गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

"एकांतवास"




       टॉलस्टॉय की लिखी एक कहानी है - दो दोस्तों में शर्त लगी कि- कौन एक वर्ष तक एकांतवास कर सकता है जो करेगा दूसरा उसे 10 लाख नगद देगा। एक दोस्त राजी हो गया।उसने एक साल की अपनी जरुरत की सारी चीज़े रख ली,खुद के मनोरंजन के जितने भी साधन उसे चाहिए थे सब इकठ्ठें  कर रख लिये और एक साल के लिए कमरे में बंद हो गया।  कुछ दिन तो बड़ा खुश-खुश रहा,मगर धीरे-धीरे वो उन सब चीजों से ऊबने लगा। महीने दिन में ही वो अकेलापन से घबराने लगा।कुछ और दिन बीतते ही वो चीखने- चिल्लाने लगा,अपने बाल नोचने लगा,अकेलेपन की पीड़ा उसे असहनीय लगने लगी मगर, जैसे ही उसे शर्त की बात याद आती वो शांत हो जाता क्योँकि उसे पैसे की बहुत आवश्यकता थी। उसके पास कुछ अच्छी किताबें थी जिसमे परमात्मा से जुडी ज्ञान की बातें थी, मन बहलाने की लिए वो उसे पढ़ने लगा।उसका मन थोड़ा लगने लगा,वो धीरे-धीरे शांत भी होने लगा।धीरे-धीरे वो खुद को परमात्मा के करीब महसूस करने लगा,जब किताबें छोड़ता तो परमात्मा से बातें करने लगता।परमात्मा से बातें करना उसे अच्छा लगने लगा, अब उसे अकेलापन भी अच्छा लगने लगा,उसे खुद के भीतर अजीब सी शांति महसूस होने लगी,वो खुद को परमात्मा के साथ महसूस करने लगा, परमात्मा के साथ उसे अच्छा लगने लगा और वो खुश रहने लगा। उसे पता ही नहीं चला कब एक वर्ष गुजर गया। शर्त पूरा होने में बस एक महीना बचा था।  उधर दूसरे दोस्त को घबराहट होने लगी उसे लगा कि यदि मेरा दोस्त शर्त जीत गया तो उसे शर्त की  रकम देनी होगी।वो परेशान हो गया, क्योँकि इधर एक साल में उसे बिजनेस में काफी नुकसान हो गया था वो चिंतित रहने लगा कि शर्त की रकम कहाँ से लाऊँगा। उसने सोचा कि मैं दोस्त को मार दूँ तो सब यही समझेगें कि अकेलेपन से ऊब के और शर्त हारने के डर से उसने आत्महत्या कर ली,मुझ पर कोई शक भी नहीं करेगा और मैं पैसे देने से भी बच जाऊँगा।  फिर क्या था,शर्त पूरा होने के एक दिन पहले वो दोस्त को मारने के ख्याल से उस कमरे में गया जहाँ उसका दोस्त बंद था। मगर वहां जाकर देखा तो दंग रह गया। उसका दोस्त जा चूका था, उसने एक पत्र छोड़ रखा था जिसमे लिखा था -"प्यारे दोस्त इस एक साल में मैंने वो चीज पा ली हैं जो अनमोल हैं उसका मूल्य कोई भी नहीं चूका सकता ,मैं जान चूका हूँ कि हमारी जरूरते जितनी कम होती जाती है आनंद और शांति की अनुभूति बढ़ती जाती है,इन दिनों में मैंने परमात्मा के असीम शक्ति और प्रेम को जान  लिया हैं, ये शर्त मैं खुद ही तोड़कर जा रहा हूँ मुझे तुम्हारी रकम नहीं चाहिए,तुम इस रकम को मेरी तरफ से खुद के लिए उपहार समझो, इस रकम से अपना व्यवसाय बढ़ाओं,मुझे अब किसी चीज़ की आवश्यकता नहीं है,मैं अब हमेशा के लिए इन सभी चीज़ों से दूर जा रहा हूँ।"
    पहले ये कहानी मुझे बिलकुल समझ नहीं आती थी लेकिन, लॉकडाउन के दौरान मुझे ये बात समझ में आई कि-सचमुच," हमारी जरूरते जितनी कम होती जाती है आनंद और शांति की अनुभूति बढ़ती जाती है"शायद,इस बात का अनुभव लॉकडाउन के दौरान बहुतों ने किया होगा।   

     पहले मेरे लिए अकेलापन ही सबसे बड़ी सजा होती थी। मैं अक्सर कहती थी कि-"मुझे अगर मारना है तो दो दिन के लिए एक कमरे में बंद कर दो मैं अकेलेपन से ही मर जाऊँगी" मगर,पिछले कुछ दिन में मुझे भी ऐसी ही अनुभूति हुई कि -"कभी-कभी अकेलापन आपके लिए सजा नहीं बल्कि वरदान साबित होता है" बशर्ते आप उस अकेलेपन का सही मायने में सदुपयोग करें,जैसा कि टॉलस्टॉय की कहानी के किरदार ने किया। अकेलेपन में आप सर्वप्रथम तो खुद करीब होते हैं,खुद को जानने समझने और खुद से प्यार करने का अवसर मिलता है और खुद के करीब होते ही आप परमात्मा के करीब होने लगते है।आप अपने आस-पास सभी को जानते,पहचानते और समझते हैं बस खुद को ही नहीं जानते हैं और ना ही कभी जानने की कोशिश करते हैं,अकेलापन यही अवसर आपको प्रदान करता है
    ये सत्य है कि-"मनुष्य एक समाजिक प्राणी है" समाज में रहना नाते-रिश्तेदारों के साथ अपना कर्तव्य निभाना ये जरुरी है लेकिन, उतना ही जरुरी है खुद के साथ भी रहना।खुद के साथ रहने के लिए किसी एकांतवास या अलग कमरे में रहने  की जरुरत नहीं होती, अपनी आशाओं,अपेक्षाओं और आवश्यकताओं को कम  कर आप भीड़ में रहकर भी खुद के साथ रह सकते हैं और परमात्मा के असीम शक्ति और स्नेह की अनुभूति कर सकतें हैं। 

30 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार ( 25-12-2020) को "पन्थ अनोखा बतलाया" (चर्चा अंक- 3926) पर होगी। आप भी सादर आमंत्रित है।
    धन्यवाद.

    "मीना भारद्वाज"

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    1. मेरी रचना को स्थान देने की लिए हृदयतल से आभार मीना जी,सादर नमन

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  2. ये सत्य है कि-"मनुष्य एक समाजिक प्राणी है" समाज में रहना नाते-रिश्तेदारों के साथ अपना कर्तव्य निभाना ये जरुरी है लेकिन, उतना ही जरुरी है खुद के साथ भी रहना।

    सार्थक रचना

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  3. ये सत्य है कि-"मनुष्य एक समाजिक प्राणी है" समाज में रहना नाते-रिश्तेदारों के साथ अपना कर्तव्य निभाना ये जरुरी है लेकिन, उतना ही जरुरी है खुद के साथ भी रहना।

    सार्थक रचना

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  4. बहुत सुन्दर प्रेरणादायक ,मार्ग दर्शन करने वाली कहानी । वैसे प्रेम चंद जी व टालस्टाय जी की जितनी भी कहानियां पढ़ी हैं उनमें कोई न कोई संदेश अवश्य ही होता है । बस उसे समझने की पकड़ने की बात है ।

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    1. सहृदय धन्यवाद सर,आप की उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आभार ,सादर नमन

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  5. कामिनी दी, जिस इंसान ने अकेले रहना सीख लिया उससे खुशनसीब इंसान दूसरा नही हो सकता।

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    1. दिल से शुक्रिया ज्योति जी,आपने सही कहा,एक उम्र के बाद तो एकांतवास को दिल से अपना लेना ही चाहिए,हमारे बहुत से दुःख काम हो जायेगे,सादर नमन आपको

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  6. बहुत सुंदर कामिनी जी। सच पूछें तो जैसे जैसे आपकी आत्मा परम तत्व का स्पर्श करने लगती है, आपका अकेलापन एकांत में बदलने लगता है और सत चित आनंद में आप विलीन होने लगते हैं।

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    1. दिल से शुक्रिया विश्वमोहन जी,बिलकुल सही कहा आपने,जब हम खुद को सत चित आनंद में विलीन कर लेते है तो फिर शांति की तलाश में यहाँ-वहाँ भटकना नहीं पड़ता,सादर नमन आपको

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  7. वाह कामिनी जी सुंदर सत्य आपने बहुत ही सुंदर ढंग से एक सत्य को खोजा है ।
    लाजवाब।

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    1. आपके उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए दिल से धन्यवाद कुसुम जी,सादर नमन

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  8. बहुत बढ़िया कहानी है। सीख भी मिलती है। सादर बधाई। शुभकामनाएँ।

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    1. दिल से धन्यवाद वीरेन्द्र जी,सादर नमन

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  9. पर-अर्थ में संलग्न रहना ही जीवन नहीं है । देर-सवेर आत्म उन्मुख होकर आंतरिक स्वभाव से अवगत होना चाहिए । यदि समय अवसर दे रहा है तो क्या कहना ।

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    1. बिलकुल सत्य ,आपकी स्नेहिल प्रतिक्रिया के लिए दिल से धन्यवाद अमृता जी,सादर नमन

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  10. कितना भी कुछ हो जाय फिर भी आज के ज़माने में ऐसा देखने वाले करोड़ो में से एक आध ही मिलेगा, फिर लोग उसी राह चल देता है, फिर से पहले जैसे में रमना उसे बहाने लगता है
    \
    बहुत अच्छी प्रेरक प्रस्तुति

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    1. सत्य कहा आपने,तभी तो शांति की तलाश में ईधर-उधर भटकते रहते हैं,आपकी सुंदर प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से धन्यवाद कविता जी,सादर नमन

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  11. वाह ! बहुत सुंदर कहानी, आत्मचिंतन के लिए जब भी अवसर मिले चूकना नहीं चाहिए

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    1. सत्य वचन ,सहृदय धन्यवाद अनीता जी ,सादर नमन

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  12. दोनों का अपना अलग अलग सत्य है ... एकांत में रहना जितना मुश्किल है उतना ही स्वयं को जानने का एक माध्यम भी है ... और स्वयं को जान कर चिर आनंद में भी पाया जा सकता है ...

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    1. सहृदय धन्यवाद दिगंबर जी ,आपकी इस सुंदर प्रतिक्रिया के लिए तहेदिल से आभार ,सादर नमन

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  13. बहुत सुंदर और सार्थक सृजन सखी।

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kaminisinha1971@gmail.com

दोष किसका ???

     नमस्ते आंटी जी, कैसी है आप - शर्मा आंटी  को देखते ही मैंने हाथ जोड़ते हुए पूछा।      खुश रहो बेटा....तुम कैसी हो...कब आई दिल्ली....बिटिय...