशा वाले होने लगे तो  60 के उम्र में रिटायर्ड होने के बाद खुद ही अपने आप को खाली और बेकार समझने लगे। फिर संतान से सेवाभाव की अपेक्षा और उससे भी ज्यादा पोते -पोतियो का मोह ने उन्हें घर की चार दीवारी में जकड़ दिया। बच्चो से अपेक्षा के बदले जब उन्हें उपेक्षा मिली तो वो और कुंठित हो गए। और जब उन्हे बृद्धाआश्रम की तरफ रवाना होने के लिए कहा  गया तो वो अपने आप को नाकारा ,बोझ ,घर से निकला हुआ ,तरस्कृत और उपेक्षित महसूस करने लगे। बृद्धाआश्रम उनके लिए एक जेल,एक सजा की जगह बन गई। अक्सर बुजुर्गो को ये कहते सुना गया है कि-" मेरे बेटे बहु के पास कुत्ते को रखने तक का एक दरबा तो होता है लेकिन हम तो कुत्ते से भी गये गुजरे है जिसके लिए घर ना बाहर कही भी जगह नहीं है "

"इंसान अपने दुखो का कारण स्वयं होता है "ये सत्य है ,हम क्यों अपने आप को दयनीय बनाते है ,सारी उम्र हम उनकी देखभाल करते आये  है वो हमारी क्या खाक करेंगे। हम ऐसी अवस्था ही क्यों आने दे कि हम उनकी रहमो कर्म पर रहे। मेरे नज़रिये से वानप्रस्थ की जो प्रथा थी बिलकुल सही थी। अगर बुजुर्ग अपनी जिम्मेदारिया पूरा कर ,बाल  - बच्चो का मोह  त्याग खुद के लिए ,खुद की मर्ज़ी से ज़ीने के लिए एक घर खुद तैयार कर ले तो वो कभी बच्चो पर बोझ नहीं बनेगे। 

अब एक बार फिर से आप खुद को 60 साल की उम्र में इमेजिन कर सोचिये ,सारी उम्र तो आपने घर की जिम्मेदारी निभाने में  गुजर दी ,कभी जीया है खुद के लिए। अब एक ऐसा घर हो जहां कोई रोक टोक नहीं,कोई ज़िम्मेदारी नहीं हो अपने हमउम्र दोस्त हो ,उनके साथ एक मस्ती भरा दिन जैसे बचपन का होता है कोई चिंता फ़िक्र नहीं। अरे ,करे भी क्यों चिंता, हमने अपने बच्चो को अपने पैरो पर खड़ा कर दिया अब वो अपनी जिम्मेदारी संभाले और जहा तक बात है पोते-पोतियो की तो हां यार ,वो प्यारे तो है लेकिन आज कल के दौड में वे बच्चे बेचारे खुद ही ढाई साल की उम्र से स्कूल के बोझ तले दबे है उनके पास कहा समय है आप के लिए जो वो आप के साथ खेलेगे । तो उनसे रविवार या छुटियो में मिल लगे। जब छुट्टी के दिन वो अपने मम्मी पापा के साथ आप से मिलने आएंगे तो उनके लिए भी आप स्पेसल होंगे और उनके मम्मी पापा के लिए भी। 

तो आये ,हमारी पीढ़ी  बृद्धाआश्रम को एक उपेक्षित जेल का रूप न देकर एक ऐसा घर बनाये जहां हम अपनी लाइफ का second innings यानि दूसरी पारी खेले।अपने हमउम्र के साथ रहे ,अपने सुख दुःख बांटे ,हसी ठहाको की महफिल जमाये,वो सब करे जो जवानी में वक़्त के अभाव के कारण नहीं किया ,जैसे मर्जी हो वैसे जिए रोकर नहीं हँस कर। 

ये सत्य है कि आज कल के समय में घर में माँ बाप की जरुरत किसी को नहीं है जो की एक सामाजिक,वैचारिक 
और भावनात्मक पतन है। इस बदलते दौर को बदलना  हमारे वश में नहीं तो आये हम खुद को बदल ले,अपनी सोच को बदल ले। इस समाज में बहुत से माँ बाप के बच्चे नहीं है और बहुतो को बच्चे होते हुए भी वो अकेले है.वैसे ही बहुत से बच्चो के माँ बाप नहीं अनाथ है। अगर  बृद्धाआश्रम और अनाथ आश्र्म को जोड़ दे तो कितने बच्चो को माँ बाप,दादा दादी का प्यार मिल जायेगा और बुजुर्गो को अपने पोते पोतियो के रूप में बच्चे सँभालने का सुख मिल जाये। दोस्तों ,मैं तो अपनी तैयारी इसी सोच के आधार पर कर रही हूँ कि- एक दिन  बृद्धाआश्रम + अनाथआश्रम को जोड़ कर एक ऐसा खुशनुमा घर की रचना करू जहाँ  सब स्वार्थ से परे हो। खुशहाल वातावरण में गैरो के साथ अपनों से बढ़ कर रिश्तो पे पिरोया मेरा " second innings home" ये मेरे जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत होगी। 













26 टिप्‍पणियां:

  1. गहरी संवेदनाएँ समेटे...second innings home

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  2. आभार..... सह्रदय धन्यवाद......... सर

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  3. प्रिय कामिनी -- आपके इस लेख को जब मैंने शब्द नगरी पर पढ़ा था तो हैरान सी हो गई थी क्योकि ये चिंतन मेरे लिए नितांत नया था | बदलते वक्त में जीवटता से भरे माता- पिता सीमित परिवार के चलते बहुत जल्द ही अकेले पड़ जाते हैं | तुमने सही याद दिलाया |वानप्रस्थ भारतीय संस्कृति की वो परम्परा थी जो किसी भी इन्सान को जीवन के व्यर्थ मोह और लिप्साओं से दूर करने में सहायक होती थी | सबसे बड़ी बात कि ये स्वैच्छिक होती थी | आज के वृद्धाश्रमों के जीवन और तब के वानप्रस्थ आश्रम में यद्यपि बहुत अंतर हैपर फिर भी मायूसी में डूबे बुजुर्गों के लिए सकारात्मक संबल भी है जो उन्हें पुरानी परम्पराओं से परिचित करवा जीवन में आशावादिता की और कदम बढ़ाने को प्रेरित करता है | मन को नकारात्मकता की ओर से सकारात्मकता की ओर ले जाते | इस मौलिक चिंतन के लिए तुम्हे बधाई और शुभकामनायें देती हूँ | अपने उर्जावान लेखन के साथ आगे बढती रहो | मेरा प्यार |

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    1. सहृदय धन्यवाद सखी ,तुम्हारी प्रतिक्रिया सदा मेरा मनोबल बढाती है ,स्नेह सखी

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  4. विलक्षण सोच है आप की वाकई में सकारात्मकता के दृष्टिकोण से सोचें तो यह भी एक पहलू है जीवन की second inning को बोझ न समझ कर भरपूर जीने का । गहरी संवेदनशीलता के साथ एक गहन चिंतन है आपके विचारों मेंं । सस्नेह शुभकामनाएँ ।

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    1. सहृदय धन्यवाद मीना जी ,आप की प्रतिक्रिया मेरा उत्साहवर्धन करती है सादर स्नेह

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  5. वृद्धावस्था पर आपकी सजग लेखनी अत्यंत ही प्रभावशाली है। वृद्ध व्यक्ति समाज का मार्गदर्शक तत्व के समान होते हैं । उनका व्यवहार आचरण व जीवन शैली व दर्शन कोटि का हो तो यह समाज को एक दिशा प्रदान कर सकती है।
    आज की पीढी ही कल के वृद्ध बनेंगे, और जो आज भी भटके है वो वृद्ध होकर भी क्या मार्गदर्शन देंगे। अतः, दोनो को सामंजस्य स्थापित करने और उच्च जीवन मानदंड स्थापित करने की आवश्यकता है।
    धन्यवाद ....

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    1. सहृदय धन्यवाद........ आप की प्रतिक्रिया मेरा मार्गदर्शन करती है सादर नमन

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  6. प्रिय सखी कामिनी बहुत अच्छा लेख, शब्द नहीं आप के लेख की तारीफ़ में....| वृद्धआश्रम से अपने बच्चों के लिए तरसते माता -पिता, मोहब्बत लुटाने वाले मोहब्बत को मोहताज़ रहते है,
    वृद्धावस्था के , उत्थान के लिए सकारात्मक ऊर्जा से भरा सुन्दर लेख ,आप को बहुत सा स्नेह
    सादर

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    1. परिस्थितियों.से समायोजन. का वेहतरीन विकल्प। संवेदनशील। यथार्थ ।

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  7. प्रिय सखी कामिनी बहुत अच्छा लेख, शब्द नहीं आप के लेख की तारीफ़ में....| वृद्धआश्रम से अपने बच्चों के लिए तरसते माता -पिता, मोहब्बत लुटाने वाले मोहब्बत को मोहताज़ रहते है,
    वृद्धावस्था के , उत्थान के लिए सकारात्मक ऊर्जा से भरा सुन्दर लेख ,आप को बहुत सा स्नेह
    सादर

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    1. आभार सखी, इतनी सुन्दर और सकारात्मक प्रतिक्रिया के लिए ,आप का स्नेह और साथ यूँ ही बना रहे

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  8. नमस्ते,

    आपकी यह प्रस्तुति BLOG "पाँच लिंकों का आनंद"
    ( http://halchalwith5links.blogspot.in ) में
    गुरुवार 10 जनवरी 2019 को प्रकाशनार्थ 1273 वें अंक में सम्मिलित की गयी है।

    प्रातः 4 बजे के उपरान्त प्रकाशित अंक अवलोकनार्थ उपलब्ध होगा।
    चर्चा में शामिल होने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं, आइयेगा ज़रूर।
    सधन्यवाद।

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    1. सहृदय धन्यवाद...... रवीन्द्र जी ,मेरी लेख को अपनी संकलन में स्थान देने के लिए ,आभार सादर नमस्कार ...

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  9. जी बहुत सुंदर लेख और सोच है आपकी।

    वृद्धाश्रम जिनकों मिला वे भी किस्मत वाले हैं,यहाँ अपने शहर में ऐसे लो सड़कों पर दिन गुजर रहे है। उनमें हैप्पी मिठ्ठू जी भी हैं। जिनसे में प्रतिदिन सुबह मुलाकात करता हूं।

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    1. सहृदय धन्यवाद...... शशि जी ,आपने सही कहा कई बुजुर्गो को तो फुटपाथ ही नसीब होता ,काश हम मिठूठ जी जैसे लोगो के लिए कुछ कर पाते , सादर नमस्कार

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  10. जी बहुत सुंदर लेख और सोच है आपकी।

    वृद्धाश्रम जिनकों मिला वे भी किस्मत वाले हैं,यहाँ अपने शहर में ऐसे लो सड़कों पर दिन गुजर रहे है। उनमें हैप्पी मिठ्ठू जी भी हैं। जिनसे में प्रतिदिन सुबह मुलाकात करता हूं।

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  11. अत्यंत विचारणीय लेख, आज के समाज के सत्य को उकेरते हुए. इस अच्छे लेख की बधाई और आभार!!!

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    1. बहुत बहुत शुक्रिया ......आप का सादर नमस्कार आप को

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  12. बहुत ही प्रभावशाली लेख लिखा आपने कामिनी जी वृद्ध व्यक्ति समाज का मार्गदर्शक होते हैं जिनकी छत्र छाया में हमारे बच्चों को अच्छे संस्कार मिलते हैं।जिसकी कद्र आज की पीढ़ी कहां करती है।बहुत सुंदर प्रस्तुति

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    1. हार्दिक धन्यवाद....... अनुराधा जी ,सही कहा आपने, बृद्ध व्यक्ति समाज के मार्गदर्शक है लेकिन ये भी सत्य है कि जैसे जैसे हम बुढ़ापे की ओर अग्रसर होते है हम अपनी ही कदर करना भूलते जाते है ,हम खुद अपने आप को दयनीय अवस्था में लाते जाते है यही हमारे दुःख की वजह होती है। हमे खुद की कद्र करना सीखना होगा

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  13. बहुत ही सुन्दर एवं विचारणीय लेख....
    सही कहा वृद्धाश्रम को वानप्रस्थ सा लें या बृद्ध अनाथ बच्चों को सनाथ कर सकते हैं जिन्हें जरूरत है उनके काम भी आयें और अपना भी समय पास हो...वाह कामिनी जी आपकी सजग लेखनी से लिखित यह लेख बहुत ही सराहनीय है इतने सुन्दर लेख के लिए बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं....

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    1. हार्दिक धन्यवाद.........आभार आप का ,सुधा जी हम जो कुछ लिखते है वो अपने जीवन के अनुभव से सीख कर ही लिखते है ,मैंने अनुभव किया है कि -बृद्धो की सबसे बड़ी समस्या एकाकीपन होता है अगर वो दूर कर दे तो वो भी खुश रह सकते है.

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  14. बहुत ही सुन्दर एवं विचारणीय लेख....
    सही कहा वृद्धाश्रम को वानप्रस्थ सा लें या बृद्ध अनाथ बच्चों को सनाथ कर सकते हैं जिन्हें जरूरत है उनके काम भी आयें और अपना भी समय पास हो...वाह कामिनी जी आपकी सजग लेखनी से लिखित यह लेख बहुत ही सराहनीय है इतने सुन्दर लेख के लिए बहुत बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं....

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  15. सुख और दुःख जीवन के दो पहलू होते हैं जो कभी भी साथ साथ नहीं रहते हैं। ये एक दूसरे के पूरक होते हैं और जब एक रहता हैं तो दूसरा नहीं रहता हैं। इन्हें धूप छाँव, सिक्के के दो पहलुओं की संज्ञा दी जाती हैं।
    हर इंसान के जीवन में सुख और दुःख दोनों का क्रम चलता रहता हैं। धरा पर ऐसा कोई इंसान नहीं हैं जिसने इन दोनों का अनुभव नहीं किया हो। सुखों और दुखों का इंसान से हमेशा से नाता रहा हैं तथा जीवन में इनका एक अलग ही महत्त्व हैं”। बदलते वक्त में जीवटता से भरे माता- पिता सीमित परिवार के चलते बहुत जल्द ही अकेले पड़ जाते हैं आपका ये लेख सकारात्मक ऊर्जा से भरा है सुख और दुःख जीवन के दो पहलू होते हैं बचे आजकल ये भूल जाते है जो वो आज कर रहे है वो कल उनके साथ भी होना है ...वृद्धावस्था पर आपकी सजग लेखनी अत्यंत ही प्रभावशाली है।

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    1. आदरणीय संजय जी ,मैं आप के विचारो से पूर्णतः सहमत हूँ ,आपने मेरे लेख को सराहा और उस पर अपनी अनमोल प्रतिक्रिया दी इसके लिए आप का तहे दिल से शुक्रिया उमींद करती हूँ कि आप का साथ और सहयोग यूँ ही बना रहेगा ,सादर नमन

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" बृद्धाआश्रम "बनाम "सेकेण्ड इनिंग होम "

" बृद्धाआश्रम "ये शब्द सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते है। कितना डरावना है ये शब्द और कितनी डरावनी है इस घर यानि "आश्रम&...