बुधवार, 28 अगस्त 2024

"हमारी जागरूकता ही प्राकृतिक त्रासदी को रोक सकती है "


मानव सभ्यता के विकास में नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तो उनकी वजह आने वाली बाढ़ भी हमारी नियति है। हज़ारों वर्षों से नदियों के पानी के साथ पहाड़ी मिट्टी और चट्टानों के कण बहकर आ रहे हैं और जमा हो रहे हैं। ये तलछट पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था के निर्माण और समृद्धि के लिए उत्तरदायी है। लेकिन जब वही नदी मानसून में अत्यधिक बारिश के कारण उफान पर होती है तो वे हमें अपनी दुश्मन नजर आती है। जैसा कि कोसी नदी को बिहार का शोक और ब्रह्मपुत्र और घाघरा नदियों को संबंधित राज्यों का शोक कह कर उन्हें कोसा जाता है। नदियों से बहकर आने वाली पानी की भारी मात्रा को हम अपने अस्तित्व के लिए ख़तरा मानने लगते हैं जबकि, सच ये है कि नदियाँ जो पानी अपने साथ ले आती हैं, वो हमारे लिए असल में वरदान है। पर, बाढ़ को अब बढ़ती मानवीय समृद्धि की राह का रोड़ा मान लिया गया। आखिर क्यों ना माना जाए-हर साल जो बाढ़ के कारण तबाही का भयानक मंजर जो भुगतना पड़ता है।

मानसून आते ही बाढ़ का संकट मडराने लगता है। हो भी क्यों न ,हमारी दिखावटी व्यवस्था जो चरमरा जाती है।अब देखिये उत्तरी बिहार में मानसून की शरुआत होते ही किशनगंज में बाढ़ की स्थिति बननी शुरू हो गई।  मानसून पहले भी आता था मगर तब  इतना हाय-तौबा नहीं मचता था , पहले इतना जान-माल का नुकसान भी नहीं होता था क्यूँ ? क्योंकि पहले हमारा जो स्वदेशी ज्ञान था, जिसकी मदद से हम समुदायों को  बाढ़ के खतरों से बचा भी लिया करते थे और नदियों के उस उपयोगी जल से इंसान के जीवन को और समृद्ध भी किया करते थे। हमारा वो देशी ज्ञान औद्योगीकरण की अंधी दौड़ और ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने के लालच में गुम हो गया।

उत्तरी  बिहार में आने वाली वार्षिक बाढ़ को लेकर अपने शानदार रिसर्च में डॉक्टर दिनेश मिश्रा ने इस बात की विस्तार से व्याख्या की है कि-कैसे पहले गांवों के लोग नालियों के मुंह खोल देते थे, जिससे नदियों के बाढ़ का पानी तालाबों में भर जाता था और बाढ़ का दौर खत्म होने के बाद भी तालाब में पानी भरा रहता था और बाद में इसी जल का उपयोग कृषि कार्य में होता था। इसी तरह बंगाल प्रेसीडेंसी का बर्दवान ज़िला पूरब का अनाज का टोकरा बना, जिसके पीछे धान की खेती करने वालों की विशुद्ध चतुराई थी। क्योंकि स्थानीय लोगों ने धान की फसल की बुवाई को मानसून की बारिश के साथ सामंजस्य कर लिया था। खेतों में ऐसी व्यवस्था की जाती थी कि बारिश का पानी दूर दूर तक फैल जाए और खेतों में नदी की तलछट जमा हो जाए जिससे खेतों को पोषक तत्व मिल जाता था और मछलियां व अंडे भी मिल जाते थे। जिस साल बहुत ज्यादा बारिश होती थी, तो गांव के लोग ऊंचे इलाकों की ओर चले जाते थे और बाढ़ के पानी में खेतों को डूब जाने देते थे। इससे पानी एक बड़े इलाके में फैल जाता था और जन-धन की कम हानि होती थी। 

लेकिन, भारत में बाढ़ से निपटने की इन पारंपरिक व्यवस्थाओं भुला दिया गया। इतना ही नहीं बढ़ती जनसंख्या के कारण पानी से डूब जाने वाले क्षेत्रों में भी शहरी बस्तियां बसने की रफ़्तार तेज़ हो गई इस कारण से भी बाढ़ से होने वाली क्षति का दायरा बढ़ता जा रहा है। बाढ़ प्रभावित इलाकों में बस्तियां बसने के कारण बाढ़ के पानी के निकलने का रास्ता रुक जाता है इससे बाढ़ का पानी निकल नहीं पाता। हमने बस्तियां बसाने पर तो ज्यादा ध्यान दिया लेकिन पानी की निकासी को अनदेखा कर दिया। बड़े शहरों में आने वाला बाढ़ तो निसंदेह पानी की निकासी की उचित तकनिक ना होने और स्थानीय लोगो की लापरवाही का नतीजा है। एक तो निकासी नहीं और जो है भी उसे कचरे से भर देना। ऐसा नहीं है कि बारिश ज्यादा हो रही है बल्कि जो बरसात का पानी है उसे निकलने का रास्ता नहीं मिल रहा है। आप अपने आस-पास नजर घुमा लीजिये देखेंगे कि- शहरों में पानी के जमाव का कारण हम स्वयं है।पिछले दो सालों से दिल्ली में आई बाढ़ भी इसी का परिणाम है । उसकी वजह अत्यधिक बारिश नहीं है वरन बारिश के पानी को निकलने की कही जगह नहीं है । 

इस वर्ष भी पहाड़ों ने जो अपना रौद्र रूप दिखाया है वो बड़ा ही डरावना है।इतनी तबाही के वावजूद हम सबक नहीं सीख रहें हैं। पहाड़ों की खुबसूरती को हम कचरे से भर रहें हैं।

शहरा में पानी के जमाव का कारण हम स्वयं है मगर , जिन क्षेत्रों में हर साल अत्यधिक बारिश के कारण नदियाँ उफन जाती है वहाँ पर इस समस्या के आने से पहले पूर्व तैयारी नहीं करना बाढ़ को विभीषिका का रूप दे देता है। जिस कारण वहाँ हर साल जान-माल की अति क्षति होती है। वैसे भी जरूरी नहीं है कि भारी बारिश के कारण ही नदियां उफनती है वरन नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को अवरुद्ध करने वाली बाधा भी नदियों का रौद्ररूप बना देती है। इतना ही नहीं नदी के प्रवाह को कम  करने में जो पेड़-पौधे कारगर होते हैं हमने उनका भी सफाया कर दिया है। पेड़-पोधो की कमी के कारण मिट्टी की कटाई और भूसंख्लन होना भी बाढ़ को भयावता को बढ़ाने में सहायक होते हैं । 

अतीत की घटनाओं से हम कभी नहीं सीखते यदि हम पहले से ही सुरक्षा के समुचित कदम उठा ले तो स्थिति बदल सकती है।बाढ़ की त्रासदी को रोकने लिए चंद कारगर कदम उठाना बेहद जरूरी है- पहाड़ों पर अत्यधिक निर्माण कार्य को रोकना, नदी के तेज बहाव का प्रबंधन वैज्ञानिक तरीके से करना,ज्यादा से ज्यादा वनों का विस्तार करना,पानी की निकासी की उचित व्यवस्था करना, निजी क्षेत्रों में आपसी सहयोग से लोगों की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव लाना, तथा शहरी लोगों को भी रहन-सहन की आदतों व जीवनशैली में सुधार लाना होगा, तभी बाढ़ से होने वाले नुक़सान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

बाढ़ को "मौसमी हत्यारा" कहा जाता है। क्योंकि इससे हजारों लोगो को जिंदगियां प्रभावित होती है। कुछ तो बाढ़ की बिभीषिका के बलि चढ़ जाते हैं और कुछ बाढ़ के गुजरने के बाद जिन्दा होते हुए भी मरे से भी बतर जीवन गुजारने को मजबूर होते  हैं। क्योंकि बाढ़  के बाद की तबाही का मंजर बहुत भयानक होता है जिसका असर महीनो चलता है। 

अत्यधिक वर्षा के कारण नदियों का आकस्मिक उफन जाना, बादल फटना, अत्यधिक गर्मी के कारण ग्लेशियर का पिघलना,इन सभी कारणों से बाढ़ एक प्रकृतिक आपदा तो है मगर इसका भयावह रूप मानव समाज की खुद की गलतियों का परिणाम है। पर्यावरण से की जा रही छेड़छाड़ और उसका अत्यधिक दोहन इसके लिए तो हम ही जिम्मेदार है और इसका समाधान भी हमें ही ढूँढना होगा। 







गुरुवार, 7 मार्च 2024

"नारी दिवस"


 नारी दिवस

" नारी दिवस " अच्छा लगता है न जब इस विषय पर कुछ पढ़ने या सुनने को मिलता है। खुद के विषय में इतनी बड़ी-बड़ी और सम्मानजनक स्लोगन, हमारे अधिकार और प्रगति की बातें सुनकर हम खुद को गौरवान्वित महसूस करने लगते हैं।
क्यूँ है न?मगर सोचती हूँ कि 
 कोई "पुरुष दिवस" क्यों नहीं मनाया जाता?
 हमारे लिए ही ये सब कुछ क्यों हुआ????
अगर हम ध्यान से सोचे तो हर उस विषय पर "एक दिन" निर्धारित कर दिया गया है जो विषय अपने आप में कमजोर है या होता जा रहा है। सीधे शब्दों में जब कहीं गिरावट महसूस होती है या उस विषय को उपर उठाना होता है तभी उसे एक दिन विशेष से जोड़ दिया जाता है। तभी तो मजदूर दिवस, हिंदी दिवस, मातृदिवस, प्रेम दिवस,पर्यावरण,जल और वन संरक्षण दिवस आदि की शुरुआत हुई है।
अब सोचने वाली बात है कि जो नारी सत्ता भारत देश की गौरव हुआ करती थी उसमें इतनी गिरावट आई कि उनके उत्थान के लिए, उनके अस्तित्व को याद दिलाने के लिए, उन्हें फिर से जिंदा करने के लिए एक दिन का निर्धारण करना पड़ा। अजीब है न ये?
खैर, जो हुआ सो हुआ, अब क्या? 
क्या नारी का उत्थान हो रहा है ?
क्या हमने वो स्थान पा लिया जो हम खो चुके थे?
क्या नारी की वो गरिमा फिर से स्थापित हो रही है?
नारियों का संघर्ष बहुत लम्बा चला। लेकिन इस कठीन लम्बे सफ़र में 
हम अपना प्रमुख मकसद ही भुल गए।
चले थे खुद के वजूद को ढूंढने, फिर तरासने और अपनी चमक बिखेरकर सबको प्रकाशित करने। लेकिन पता नहीं कब और कैसे अपनी मुल मकसद को भुल हम पुरुषो के साथ प्रतिस्पर्धा को ही मुख्य उद्देश्य बना बैठे। वैसे भी जब भी कोई प्रतिस्पर्धा शुरू होती है तो प्रतियोगी को चाहिए कि वो सिर्फ और सिर्फ अपनी जीत पर ध्यान केंद्रित करें ना कि दुसरे की हार पर, तभी वो पुर्ण सफलता पा सकता है। यहाँ भी हमसे एक चुक हो गई हमने अपनी जीत से ज्यादा ध्यान पुरुषो को हराने में लगा दिया।
हम जीत तो गए परन्तु अपना मुल स्वरुप ही खो दिए।
इस नारी दिवस पर एक बार हमें इन बातों पर भी विचार करना चाहिए कि बाहरी दुनिया में अपनी  शाखाओं को फैलते-फैलते  कही हम अपनी जड़ों से तो नहीं उखड गए?
अपनी रौशनी से बाहरी दुनिया को रोशन करने में खुद के घरों को तो अंधकार में नहीं डुबो दिया ?
खुद आसमान छूने की लालसा में कही अपनी बेटियों को रसातल में तो नहीं ढकेल दिया। 
(क्योंकि बेटियाँ दिन-ब-दिन अपने मार्ग से भटकती जा रही है जो कि चिंता का विषय है )
  
हम नारी शक्ति है,जैसे माँ दुर्गा ने एक साथ कई रूप धारण कर दुष्टों का संहार भी किया और अपनी संतानों को दुलार भी। उसी शक्ति के अंश हम भी है। हमें किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं करनी बल्कि हमें अपने मूल स्वरूप को पहचान कर पहले खुद का सम्मान खुद ही करना होगा। कोई और हमें सम्मानित करे इसकी प्रतीक्षा नहीं करनी। किसी को अपना अपमान करने का हक़ नहीं देंगे और ना ही किसी को कमतर करने की होड़ में रहेंगे। 
फिर कोई एक "नारी दिवस" नहीं होगा। हमारा तो हर दिन है..
हम तो वो है जो घर और बाहर दोनों में अपनी भूमिका बाखूबी निभा रहें है। 



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इस "नारी दिवस" पर मैंने भी अपनी हुनर को एक पहचान देने की कोशिश की है। 
इसके लिए आप सभी का आशीर्वाद चाहती हूँ। 




     
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मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

"स्वीकार किया मैंने"



रविवार, 21 जनवरी 2024

"सिया राम मय सब जग जानी"


            सिया राम मय सब जग जानी 

करहु प्रणाम जोरी जुग पानी 

तुलसी दास जी की कही इस चौपाई को चरितार्थ होते हुए आज देखकर खुद के कानों और आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा है। क्या हम सचमुच इस पल के साक्षी बन रहें हैं?

पूरा देश ही नहीं कह सकते है कि पूरी सृष्टि राम मय हो गई है। बच्चे-बच्चे में जो उत्साह, उमंग और श्रद्धा नजर आ रही है वो अब से पहले ना देखीं गई थी और ना ही सुनीं गई थी।ऐसी ऐसी जीवन्त कहानियां सुनने को मिल रही है जिसपर कल्पना करना मुश्किल हो रहा है कि आज भी सनातन धर्म में ऐसे व्यक्तित्व जीवित है?

धनबाद की सरस्वती देवी जी जो राम लल्ला के इंतजार में 30 वषों से मौन धारण की हुई थी जो अब राम का दर्शन कर के "राम"  उच्चारण से ही टुटेगा। अयोध्या के पास के 105 गांव के ठाकुर लोग जिन्होंने 500 साल से ना सर पर पगड़ी पहनी है और ना ही पैरों में जुते,उर्मिला चतुर्वेदी जी जो 30 वषों तक राम मंदिर के इन्तजार में फलाहार में गुजारा लेकिन आज वो उसे देखने के लिए जीवित नहीं है(पिछले साल उनका निधन हो गया) यकीनन राम जी उनके कष्ट को देख नहीं पाएं होंगे। श्रीनिवास शास्त्री जी जो 8000 किलोमीटर की पैदल यात्रा कर राम लल्ला की चरण पादुका लेकर अवध पहुंच चुके है।

ऐसी-ऐसी अनगिनत कहानियां बन रही है, अनगिनत किर्तिमान बन रहें हैं जो अविश्वसनीय है। अयोध्या की छटा टीवी पर देख कर ही ऐसा लग रहा है जैसे त्रेता युग में आ गए हैं।सच खुद के भाग्य पर यकीन नहीं हो रहा।अगर हमने कोरोना की त्रासदी देखीं तो त्रेता युग का उदय देखने का सौभाग्य भी हमें मिला।

चाहे कुछ पक्ष मुहुर्त, कर्म-कांड, मंदिर की पूर्णता अपूर्णताओं पर लाख प्रश्न उठाए,कितनी भी विध्न बाधाएं डालें लेकिन उनका अन्तर्मन भी ये स्वीकार कर रहा होगा कि जो हो रहा है वो असम्भव सा दिख रहा है। सनातन की शक्ति का इससे बड़ा उदाहरण हो ही नहीं सकता।

इसमें कोई दो राय नहीं कि अयोध्या विश्व का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक चेतना केंद्र बनने वाला है और भारत निश्चित रूप से अब विश्वगुरु बनने की ओर बढ़ चला है। दुर्भाग्यशाली है वो लोग जो अब भी सिर्फ खुद के अहम वंश या अपने निहित स्वार्थ में अंधे होकर समय के परिवर्तन को नहीं देख पा रहे हैं।

 कल का दिन यकीनन हम सनातनियों के लिए स्वर्ण अक्षरों में इतिहास में दर्ज हो जाएगा ।आप सभी को राम लल्ला के आगमन की अनन्त शुभकामनाएं ,प्रभु राम का अस्तित्व और उनकी कृपा इस धरा पर सदैव बनी है और रहेगी 🙏🙏🙏


गुरुवार, 11 जनवरी 2024

"गुलाब के साथ कांटे भी तो आते हैं "


 मां सुनो-  ये कहते हुए मिनी ने ईयर फोन का एक सिरा नीरा के कानों में लगा दिया।एक vioce massege था जिसमें साहिल की मां बोल रहीं थीं" मिनी को बोल दो चाय बनाना जरूर सीख ले पापा को खुश करने के लिए और कुछ खाना बनाना भी... अच्छा मिनी खाना बनाएगी नौकर चाकर नहीं-  साहिल पुछा। नहीं मेरे लल्ला के लिए खाना तो मैं या मिनी ही बनाएंगे -साहिल की मां बोल रही थी "

जैसे ही मैसेज खत्म हुआ मिनी बोली - "मम्मा ये क्या हैं मुझे तो इनकी बातों से डर लग रहा है ये कितने सपने देख रही है मुझे लेकर..."हां बेटा वो बहुत खुश है- नीरा ने कहा। लेकिन मम्मा मैं ये सब नहीं कर सकी तो....तुम्हें तो पता है मैं टिपिकल लाइफ नहीं जी सकती....एक सुघड़ बहु की तरह खाना बनाऊं अपनी दिनचर्या सिर्फ सबको खुश रखने में बिताऊं....तुम लोगों की तरह चाह कर भी हम नहीं कर पाएंगी ये सब...। मिनी की आवाज में फिक्र थी। वो साहिल से बहुत प्यार करती थी और उसकी मां से भी। लेकिन जब जब रिश्ता जुड़ने की बात होती साहिल की मां मिनी को लेकर बहुत उत्साहित हो ढेरो सपने देखने लगती । वो बाल गोपाल की पुजारन एक सीधी और सरल महिला थी जिसने जीवन में बहुत दुख झेले थे और मिनी मां बाप की एकलौती संतान बेहद नाजों में पली-बढ़ी। लेकिन नीरा ने उसको संस्कारी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मगर कभी भी उस  पर कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं पड़ी थी । इसलिए वो साहिल की मां की अपेक्षाओं से कभी कभी घबराने लगती कि कहीं मैं उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी तो उन्हें कितना दुःख होगा। वैसे भी अपनी कैरियर को लेकर उसके सपने बहुत बड़े थे। वो ना ही अपना सपना छोड़ सकती थी और ना ही वो कभी साहिल और उसकी मां का दिल दुखाना चाहती थी । ऐसे में एक अजीब दुविधा में पड़ जाती थी वो।

जब वो ज्यादा परेशान हो गई तो नीरा ने उसे समझाया - बेटा गुलाब के पौधे को देखा है तुमने कितना खूबसूरत होता है क्यूं है न लेकिन जब उसे तोड़कर घर लाना चाहो तो संग संग कुछ कांटे भी तो आते हैं तो क्या इस डर से हम गुलाब को लेने से डर जाते हैं?? नहीं न, तो जीवन में जब गुलाब के फूल की तरह खुबसूरत रिश्ते जुड़ते हैं या कोई खुशियां आती है तो संग संग कुछ कांटे समान परेशानियां भी साथ आती और यदि इसे हम बिना घबराए प्यार और समझदारी से एक एक करके निकलते जाएंगे तो जीवन मधुबन बन जाएगा। साहिल की मां ने बहुत दुख झेला है और अब जब घर में खुशी आती दिखाई दे रही है तो वो अति उत्साहित हो जा रही है और वैसे भी हमारी उम्र में ये सारी बातें स्वाभाविक है, हमारी बातें खानें से ही शुरू होती है और खाने पर ही खत्म... वो तुम से भी तो तुम्हारे खानें की पसंद ही पुछ रही थी ये कहते हुए कि तुम जब पहली बार उनके घर आओगी तो वो बनाएगी - कहते हुए नीरा मुस्कुराने लगी।

मिनी समझ रही थी कि ये साहिल की मां का प्यार है फिर भी उसकी एक ग़लती से उनका दिल ना दुखे इससे वो डर जाती थी। मां की बातें उसे समझ आई और वो उनसे लिपट कर बोली -" तुम नहीं होती तो मेरा क्या होता" मैं नहीं होती तो तुम इस दुनिया में आती ही नहीं - कहकर नीरा मुस्कुराने लगी और मिनी की ठहाके गूंज उठी। नीरा उसे गले से लगाए सोच रही थी " कुछ दिनों में मेरे घर की मुस्कान किसी और के घर खिलखिला रही होगी ' उसकी आंखें नम थी मगर मन में एक अजीब सुख की अनुभूति।

गुरुवार, 28 दिसंबर 2023

"नई विचारधारा के साथ नव वर्ष का आगाज़"

      


    समय के साथ हर चीज की परिभाषा बदलती रहती है। बदलाव प्रकृति का नियम है तो हमें इसे स्वीकार करना ही होता है। लेकिन हर बात को स्वीकारने या नाकारने से पहले उस पर चिन्तन करना क्या ज़रूरी नहीं होता ?

    शास्त्रों में लिखा है "माता-पिता और गुरु देवस्वरूप है " हमनें कहानियों में भी पढ़ा है कि -गणेश जी ने माता-पिता को ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मानकर उन्ही की परिक्रमा कर ली थी।श्रवणकुमार की कथा कौन नहीं जानता है।  ऐसे ही अनेकों किस्से-कहानियां है जो हमें ये सिखलाते हैं कि-माता-पिता देवतुल्य है,उनके चरणों में ही स्वर्ग सुख है आदि,और उस युग में ये सत प्रतिशत सत्य भी था। 

   ये सत्य है कि - जब किसी व्यक्ति विशेष में हम देवत्व के गुण देखते हैं तो हम उसे देवतुल्य या देव कहते हैं। परन्तु,चाहें वो माता-पिता हो या गुरु यदि उसमें देव का एक भी गुण नहीं हो तब भी क्या हमें उन्हें देवता कहना चाहिए ???

    पुराने जमाने यानि 100 -200 साल पहले के भी कितने ही किस्से-कहानियों में ये वर्णित है कि -माँ-बाप के जरूरत से ज्यादा तानाशाह और महत्वकांक्षा ने कितने ही बच्चों की ज़िंदगियाँ बर्बाद कर दी।70 के दशक तक भी माँ-बाप को देवता मानकर उनकी हर आज्ञा को शिरोधार्य किया जाता था। भले ही वो दिल से ना माना जाये मगर, उनके आज्ञा की अवहेलना करना पाप ही समझा जाता था। हमारी पीढ़ी ने भी माँ-बाप की ख़ुशी और मान-सम्मान के लिए ना जाने कितने समझौते किये। जबकि उस वक़्त में भी माँ-बाप के गलत निर्णय और जरुरत से ज्यादा सख्ती के कारण कितने ही बच्चों ने आत्महत्या तक कर ली और आज भी करते हैं । 

    ये भी सत्य है कि- जब हम किसी को भगवान का दर्जा देते है तो वो स्वयं को भाग्यविधाता ही मान बैठता है। और शायद यही गलती अब तक माता-पिता करते आये है और उनकी इसी गलती ने आज वो दिन दिखा दिया जब बच्चें माँ-बाप को देवता छोड़ें जन्मदाता तक मानकर भी सम्मान नहीं देते।  ये भी सही है कि 21 वी सदी के -"माँ-बाप तो जन्मदाता तक का फ़र्ज़ भी सही से नहीं निभा पा रहें हैं"   

    गुरुओं ने भी यही किया हम आँख बंद कर  गुरु भक्ति करते रहें और वो हमारी ही भावनाओं से खेलते रहें। यहां तक की शास्त्रों के ज्ञान को भी अपने हित के मुताबिक  तोड़-मड़ोड़कर हमारे समक्ष प्रस्तुत करते रहें और हम भ्रमित होते रहें फिर ऐसा वक्त आया कि हम प्रत्येक रीती-रिवाजों और शास्त्रों के बातों को आडंबर कहते हुए नाकरते रहें । गुरु का स्थान कितना ऊंचा था ,कहते थे कि -"गुरु गोविन्द दाऊ खड़े काके लागू पाय,बलिहारी गुरु आपने जो गोविन्द दियो बताये" मगर आज कितने ही गुरु घंटाल जेल की सलाखों के पीछे है और उनके दुष्कर्मो की गिनतियाँ  नहीं है। 

     हमारी पीढ़ी तक को ये सिखाया गया था की "पति परमेश्वर होता है" परमेश्वर से तो कोई गलती नहीं होती और कोई ऐसा पति नहीं जिससे गलती ना हुई हो.....तो फिर क्या पति को परमेश्वर मानना उचित था? 

   आज हम जरूर शिकवे-गीले कर रहे है कि -बच्चें माँ-बाप की बेकद्री कर रहे हैं,उनको घर से बेघर कर रहें  हैं.......समाज में अब  गुरुओं का सम्मान नहीं हो रहा....लड़कियां पति का सम्मान नहीं करती....रिश्तें  टूट रहे हैं।   क्या इन सब बातों के जिम्मेदार माँ-बाप, गुरु और पति स्वयं नहीं है ? ये सारी स्थितियाँ एक दिन में तो बदली नहीं है सदियों से होती हुई गलतियों का धीमा परिणाम ही तो है ये ।  

      अवल तो हमें जब तक किसी में देवत्व का अंश ना दिखे उसे देव की उपाधि देनी ही नहीं चाहिए यदि हम  भाव अभिभूत होकर देव की  उपाधि दे दे  तो उसे व्यक्ति विशेष को भी अपने देवत्व की गरिमा बनाये रखनी चाहिए और खुद को भाग्यविधाता नहीं मान बैठना चाहिए। 

     मेरा मन मुझसे ये सवाल करता है कि-"क्या हम रिश्तों को उसके ओहदे के मुताबिक स्थान देकर मान-सम्मान नहीं दे सकते ?? क्या आज के दौर में भी उन्हें देव की उपाधि देना जरुरी है ?"क्या देवता बनने के वजाय एक आदर्श व्यक्ति बनकर रहना ही उचित नहीं है ताकि रिश्तों में हम सम्मान तो पा सकें?

    सोशल मिडिया की वजह से नई पीढ़ी जागरूक हो रही है, प्रत्येक विषय पर खोजबीन कर रही है, तर्क-वितर्क  भी कर रही है।  उनमें अपनी धर्म,संस्कृति और इतिहास को जानने की भी उत्सुकता बढ़ रही है।विचारधारायें बदल रही है,हमें भी बदलना होगा और बहुत चीजों की परिभाषा भी बदलनी होगी। हमें नई पीढ़ी के आगे एक नया उदाहरण प्रस्तुत करना ही होगा।

    जैसा कि पिछले कुछ दिनों में नई पीढ़ी में ये जागरूकता आई है कि हमारा नव वर्ष 1 जनवरी को नहीं बल्कि चैत्र माह की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता था। लेकिन हमारी संस्कृति में यह भी सिखाया गया है कि -सभी धर्मो और उनके रीति-रिवाजों का सम्मान करना चाहिए,सभी की भावनाओं को मान देना चाहिए। तो अंग्रेजों के द्वारा थोपी गई इस परम्परा का भी हम ख़ुशी ख़ुशी निभाएंगे मगर अपना भूलेंगे भी नहीं। 

चलिए, नई विचारधारा के साथ नव वर्ष का आगाज़ करे। नव वर्ष हम सभी के लिए मंगलमय हो यही कामना है। 

 





  

गुरुवार, 14 दिसंबर 2023

कर्मानन्द और भाग्यनंद


"यूट्यूब" ज्ञान बाँटने की सबसे बड़ी पाठशाला। वही के ज्ञानी बाबा के मुख से मेरी बहन की लड़की ने एक कहानी सुन ली। (जो अभी 18 साल की है ) उसने वो कहानी मुझें सुनाई और मुझसे अपने कुछ सवालों के जबाब मांगने लगी। उस कहानी को सुन मैं थोड़ी confuse हो गई। आजकल के बच्चें हमारी तरह तो है नहीं। हमें तो बड़े जो समझा देते थे बिना तर्क-वितर्क के मान लेते थे। आज के पीढ़ी के पास तो ज्ञान बाँटने का महासागर पड़ा है अब वो ज्ञान कितना सही है या गलत उसे भी वो उसी जगह खोजते हैं। 

कहानी कुछ इस तरह है- एक कर्मानन्द थे एक भाग्यनंद,दोनों ही अपने आपको बड़ा मानते थे। जब वो खुद इस बात का फैसला नहीं कर सकें तो पहुचें ज्ञानिनंद के पास कि -"आप इसका फैसला कीजिये। ज्ञानिनंद ने कहा कि "मैं तुम दोनों को आज रात एक अँधेरे कोठरी में बंद रखूंगा और सुबह तुम दोनों का फैसला सुनाऊँगा। दोनों राजी हो गए और अँधेरी कोठरी में बंद हो गए। रात को उन्हें बहुत जोर की भूख लगी क्योंकि ज्ञानिनंद ने उन्हें कुछ खाने को दिया नहीं था। कर्मानन्द जी अपने कर्म में लग गए,अँधेरे में ही कोठरी में खाने की कुछ चीज तलाशने लगे। ढूंढते-ढूंढते उन्हें एक मटका मिला टटोला तो उन्हें समझ आया कि -इसमें कुछ भुने चने है, वो उसे मजे से खाने लगे। उधर भाग्यनंद भगवत भजन कर रहे थे और इस उम्मींद में थे कि-भगवान उनके लिए कुछ जरूर करेंगे। कर्मानन्द चने खा रहा था तो बीच-बीच में कुछ कंकड़ आ जाता वो उसे निकल कर भाग्यनंद की तरफ फेंक देता। भाग्यनंद पहले तो झल्लाया फिर उन कंकड़ों को ये कहते हुए इकठ्ठा करने लगा कि-शायद ईश्वर ने उसके भाग्य में आज यही दिया है। खैर, सुबह हुई ज्ञानिन्द आये तो कर्मानन्द ने खुश होते हुए रात का अपना करनामा कह सुनाया। ज्ञानिनंद ने भाग्यनंद से पूछा "तुमने क्या किया " तो वो बोला मैंने ये मान लिया कि-भगवान ने मेरे भाग्य में भूखा  रहना ही लिखा था और मैं कर्मानन्द के फेंके पथ्थरों को चुन-चुनकर अपने अगौछे में बांधता रहा। ये कहते हुए उसने अपने अंगोछे की गांठ खोली तो उसकी आँखे चौंधिया गई वो जिसे पथ्थर समझकर इकठ्ठा कर रहा था वो तो सारे हीरे निकलें। कहानी को ख़त्म करते हुए यूट्यूब के ज्ञानी बाबा ने कहा कि-अब आप खुद ही समझ ले "कर्म और भाग्य में अंतर " (मुझे यहाँ ये बताने की आवश्यकता नहीं कि-वो बाबा जी एक ज्योतिषाचार्य थे।)

अब मेरी बेटी का सवाल ये था कि -"जब भगवान ही हमे सब कुछ दे देंगे तो हम बे वजह इतनी मेहनत क्यों करते हैं।" मैंने कहा -बेटा हमने तो अपने गुरुजनों से यही सीखा और समझा है कि " आपका कर्म ही आपका भाग्य निर्धारित करता है,भगवन भी उसी को देते हैं जो कर्म करता है,बैठे-बिठाये सिर्फ भजन करने से तो कुछ नहीं मिलता "

उसने कहा- लेकिन आज के सन्दर्भ में तो बाबा जी की कही बात ही सही दिखाई दे रही है। क्योंकि आज बिना किसी काबिलियत के अकर्मक लोग गुलझरे उड़ा  रहे है और काबिल तथा कर्मठ लोगों की कोई कद्र ही नहीं है। अब इंस्ट्राग्राम और यूट्यूब पर ही देख लो क्या हालत है। 

मैंने कहा-लगता है ये कहावत सच हो रही है कि "रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा युग आएगा,हँस चुनेगा दाना-तिनका और कौआ मोती खायेगा "

ये कहते हुए मैंने अपनी बेटी से मुँह छुपा लिया और क्या कहती आज के हालत को देखते हुए। 

आप क्या कहते हैं ?????

गुरुवार, 7 दिसंबर 2023

माँ तुम बदल गयी हो...






माँ तुम बदल गयी हो....मनु ने बड़े प्यार से मुझे अपनी बाँहों में पकड़ते हुए कहा। अच्छा....कैसे बदली लग रही हूँ.....तुम्हे डांट नहीं लगा रही हूँ इसलिए। वो हँसकर थोड़ी इतराते  हुए बोली -अरे नहीं यार, मुझे पता है अब मैं बड़ी हो गयी हूँ और थोड़ी समझदार भी इसलिए....तुम मुझे नहीं डांटती.....मैं तो ये महसूस कर रही हूँ कि-तुम अब पहले से शांत हो गई हो,ना गुस्सा ना किसी बात पर रोक-टोक करना , ना किसी बात की चिंता-फ़िक्र करना,मैं जो भी कहती हूँ बिना सवाल किये "हाँ "कह देती हो सच कहूं तो अब तुम मुझे बच्ची सी प्यारी-प्यारी लगने लगी हो।

     मैंने हँसते हुए कहा-अच्छा! उसने कहा-हाँ बिल्कुल। मैं उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठाते हुए बोली-बेटा जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है न वैसे-वैसे खुद में कुछ बदलाव करना जरुरी होता है....बच्चों को अच्छे संस्कार देने के लिए, उनके उज्वल भविष्य के लिए हमें सख्ती का आवरण ओढ़ना जरूरी होता है....लेकिन जब बच्चें बड़े हो जाते है और समझदार भी तो, हमें भी उनकी समझदारी पर भरोसाकर उनसे उचित दुरी बना लेनी चाहिए.....उनके भले-बुरे की चिंता भी उन्ही पर छोड़ देनी चाहिए....उनके निर्णय का सम्मान करना चाहिए.....जबरदस्ती की अपनी मर्जी उनपर नहीं थोपनी चाहिए। 

 बस, शांत भाव से उनपर छिपी हुई एक नज़र भर रखनी चाहिए जब कही कुछ गलती देखें तो एक बार समझा भर देना चाहिए ये कहते हुए कि- इस बात पर विचार करना मेरे मत से ये सही नहीं है इसका खामियाज़ा तुम्हे भविष्य में भुगतनी पड़ सकती है बस, इसके आगे मौन और जब बच्चें सफल और समझदार हो जाये तो फिर हर चिंता छोड़ देनी चाहिए हमें ये यकीन रखना चाहिए कि -आज तक हमने बच्चों का हाथ पकडे रखा है तो जब वक़्त आएगा तो वो भी हमें संभाल ही लगे।  और हाँ,जहाँ तक तुम्हारी बात मानाने का सवाल है तो चौबीस साल तक तुम मेरी बात को सर झुककर मानती रही हो तो अब ये मेरी बारी है.....क्युँ सही कहा न ? वो मुस्कुराते हुए मुझसे लिपट गई। 

एक बात और कहूँ बेटा "जैसे जैसे उम्र आगे बढ़ती है न हमें पीछे की ओर लौट ही जाना चाहिए यानि "बच्चा" ही बन जाना चाहिए तभी बच्चों का भरपूर प्यार मिलेगा और जीवन का असली आंनद भी " 

बुधवार, 22 नवंबर 2023

"हमने देखी है "


हमारी पीढ़ियां  बदलाव की अप्रत्याशित दौर को देख रही हैं । कभी-कभी यकीन करना भी मुश्किल हो जाता है।गुजरा जमाना सपने सा लगता है और जो गुजर रहा है वो अपना नहीं लग रहा है और आने वाला कल डरा रहा है। 

वो हम ही है जिन्होंने रक्षाबंधन पर्व से लेकर छठ पर्व तक अति उत्साह और उमंग से भरे बचपन को जिया है, वो हम ही हैं जो छठ पूजा पर समस्त खानदान को एकत्रित होते देखा है,पूजा की पवित्रता और उसके सभी रीत- प्रीत को पुरी श्रद्धा - भक्ति से निभाते अति हर्षित एक-एक चेहरे को देखा है, त्योहारों पर मिलकर एक दूसरे पर प्यार और आशीर्वाद लुटाते अपनों को देखा है और अब भी वो हम ही हैं जो टुटते घरों को देख रहे हैं, एक-एक कर के  दूर होते हुए अपनों को देख रहे हैं,त्योहारों के अति विकृत होते स्वरूपों को भी देख रहे हैं।

   याद है हमें वो दिन भी जब, छठ पूजा पर दादी  के घर सारा खानदान यानी दादा का परिवार ही नहीं दादा के सारे भाइयों का परिवार भी एकत्रित होता था।फिर आया माँ का दौर तब भी दादा का पूरा परिवार जिसमे चचेरे हो या फुफेरे सभी अपने थे, जो एकजुट होकर त्योहार की खुशी मनाते थे।फिर आया हमारा दौर हम सिर्फ अपने भाई बहनों के साथ ही निभा रहे थे। लेकिन हम इसे भी ज्यादा दिनों तक संभाल नहीं पाए और सब से दूर हो कर कुछ दिखावे के दोस्तों तक सीमित रहने लगे।बीते कुछ सालों से खास तौर से करोना काल से ऐसे एकल हुए कि वो दोस्त भी कब छूट गए पता ही नहीं चला और अब ना जाने कौन सा युग शुरू हुआ जिसे समझना मेरे लिए तो बहुत मुश्किल हो रहा है।आज त्योहार सिर्फ सोशल मीडिया पर दिखावा भर बन कर रह गया है। सजना-संवरना सब कुछ हो रहा है है मगर, उत्साह- उमंग, श्रद्धा-भक्ति, प्यार और अपनापन ना जाने कहा खो गया। त्योहारों पर भी सिर्फ अपने परिवार के दो चार सदस्य वो भी त्योहारों से जुड़े रस्मों को बस दिखावे के तौर पर निभाकर गुम हो जाते हैं इस मोबाइल रूपी मृग मरीचिका में। और हमारी पीढ़ी गुज़रे ज़माने में खोई हुई जबरन अपने संस्कारों की अक्षतों को समेटने की कोशिश करती रहती है, आज और कल में सामंजस्य स्थापित करती ढूंढती फिरती है उस खुशी और उमंग को, कहना चाहती है सबसे कि " हमने देखी है रक्षाबंधन में भाई- बहनों के निश्छल प्रेम को, महसूस किया है नवरात्रि में भक्ति के शीतल व्यार को, भाई दूज में कच्चे सूत से बंधे पक्के रिश्तो को, छठ पूजा के चार दिनों के कठिन कर्मकांडो को भी उत्साह और उमंग से निभाते अपनों को, मगर......वो भी नहीं कह सकते क्योंकि सुनेगा कौन...??? फिर थक कर उदास हो बीती यादों को समेटे बैठ जाती है एक कोने में....सोना चाहती है अतीत के तकिये पर सर रखकर मगर.....सो नहीं पाती, उलझी जो है अतीत और वर्तमान में सामंजस्य स्थापित करने में...... अगली सुबह सोच रही होती है 

त्योहार कब आया और कब चल गया पता ही नहीं चला........

बुधवार, 22 मार्च 2023

"सूखने लगे है प्राकृतिक जलस्रोत"


"विश्व जल दिवस" 22 मार्च पर कुछ विशेष....

     हमारा देश "भारत" अनेकों नदियों एवं पर्वतों की भूमि है।कहते हैं ये सात महानदियों से घिरा था इसीलिए इसे सप्तसिंधु भी कहते थे। कुछ नदियाँ तो आज भी विश्व की महान नदियों के रूप में प्रसिद्ध है। भारत के लोगों के  धार्मिक,सांस्कृतिक और आध्यत्मिक जीवन में इन नदियों के विशिष्ट महत्व को आज भी किसी न किसी परम्पराओं के रूप में देखा जा सकता है। ये कहना गलत नहीं होगा कि-नदियाँ हमारे भारत की हृदय  ही नहीं बल्कि आत्मा है।

    नदी ही नहीं यहाँ तो अनगिनत प्राकृतिक झरनों, झीलों और तालाबो की भी भरमार थी। कई राजाओं, महराजाओं और परोपकारी प्रवृत्ति के धन्ना सेठों ने अनगिनत कूपों और बावड़ियों  का निर्माण भी करवाया था। जिससे बारहों मास ठंडा और मीठा पानी ग्रामीणों को आसानी से उपलब्ध होता रहता था। लेकिन वक्त के साथ हमारी लापरवाहियों ने हमारे देश की उन सभी प्राकृतिक धरोहरों का सत्यानाश कर दिया है। अपने ही हाथों अपने नदियों- तालाबों को हमने प्रदुषित कर दिया है, अपने कूपों और  बावड़ियों को कचरों से भर दिया है और अब एक-एक बूंद पानी को तरस रहे हैं।

     "जल है तो जीवन है" ये सिर्फ एक सद-वाक्य बनकर रह गया है।  दुर्भाग्य यह है कि जल संरक्षण के नारे तो लगाए जाते हैं और इससे जुड़े दिवस विशेष पर भी बड़ी-बड़ी बातें कही सुनी जाती है पर असल में इस पर व्यवहारिक रूप से कोई सही कदम उठाने वालों की संख्या अभी भी नगण्य है। इन जलस्त्रोतों  के संरक्षण को लेकर सरकारी कार्यवाही क्या हो रही है ये तो बाद की बात है, यहाँ तो अधिकांश स्थानीय लोग ही उसकी दुर्दशा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

     सर्वे बताती है कि-रुद्रप्रयाग नगर के गुलाबराय क्षेत्र में कई सौ वर्ष पुराना जलस्त्रोत पूरी तरह सूख गया है। इससे स्थानीय लोगों मायूस है। इसका मीठा जल पूरे क्षेत्र के लोग दूर-दूर से आकर ले जाते थे। पेयजल किल्लत होने पर भी गुलाबराय एवं  भाणाधार वार्ड के लोगों को इस जलस्त्रोत से पानी की आपूर्ति हो जाती थी। लेकिन अब  ये पूरी तरह सूख गया है। ग्रामीणों का आरोप है कि रैंतोली-बाईपास के पास निर्माणाधीन सुरंग के चलते गुलाबराय का यह पुराना और महत्वपूर्ण जल धारा सूख गया है।नगर के अधिकांश लोग इसको पुनर्जीवित करने की मांग कर रहे हैं।  

    अब तो उत्तराखंड के पहाड़ों पर भी इसका असर दिखना शुरू हो चुका है। गर्मी आते ही पौड़ी में भी पानी की किल्लत होने लगी है इसके चलते अब वहाँ के ग्रामीण प्राकृतिक जल स्रोत को संरक्षित करने में जुट गए हैं। ऐसे में प्राकृतिक जलस्रोत स्थानीय लोगों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होते हैं। हालांकि ग्रामीणों को भी प्राकृतिक जलस्रोत की याद गर्मियों में ही आती है, जब उन्हें पानी की दिक्कत का सामना करना पड़ता है। पौड़ी के कल्जीखाल ब्लॉक के डांगी गांव के लोगों ने खुद ही सामूहिक प्रयासों से जलस्रोतों की साफ-सफाई का जिम्मा उठाया है। डांगी गांव के लोगों ने करीब 100 साल पुराने प्राकृतिक जलस्रोत की साफ-सफाई की, इसके साथ ही पानी के रिसाव को रोकने के लिए चिकनी मिट्टी का लेप लगाकर स्रोत को संरक्षित भी किया।जोकि एक सराहनीय प्रयास है,और क्षेत्र के लोगों को भी इससे सीख लेनी चाहिए।  

    बीते एक दशक में पौड़ी गढ़वाल के प्राकृतिक जल स्रोतों के सूखने के चलते पेयजल संकट की जो तस्वीर उभर कर सामने आई है, वो चिंतनीय है। हर साल इन स्रोतों का पानी कम ही होता जा रहा है। इसके साथ ही पहाड़ों से और भी कई पानी की धाराएं निकला करती थी, जो आज विलुप्त हो चुकी हैं। 

    इधर राजस्थान जहाँ पानी की कीमत क्या है ये बताने की आवश्यकता नहीं। वहाँ यदि जलस्रोतों के साथ खिलवाड़ हो या उसके प्रति वहाँ के लोग लापरवाह और असंवेदनशील हो तो क्या कह सकते हैं ? सर्वे बताती है कि-कोटा रोड पर 100 वर्ष से अधिक पुराना मोती कुआं है, जिसके चारों और गंदगी के अंबार लगा हुआ है। लोगों ने बताया कि प्रशासन की अनदेखी से यहाँ गंदगी जमा रहती है।क्या इसके लिए सिर्फ प्रशासन ही जिम्मेदार है ?

     इसी तरह,बताते है कि वही पर बस स्टैंड के पास भी एक प्राचीन कुआं है, इसकी सफाई हुए वर्षों बीत गए। कस्बे के बुजुर्ग लोग बताते हैं कि "सन 1956 के अकाल में जहाँ चारों और पानी के लिए त्राहि-त्राहि मची हुई थी,तब भी इन कुओं में भरपूर पानी था।" प्रशासन इन कुओं की सफाई करवा दे तो इनका पानी पीने के काम आ सकता है। प्राचीन जलस्स्रोतों की बिगड़ी दुर्दशा पर लोगों में रोष तो है मगर उसकी दुर्दशा सुधारने के लिए कोई प्रयत्नशील नहीं है। वैसे ही मध्य्प्रदेश के इटावा क्षेत्र में करीब 800 कुएं, बावड़ियां हैं। मालियों की बाड़ी में 500 वर्ष पुराना प्राचीन कुआं है, जो अब जर्जर होता जा रहा है।

     सम्पूर्ण भारत में ऐसे अगिनत प्राचीन जलस्स्रोतों है जो आज लुप्त होने के कगार पर है। यदि आज भी इनकी सार संभाल की जाए तो पेयजल की समस्या का समाधान हो सकता है।प्रशासन की अनदेखी तो है ही मगर स्थानीय लोगों की लापरवाही ज्यादा है। नदी,तालाब और कुओं में ही हम कचरा डालने लगेंगे तो पीने के पानी की किल्ल्त तो होगी ही। आवश्यकता है जागरूक होकर अपनी इन अनमोल धरोहरों को सहेजने की। वरना,सामने कुआ होगा और हम प्यासे ही मर जायेगें।  



 

सोमवार, 27 फ़रवरी 2023

"तू मेरी माँ थी या मैं तेरी माँ"


हम सभी से विदा लेने से पांच महीने पहले ऐसी थी मेरी  माँ...... बहुत बीमार थी फिर भी चेहरे पर वही तेज था।


 मेरी माँ से मेरा रिश्ता कुछ अजीब था.....वो तो मुझे ही अपनी माँ मानती थी....पता नहीं, पूर्वजन्म में विश्वास वजह था या मेरा उसका जरूरत से ज्यादा ख्याल रखना। अक्सर बीमार रहा करती थी वो और दस साल की उम्र से ही मैं उसकी सेवा करती रही। सेवा करते-करते कब वो मेरी माँ से मेरी बेटी बनी हम दोनों नहीं जान पाए। मैं अक्सर उससे ये सवाल किया करती थी....आज, वो मुझे छोड़कर बहुत दूर जा चुकी है कभी ना लौटने के लिए। 

अब किससे पूँछु तो सहेज लिया...शब्दों। 

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तू मेरी माँ थी या मैं तेरी माँ 

था रहस्य ये क्या 

अब तो, बतला दें माँ 

 

तुमने जन्म दिया था मुझको 

फिर क्यूँ ,कहती थी तू मुझको माँ 

पालन किया था तुमने  मेरा 

या मैंने संभाला था, तुझको माँ 

था रहस्य क्या,अब तो बतला 


हाँ, मैं तो बेटी थी तेरी

 पर,हठ करती तू बन बेटी मेरी 

 छूटा तो तेरा आँचल मुझसे 

फिर क्यूँ, सुनी हो गई मेरी गोद 

है रहस्य ये कैसा, अब तो बोल  


तुममें मैं थी या मुझमें तू 

तुमसे मैं थी या मुझसे तू 

जाना तेरा क्यूँ लगता है,

कर गई मुझको खाली तू 

बन्धन था ये कर्मो का 

या, बंधे थे दिल से माँ 

ये रहस्य अब तो बतला


जब होती नाराज़ मै तुमसे 

इतरा के कहती तुम 

 छोड़ मुझे कहाँ जाओगी

 मेरी एक आवाज को सुनकर,

दौड़ी-दौड़ी आ जाओगी

क्यूँ था, मुझ पर इतना एतबार 

ये रहस्य  बतला दो माँ 



अब, दे रही मैं तुझको आवाज

क्यूँ,  बन बैठी हो अनजान

नाता मुझसे तोड़ चुकी हो 

या मुझसे तुम हो नाराज़

जा बसी हो कौन नगर तुम 

ढूँढू तुमको कौन से द्वार

 इतना तो बतला दो माँ 


बहुत हठ किया था तुमने मुझसे

अब है मेरी बारी माँ 

आ जाओ तुम पास मेरे
  
या अपनी याद बिसरा दो माँ 

जीवन मेरा उलझा है 

अब तो,ये रहस्य सुलझा दो माँ 

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कुछ प्रश्नों के उत्तर कभी नहीं मिलते....इसके भी नहीं मिलेंगे 
क्योंकि, अब तुम लौट के कहाँ आने वाली हो.....


माँ की पहली पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि 
वो जहाँ कही भी हो परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें। 

"हमारी जागरूकता ही प्राकृतिक त्रासदी को रोक सकती है "

मानव सभ्यता के विकास में नदियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है तो उनकी वजह आने वाली बाढ़ भी हमारी नियति है। हज़ारों वर्षों से नदियों के पानी क...