मंगलवार, 31 अगस्त 2021

"धरती की करुण पुकार"



हे! मानस के दीप कलश 

तुम आज धरा पर फिर आओ।

नवयुग की रामायण रचकर 

मानवता के प्राण बचाओ।।


आज कहाँ वो राम जगत में 

जिसने तप को गले लगाया ।

राजसुख से वंचित रह जिसने 

मात-पिता का वचन निभाया।। 

 

सुख कहाँ है वो रामराज्य  का  ?

वह सपना तो अब टूट गया ।

कहाँ है राम-लक्ष्मण से भाई ?

भाई से भाई अब रूठ गया।।


सुन लो अब अरज ये मेरी

मैं धरती जननी हूँ तेरी।

दे दो, ऐसे राम धरा को 

 भ्रष्टाचार जो दूर भगा दें ।

दे दो, ऐसे कृष्ण मुझे तुम 

जो द्रोपदी की लाज बचा लें।।


दे दो, भरत-लखन से भाई 

जो भाई का साथ निभा दे।

लौटा दो, वो अर्जुन तुम मुझको

जो धर्मयुद्ध का मर्म समझा दे‌ ।।


हे!मेरे मानस पुत्रो

मेरी करुण पुकार तुम सुन लो।

दहक रहा है  मेरा  आँचल

आओ, धरा की लाज बचा लो।।


31 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल बुधवार (01-09-2021) को चर्चा मंच   "ज्ञान परंपरा का हिस्सा बने संस्कृत"  (चर्चा अंक- 4174)  पर भी होगी!--सूचना देने का उद्देश्य यह है कि आप उपरोक्त लिंक पर पधार करचर्चा मंच के अंक का अवलोकन करे और अपनी मूल्यवान प्रतिक्रिया से अवगत करायें।--
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'   

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    1. मेरी रचना को स्थान देने के लिए हृदयतल से धन्यवाद सर,सादर नमन

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  2. दे दो, ऐसे राम धरा को

    भ्रष्टाचार जो दूर भगा दे ।

    दे दो, ऐसे कृष्ण मुझे तुम

    जो द्रोपदी की लाज बचा ले।।


    गहन चिंतन के परिणाम स्वरूप रची गई रचना।
    सुन्दर।

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    1. सरहनसंपन प्रतिक्रिया देने के लिए हृदयतल से धन्यवाद सधु जी,सादर नमन

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  3. बहुत बहुत सशक्त प्रभावशाली रचना । शुभ कामनाएं।

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    1. सहृदय धन्यवाद सर,आपका आशीर्वाद प्राप्त हुआ रचना सार्थक हुई,सादर नमन आपको

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  4. बहुत सुंदर कामिनी जी! धरा की कातर पूकार है आपका काव्य हृदय स्पर्शी ,मन में ये भाव हमारे भी आते हैं पर धरती माँ बिलख कर ऐसा कहती हैं तो सच रोगंटे खड़े हो जाते हैं।
    अति सुंदर।

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    1. धरती माँ तड़प तो रही है,अब हमें खुद को बदलना ही होगा। रचना को सार्थकता प्रदान करने के लिए हृदयतल से धन्यवाद कुसुम जी,सादर नमन

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  5. हे! मानस के दीप कलश

    तुम आज धरा पर फिर आओ।

    नवयुग की रामायण रचकर

    मानवता के प्राण बचाओं।।

    कामिनी सिन्हा का आवाहन राम सबका आवाहन है। वैसे तो हैं कितने राम ,सबके अपने अपने राम ,कहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम मेरे तेरे सबके राम। बेहद की सार्थक निर्मल रचना पतित पावनी सुरसरि सी।

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    1. सही कहा आपने वीरेंद्र जी,जिसकी जैसी भावना...,सराहना हेतु हृदयतल से धन्यवाद एवं नमन

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  6. बहुत सुंदर रचना, कामिनी दी।

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    1. दिल से शुक्रिया ज्योति जी,सराहना हेतु आभार,सादर नमन आपको

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  7. वाह! अत्यंत सामयिक, सार्थक और सुमधुर याचना।

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    1. सहृदय धन्यवाद विश्वमोहन जी,आपकी प्रतिक्रिया मिली लेखन सार्थक हुआ,ये तो बस एक तुच्छ प्रयास है,सादर नमन आपको

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  8. आदरणीया मैम, बहुत ही सुंदर और सशक्त रचना। धरती माँ की यह करुण पुकार सच ही मन को भेद देती है, काश हम उनकी पुकार सुन कर, अपने भीतर मानवता के संस्कार पुनः जगा सकें। हृदय से आभार इस सुंदर पर करुण रचना के लिए व आपको प्रणाम।

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    1. दिल से शुक्रिया अनंता जी,धरती की आस आप जैसे युवावर्ग से ही है हमें तो जो करनी करना था वो करके सिर्फ पछतावा भर कर सकते हैं और कुछ नहीं।
      ढेर सारा आपको

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  9. आज के हालतों को व्यक्त करती प्रभावशाली रचना...

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  10. सुन्दर और सार्थक सृजन। गहन चिंतन वाली सामयिक रचना के लिए आपको बहुत-बहुत शुभकामनायें।

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  11. बहुत सुन्दर और सार्थक भाव से सृजित हृदयस्पर्शी कविता । लाजवाब भावाभिव्यक्ति कामिनी जी ।

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    1. दिल से शुक्रिया मीना जी,उत्साहवर्धन हेतु आभार आपका ,सादर

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  12. हे!मेरे मानस पुत्रों

    मेरी करुण पुकार तुम सुन लो।

    दहक रहा है मेरा आंचल

    आओ, धरा की लाज बचा लो।।बहुत भाव प्रवण निवेदन मां धरती से। सुंदर सृजन के लिए हार्दिक शुभकामनाएं कामिनी जी ।

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    1. दिल से शुक्रिया जिज्ञासा जी,उत्साहवर्धन हेतु आभार आपका ,सादर

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  13. 'हे! मानस के दीप कलश
    तुम आज धरा पर फिर आओ।
    नवयुग की रामायण रचकर
    मानवता के प्राण बचाओ'... इन प्रारम्भिक पंक्तियों ने ही बता दिया था कि रचना कितनी सुन्दर होगी!... बधाई महोदया!

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    1. सहृदय धन्यवाद सर ,आपका आशीर्वाद मिला लेखन सार्थक हुआ ,सादर नमन आपको

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    2. 👍स्नेहिल अभिनन्दन आ.कामिनी जी!

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  14. धरती की करुण पुकार और ये सुंदर और सारगर्भित लेखन ।
    भावपूर्ण अभिव्यक्ति ।

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  15. सराहना हेतु दिल से शुक्रिया दी,सादर नमस्कार

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