गुरुवार, 25 मार्च 2021

"होली के फूल"



 ये रंगीन फूल मुबारक तुम्हे हो

ये ख्वाबों की होली मुबारक तुम्हे हो। 


ख़ुशी के रंगों से रंगी है- ये दुनिया

तेरे सपनो के रंगो से सजी है-ये दुनिया। 

इस प्रिय पहर में दो खग यूँ मिले है, 

जैसे एक ही डाली पर दो सुमन खिले है। 

मेरे दिल की लाली मुबारक तुम्हे हो।। 

मेरे ख्वाबों की होली..... 


प्रेम पिचकारी में दिल के रंगों को घोल 

दिल ये कहता है,तुमसे भी होली खेलूं । 

तेरी सारी पोशाकों को रंगों से रंग दूँ, 

तेरे गालों-ललाटों पे गुलालों को मल दूँ। 

मेरे प्यार की रोली मुबारक तुम्हे हो।।  

मेरे ख्वाबों की होली-----


काश !तुमसे मैं होली में मिल पाती 

मगर, ये होली अधूरी ना होगी 

मेरे शब्दों के छीटों से खुद को रंग लेना 

हो सकें तो, इन रंगों को मुझको भी देना। 

संग-प्रीत की ठिठोली मुबारक तुम्हे हो।। 

मेरे ख्वाबों की होली मुबारक तुम्हे हो -----



आप सभी को होली  की हार्दिक शुभकामनायें 

शनिवार, 20 मार्च 2021

"पद और प्रतिष्ठा"

बात उन  दिनों की जब हम सब छोटे-छोटे थे। मेरे पापा  इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में कार्यरत थे,हमें सरकारी  क्वार्टर  मिले थे। हमारी  कॉलोनी में साफ-सफाई के लिए,बागवानी के लिए और घरों के टॉयलेट-बाथरूम तक के सफाई के लिए अलग-अलग कर्मचारी थे। उन्ही कर्मचारियों में एक थे "रामचंद्र अंकल" जी हाँ,हम उन्हें अंकल कहकर ही बुलाते थे, वो हमारे टॉयलेट-बाथरूम और नालियों की सफाई करने हर रोज आते थे। अब उन दिनों की  मानसिकता के हिसाब से आप समझ ही सकते हैं कि-घर के बुजुर्ग उनके साथ कैसा व्यवहार कर सकते हैं। उन दिनों तो छुआ-छुत जैसी बीमारी अपने प्रवल रूप में थी। लेकिन.....हमारे घरों में ये कम होता था, थोड़ा बहुत दादी करती थी बाकी कोई नहीं। लेकिन रामचंद्र अंकल के लिए पापा की सख्त हिदायत थी कि उनके साथ कभी कोई गलत व्यवहार नहीं करेगा। उन्हें दफ्तर से लेकर सबके घरों में भी उतना ही सम्मान मिलता था जितना बाकी बड़े कर्मचारियों को मिलता था। दरअसल अंकल का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि कॉलोनी के साहब भी उन्हें "रामचंद्र जी" कहकर सम्बोधित करते थे बाकी उम्र के हिसाब से भईया,चाचा अंकल बुलाते थे। साहब को पीठ पीछे गालियाँ भले दे दी जाए ,मगर रामचंद्र अंकल के लिए... पीठ पीछे भी उनकी तारीफ ही होती थी। 

पापा.. दादी कहती है कि- "रामचंद्र अंकल तो मेहतर है छोटी और नीच जाति  के है और तो और वो बहुत छोटे कर्मचारी भी है "फिर भी सभी लोग उन्हें इतना मान-आदर क्यूँ देते हैं ? मेरे भोले मन को ये बाते उलझा रही थी सो एक दिन मैंने पापा से पूछ ही लिया। पापा ने उस दिन एक बात बड़े प्यार और गंभीरता से समझाई  जो आज तक मैं कभी नहीं भूली। पापा ने कहा -"बेटा "प्रतिष्ठा"  पद और जाति से नहीं मिलती, प्रतिष्ठा अपने व्यक्तित्व और व्यवहार से कमानी पड़ती है " और रामचंद्र ने ये कमाया है। फिर पापा ने उनकी कहानी बताई-रामचंद्र अंकल के पापा इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में कार्यरत थे जब वो 14 साल के थे तभी उनके पापा गुजर गए। उनके पापा का स्वभाव भी बड़ा मृदुल था और हर एक हाकिम उन्हें मानता भी था और इज्जत भी देता था। उन  साहब लोगो ने जब रामचंद्र अंकल की आर्थिक मदद करनी चाही तो उन्होंने मना कर दिया। तब वो लोग उन्हें चाय-पानी पिलाने के लिए रख लिया और इस बहाने उनकी मदद करने लगे। जब वो 18 साल के हुए तो उनके  पापा के जगह पर ही उन्हें नौकरी पर रख लिया। 

रामचंद्र अंकल कठोर परिश्रमी,मृदुभाषी और बड़े  स्वभिमानी भी थे कभी किसी से उनका झगड़ा तो दूर कहा-सुनी भी नहीं होती, बच्चें  हो या बड़े साहब सबके साथ उनका व्यवहार नपातुला होता ,चेहरे पर शालीनता भरी एक मुस्कुराहट सदैव बनी रहती। इसी  कारण कभी कोई साहब तक भी उनके साथ दुव्यवहार कर ही नहीं पाया और उन्हें "रामचंद्र जी' ही कहकर सम्बोधित किया और अपने बच्चों से भी उनका आदर करने को कहा। 

मुझे आज भी याद है उनकी जेब टॉफियों से भरी रहती थी जो भी कोई बच्चा उनके करीब आता  तो उन्हें "नमस्ते अंकल" जरूर कहता था और वो बड़े प्यार से उसकी हथेली पर दो टॉफियाँ रख देते थे और बच्चें "थैंक्यू अंकल" कहते हुए खुश हो जाते थे। आज खबर आई कि रामचंद्र अंकल नहीं रहे.... , जिनके  व्यवहार ने बालपन में ही मुझे ये सीखा दिया था कि -"प्रतिष्टा कमानी पड़ती है"

उनकी याद आई तो ये संस्मरण आप से साझा कर लिया। 


रविवार, 14 मार्च 2021

"सीख"

अरे....बिट्टू बेटा, बाहर इतना शोर क्यों हो रहा है और बाबुजी किस पर गुस्सा हो रहे है।  

अरे चाची... क्या बताऊँ, दादा जी छोटी सी बात पर किसी औरत पर बहुत गुस्सा हो रहे है....

उसे ही अभद्र बोल रहे है....

जब कि गलती उस औरत की है भी नहीं....यदि वो दुकान से कोई सामान ले रही है 

और उसमे कुछ कमी है तो... शिकायत करना उसका वाज़िब है न 

मगर..... दादा जी को कौन समझाए..... 

यदि हम छोटी से बात भी चीखकर या गुस्से में बोले तो अभद्र हो जाते हैं... 

और जब बड़े ऐसा करे तो, उन्हें कौन रोके......

ऐसा नहीं बोलते बिट्टू, दादा जी बड़े है न.....

हाँ, चाची वही तो वो बड़े है जो करे वो सही.....

क्या बड़े कभी गलत नहीं होते ? 

मुँह बनाकर बोलते हुए बिट्टू तो निकल गया और मैं.... 

सोचती रही बात तो सही कह रहा है लेकिन मैं उसे प्रोत्साहन तो दे नहीं सकती.......

 क्योंकि वो गलत होगा और चुप रहना वो भी सही नहीं..... 

फिर मैं तो घर की नई सदस्य हूँ ......घर के रीत-रश्मों से भी बेखबर.....बोलूँ भी तो क्या ?

दिमाग ख्यालों में उलझा था.....तभी मन ने कहा -वो घर के मुखिया है और.....

 उससे भी ज्यादा वो बुजुर्ग है.....

 उनका तो सिर्फ सम्मान किया जा सकता है सवाल-जबाब नहीं....

घर-परिवार की मर्यादा तभी बनी रहती है। 

हाँ,उनसे सीख जरूर ले सकते हैं कि-

जो गलती वो कर रहे हैं वो हम ना करे.....

छोटों की नज़र में खुद का मान-मर्यादा बनाये रखना भी बड़ों का अहम फर्ज है। 

गुरुवार, 11 मार्च 2021

फिर क्यूँ??



क्यूँ ये मन उदास है ?

किसकी इसे तलाश है ?

सीने में हूक सी उठती है। 

क्यूँ दर्द से दिल ये बेजार है ?

ना कुछ खोया,ना पाया है। 

 फिर किस बात का मलाल है ?

ना रूठी हूँ,ना मनाया है किसी ने। 

 क्यूँ कहते हैं,तुमसे बहुत प्यार है ?

ना कुछ भूली,ना ही याद है। 

फिर क्यूँ उलझे से ये मन के तार है?

ना आया है,ना आएगा कोई। 

फिर मुझे किसका इंतज़ार है ?

ना प्यार है,ना शिकवा-गिला। 

फिर क्यूँ ये तकरार है ?

ना मरती हूँ,ना जिन्दा हूँ। 

क्यूँ त्रिशंकु सा बना हाल है ?

और कितने इम्तहान लेगी ऐ ज़िंदगी !

आखिर तुझे मुझे से, 

क्या दरकार  है ?

ऐ मन ! तू ही बता 

ना चाहती थी,ना चाहिए कुछ तो  

फिर क्यूँ, इतने सवाल है ?


गुरुवार, 4 मार्च 2021

"खिलतें हैं फुल बनके चुभते हैं हार बनके"


   

"रिश्ते जो जिंदगी में मिलते हैं प्यार बनके  

    खिलतें हैं फुल बनके चुभते हैं हार बनके" 

वैसे तो, सामान्य जीवन में रिश्तों का बहुत महत्व है, अनमोल होते हैं ये रिश्ते। सच्चे और दिल से जुड़े रिश्ते कभी चुभते नहीं...वो हार बनकर भी गले की शोभा ही बढ़ाते हैं। ये गीत तो आज कल के युग की एक खास रिश्ते को बाखुबी परिभाषित कर रहा है वो रिश्ते हैं "आभासी दुनिया के रिश्ते" जो आजकल समाज में यथार्थ रिश्तों से ज्यादा महत्वपूर्ण जगह बना चुका है। सोशल मीडिया के नाम से प्रचलित अनेकों ठिकाने हैं  जहाँ ये रिश्ते बड़ी आसानी से जुड़ रहें हैं और हवाई पींगे भर रहें हैं "फल-फूल भी रहें हैं" ये कहना अटपटा लग रहा है क्योंकि वैसे तो हालात कही भी नजर नहीं आ रहें हैं। 

रिश्ते बनाना अच्छी बात है..किसी से बातें करना... किसी के अनुभव से जुड़कर कुछ सीखना...किसी का दर्द बाँटना.... किसी का हमदर्द बनने में कोई बुराई नहीं है। कितना सुखद होता है ये सब... किसी अजनबी से जुड़ आप खुद को उससे साझा करते हो....वो अपना ना होते हुए भी आपका हमराज बनता है....सही है। 

तो गलत क्या है ? आजकल के ऐसे रिश्तों को देख मेरा मन अक्सर ये सवाल खुद से ही कर बैठता है तो सोचा  क्यूँ न इस पर थोड़ा मंथन किया जाए,कुछ विचार-विमर्श हो। आभासी रिश्तों में फँस कर दर्द पालते हुए लोगों को देखकर मुझे बड़ी उलझन सी होती और ऐसी परिस्थिति में मन खुद ही मंथन करने लगता है।

  तो  चलते हैं, आज से बीस साल पीछे - जब हमारे पास रिश्तों के नाम पर कुछ खून से जुड़े रिश्तें और चंद गिने-चुने दोस्त ही हुआ करते थे। अब आपका उनके साथ जैसा भी संबंध हो बस, आपको निभाना होता था। क्योंकि उससे आगे का आप सोच भी नहीं सकते थे और यक़ीनन हम खुश रहते थे....भटकाव के रास्ते जो नहीं थे। आज बे-अंत द्वार खुले हैं....अनगिनत रास्ते है....आप जहाँ चाहे विचरण कर सकते हैं....जिससे चाहे संबंध बना सकते हैं.....मेरा मतलब दोस्त बना सकते हैं....कोई रोक-टोक नहीं है....कोई पहरेदारी नहीं है...आप स्वछंद है और सबसे बल्ले-बल्ले ये है कि -उन रिश्तों को निभाने की आप पर कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं है... यूँ कह सकते हैं कि -आप बिंदास होकर इन रिश्तों का लुफ़्त उठा सकते हैं। 

अब सवाल ये है कि-क्या ये रिश्ते दिल से जुड़े होते हैं और टिकाऊ होते हैं या ये सिर्फ मनोरंजक होते हैं ? मेरे समझ से तो ये बात अपने-अपने व्यक्तित्व पर निर्भर करता है,कुछ तो सचमुच दिल से जुड़ जाते हैं मगर अधिकांश के लिए ये सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन होता है (मनोरजन करने  वालों की तादाद ही ज्यादा है ) मनोरंजन करने वाले तो मनोरंजन करके निकल लिए....कोई और खिलौना  ढूंढने मगर....जो दिल से जुड़ जाते हैं वो तो यही कहते हैं -"खिलते हैं फुल बनके चुभते हैं हार बनके" इन रिश्तों में स्पष्ट दिखता है कि -इसकी ख़ासियत कम और ख़ामियाँ ज्यादा है फिर भी इसके मोहपाश में लोग बँधते  ही जा रहें हैं।

ऐसे रिश्ते बनाने की पीछे आखिर क्या मानसिकता है ? 

 आजकल की युवा पीढ़ी ऐसे रिश्तों का खेल खेल रहें है तो उनकी मानसिकता तो फिर भी समझ आती है। क्योंकि उन्होंने तो आँखें ही इस युग में खोली है जहाँ हर चीज़ उनके लिए बस "यूज एंड थ्रो" हो गयी है। उन्हें किसी चीज़ का मोह ही नहीं है हमारी तरह। लेकिन गौर करने वाली बात ये भी है कि-पिछले दस-पंद्रह सालों में इन फरेबी रिश्तों के चक्कर में पड़कर कितने युवक-युवतियों ने ( नाबालिगों ने तो और भी ज्यादा ) अपने हँसते-खेलते जीवन को तबाह कर लिया  है। जो समझदार है वो इन आभासी रिश्तों को आभासी ही समझ मनोरंजन कर निकल आते हैं और उस हार को गले में  डालते ही नहीं जो चुभें। 

  हैंरत तो तब होती है जब प्रौढ़ लोग और उससे भी ऊपर 50-60 साल के बेटे-बहु ,नाती-पोतो से भरे परिवार वाले समझदार लोग इन आभासी रिश्तों में उलझ जाते हैं। मैं ऐसे लोगो को बदचलन या रसिक मिज़ाज की संज्ञा बिलकुल नहीं दे रही। ऐसा नहीं है कि- ये सब इन्ही तरह के लोग है,सीधे-साधे भोले प्रकृति के लोग भी इस आभासी रिश्तों के बीमारी के शिकार हुए जा रहें हैं। हाँ,मैं तो इसे "बीमारी" ही कहूँगी क्योंकि स्वस्थ मानसिकता के लोग ऐसे रिश्ते बनाते जरूर है मगर इन रिश्तों के धागों में उलझतें नहीं है,इन रिश्तों को एक मर्यादित सीमा में ही रखते हैं जो उन्हें सिर्फ खुशियाँ ही देता है। 

आखिर क्या वजह है ऐसे रिश्तों को दिल से लगाने की और उसमे दर्द पालने की ? 

आखिर क्यूँ आज सब हक़ीक़त की धरातल छोड़ आभासी आसमान में उड़ना चाहते हैं ?आखिर  क्या पाने की चाहत होती है ? कोई प्रलोभन  या दिखावे के ही सही स्नेह और अपनत्व के चंद बोल की लालसा या उलझ जाते हैं दूर से चाँद का  लुभावना  रूप-रंग देखकर या खुद के मन को खोलकर साझा करना चाहते है वो दर्द जो यथार्थ के रिश्तों में उन्हें मिले होते हैं या भरना चाहते हैं अपने मन और जीवन के ख़ालीपन को ? 

 जब एक स्त्री दूसरी स्त्री से आभासी दोस्ती की डोर में बँधती है (जो कि अमूमन कम ही होता है ) तो अवश्य ये उनके लिए सुखद है क्योंकि वो इस आभासी रिश्ते में अपनी वो बातें, अपना वो दर्द, जो वो किसी से साझा नहीं कर पाती वो सुनने और समझने वाला उसे कोई दोस्त मिल जाता है,जो उसकी बात किसी और तक नहीं पहुँचाएगी। लेकिन जब एक स्त्री और पुरुष की आभासी दोस्ती होती है तो यहाँ भी ये  फार्मूला लागू  होता है कि -"एक लड़का-लड़की कभी दोस्त नहीं होते" (अपवाद से इंकार नहीं किया जा सकता )  तो ये रिश्ते बहुत कॉम्प्लिकेटेड हो जाते हैं और अक्सर दर्द और बदनामी ही दे जाते हैं। 

फिर हमारी पीढ़ी की कुछ  खास बुराई भी है वो सपने में ज्यादा जीती है शायद हक़ीक़त  की धरातल पर उसे वो सुख नहीं मिल पता जो उसे चाहिए और दूसरा सपनों को भी सच मान यदि वो किसी रिश्ते से जुड़ गई तो उसका दर्द भी दिल में पाल लेती है। हाँ,कुछ लोग तो इस गम से निकल आते हैं कुछ का इससे उबर पाना मुश्किल होता है। यहाँ स्त्री या पुरुष कहना उचित नहीं है क्योंकि पुरुष तो पहले से समझदार थे अब तो स्त्रियाँ भी समझदार हो गयी है। 

ये कहावत बिलकुल सही है और यहाँ शत-प्रतिशत लागू होता है कि-"दूर के ढ़ोल सुहाने लगते हैं" पास आते ही वो मात्र शोर होता है। आभासी रिश्ते भी कुछ ऐसे ही होते हैं।  वैसे तो रिश्तों में थोड़ा बहुत स्वार्थ तो होता ही है मगर ये रिश्ता तो शायद, पूर्णतः स्वार्थ और आकर्षण में ही लिप्त होता है इसीलिए और जल्दी दर्द दे जाता है।( इसमें भी अपवाद से इंकार नहीं किया जा सकता)  मेरी समझ तो यही कहती है कि -आभासी  या मिथ्य रिश्तों को छोड़ यथार्थ के रिश्तों के साथ में जीना ही समझदारी है। दूर के दोस्त से भला पास का दुश्मन होता है। एक ऐसे व्यक्ति के साथ रिश्तों में उलझना जिसके व्यक्तित्व से आप पूरी तरह अनभिज्ञ हो  जो सिर्फ एक भ्रम है ये खुद को छलना ही होता है। 

वैसे एक  नज़रिये से देखा  जाए तो आभासी रिश्ते बेहद पवित्र होने चाहिए क्योंकि इसमें देह से जुडा कोई स्वार्थ नही होता। भक्त और भगवान का रिश्ता भी तो आभासी ही होता है।   कही-कही तो देखने में आता है कि -अकेलेपन के शिकार बुजुर्गों के लिए तो ये वरदान भी साबित होता हैं। कभी-कभी तो ये रिश्ते  बड़ी ही सुखद अनुभूति कराते हैं.....आप जिसे जानते नहीं....जिससे कभी देखा नहीं....उससे मन से जुड़ जाते हैं...वो अपना सा लगने लगता है....कभी-कभी तो वो पिछले जन्म का  बिछुड़ा  मीत सा लगता है। इस नज़रिये से देखा जाए तो आभासी रिश्ते बेहद खूबसूरत और सुकून देने वाले होने चाहिए।मगर ऐसा होता नहीं है..... अक्सर लोग इस रिश्ते को अपवित्र बना लेते है ( खासतौर पर स्त्री और पुरुष का रिश्ता)  क्योंकि आज की हक़ीक़त  ही यही है कि-रिश्तों से पवित्रता ही खत्म हो गई है वो चाहे आभासी हो या यथार्थ। आभासी रिश्ते भी अमूमन किसी न किसी स्वार्थ वश ही बन रहे है। 

  एक दर्द को मिटाने के लिए दूसरा गम पाल लेना ये कहा की समझदारी है। मेरी समझ तो यही कहती हैं कि -इन आभासी रिश्तों में उलझ कर एक और दर्द पालने से अच्छा है जो रिश्ते हमारे पास है उसे ही खूबसूरत और खूबसूरत बनाने में अपना मनोयोग लगाना ही उचित है। 

जिनके पास खूबसूरत आभासी रिश्ते है जो उन्हें सिर्फ खुशियां और सुकून देते है तो वो बड़े भाग्यशाली है। मैं भी भाग्यशाली हूँ,मेरे पास भी मेरी कुछ प्यारी सखियाँ है। मगर ऐसे रिश्ते जो दर्द दे उनसे खुद को बचाने में ही समझदारी है। मेरी  मनसा किसी की भावनाओं को आहत करना बिलकुल नहीं है ये बस  मेरी व्यक्तिगत सोच है आपकी राय मेरे से इतर हो सकती है और उसका मैं सम्मान भी करती हूँ। 



 

"योग को अपनायेंगे रोग को हराएंगे"

" 21 जून "विश्व योगदिवस      "योग" हमारे भारत-वर्ष की सबसे अनमोल धरोहर है।   वैसे तो "योग की उत्पति" योगिराज क...